Thursday, April 30, 2020

चाह किस जीत की


पंथ-जीवन का कँटीला मन-बटोही है हठीला।


तयशुदा है अंत लेकिन, रुक न जाना कहीं, मीत तुम हारकर।


अश्रु किसके लिए, दर्द किस बात का।


सब छलावा यहाँ, एक दो रात का।


मुस्कुराते वही, गुनगानते हैं जो, दूसरों की खुशी-में-खुशी जानकार।


किस पराजय से डर, चाह किस जीत की।


व्यर्थ है लालसा, राह में मीत की।


काल से नित समर, लड़ते रहना अथक, थम न जाना कहीं, मृत्यु का ध्यानकर।।


रुक न जाना कहीं, मीत तुम हारकर ||


किसलिए बन्धनों में बँधे जा रहे। .मधु समझकर ये विष क्यूँ पिए जा रहे।


 


बाबा बलदेव शाह जी


सब रब धे बंदे ने, 
न कोई पेडे, न चंगे ने। 
फकीरी पैशा है जिसदा, 
उसदे न कोई काज; न पंगे ने। 
तुर पैदे ने  मीला, 
पावे होन खड़ावा या पैर नंगे ने। 
जदो व जुल्मी कोई भटके, 
हक/सच तो बाबा जी ने सब पुठे टंगे ने। 


सब रब धे बंदे ने, 
न कोई पेडे, न चंगे ने। 
फकीरी होवे पैशा जिसदा, 
ओ रब दे  रंग विच रंगे ने, 
सब सजदा कर कर गया, 
जो अकड़ अकड़ सामने तो लंगे ने। 
जीडे सोचते ने,थले लावन नूं, 
औ दिमाग शैतान ते गंदे ने। 
मल मल हथ मे यार(रब) मनावा, 
जो वेख वेख मेनू हसदे औ अन्ने ने। 


सब रब दे बंदे ने, 
न कोई पेडे, न चंगे ने। 
फकीर इक इक सां विच करदे सिमरन, 
होनदे उनदे दिल ते दिमाग विच दंगे ने। 
सबदी खाली झोलिया परती, 
जो रहन गुरु दे संगे  ने। 
उस धरत विच कोई की वश करे, 
जिथे मेरे बाबा जी खंगे ने। 



हे सच मे डुबा एक फकीर मेरा गुरु, मुझे तो बस जन्नत ए दरबार जाना हैं। 
करके हर घड़ी,हर पल सजदा अपने गुरु "बाबा बलदेव शाह जी" का,इनसे एक पाक रिश्ता निभाना हैं। 
फकीरों का नियम तो बस हक और सच है, बस जिन्दगी का यही नियम बनाना हैं। 
चल देता हूँ वक्त-बेवक्त दरबार मे मैं, यह तो बस मेरे रब से मिलने का  बहाना हैं। 
भरदी खाली झोलियां मेरे बाबा जी ने सबकी, हे कर्जदार मेरे बाबा जी का सारा  जमाना हैं। 
छोड़ के बस्ती कलयुग की, अब यह जीवन मेरे गुरु के रहमो कर्म के नाम करवाना हैं। 
बंद करदे सारी दुनिया अपने दरवाजे मेरे लिए फिर भी बेपरवाह हूँ मैं, मुझे तो अपने बाबा जी के दिल मे  घर बनाना हैं। 
झूठ बोले कोई पाखंडी मेरे रब के दरबार में, ऐसे ढोंगी से बाबा जी  ने खुद ही  सच बुलवाना हैं। 
हे पाक दरबार मेरे बाबा जी का, सच्चे मन से शीश झुकाना हैं। 
करता हूं सजदा लख लख बार, मन मेरा तो बाबा जी का दिवाना हैं। 
रखे कदम मेरे बाबा जी के दरबार मे अगर कोई, पहले उसे उच्च-नीच, अमीर-गरीब, जात-पात की सोच को भुलाना हैं।
दिन रात मग्न है फकीर इबादत मे दरबार पर ,फिर भी उस पाक जमीन से किसी ने क्या चुराना हैं। है खुद अंतर्यामी जो,उस बाबा जी  किसी ने क्या छुपाना हैं । 
है हर सवाल का जवाब मेरे गुरु के पास, वो तो सर्वोत्तम ज्ञान का  खजाना हैं। 
कहते है गुरु जी कण कण मे रब है, हर जीव मे रब है; तो किसी भी पशु, पक्षी और अन्य जीवों को नहीं सताना हैं। 
मेरा देह ही सब कुछ है और तन, मनहसे किसी को दु:ख देना ऐसी सोच को हटाना हैं। 
असंभव को  संभव कर दिया, नवाजा अपनी झोली से भक्तों को खजाना हैं। 
शब्दों का कोई मोल नहीं दरबार मे, गुरु की वाणी का तो खामोशी मे भी मधुर तराना हैं। 
क्या डुबाऐ गा कोई उसको जो "रब का बन्दा" और "गुरु का दिवाना" हैं। 
बात है सब "दुआ और फरियाद" की  सच्ची बाकी तो बस फसाना हैं।


 


Wednesday, April 29, 2020

घर बैठे पता लगाएं कि Aadhar Card से कौन सा मोबाइल नंबर है रजिस्टर्ड

अगर आप ये चेक करना चाहते हैं कि आधार से आपका कौन सा नंबर रजिस्टर्ड है तो आप यूआईडीएआई की वेबसाइट पर जाकर मिनटों में इस बात का पता लगा सकते हैं।



आजकल छोटे से छोटे काम में आधार कार्ड (Aadhar Card) की जरूर पड़ ही जाती है। साथ ही कई ऐसी सुविधाएं है, जिनके लिए आधार को उससे लिंक करना जरूरी हो गया है। अब तो पैन कार्ड से लेकर इश्योरेंस पॉलिसी और यहां तक की म्यूचुअल फंड स्कीम तक को आधार कार्ड से लिंक करना अनिवार्य है। लेकिन अगर आप ये भूल गए हैं कि आधार से आपका कौन सा नंबर रजिस्टर्ड है तो आप यूआईडीएआई की वेबसाइट पर जाकर मिनटों में इस बात का पता लगा सकते हैं।


UIDAI ने अपने ट्वीट के साथ शेयर किया ट्यूटोरियल लिंक


आधार कार्ड (Aadhar Card) जारी करने वाली संस्था यूनिक आइडेंटिफिकेशन ऑथोरिटी ऑफ इंडिया यानि UIDAI ने एक ट्वीट किया है, जिसमें उसने आधार नंबर के वेरिफिकेशन प्रोसेस को पूरा करने के लिए एक यूट्यूब ट्यूटोरियल का लिंक दिया है। इस लिंक पर जाकर आप ये भी पता लगा सकते हैं कि आपको मोबाइल / ईमेल आईडी आधार के साथ पंजीकृत है या नहीं।


क्या है प्रकिया?


सबसे पहले आपको uidai.gov.in पर लॉग इन करना होगा। उसके बाद आधार सर्विसेज पर जाकर वेरिफाई ई- मेल/ मोबाइल नंबर वेरिफाई ऑप्शन पर क्लिक करें। फिर यहां पर आधार कार्ड नंबर के साथ ईमेल आईडी या फिर अपना मोबाइल नंबर और सिक्योरिटी कोड डालें।


उसके बाद इसको जानने के लिए कि आपके आधार के साथ कौन सा मोबाइल नंबर लिंक है, सबसे पहले अपना आधार कार्ड नंबर डालें। उसके बाद मैनुअली मोबाइल नंबर डालकर चेक करें। वहीं नंबर एंटर करें जो आपको लगता है कि ये आपके आधार से लिंक हो सकता है। इसके साथ ही ईमेल को भी इस प्रक्रिया से चेक किया जा सकता है।


अगर आपने जो नंबर/ ईमेल डाला है, वहीं नंबर या ईमेल आपके आधार कार्ड से लिंक होगा तो आपके ईमेल या मोबाइल नंबर पर एक वन टाइन पासवर्ड (OTP) आएगा। इस OTP को एंटर करके वेरिफाई कर लें।


 


Monday, April 27, 2020

कोरोना काल में गरीबों की भूख मिटा रहे कानपुर के युवा

कानपुर के युवाओं ने कोरोना काल के इस लॉक डाउन की कठिन परिस्थितियों में भी आपसी सहयोग से सरकार के साथ कंधा से कंधा मिला कर इस मुश्किल घड़ी में अपना कर्तव्य निभाया जो कि अत्यंत काबिले तारीफ है और "एक भारत श्रेष्ठ भारत" की अवधारणा को चरितार्थ करता है |


युवाओं के एक समूह के द्वारा आपसी सहयोग से सड़क किनारे रहने वाले गरीब परिवार तथा झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले नागरिकों को खाने के लिए भोजन तथा 6 माह से कम बच्चों के लिए 15 लीटर दूध वितरित किया जा रहा है |


जिसमें टीम जूही गढ़ा, जूही राखी मंडी, जूही टायर मंडी, मिलेट्री कैंप कॉलोनी तथा किदवई नगर जैसे इलाकों में नियमित रूप से 250 से अधिक लोगों को भोजन करा रही है |



टीम द्वारा न सिर्फ क्षेत्र के नागरिकों बल्कि जानवरों के लिए भी नियमित भोजन व चारे का प्रबंध किया जा रहा है और मानवता का फर्ज़ निभाते हुए कानपुर नगर के नागरिकों में जागरूकता के लिए बस्तियों एवं मोहल्लों व सोसाइटी आदि में कोरोना वायरस से बचने के उपाए बताए जाने के साथ ही सेनीटाइजेशन का कार्य कर इस कार्यक्रम को सफलता के पैमाने पर स्थापित किया जा रहा है |




टीम में सुमित , प्रतीक , जयपाल , सरलेश तथा अजय सक्रिय सहयोग दे रहें हैं | आपको बताते चलें कि यह टीम शहर के वरिष्ठ नागरिकों , दिव्यांगजनों तथा श्रमिकों के लिए शासन द्वारा प्रदान की जा रही योजनाओं की जानकारी देने के साथ ही गंभीर रूप से बीमार वृद्धजनों के उपचार हेतु  चिकित्सीय परामर्श व औषधियों को उपलब्ध कराने का कार्य भी बेहतरीन प्रकार से कर रहे हैं |



Sunday, April 26, 2020

भारत में प्रिंट मीडिया की शुरुआत इस अख़बार से हुई थी

आज के दौर में न्यूज़ पाना बेहद सरल हो गया है.चाहे अखबार हो,टी वी हो,मोबाइल हो इन सबने पत्रकारिता को बेहद सरल और सुलभ कर दिया है. हालांकि पत्रकारिता किसी-न-किसी रूप में मानव सभ्यता के इतिहास में शुरूआत से ही रही है. लेकिन उस दौर की पत्रकारिता आज की पत्रकारिता से बिल्कुल अलग हुआ  करती थी.


चाहे अशोक के समय में पत्थरों की शिलाओं पर लिखे हुए लेख हों या मुगल काल में खबरनवीस या वाकयानवीस, इन सबको पत्रकारिता का ही प्रारंभिक रूप माना जाता है.ये शिलालेख या वाकयानवीस शासन की बात को जनता तक और जनता की बातों को शासन तक पहुंचाने के प्रमुख माध्यम हुआ करते थे.बात जब  प्रिंट पत्रकारिता की करें तो देश में पहली बार पत्रकारिता के लिए प्रेस का इस्तेमाल 29 जनवरी, 1780 को किया गया.


आज से 238 साल पहले यानी सन् 1780 में देश के पहले न्यूज पेपर बंगाल गजट का कोलकाता से प्रकाशन आरंभ हुआ. र्इस्ट इंडिया कंपनी के एक कर्मचारी जेम्स आगस्टस हिक्की ने पहली बार कलकत्ता से चार पृष्ठों के एक अंग्रेजी समाचार पत्र ‘बंगाल गजट का प्रकाशन आरंभ किया.



इस तरह भारत में मुद्रित पत्रकारिता का युग  प्रारंभ हुआ , जिसका श्रेय हिक्की को जाता है. ‘बंगाल गजट आर कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर नामक यह पत्र ‘बंगाल गजट या ‘हिक्की गजट के नाम से भी प्रसिद्ध था, क्योंकि इसका प्रकाशन हिक्की किया करते थे.


अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों के दौरान भारत में रह रहे कुछ यूरोपीयों के अंदर तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों के विरूद्ध गहन आक्रोश और असंतोष व्याप्त था.कलकत्ता इस विक्षोभ का केन्द्र बिन्दू बना. इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ही ‘हिक्की गजट का प्रकाशन हुआ और उसे देश का पहला समाचार पत्र होने का गौरव प्राप्त हुआ.इससे ही प्रेरणा लेकर भारत में अन्य प्रमुख स्थानों जैसे- मद्रास (अब चेन्नई), बम्बई (अब मुंबई) और दिल्ली जैसे जगहों से भी अंग्रेजी के साथ- साथ कई अन्य भारतीय भाषाओं में भी समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ.


क्यों शुरू  किया हिक्की ने पत्रकारिता का कार्य


हिक्की ने पत्रकारिता का कार्य क्यों शुरू किया, इसके बारे में उसने अपने पत्र में लिखा है.उसका कहना था कि कंपनी के अधिकारियों द्वारा भारत में जो लूट मचार्इ गर्इ थी, उससे वह आहत थे. अन्य कर्मचारियों की तरह वह भी यह सब देखते हुए चुप नहीं बैठ सकते थे. इसी वजह से ‘अपने मन और आत्मा की स्वतंत्रता हासिल करने के लिए उन्होंने पत्रकारिता का काम शुरू किया.यह पत्र एक ऐसा साप्ताहिक होने का दावा करता था, जिसकी मुख्य सामग्री राजनीतिक और वाणिज्यिक थी. ‘बंगाल गजट के पहले अंक में हिक्की ने अपने पत्र के उददेश्यों के बारे में लिखा-

“A weekly political and commercial paper, open to all parties but influenced by none.”राजनीतिक और वाणिज्यिक खबरों के अलावा इस पत्र में शादी-ब्याह व अन्य तत्कालीन सामाजिक विषयों जैसे बाजार भाव आदि की भी जानकारियां प्रकाशित की जाती थीं.इस प्रकार समाचारों के प्रति कौतूहल हिक्की ने ही पैदा किया था.


‘संपादक के नाम पत्र कालम को प्रारंभ करने का श्रेय भी ‘बंगाल गजट को ही जाता है.इस कालम के माध्यम से यह भी पता चलता है कि पत्र जनता की भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का पक्षधर था.यह एक लोकतांत्रिक सोच को ही दर्शाता है.


25 मार्च, 1780 के अंक में फिलन थ्रोप्स के नाम से संपादक के नाम एक पत्र छपा था, जिसमें कोलकाता के पोर्तगीज श्मशान घाट की गंदगी के बारे में शिकायत की गर्इ थी.


उन दिनों र्इस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने निजी व्यापार चलाकर तथा अन्य तरीकों से भारी लूट मचा रखी थी. हिक्की ने इन सब गड़बड़ियों का भांडा-फोड़ करना शुरू किया. इसके लिए समाचार पत्र से अच्छा माध्यम और क्या हो सकता था.


हिक्की के गजट की महारत र्इस्ट इंडिया कंपनी के कर्मियों की निजी जिंदगी का भांडाफोड़ करने में थी.अपने कृत्यों को सबके सामने लाया जाना उस समय के अंग्रेज अधिकारियों को नागवार गुजरा. उन्होंने हिक्की को रोकने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिये.हिक्की ने जब वारेन हेसिटंग्स की पत्नी और कुछ अन्य आला अफसरों के विरुद्ध व्यक्तिगत और तीखे प्रहार किये, तब उसे जीओपी (जनरल पोस्ट आफिस) के द्वारा समाचारपत्र भेजने की सुविधा से वंचित कर दिया गया.


हिक्की ने इन सब के बावजूद अपना काम जारी रखा.उन्होंने भ्रष्ट अंग्रेज अधिकारियों के खिलाफ कठोर और निंदात्मक भाषा का प्रयोग करना शुरू किया.’बंगाल गजट ने तत्कालीन गवरनर जनरल वारेन हेसिटंग्स को भी नहीं छोड़ा.अपने पत्र के माध्यम से हेसिटंग्स को अनेक नामों से हिक्की ने पुकारना शुरू किया, जैसे-Mr. Wronghead, The Dictator, The Great Moughal आदि.


अपने पत्र के एक अंक में हिक्की ने हेस्टिंग्स और उनकी पत्नी तथा मुख्य न्यायाधीश सर एलिज इम्पी के बारे में चरित्र हनन संबंधित बातें लिखीं.इस वजह से उन पर मानहानि का मुकदमा चलाया गया. दोष सिद्ध होने पर उन्हें भारी जुर्माना चुकाना पड़ा तथा जेल की सलाखों के पीछे भी बंद रहना पड़ा.इन सबके बावजूद भी हिक्की ने अपना काम जारी रखा.


इस बीच यूरोपीय लोगों की अगुवार्इ में करीब चार सौ हथियारबंद लोगों की भीड़ ने हिक्की के प्रेस पर धावा बोल दिया. हिक्की से जमानत मांगी गर्इ, जिसे वह नहीं दे सका और परिणामस्वरूप उसे जेल भेज दिया गया.उन पर चले मुकदमे में एक आरोप में एक साल की कैद और दो सौ रुपये जुर्माने की सजा हुर्इ, वहीं दूसरे आरोप में मुख्य न्यायाधीश ने वारेन हेसिटंग्स को पांच हजार रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में चुकाने का आदेश पारित किया.इस तरह भारत में पत्रकारिता पर शासकीय अंकुश और दबाव उसके जन्म के साथ ही शुरू हो गया.


क्या था वॉरेन हेस्टिंग्स का आदेश


हिक्की की पत्रकारिता पर वारेन हेसिटंग्स ने पहला प्रहार 14 नवंबर, 1780 को यह आदेश जारी करके किया- ”आम सूचना दी जाती है कि एक साप्ताहिक समाचार पत्र जिसका नाम ‘बंगाल गजट आर कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर है, जो जे. ए. हिक्की द्वारा मुदि्रत किया जाता है, के अंकों में निजी जिंदगी को कलंकित करने वाले अनेक अनुचित अंश पाये गये हैं, जो शांति भंग करने वाले हैं, अत: इसे जीओपी के माध्यम से प्रसारित होने की और अधिक अनुमति नहीं दी जा सकती. यह भारत में समाचार पत्र और शासन के बीच टकराव की प्रथम घटना थी.


इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में जिस जेम्स आगस्टस हिक्की को पत्रकारिता के प्रादुर्भाव का श्रेय जाता है, उसी के खाते में व्यवस्था से टकराने और अभिव्यकित की स्वतंत्रता के लिए प्रताड़ना के रूप में कीमत चुकाने का सम्मान भी दर्ज है.


अपने ऊपर लगाए गये जुर्मानों और मुकदमों से तंग आकर हिक्की अंतत: पूरी तरह से टूट गये. मार्च, 1782 में इस पत्र का प्रकाशन बंद हो गया.’हिकीज गजट के 29 जनवरी, 1780 से 16 मार्च, 1782 तक प्रकाशित होने की पुष्टि होती है, यद्यपि इसके सभी अंक उपलब्ध नहीं हैं.राष्ट्रीय पुस्तकालय कोलकाता के दुर्लभ ग्रंथ संग्रह में केवल 29 जनवरी, 1780 और 5 जनवरी, 1782 के अंक उपलब्ध हैं.


‘बंगाल गजट का प्रकाशन बंद होने का कारण सिर्फ हिक्की के ऊपर लगाए गए आरोप ही नहीं थे, बल्कि इसके दूसरे भी कारण थे.’बंगाल गजट के संरक्षक फिलिप फ्रांसिस को भी हिक्की के मुफलिसी के दिनों में ही इंग्लैंड वापस लौट जाना पड़ा. इस वजह से हिक्की बिल्कुल अकेले पड़ गये और उनके पत्र को सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा. गवर्नर जनरल हेसिटंग्स ने न केवल पत्र के प्रकाशन के लिए उपयोग में लाए जाने वाले टाइप्स जब्त कर लिए बल्कि हिक्की के प्रेस को बंद भी करवा दिया.

ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि प्रकाशन की दृष्टि से देश का पहला पत्र होने के कारण यह अखबार हर कसौटी पर खरा उतरता था. कर्इ विद्वानों ने ‘बंगाल गजट को हल्का, अगंभीर और चटपटा अखबार कहकर हिक्की की आलोचना भी की है. किन्तु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारत में पहला समाचार पत्र प्रकाशन करने का श्रेय जेम्स आगस्टस हिक्की को ही जाता है.भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है.


हिक्की ने बिना डरे अखबार के जरिए भ्रष्टाचार और ब्रिटिश शासन की आलोचना की. हिकी को अपने इस दुस्साहस का अंजाम भारत छोड़ने के फरमान के तौर पर भुगतना पड़ा था.


जेम्स हिक्की भारतीय पत्रकारिता के पितामह माने जाते हैं. ब्रिटिश राज में अपना स्वंय का समाचार पत्र प्रकाशित करने का साहस रखने वाले ये उस समय के एकमात्र पत्रकार थे.


 


Saturday, April 25, 2020

शिक्षा की सूचना एवं तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता: परिणाम एवं दुष्परिणाम


शिक्षा न केवल मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग ही करती है बल्कि यह मनुष्य के सोचने की क्षमता का भी इस कदर विकास करती है ताकि वह स्वयं का, समाज का एवं संपूर्ण विश्व का विकास कर सके। भारत जैसे देश जो की अंग्रेजी दासता से काफी देर से मुक्त हुए; अपनी बड़ी आबादी की वजह से शिक्षा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा विकास करने के लिए कार्यरत हैं क्योंकि सिर्फ शिक्षा ही भारत को विकासशील से विकसित बनने में सहायता कर सकता है। इसलिए यह जरूरी है की आधुनिक विश्व के बाजारीकरण एवं उपभोक्तावाद के बदलते आयाम में शिक्षा में भी बदलते अविष्कारों को सम्मलित किया जाए। 


इसी क्रम में आज विश्वव्यापी COVID-19 महामारी के समय विश्व के अधिकांश देश जोकि लॉक डाउन से गुजर रहे हैं भारत भी इस से अछूता नहीं है और जिस प्रकार भारत ने इस समस्या से निपटने के प्रयास एवं उपाय किये हैं उसकी विश्व में सराहना हो रही है जिसमे से एक शिक्षा प्रबंधन भी है।


भारत के लगभग सभी स्कूलों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में इस समय नव अविष्कारों के प्रयोग के रूप में Work from  Home के तहत  शिक्षा में ICT की भूमिका को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है ताकि महामारी से शिक्षा को कोई नुकसान न पहुँच सके और इसी के साथ ही एक नयी परिचर्चा भी शुरू हुई है की भारत जैसे विकासशील देश में अब शिक्षा का भविष्य में क्या रूप होगा क्योंकि कहीं न कहीं विश्वव्यापी आर्थिक मंदी दस्तक देने वाली है और बाजारीकरण और उपभोक्तावाद के इस दौर में शिक्षा, छात्र एवं शिक्षक दोनों के लिए गुणवत्ता, रोजगार एवं अन्य मामलों में एक गंभीर चिंता का विषय बननेवाला है।


बहरहाल लॉक डाउन के इस  समय में  ICT एक सहायक के रूप में उभरा है जिससे हालाँकि क्लासरूम जैसी शिक्षा तो नहीं मिल पा रही है परन्तु उसकी भरपाई करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। देखना यह है की शिक्षा में ICT के अत्यधिक अत्यधिक प्रयोग/योगदान कहीं पूंजीवादी मानसिकता को विकसित होने में मदद न कर दे क्योंकि भारत जैसे विशाल जनसँख्या वाले देश में जहाँ का अधिकांश गरीबी एवं गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत  कर रहा है वह पूंजीवादी मानसिकता वाली शिक्षा व्यवस्था से कहीं बहार न हो जाए। अगर ऐसा होता है तो यह देश हित  एवं देश के विकास के लिए उपयुक्त नहीं है।


क्लासरूम शिक्षण में ICT का उपयोग काफी हुआ है और यह सफल भी प्रतीत होता है क्योंकि इसके संतोषजनक परिणाम सामने आये हैं परन्तु जब ICT का प्रयोग एवं उपयोग Online Teaching Learning में हो रहा है तब इसमें फायदों के साथ साथ समस्याएं भी दिखती हैं।  


ICT के प्रयोग से एक बात तो साफ़ है की इस से उपभोक्तावाद में परिवर्तन आना स्वाभाविक है जोकि फायदेमंद के साथ नुकसानदेह भी है। एक तरफ अब उपभोक्ता (छात्र एवं शिक्षक) में कॉपी-किताब से अलग होकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पर समझ, पहुँच एवं निर्भररता बढ़ेगी वहीँ दूसरी ओर फइंफ्रास्ट्रक्चर में कमी आने की संभावना दिखाई पड़ती है। गौरतलब है की अगर Online Teaching Learning होती है तो शिक्षकों एवं छात्रों को रोज रोज नए नए कपड़े  बदल कर कॉलेज एवं क्लासरूम जाने की आवश्यकता नहीं रहेगी, न तो सजने सँवरने की आवश्यकता होगी और न ही उसके लिए सैंदर्य प्रसाधनों को खरदीने की आवश्यकता होगी और शायद रोज नहाने की भी आवश्यकता न रहे क्योंकि इसमें Classroom Teaching की तरह face to  face इंटरैक्शन अत्यधिक नहीं हैं। ICT के अंतर्गत Work  from Home में एक खतरा अनुशाशित जीवन में कमी आने को लेकर  भी है क्योंकि इसमें आप कब उठते हैं, कब नहाते हैं, कब पढ़ते हैं, कब पढ़ाते हैं  इसमें काफी ढील दी गयी है यानी आपको इसमें एक Disciplined Life जीने की कोई आवश्यकता  नही है। अब यह सकारात्मक प्रभाव है या नकारात्मक यह तो उपभोक्ता ही तय करेगा। लेकिन इस से शायद पर्यावरण को काफी फायदा होगा यानी की यह Environment फ्रेंडली होने के साथ साथ Sustainable Development के लिए भी काफी उपयुक्त है।


इसी तरह इसमें समय के बचत की भी बात की जा रही है क्योंकि छात्र कम समय में ज्यादा ज्ञान हासिल कर सकते हैं परन्तु क्या यह मुमकिन है? इतिहास गवाह है की बड़े बड़े दार्शनिकों एवं वैज्ञानिकों को भी ज्ञान प्राप्त करने में एक विशाल समय अंतराल लगा है एवं लगता है तो फिर यह कैसे संभव है की ICT से ज्ञान शीघ्र ही प्राप्त होगा. जहाँ तक मेरी समझ है एक और गंभीर समस्या Science एवं Commerce विषयों को लेकर भी है क्योंकि इनमे Practical और Field Study की आवश्यकता बहुत ज्यादा होती है क्योंकि बगैर एक्सपेरिमेंट के प्राप्त किया गया विज्ञान एवं ज्ञान साइंटिफिक नहीं होता। 


मेरी समझ के अनुसार शिक्षा में ICT की अत्यधिक निर्भरता की एक गंभीर समस्या और भी है जो स्वयं ICT के अंतर्गत ही है। पूरे विश्व में ICT के बढ़ते प्रयोग एवं उपयोग में पूंजीवादी मानसिकता का ज़बरजस्त विकास हो रहा है क्योंकि विश्व के अधिकांश देश आज भी Operating System के रूप में Microsoft, Apple एवं Google जैसी कंपनियों पर ही निर्भर है और इनमे प्रयुक्त होने होने 2nd और 3rd party के Softwares/ Apps भी ज्यादातर इन्ही कंपनियों के हैं या फिर अन्य पूंजीवादी देशों या चाइना के हैं जो शुरुवात में ग्राहक एवं उपभोक्ता को मुफ्त सेवा का लालच देकर अपनी ओर आकर्षित करते हैं  और जब आपकी निर्भरता बढ़ जाती है तो सेवा में बढ़ोतरी के रूप में आपको प्रोडक्ट खरीदने के लिए उकसाते हैं, अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो फिर आप अनचाहे Add के रूप में एक मानसिक प्रताड़ना का शिकार होने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इसी क्रम में एक और समस्या Security Breach को लेकर भी है जो हाल ही में Zoom App के रूप में पूरी दुनिआ के सामने आया है। 


समस्याएं चाहे जो भी हों  ऐसा लगता है की ICT का अत्यधिक प्रयोग/उपयोग एवं Work फ्रॉम Home को तरजीह देने से छात्रों एवं शिक्षकों के Smart होने में बढ़ोतरी होगी, समय एवं पैसे की बचत होगी, क्योंकि किसी शब्द को ढूंढने के लिए पुस्तक के पृष्ठ संख्या को उलटने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी केवल Ctrl+F  बटन से ही आपका काम हो जायेगा और अंततः बदलते परिवेश में स्मार्ट फ़ोन की तरह अब आपकी स्टडी और टीचिंग भी स्मार्ट हो जाएगी और शायद आप भी स्मार्ट हो जायेंगे, पर क्या वाकई? यह सोचने का विषय है।


 


Wednesday, April 22, 2020

इंजीनियर ने तैयार की डिवाइस,कोविड-19 के फैलाव को रोकने में हो सकती है सहायक


देश इस वक्त कोविड-19 कोरोनावायरस के खिलाफ एक जंग लड़ रहा है।इस जंग में सभी देशवासी एक सिपाही के तौर पर जंग लड़ रहे हैं। जिसमें डॉक्टर,पैरामेडिकल स्टाफ और पुलिसकर्मी अहम भूमिका निभा रहे हैं तो वहीं इस जंग में सहायक बनने के लिए इंजीनियर शिवम श्रीवास्तव ने अनोखी पहल करी है।इंजीनियर शिवम श्रीवास्तव ने एक गैजेट तैयार किया है जो कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सहायक हो सकता है।


स्वास्थ्य मंत्रालय भारत द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार हर व्यक्ति को थोड़ी थोड़ी देर में साबुन से या अल्कोहल बेस्ड सैनिटाइजर से हाथ को साफ करते रहना है और जहां तक हो सके अपने हाथों को अपने चेहरे से दूर रखना है।वैसे तो कोरोना वायरस की दवाई अभी तक नहीं बन सकी है लेकिन इसके बचाव के उपाय बताए गए हैं।



एक सर्वे के अनुसार यह जानकारी मिली है कि ना चाहते हुए भी एक व्यक्ति
एक घंटे में कई बार अपने हाथ को अपने चेहरे के पास ले जाता है।जिससे कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने का खतरा ज्यादा होता है क्योंकि हाथों के जरिए ही वायरस शरीर के अंदर प्रवेश कर जाता है।


इंजीनयर ने तैयार की प्रॉक्सिमिटी सेंसर डिवाइस


कानपुर के रतनलाल नगर में रहने वाले 32 वर्षीय इंजीनियर शिवम श्रीवास्तव आईआईटी कानपुर में सोलर एनर्जी रिसर्च एंक्लेव में बतौर प्रोजेक्ट इंजीनयर कार्य करते हैं।इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग से बीटेक करने के बाद इंजीनियर शिवम श्रीवास्तव के रिसर्च पेपर इंटरनेशनल कांफ्रेंस में भी प्रकाशित हो चुके हैं।इंजीनियर शिवम हर वक्त नई तकनीकों पर कार्य करते रहते हैं।


वर्तमान में भी देश में फैले कोरोना वायरस की विकट समस्या को देखते हुए इंजीनियर शिवम ने अनोखी पहल करी और लॉक डाउन के चलते पर्याप्त संसाधन उपलब्ध न होते हुए भी एक मैग्नेटिक सेंसर डिवाइस तैयार कर दी। इंजीनियर शिवम ने बताया की यह प्रॉक्सिमिटी सेंसर डिवाइस मैग्नेटिक सेंसर डिवाइस के तौर पर कार्य करती है और जिस तरह से कोविड-19 का संक्रमण चल रहा है उसको कहीं ना कहीं रोकने में सहायक हो सकती है।वही इस डिवाइस को पर्याप्त संसाधनों की उपलब्धता पर काफी छोटा भी बनाया जा सकता है जिससे लोगों को इसको पहनने में दिक्कत ना हो।


इस तरह कार्य करती है डिवाइस


इंजीनियर शिवम श्रीवास्तव के अनुसार इस डिवाइस को व्यक्ति अपने हाथ में वॉच की तरह यूज कर सकता है और शर्ट के कॉलर में मैग्नेट लगा सकता है जिसका भार बिल्कुल भी नहीं होता।वही जैसे ही व्यक्ति अपने हाथ को अपने चेहरे की तरफ ले जाता है इस डिवाइस से बीप की आवाज सुनाई देने लगती है।जिससे व्यक्ति अपने हाथ को चेहरे पर जाने से रोक सकता है और कोविड-19 वायरस के फैलाव को रोकने में सहायता कर सकता है।


रक्षा सूत्र दिया है नाम


इंजीनियर शिवम श्रीवास्तव ने इस डिवाइस को रक्षा सूत्र नाम दिया है।उनका कहना है कि जिस तरह से यह डिवाइस कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने में सहायक होगी।जिससे आम जनमानस की रक्षा हो सकेगी।इसी को देखते हुए उन्होंने इस डिवाइस को रक्षा सूत्र का नाम दिया है।उनका कहना है कि जल्द ही वह जिला प्रशासन को अपनी डिवाइस के विषय में अवगत कराएंगे और अगर मंजूरी मिल जाती है तो लॉक डाउन समाप्त होने के बाद आमजन के लिए यह डिवाइस तैयार करेंगे।



संसाधनों के अभाव में तैयार कर दी डिवाइस


इंजीनियर शिवम श्रीवास्तव ने बताया कि लॉक डाउन होने के कारण उनको पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाए। उन्होंने बताया कि घर में पड़ी पुरानी चीजों में से कुछ पार्ट्स निकाल कर उनको एकत्र कर डिवाइस तैयार कर दी है। संसाधनों की उपलब्धता पर यह डिवाइस आकार में बहुत ही छोटी की जा सकती है और आसानी से तैयार की जा सकती है।डिवाइस को बनाने के लिए उन्होंने एक पुरानी घड़ी,बैटरी और एक अलार्म क्लॉक में से बजर निकालकर उसका यूज़ किया है।


Tuesday, April 21, 2020

सावधान मूवमेंट द्वारा महिलाओं के तनाव को कम करने का प्रयास


सावधान मूवमेंट की पहल पर लॉक डाउन के समय का सदुपयोग करने के टिप्स देने हेतु 'टीम लॉकडाउन परामर्श'  विभिन्न व्यक्तियों की प्रतिदिन काउंसलिंग कर रही है!
 सावधान मूवमेंट के प्रमुख विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना के जिला नोडल अधिकारी डॉ सुधांशु राय ने बताया  कि डॉक्टर कामायनी शर्मा रुचि त्रिवेदी प्रीति पालीवाल और अनुराग पांडे प्राइमरी स्कूल के सैकड़ों छात्र छात्राओं को रोज नई-नई तकनीकों से पढ़ने की विधा बता रहे हैं ! महिलाओं के तनाव से संबंधित प्रश्नों को डॉक्टर कामायनी शर्मा अपने जवाब से संतुष्ट कर रही हैं तो वही रुचि त्रिवेदी प्रतिदिन नए-नए वीडियोस बनाकर एक खुशनुमा माहौल भी पैदा कर रही हैं !राजीव मिश्रा एवं डॉक्टर नीता अग्निहोत्री उच्च शिक्षा एवं शोध के छात्र छात्राओं के साथ सामाजिक एवं शैक्षिक विश्लेषण पर परामर्श कर रहे हैं डॉ हेमंत मोहन प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में कोरोनावायरस के  लक्षण  पर टेलीफोन पर परामर्श दे रहे हैं डॉक्टर किट्टी टंडन और अनुराधा सिंह के पास समय का सदुपयोग कैसे किया जाए इससे संबंधित प्रश्न आ रहे हैं!
 डॉक्टर शिवा मिश्रा भावना श्रीवास्तव एवं  जीएस कोस्टा योग के द्वारा लोगों का मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहयोग कर रहे हैं ! पारुल भार्गव एवं गुरुचरण सिंह छात्रों को पर्सनैलिटी के टिप्स दे रहे हैं सबसे ज्यादा महिलाएं नए-नए व्यंजनों को बनाने की विधि श्रीमती प्रभा पांडे से सीख रही है जिसमें आज उन्होंने केक बनाने की विधि दी है!
एक प्रश्न के जवाब में डॉक्टर सुधांशु राय ने कहा इस समय जो भी चुनौतियां हैं उसको अवसर में बदलने की कोशिश करें!


डॉ सुधांशु राय
कोविड-19 सावधान मूवमेंट


Monday, April 20, 2020

महाराष्ट्र साधू हत्या प्रकरण से संत समाज आक्रोशित , 101 लोग हिरासत में कुमार विश्वास ने ट्वीट कर दिया कड़ा संदेश


महाराष्ट्र के पालघर (Palghar Mob Lynching Case) में साधुओं की मॉब लिंचिंग का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. सोशल मीडिया पर इंसाफ की मांग करते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग की जा रही है. मशहूर कवि कुमार विश्वास (Kumar Vishwas) ने भी इस घटना पर दुख और गुस्सा जाहिर किया है. उन्होंने कहा है कि यह घटना महाराष्ट्र सरकार के माथे पर कलंक है. दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिले |


कुमार विश्वास ने ट्वीट किया, 'महाराष्ट्र शासन के माथे पर कलंक है पालघर की लोमहर्षक घटना! छत्रपति महाराज शिवाजी की धरा पर मित्रता-शत्रुता से उपर उठ चुके साधुओं को अगर उन्मादी जाहिल भीड़ घेर कर मार दें तो यह उस ऐतिहासिक परम्परा पर धब्बा है जिसमें शत्रुपक्ष की महिलाओं तक को आदर दिया जाता है. भीषण दंड मिले.'



https://twitter.com/DrKumarVishwas/status/1251891134235734016?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E1251891134235734016&ref_url=https%3A%2F%2Fkhabar.ndtv.com%2Fnews%2Fmaharashtra%2Fkumar-vishwas-tweets-on-maharashtra-palghar-mob-lynching-case-2214748


बताते चलें कि महाराष्ट्र के पालघर में बीते गुरुवार की देर रात ग्रामीणों में तीन लोगों को चोर समझा और पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी. तीनों मृतक मुंबई के कांदिवली से सूरत अपने एक मित्र के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने जा रहे थे. उनकी पहचान 35 वर्षीय सुशीलगिरी महाराज, 70 वर्षीय चिकणे महाराज कल्पवृक्षगिरी और 30 वर्षीय निलेश तेलगड़े के तौर पर की गई. निलेश उनका ड्राइवर था. बताया जा रहा है कि कासा पुलिस थाने के गडचिंचले के ग्रामीणों ने गुरुवार की रात पहले उनकी कार रोकी, फिर पत्थरों और कोयते से निर्मम हत्या कर दी.


पुलिस ने केस दर्ज कर इस मामले में 110 लोगों को हिरासत में लिया था. मामले की जांच की जा रही है. अभिनेता जीशान अय्यूब (Zeeshan Ayyub) ने घटना पर दुख जताते हुए ट्वीट किया, 'पालघर लिंचिंग के बाद भी अगर हम ये मान रहे हैं कि हम लोगों में इंसानियत बाकी है तो माफ कीजिए, मैं आपकी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता. इस देश को आप लोगों ने नफरत से जला दिया है. पर घबराइये नहीं, हम आपसे लड़ते रहेंगे, देश को बचाने के लिए.'


पुलिस ने केस दर्ज कर इस मामले में 110 लोगों को हिरासत में लिया था. मामले की जांच की जा रही है. अभिनेता जीशान अय्यूब (Zeeshan Ayyub) ने घटना पर दुख जताते हुए ट्वीट किया, 'पालघर लिंचिंग के बाद भी अगर हम ये मान रहे हैं कि हम लोगों में इंसानियत बाकी है तो माफ कीजिए, मैं आपकी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता. इस देश को आप लोगों ने नफरत से जला दिया है. पर घबराइये नहीं, हम आपसे लड़ते रहेंगे, देश को बचाने के लिए.'


देखिए हिंदुस्तान समाचार के मध्यम से Palghar पर Devendera Fadanvis- घटना मानवता को शर्मसार करती हैं, जाने का Uddhav Thackeray का जबाब



 


 


सत्य का बोध


तम का दीप लिये हाथों में,

मानव तन को हाँकने आया।

सत्य का हमको बोध कराया,

कोरोना ने हमें जगाया।

भटके थे जो राही बाट से,

अंतक का भय उसपे छाया।

माया-मोह में डूब गये थे,

डर से थोड़ा ऊपर आया।

जीव हत्या कर खाने वाले,

दाल रोटी से पेट भर आया।

पिज्जा, बर्गर दूर हो गया,

पेड़-पौधों से हाथ मिलाया।

अकड़ रहा था मानव कब से,

मौत को जैसे मात दे आया।

कोरोना ने हमें जगाया,

सत्य का हमको बोध कराया।

नीले गगन में उड़ने वाले,

देखो भूमि पे वापिस आया।

प्राणवायु, और रोटी क्या हैं,

क्षण भर में इसने समझाया।

हमको रोटी देने वाले,

हलधर का सम्मान कराया।

रिश्ते नाते सभी हैं झूठे,

अटल सत्य का बोध कराया।

झुठी काया झुठी माया,

इतने पे जो समझ न पाया।

जीवन नैया पार हो कैसे, 

अब तक जिसने समझ न पाया।

ज्ञान चक्षु को खोल के देखो,

जीवन से अब तक क्या पाया।

पाप की गठरी ढोने वाले,

अपने कर्म को समझ तो पाया।

मिट्टी का तन मिट्टी होना,

जग ने तुझसे क्या हैं पाया।

जाग बटोही सत्य को जानो,

जिससे कोई बच न पाया।

कोरोना ने हमें जगाया, 

सत्य का हमको बोध कराया।

तम का दीप लिये हाथों में,

मानव तन को हाँकने आया।
कोरोना ने हमें जगाया
कोरोना ने हमें जगाया

Sunday, April 19, 2020

लॉक डाउन और सामाजिक निहितार्थ


वर्तमान समय बड़ा संकट पूर्ण है एक ओर पूरा देश और विश्व कोरोना नामक वैश्विक महामारी से आक्रांत है तो दूसरी ओर पूरा मानवीय समाज मानवीय  विभीषिका से दो चार हो रहा है। जितनी विकट समस्या  इस वैश्विक बीमारी से उबरने की है संभवतः उससे कहीं कम इस समय उपजी सामाजिक परेशानियों  की भी नहीं है और  कोरोना ने आज समूचे विश्व के गति चक्र को रोककर लगभग पूर्णत:'चक्का जाम' कर दिया है प्रकृति के साथ खिलवाड़ का  इससे भयावह परिणाम और क्या होगा कि समूचा मानवीय समाज ही एक दूसरे से दूरी बनाने अर्थात 'सोशल डिस्टेंसिंग 'के लिए  आज विवश हो गया है। प्रशासन के द्वारा अपील की जा रही है कि लोग सामाजिक रूप से जितना एक दूसरे से दूर रहेंगे उतना ही इस महामारी के प्रकोप और प्रसार से बचेंगे और जितना निकट आएंगे इस बीमारी के गंभीर दुष्परिणाम के भागीदार बनेंगे ।इसी  समसामयिक जरूरत के मद्देनजर भारत में भी दुनिया के अन्य देशों की तरह लॉक डाउन तथा कर्फ्यू लगाया गया। हर सिक्के के जैसे दो पहलू होते हैं, इस लॉक डाउन के भी दोनों पहलू हैं ।कोरोना महामारी के निदान स्वरूप तो लॉक डाउन एवं  social distancing लाभप्रद एवं सकारात्मक एकमात्र तरीका है लेकिन लोगों के सामाजिक जीवन एवं सामाजिक चरित्र  को लॉक डाउन ने कितनी बुरी तरह से 'ताला बंद'कर दिया है, इसका जीवंत प्रमाण प्रवासी मजदूरों एवं विद्यार्थियों के अस्तित्व और भविष्य पर बड़ी मार को माना जा सकता है। अपने मूल स्थान से मीलो दूर रोजी रोटी के इंतजाम के लिए करोड़ों गरीब लोग सुदूरवर्ती राज्यों में जाकर वर्षों से मेहनत मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का किसी तरह पेट पाल रहे थे लेकिन कोरोना महामारी के चलते दिनांक 24 मार्च 2020 को हुए को हुए लॉक डाउन ने जैसे इन प्रवासी करोड़ों मजदूरों की किस्मत और जिंदगी की रफ्तार को पूरी तरह ताला बंद कर दिया लगभग हर उद्यमी फैक्ट्री मालिक तथा कंपनी के स्वामी ने लॉक डाउन के चलते  कामकाज ठप होते ही बेबस और गरीब मजदूरों को अचानक नौकरी से निकाल दिया और  यह गरीब मजदूर जिन घरों में किराए किराएदार की हैसियत से रह रहे थे ,उनके मकान मालिकों ने भी किराया ना दे पाने के कारण उन्हें घर खाली करने पर मजबूर कर दिया ऐसी विपदा की घड़ी में यह मजदूर पलायन करने एवं अपने मूल स्थान पर जाने के लिए विवश हो गए एक और नौकरी से बिना किसी गलती ही के अचानक निकाल दिए जाने और और मकान का किराया न चुका पाने के कारण अपने परिवार के लिए दो  जून की रोटी तक का इंतजाम न कर पाने के कारण ये  प्रवासी मजदूर अचानक रातों-रात अपने गांव जाने के लिए मजबूर हो गए और  इस महामारी के भय से अधिक   यह लोग भूख के भीषण  संत्रास भयभीत होकर बिना संक्रमण की चिंता किए आनंद विहार नोएडा गाजियाबाद आदि बस टर्मिनल पर पहुंचकर न केवल समाज एवं प्रशासन के लिए वरन सर्वप्रथम अपने ही जीवन के लिए सुरक्षा का विकराल संकट खड़ा कर लिया वस्तुतः संकट की इस घड़ी में इन मजदूरों की व्यथा एवं आवश्यकता को समझते हुए ठोस एवं कारगर कदम उठाए  जाने आवश्यक  बहुत आवश्यक हैं।



लगभग ऐसी ही पीड़ा का अनुभव विद्यार्थियों का एक बहुत बड़ा तबका कर रहा है अपनी आंखों में कुछ बनने और कुछ हासिल  कर लेने के करने के बड़े-बड़े सपने लेकर एक बड़ी संख्या में विद्यार्थी न केवल देश बल्कि दुनिया के कोने कोने में पढ़ने तथा कुछ बनने के लिए गए हुए थे इस लॉक डाउन में न जाने कितने विद्यार्थी अपने परिवार से दूर अभिशप्त एकाकी एवं मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से हीन जीवन का बोझ ढोने को विवश है दैनंदिन जीवन का खर्च वाहन करने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं है बैंकों के माध्यम से लेनदेन हेतु आवागमन की सुविधाजनक परिस्थितियां नहीं हैं। एकांतिक रूप से रहने वाले ये  विद्यार्थी शोधार्थी पर्याप्त खाद्य सामग्री एवं संसाधनों से रहित अभिशप्तता का संत्रास भोग रहे हैं किसी के पास किराया देने को पैसे नहीं हैं तो किसी के पास खाद्य सामग्री की अनुपलब्धता है, किसी को पढ़ाई की पूर्णता के इस आखिरी पड़ाव के तुरंत बाद नौकरी करके अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने का बीड़ा उठाना था तो किसी को बूढ़े और असहाय माता-पिता के इलाज का पर्याप्त प्रबंध करना था किसी को अस्वस्थ परिजनों के पास पहुंचना था इस कोरोना महामारी के चलते हुए लोग डाउन ने आज करोड़ों प्रवासियों से उनके जीवन का आधार ,उनके सपने ,उनकी खुशियां और उनके पैरों के नीचे से मानव जमीन है छीन ली हो आज इस लॉक डाउन ने हमें यह एहसास करा दिया है कि जिंदा रहते हुए नर्क भोगना कैसा होता है न कहीं स्वच्छंदतापूर्वक कहीं आ -जा सकते हैं और न ही किसी से मिल सकते हैं इंसान को इंसान के अस्तित्व से ही खतरा उत्पन्न हो गया है ।हर कोई एक- दूसरे को देख कर संक्रमण से बचने के लिए मास्क और ग्लव्स का सहारा ले रहा है एक इंसान के लिए सामने वाला दूसरा इंसान ही मानो मानव बम या कोरोना बम बन गया हो इस कटु सत्य ने संभवतः मनुष्य को यह भी सोचने के लिए विवश कर दिया है कि स्वछंदता का क्या मूल होता है ,जब बेबस पशु  -पक्षियों की स्वतंत्रता को मानव के द्वारा छीन लिया जाता है तब उन्हें कैसा महसूस होता है आज जब इस लॉक - डाउन ने लगभग समूची माननीय गतिविधियों को ताला बंद करके रख दिया है तब पशु पक्षियों को पिंजड़ा बंद कर देने वाले मनुष्य को निश्चय ही पहली बार पिंजरों की क्रूरता और भयावहता का एहसास हुआ है। वास्तव में आज की इन समसामयिक परिस्थितियों में प्रवासियों के प्रति संवेदनशील एवं सहयोगी बनकर उन्हें समाज का अविभाज्य अंग मानकर उनको संभाल देने की सख्त जरूरत तो है ही साथ ही पशु पक्षियों की पीड़ा को समझते हुए उन्हें  पिंजरों से मुक्त करने की जरूरत है ।लॉक डाउन के इस संकटकालीन समय में एक उदार, समझदार तथा संवेदनशील मनुष्य बनकर लॉक डाउन के निहितार्थ तथा संकेतार्थों को समझना और भी अधिक आवश्यक है । वास्तव में यह समय मनुष्य की परीक्षा का समय है और पूर्ण धैर्य तथा उदारतापूर्वक ही मनुष्य मानवीय संस्कारों को धार देकर श्रेष्ठ पहचान बना सकता है।


अपने कर्मों के फल मैंने कुछ यूं पाये ,बनकर फरिश्ता दुनिया में, मेरे डैडी आये।।

 
मेरे डैडी " केसरी उर्फ केसर सिंह"


हाँ कोयल के कूकने की आवाज आती थी ,मेरे घर के सामने वाले पेड़ से,, 
परवाह नहीं थी मुझको दुनिया की और रोज सुबह देरी से उठती थी मैं। 
"उठ जाओ दुनिया कहा से कहा पहुँच गयी" बोलकर यह,
हर रोज डैडी मुझे जगाते थे।
सुनकर मुस्काना और फिर सो जाना, चिंता नहीं थी तब कोई, और मन में था अटूट विश्वास,क्योंकि उस वक्त मेरे डैडी,मेरे हीरो का साथ था मेरे पास।


अब वैसी नीद नहीं आती, 
अब वैसी मुस्कान नहीं आती, 
जीवन के इस मोड़ में कशमकश से न जाने क्यों आखें नम सी हो जाती ।
घर के आंगन में जब भी अब कोयल है गाती,
 कोयल की कूकू में अब वह मिठास नहीं है आती ।
बिना बोले मेरे मन का हर दर्द सूनने वाला, मिला न फिर मुझे "डैडी" सा साथी । 



अनजान थी तब मैं पैसों की कीमत से और न ही मुझे तब रूपये का था मोल पता , 
क्योंकि जितना मांगा था जेबखर्च,
हँसकर था मेरे डैडी ने मेरे हाथ में रखा।
दौड़-धूप मे बिता दिया उन्होंने अपना जीवन सारा,
और मेरी हर ख्वाहिश पूरी करने को न वो थका, न हारा ।


कुछ ख्वाहिशें तो मेरे डैडी की भी जरूर होगी लेकिन जिम्मेदारियों के तले अपने कंधो पर था बच्चों के भविष्य का सपना रखा,
जीवन तो काटकर चल दिए,,, फिर भी जीवन जीने का स्वाद उन्होंने कभी न चखा। 


डैडी जब पास थे तो हर रिश्ता ख्याल रखता था,
कैसी है सेहत मेरी और क्या है उद्देश्य मेरा,ऐसा सवाल करता था।
डैडी नहीं है अब यहां पर आज भी वही लोग हैं, ओर है वही बस्ती।
 तन पर कपड़ा बेशक महँगा पर दिमाग में सोच घटिया और सस्ती।
गर्व है मुझे डैडी मेरे अलग थे और ऐसे कर्म कर गये, मिटी न आज भी उनकी हस्ती। 


बढती जा रही अब उम्र मानो बचपन से सीधा बूढ़ी हो गयी।
पिता का अभाव हो जिस घर में वहां जिम्मेदारी के  तले जवानी कहा रही।
थे मैले कपड़े उनके और  रहती थी हाथों में कालख लगी,
 फिर भी कहते थे "मत देखो कीमत", लेलो बाजार से जो है पसंद और लगता सही।
मैं पगली अपनी पसंद पर रहती थी अडी,
और डैडी के दम पर तब, कीमत तो  देखी नहीं मेने कभी।
शिक्षा पूरी कर आज जब मैं कमाने लगी,
सोच-समझकर करती हूँ खर्च , जैसे हो न जाए हिसाब में गलती कही।
यदि अभाव हो जीवन में किसी भी चीज का तो पिता का साया पूरी कर देती है हर कमी,
और न रहे अगर उनका हाथ सिर पर तो अच्छा वक़्त भी देता हर क्षण चेतावनी नयी।


साथ थे डैडी तो रिश्ते थे कोमल जेसे रूई,
अब वार करते है जुबान से और चुभती है बातें जैसे सूई।


साथ था डैडी का जबतक,
थी मैं मुश्किलों से अनजान,
झुकती थी दुनिया सुनकर "केसरी" उनका नाम। 
और कर देते थे मानो वो मेरी,
हर मजिल को आसान।


है कई दुख और तकलीफें जीवन में मेरे, 
फिर भी अरमानों के दम पर 
तेरे 
 हर दिन सुबह शाम सवेरे,
आगे बढ़ती जाऊंगी मैं क्योंकि इन दो आँखों में मेरे,
सपने  हैं "डैडी" सिर्फ तेरे ।
सदियाँ बीत गयी अब बिन तेरे
फिर भी मेरी यादों में तेरे प्यार के बसेरे। 


सीखाया हमेशा था आपने यह, कि किसी की आँखों मे,
आये न कभी मेरे कारण पानी,
 चलूँ सदा पथ पर तेरे और दुनिया गर्व से कहे मुझे, तेरी "केसर रानी"। 


जीवन मे अब मेरे जब भी कोई खुशी के दिन आएगे,
रंगीन कपड़े पहनकर सब नाचेगे गायेंगे,
फिर भी यह व्याकुल दिल मांगे रब से दुआ रोते रोते,
काश मेरे जीवन के हर खास पलो में "मेरे डैडी" साथ होते। 


बस एक दुआ है मेरी परमात्मा से,
जहाँ पर भी है डैडी मेरे, वह सदा खुश रहे। 
और हाथ जोड़ रब से, मांगू मैं वरदान यह, 
"हर व्यक्ति के जीवन के खास दिनों में उनके माँ-बाप साथ रहे। 


Thursday, April 16, 2020

ख़ामोशी


बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती है ख़ामोशी

कभी ज़ख्म में मलहम तो

कभी नमक सा काम कर जाती है ख़ामोशी

कभी गुस्से का इज़हार तो

कभी प्यार का एतबार बता जाती है ख़ामोशी

कभी रिश्तों में मिठास तो

कभी कड़वाहट का एहसास करा जाती हैं ख़ामोशी

कभी दिल में सुकून तो

कभी तड़प सी जगा जाती हैं ख़ामोशी

कभी दोस्ती में प्यार तो

कभी तकरार करा जाती हैं ख़ामोशी

कभी जीवन में शांति तो

कभी अशांति पैदा कर जाती हैं ख़ामोशी

बिना शब्दों के कितना कुछ कर जाती है ख़ामोशी।


कोरोना क्या और क्यों


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोरोना वायरस को महामारी घोषित कर दिया है। कोरोना वायरस बहुत सूक्ष्म लेकिन प्रभावी वायरस है। कोरोना वायरस मानव के बाल की तुलना में 900 गुना छोटा है, लेकिन कोरोना का संक्रमण दुनियाभर में तेजी से फ़ैल रहा है।


कोरोना वायरस क्या है?

 

कोरोना वायरस (सीओवी) का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या हो सकती है। इस वायरस को पहले कभी नहीं देखा गया है। इस वायरस का संक्रमण दिसंबर में चीन के वुहान में शुरू हुआ था। डब्लूएचओ के मुताबिक बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ इसके लक्षण हैं। अब तक इस वायरस को फैलने से रोकने वाला कोई टीका नहीं बना है।

 

इसके संक्रमण के फलस्वरूप बुखार, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ, नाक बहना और गले में खराश जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। इसलिए इसे लेकर बहुत सावधानी बरती जा रही है। यह वायरस दिसंबर में सबसे पहले चीन में पकड़ में आया था। इसके दूसरे देशों में पहुंच जाने की आशंका जताई जा रही है।

 

कोरोना से मिलते-जुलते वायरस खांसी और छींक से गिरने वाली बूंदों के ज़रिए फैलते हैं। कोरोना वायरस अब चीन में उतनी तीव्र गति से नहीं फ़ैल रहा है जितना दुनिया के अन्य देशों में फैल रहा है। कोविड 19 नाम का यह वायरस अब तक 70 से ज़्यादा देशों में फैल चुका है। कोरोना के संक्रमण के बढ़ते ख़तरे को देखते हुए सावधानी बरतने की ज़रूरत है ताकि इसे फैलने से रोका जा सके।

 


क्या हैं इस बीमारी के लक्षण?

 

कोवाइड-19 / कोरोना वायरस में पहले बुख़ार होता है। इसके बाद सूखी खांसी होती है और फिर एक हफ़्ते बाद सांस लेने में परेशानी होने लगती है।

इन लक्षणों का हमेशा मतलब यह नहीं है कि आपको कोरोना वायरस का संक्रमण है। कोरोना वायरस के गंभीर मामलों में निमोनिया, सांस लेने में बहुत ज़्यादा परेशानी, किडनी फ़ेल होना और यहां तक कि मौत भी हो सकती है। बुजुर्ग या जिन लोगों को पहले से अस्थमा, मधुमेह या हार्ट की बीमारी है उनके मामले में ख़तरा गंभीर हो सकता है। ज़ुकाम और फ्लू में के वायरसों में भी इसी तरह के लक्षण पाए जाते हैं।

 


क्या हैं इससे बचाव के उपाय?

 

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने कोरोना वायरस से बचने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
इनके मुताबिक हाथों को साबुन से धोना चाहिए।

अल्‍कोहल आधारित हैंड रब का इस्‍तेमाल भी किया जा सकता है।

खांसते और छीकते समय नाक और मुंह रूमाल या टिश्‍यू पेपर से ढंककर रखें।

जिन व्‍यक्तियों में कोल्‍ड और फ्लू के लक्षण हों, उनसे दूरी बनाकर रखें।

 


मास्क कौन और कैसे पहनें?

 

अगर आप स्वस्थ हैं तो आपको मास्क की जरूरत नहीं है।

अगर आप किसी कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं, तो आपको मास्क पहनना होगा।

जिन लोगों को बुखार, कफ या सांस में तकलीफ की शिकायत है, उन्हें मास्क पहनना चाहिए और तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।





जरा सा थम लें


बहुत चला अब तक तू भारत
ले थोड़ा विश्राम तू थम कर


तेरा कोई आदि न जाने
क्या कर लेगा अंत भी कोई


न कर ऐसा , न बन वैसा
कोई नहीं है तेरे जैसा


अपने एक सृजन की खातिर
थम जाती कई मास को नारी


ये थमना क्या थमना  कहलाता
ये ब्रह्मा का काज वो करती


क्यों माता का तप तुम हरते
क्यों न कुछ दिन घर में रहते


बहुत तुमने है जग को जाना
अब थोड़ा अपने को जानो


तुमसे ही बनता ये भारत
बदल कर देखो अपनी आदत


गागर में सागर को भर लो
घर में ही संसार को रच लो


श्रद्धांजलि डॉ राजेंद्र बहादुर सिंह

स्वर्गीय. डॉ राजेंद्र बहादुर सिंह (1951-2019)



शिक्षक , स्वतंत्र लेखक एवं सांस्कृतिक वार्ताकार के रूप में जाने जाते हैं। उनका जन्म बाराबंकी के पूरे बैश गांव में एक शिक्षक परिवार में हुआ था । अंग्रेजी साहित्य , इतिहास , राजनीति शास्त्र , भारतीय दर्शन , वांग्मय  पर उनका समान अधिकार था ।  महाभारत तथा रामायण पर उन्होंने विशेष अध्ययन किया।
प्रिअंबिल टू द कंस्टीटूशन ऑफ़ इंडिया : आईडियल्स एंड वर्किंग , द मर्ज़िनल्स, ह्यूमन राइट्स : अ ग्लोबल कंसर्न , राष्ट्र गौरव , हमारी सांस्कृतिक अस्मिता ,उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।  एक शिक्षक के रूप में भाषा शिक्षण को सुगम बनाने हेतु उन्होंने वर्कशीट्स और मॉडल भी विकसित किये थे। मानव धर्म ,यूनाइटेड नेशंस : अ मॉडल  सज़्ज़ेशन, वाल्मीकि : अ पोलिटिकल थिंकर, अ डिक्शनरी ऑफ़ पोलिटिकल साइंस , इंडियन माइथोलॉजी एंड कल्चर , उनकी अप्रकाशित रचनाएँ हैं । उन्होंने सांस्कृतिक , साहित्यिक एवं राजनतिक मुद्दों पर सैकड़ों निबंध  लिखे , लिबर्टैरियनिज़्म  , सदर्न राइट्स मूवमेंट्स जैसे विषयों पर भी उन्होंने कार्य किया और उनके लेख द आइडियाज एंड मूवमेंट्स दैट शेप्ड अमेरिका में कैलिफोर्निआ से प्रकाशित होकर काफी सराहनीय रहे हैं ।


                                                    14 अप्रैल 2019 को उनका देहांत हो गया ।


                स्वप्न कुसुम


स्वप्न कुसुम से मिले विचार पुनः जग उठे,


बिंदु के प्रसार से प्रकाश बिंदु बन चले ,


और फिर प्रकाशपर्व इधर मन कुटीर में ।


किन्तु यह  प्रतीति सब विगत का बिम्ब अब


युग हुआ विलीन वह जहाँ कहीं हम रहे ।


नया प्रहार आ चला , नयी सृष्टि तो नहीं,


पर नया स्वरुप यह।


                   मिथक


मिथक कहें पाप हो , सत्य सुने जगत कहाँ ,


यहाँ वही बिके चले , बस आवरण धुला हुआ ।


अनेक बने संत वो दस्यु जो प्रत्यक्ष थे


सत्य कहाँ ,सत्य कहाँ कहाँ कहाँ वर्जना ।


ज्ञान की रश्मि, पर अभी चिर अखंड है ,


अनंत तक रहे ये दृढ़, जले चले प्रकाशमान ।


         चक्र यही है भौतिकता का


आकाशदीप टिम टिम जलता था, आम्र तरु की दृढ़ शाखा में ,


कहते तुमको राह दिखाता जैसे तुमने इधर दिखायी ।


जलती रही वर्तिका लहरा तुम भी तो कर्मठ ही बीते,


कर्तव्यों से बिंधे बिंधाए , कर्मठ पथ पर चलते चलते।


प्रतिदिन अनंत तक इच्छायें मेरी, मुझसे कहती, आकर


और तुम्हारे रोज़ कथानक आते रहते ।


चक्र यही है भौतिकता का, आकर हम, चलते रहते हैं ,


और अचानक एक दिवस पथ अनंत पर चल पड़ते हैं।


            अनंत में विलीन तुम


निर्माण अनंत कर गए ज्ञान कर्म पथ अनंत


गूँज रहे कथन कई दृष्टि के घोष बने ।


दृश्य सभी सजीव हैं , स्वर्गदीप जल चुका


अनंत में विलीन तुम अनुगूंज किन्तु व्याप्त इधर ।


 मिथक , युद्ध राजनीति साहित्य , कला , दृष्टि आदि


रोज़ नयी लिये सृष्टि नयी लिये प्रफुंजिका।


       उसकी गति पर कैसा चिंतन


विश्वास कर्म की गति पर , कर्म पथी जो रहे निरंतर


उसकी गति पर कैसा चिंतन , कर्मठ गति पर कैसा चिंतन ।


नारायण का कथन और भाष्यों की प्रस्तुति,


कर्मठ बन ऋषियों सा जीवन फिर अनंत पथ , अब क्या चिंतन !


पौरुष से जो राह बनाता किसी अनर्गल से न नाता


स्वाभिमान सा पुंज जले तो फिर ऐसा वैसा क्या चिंतन ।


जब तक जीवन प्रांजल जीवन फिर तो क्या ,क्या अनंत का वर्णन ।


Friday, April 10, 2020

सिली माचिस


 सिली माचिस पास हमारे,
 तम को दुर भगाए कैसे।
 गद्दारो की फौज खड़ी हैं,
 इसको अब समझाये कैसे।
 कुछ लोगों ने दीप जलाकर,
 राह तिमिर का रोका था। 
 उनपे भी जब पत्थर बरसे,
 नम आंखों को भाये कैसे।
 सिली माचिस पास हमारे,
 तम को दुर भगाये कैसे।


मोदी जी ने राह दिखाई,
मानवता को जगाये कैसे।
धर्मगुरु कुछ एक न सुनते,
धार्मिकता को भुलाये कैसे।
भुखे को रोटी बटवाकर,
हमनें कड़ीया तोड़ी थी।
कोरोना का कहर इधर हैं,
पार उधर हम जाये कैसे।
सिली माचिस पास हमारे,
तम को दुर भगाये कैसे।


न कर में त्रिशूल था कोई,
न था जुबा पे जयकार,
आपस में कोरोना बांटे,
जन्नत को हम जाये कैसे।
टिका-टोपी में हम उलझे
मानवता को निभाये कैसे।
चाईना से जो चला तिमिर हैं,
दीपक में लौ लाये कैसे।
सिली माचिस पास हमारे,
तम को दुर भगाये कैसे।


सौ साल के पत्रकार गुजरात के नगीनदास


हमारे बीच कोई सौ साल का कोई पत्रकार हो तो इसकी तो मुनादी होनी चाहिए। उत्सव मनाया जाना चाहिए। उनकी रचनाओं पर गोष्ठियां होनी चाहिए। उम्मीद है गुजरात की हवाओं में इस बात की खुश्बू होगी कि नगीनदास संघवी पिछले 10 मार्च को अपने जीवन के सौ साल पूरे कर चूकें है। 


संघवी साहब 19 साल की उम्र से ही पत्रकारीय लेखन कर रहे हैं तब उनका पहला लेख गुजरात की एक बेहद लोकप्रसिद्ध पत्रिका चित्रलेखा में छपा था। ताज़ा लेख नागरिकता कानून को लेकर है। जिसमें नगीनादास जी ने लिखा है कि भारत में 100 साल से रह रहे हैं लेकिन उनके पास साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ नहीं है। 3 मार्च को उन्होंने 11 लाख की सम्मान राशि ठुकरा दी और कहा कि यह पैसा दूसरे लेखकों को मिले। मोरारी बापू उन्हें सम्मानित करना चाहते थे। 


100 साल की उम्र में भी नगीनदास जी स्वस्थ्य हैं। कोई गंभीर रोग नहीं है। 1919 के साल में पैदाइश हुई। गुजरात के भावनगर के भुंभली गांव में। मुंबई में बीमा कंपनी में काम किया। फिर राजनीतिक शास्त्र पढ़ाया। 32 साल बाद मीठी बाई कालेज से सेवानिवृत्त हो गए। 


50 साल में संघवी साहब की कलम एक दिन नहीं रुकी। कभी संपादक से यह नहीं कहा कि आज लेख नहीं हो पाएगा। हर सप्ताह 5000 शब्द लिखने वाले संघवी साहब खुद टाइप करते हैं। उनके चार कॉलम छपते हैं। चित्रलेखा के अलावा दिव्य भास्कर की कलश पूर्ति में हर बुधवार को उनका कॉलम आता है। रविवार को ‘तड़ ने फड़’ नाम से कॉलम आता है। ‘तड़ ने फड़’ कालम में छपे लेख से कई किताबें भी बनी हैं। 


चार किताबें अंग्रेज़ी में भी हैं। १. Gujarat: a political analysis २. Gandhi: the agony of arrival ३. Gujarat at cross roads ४. A brief history of yoga.अमरीकन इतिहास और राजनीति पर उन्होंने नौ किताबो का गुजराती अनुवाद किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजकीय सफर पर भी उन्होंने किताब लिखी है। देश और दुनिया की राजनीति पर ३० परिचय पुस्तिकाएं लिखी हैं। 


संघवी साहब ने हमेशा ही अपने कॉलम में वचिंत तरफ़ी की है। सेकुलर मूल्यों को बढ़ावा दिया है। निडर हैं। २६ जून २०१९ के लेख में लिखते है कि.. ' राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति के बारे में प्रधानमंत्री की विचारधारा आरएसएस की है और वो बिल्कुल ग़लत है '। यह भी तथ्य है कि उन्हें पद्म श्री भी मोदी सरकार के दौर में ही मिला। लेकिन संघवी साहब की कलम कहां किसी का कहा मानती है। गुजरात में एक परंपरा देखने को मिली है। कांति भाई भट्ट के लेखन और लोकप्रियता से यह समझा है कि लेखक और पत्रकार घोर आलोचक होते हैं समाज और सत्ता के। यह बात मैं जनरल नहीं कह रहा है। सभी के लिए नहीं कह रहा लेकिन जिन नेताओं की आलोचना भी करते हैं वे भी इस बात का ख्याल करते हैं कि उनका वोटर पाठक भी होता है और वो पाठक कभी अपने लेखक का अपमान सहन नहीं कर सकता है। 


संघवी साहब के लेखों के बारे में लिखा है कि " भावों से भरपूर और अंगत स्पर्श वाले लेख कभी देखने को नहीं मिलते, वे हमेशा तर्कबद्ध, सजावट मुक्त लेख लिखते है।" उनके बौद्धिक धैर्य और मौलिक चिंतन का उदाहरण ' रामायण नी रामायण ' लेखमाला में मिलते है। वह कहते है कि १३ जनवरी से २४ फरवरी १९८५ के दौरान मुंबई के ' समकालीन ' में  लिखी गई सीरीज का उद्देश्य वाल्मीकि रामायण की मूल कथा का सत्य बड़े आधारभूत तरीके से सबके सामने रखना था। धर्म की आड़ में अपने पेट भरनेवाले बाबा लोग जो ' भ्रम ' पैदा करते थे उसको दूर करना था। इस लेख का काफी विरोध हुआ था। जब अखबार के संपादक ने जवाब देने की जगह नहीं दी तो सांघवी साहब ने किताब छपवा दी। ' रामायण नी अंतर यात्रा ' नाम से । डॉ. अम्बेडकर के पुस्तक ' रिडल आफ राम ' की याद दिलाता हुए इस पुस्तक के हरेक पन्नों पर स्वतंत्र चिंतन दिखता है। 


२०१९ में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित नगीनदास संघवी को गुजरात के लोग ' नगीन बापा ' और ' बापा ' कह के बुलाते है। 


कांति भाई भट्ट के बाद नगीन बापा गुजरात की पत्रकारिता के अदभुत उदाहरण हैं। नगीन बापा की शतकीय पारी शानदार रही है। 


मैं आप सभी के लिए नगीन बापा के जीवन के बारे में टाइप करते हुए गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। हमारी पत्रकारिता को उनका आशीर्वाद मिले। सभी पत्रकारों को गौरव होना चाहिए कि उनके बीच एक ऐसा पत्रकार भी है जिसकी सक्रियता के सौ साल पूरे हो रहे हैं। 


आप सभी उनके लिखे लेखों का पाठक बनें। 


 


नहीं रहे संपादकों की पीढ़ी तैयार करने वाले वरिष्ठ पत्रकार उदय सिन्हा


लखनऊ से उदास और दुखी करने वाली सूचना यह है कि इस दौर के कुछ बेहतरीन संपादकों में से एक उदय सिन्हा जी का 8 अप्रैल की सुबह निधन हो गया।


उदय जी कुछ रोज पहले सांस लेने में तकलीफ के कारण लखनऊ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराए गए थे। उनकी उम्र 62 साल थी।


वरिष्ठ पत्रकार श्री उदय सिन्हा जी को कुछ साल पहले न्यूरो की शिकायत हो गयी थी। पहले उन्हें चलने में दिक्कत आ रही थी। चलते समय पांव सही जगह नहीं पड़ते थे। एम्स में जांच कराने पर डॉक्टरों ने कहा कि उनके रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में पानी भर गया है।


वे एडमिट हुए और पानी निकाल दिया गया। फिर थोड़ा ठीक रहने लगे। बाद में फिर समस्या हुई तो जांच के बाद न्यूरो प्रॉब्लम बताया गया। उनके मस्तिष्क का ऑपरेशन करने की सलाह चिकित्सकों ने दी।


विगत दिसंबर माह में उनके मस्तिष्क का ऑपरेशन लखनऊ के निजी अस्पताल में हुआ। उसके बाद से उनकी तबियत अक्सर खराब रहने लगी। रविवार की शाम सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होने पर उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। पहले उन्हें ऑक्सीजन दिया गया, पर बाद में सांस लेने में कठिनाई होने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया।


दो दिनों के प्रयास के बाद भी उन्हें सामान्य हालत में नहीं लाया जा सका। उदय जी अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके दो बेटे हैं- अनुपम (हर्ष) और अभिषेक (यश)।


उदय सिन्हा के निधन की जानकारी मिलते ही उनके सभी जानने वाले स्तब्ध हैं। वरिष्ठ पत्रकार ओंकारेश्वर पांडेय कहते हैं- “श्री उदय सिन्हा मेरे बड़े भाई जैसे थे। वे हमारे समय की पत्रकारिता जगत का एक बड़ा नाम रहे हैं। श्री उदय सिन्हा ऐसे पहले हिंदी संपादक रहे हैं, जिनको अमरीकी राष्ट्रपति ने साक्षात्कार देने हेतु व्हाइट हाउस आमंत्रित किया था। वे दैनिक भास्कर, द पायनियर, सहारा समय, हरिभूमि और नॉर्थ ईस्ट टाइम जैसे अनेक हिंदी व अंग्रेजी अखबारों के संपादक तो रहे ही, टेलीविजन चैनल -चैनल वन के संपादक व एडवाइजर भी रहे हैं। उनका जाना एक बड़ा सदमा है। पत्रकारिता की कई पीढ़ियों को उदय जी ने पाला पोसा निखारा। श्रद्दांजलि!”


कदम ने लाई भूखों के चहरे पर मुस्कान

कदम एन.जी.ओ. की कानपुर टीम ने कोरोना काल के इस लॉक डाउन की कठिन परिस्थितियों में भी आपसी सहयोग से सरकार के साथ कंधा से कंधा मिला कर इस मुश्किल घड़ी में अपना कर्तव्य निभाया जो कि अत्यंत काबिले तारीफ है और "एक भारत श्रेष्ठ भारत" की अवधारणा को चिरितार्थ करता है |



कदम के साथियों द्वारा आपसी सहयोग से सड़क किनारे रहने वाले गरीब परिवार तथा जुग्गी झोपड़ी में रहने वाले नागरिकों को खाने के लिए पका हुआ भोजन वितरित किया गया | जिसमे टीम ने कनिका अस्पताल तथा हैलट अस्पताल तथा लीलामणी अस्पताल में भी सहयोग किया और मानवता का फर्ज़ निभाते हुए कानपुर नगर के स्वरूप नगर क्षेत्र के अलावा चुन्नीगंज , परेड , लाल ईमली , बड़ा चौराहा , सिविल लाइंस , 80 फिट रोड तथा हर्ष नगर जैसे इलाकों में घूम घूम कर 300 से अधिक जरूरतमंद नागरिकों को भोजन करा कर इस कार्यक्रम को सफलता के पैमाने पर स्थापित किया गया |



सहयोगियों के रूप में संस्था से आदर्श दुवेदी ,हेरम्भ वर्मा तथा मयंक वर्मा आदि लोग मौजूद रहे |कदम के कदमों को आगे बढ़ाने में कई दान दाताओं का सहयोग संस्था को देश के अलग अलग राज्यों से प्राप्त होता है |आपको बताते चलें कि यह संस्थान अपने कार्यकर्ताओं और उनके परिवार के सहयोगियों के सहयोग के माध्यम से लगभग पिछले एक सप्ताह से शहर में सेवा देने का कार्य कर रहा है | जिसके अंतर्गत यह आवारा पशुओं का भी ख्याल एरखना नहीं भूलते हैं |



+संस्था से जुड़ने के लिए


स्वदेशी मंच क्या है


भारतवर्ष एक ऐसा देश है जो कभी सोने की चिड़िया था। हर व्यक्ति आनन्दित,हर परिवार संपन्न,सबके पास अपने काम और सब कामो में व्यस्त,सर्वोच्च स्तर का चरित्र,बौद्धिक स्तर पर भारत का कोई मुकाबला नहीं था,उच्च स्तरीय गुरुकुल शिक्षा पद्धति,आयुर्वेदिक और शल्य चिकित्सा,तकनीक विज्ञान और खोज में सबसे आगे,सबसे पहले अंतरिक्ष विज्ञान का ज्ञाता ,संस्कार और परम्परा में पूरे बिश्व का गुरु और सिरमौर कहलाने वाला भारतबर्ष आज वासना,नशा,भ्रष्टाचार और व्याभिचार और आलास्य में डूबा हुआ है।


    हर तरफ चोरी,दुश्मनी,ह्त्या,बलात्कार,धरना प्रदर्शन,मुफ्तखोरी,दलाली,घूसखोरी और अपराध अपने चरम पर है।
    कोई संतुष्ट नहीं,सबके अंदर असुरक्षा की भावना घर कर चुकी है,कुछ भी निश्चित नहीं लगता।
    जो समाज का नेतृत्व करते है,जिनके इशारे मात्र पर कुछ बदल सकता है,वो विकास और एकता की जगह,विनाश और बिखण्डन की बात करते है,अपने राजनैतिक हित के लिए हमेशा धर्म,जाती और सम्प्रदाय की बातो में उलझाकर,उकसाकर लड़वाया करते है,और वोट की राजनीति करते है,उनके लिए हम वोट बैंक के अलावा और कुछ नहीं।
   जो विकास और जानकारी का एक स्रोत है,जो जन जन तक जानकारी पहुचाने का एक माध्यम है,वो अश्लीलता परोसकर विदेशी कम्पनियो का बिजनेस बढ़ाकर,कमीशन के रूप में पैसा बटोर रहे है।
   जिनके हाथ में देश का भविष्य है,जो पीढ़ियों का निर्माण करते है,जो अपने द्वारा   बच्चों को चरित्र,व्यवहार,सामाजिक और भविष्य निर्माण की कला सिखाते है,उनको कानूनों में बांधकर अपंग बना दिया,और थोप दी विदेशी शिक्षा व्यवस्था।
     आज सब व्यवस्थाओ में घुन लग गया है,न कुछ स्पष्ट है और न  ही सापेक्ष 
  अपनी मूल प्रकृति को भूलकर दूसरो की व्यवस्था और गंदे संस्कारो से प्रभावित होकर हम विनाश की अंधी दौड़ में शामिल हो गए है जिसका अंजाम शायद एक दिन सीरिया जैसा हो सकता है।
   क्या आप चाहते हो कि आप के बच्चे जिन्हें आप अपनी जान से ज्यादा प्यार करते हो,ऐसे माहौल में जिए,ऐसी व्यवस्थाये विनाशकारी है इनको बदलना होगा।
    ऐसे में देश के कुछ युवाओ और बुद्धिजीवी लोगो ने मिलकर अपने देश के स्वर्णिम इतिहास का अध्ययन कर  क्रांतिकारी,योगियो और संतो के जीवन से प्रेरणा लेकर "स्वदेशी मंच भारत" संगठन की स्थापना की है,और उन सिद्धांतो पर कार्य करने का निर्णय लिया जिन पर चलकर यह देश खुशहाल,संपन्न और विश्वगुरु था।
  आइये मिलकर संस्कारित,खुशहाल,समृद्ध,दिव्य और तेजस्वी भारत का निर्माण करे।
   स्वदेशी मंच देश के हर उम्र के विचारशील,प्रगतिशील और राष्ट्रभक्तो का इस महान कार्य में सहयोग के लिए आवाहन करता है।
   यह कोई राजनैतिक संगठन या पार्टी नहीं है | पर बदलाव ले लिए संगठित होना अति आवश्यक है।


                                                                                           


Wednesday, April 8, 2020

राहुल सांकृत्यायन का घुमक्कड़ शास्त्र


21वीं सदी के इस दौर में जब संचार-क्रान्ति के साधनों ने समग्र विश्व को एक ‘ग्लोबल विलेज’ में परिवर्तित कर दिया हो एवम् इण्टरनेट द्वारा ज्ञान का समूचा संसार क्षण भर में एक क्लिक पर सामने उपलब्ध हो, ऐसे में यह अनुमान लगाना कि कोई व्यक्ति दुर्लभ ग्रन्थों की खोज में हजारों मील दूर पहाड़ों व नदियों के बीच भटकने के बाद, उन ग्रन्थों को खच्चरों पर लादकर अपने देश में लाए, रोमांचक लगता है। पर ऐसे ही थेे-भारतीय मनीषा के अग्रणी विचारक, साम्यवादी चिन्तक, सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत, सार्वदेशिक दृष्टि एवं घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के महान पुरूष महापण्डित राहुल सांकृत्यायन। 9 अप्रैल, 1893 को जन्मे राहुल सांकृत्यायन के जीवन का मूलमंत्र ही घुमक्कड़ी यानी गतिशीलता रही है। घुमक्कड़ी उनके लिए वृत्ति नहीं वरन् धर्म था। तीसरी कक्षा की पढ़ाई के दौरान ही राहुल ने इस्माइल मेरठी की ये पंक्तियाँ पढ़ीं और उसे अपने जीवन में आत्मसात् कर लिया- 


                        सैर कर दुनिया की गाफिल, जिन्दगानी फिर कहाँ?
                        जिन्दगी गर कुछ रही, तो नौजवानी फिर कहाँ?



जीवन कृतित्व 


          राहुल का समग्र जीवन ही रचनाधर्मिता की यात्रा थी। जहाँ भी वे गए वहाँ की भाषा व बोलियों को सीखा और इस तरह वहाँ के लोगों में घुलमिल कर वहाँ की संस्कृति, समाज व साहित्य का गूढ़ अध्ययन किया। राहुल सांकृत्यायन उस दौर की उपज थे जब ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत भारतीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनीति सभी संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे थे। वह दौर समाज सुधारकों का था एवं काँग्रेस अभी शैशवावस्था में थी। इन सब से राहुल अप्रभावित न रह सके एवं अपनी जिज्ञासु व घुमक्कड़ प्रवृत्ति के चलते घर-बार त्याग कर साधु वेषधारी सन्यासी से लेकर वेदान्ती, आर्यसमाजी व किसान नेता एवं बौद्ध भिक्षु से लेकर साम्यवादी चिन्तक तक का लम्बा सफर तय किया। सन् 1930 में श्रीलंका जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये एवं तभी से वे ‘रामोदर साधु’ से ‘राहुल’ हो गये और सांकृत्य गोत्र के कारण सांकृत्यायन कहलाये। उनकी अद्भुत तर्कशक्ति और अनुपम ज्ञान भण्डार को देखकर काशी के पंडितों ने महापंडित की उपाधि दी एवं इस प्रकार वे केदारनाथ पाण्डे से महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गये। सन् 1937 में रूस के लेनिनग्राद में एक स्कूल में उन्होंने संस्कृत अध्यापक की नौकरी कर ली और उसी दौरान ऐलेना नामक महिला से दूसरी शादी कर ली, जिससे उन्हें इगोर राहुलोविच नामक पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ। छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता राहुल ने उपन्यास, निबंध, कहानी, आत्मकथा, संस्मरण व जीवनी आदि विधाओं में साहित्य सृजन किया परन्तु अधिकांश साहित्य हिन्दी में ही रचा। राहुल तथ्यान्वेषी व जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे सो उन्होंने हर धर्म के ग्रन्थों का गहन अध्ययन किया। अपनी दक्षिण भारत यात्रा के दौरान संस्कृत-ग्रन्थों , तिब्बत प्रवास के दौरान पालि-ग्रन्थों तो लाहौर यात्रा के दौरान अरबी भाषा सीखकर इस्लामी धर्म ग्रन्थों का अध्ययन किया। निश्चिततः राहुल सांकृत्यायन की मेधा को साहित्य, अध्यात्म, ज्योतिष, विज्ञान, इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति, भाषा, संस्कृति, धर्म एवं दर्शन के टुकड़ों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता वरन् वह तो समग्र भारतीयता के मूर्त रूप थे। 


जानना मानना 


         राहुल सांकृत्यायन का मानना था कि घुमक्कड़ी मानव-मन की मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ अपने क्षितिज विस्तार का भी साधन है। उन्होंने कहा भी था कि- ’‘कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।’’ राहुल ने अपनी यात्रा के अनुभवों को आत्मसात् करते हुए ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ भी रचा। वे एक ऐसे घुमक्कड़ थे जो सच्चे ज्ञान की तलाश में था और जब भी सच को दबाने की कोशिश की गई तो वह बागी हो गया। उनका सम्पूर्ण जीवन अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है। वेदान्त के अध्ययन पश्चात जब उन्होंने मंदिरों में बलि चढ़ाने की परम्परा के विरूद्ध व्याख्यान दिया तो अयोध्या के सनातनी पुरोहित उन पर लाठी लेकर टूट पड़े। बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बावजूद वह इसके ‘पुनर्जन्मवाद’ को नहीं स्वीकार पाए। बाद में जब वे माक्र्सवाद की ओर उन्मुख हुए तो उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी में घुसे सत्तालोलुप सुविधापरस्तों की तीखी आलोचना की और उन्हें आन्दोलन के नष्ट होने का कारण बताया। सन् 1947 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप  में उन्होंने पहले से छपे भाषण को बोलने से मना कर दिया एवं जो भाषण दिया, वह अल्पसंख्यक संस्कृति एवं भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। नतीजन पार्टी की सदस्यता से उन्हें वंचित होना पड़ा, पर उनके तेवर फिर भी नहीं बदले। इस कालावधि में वे किसी बंदिश से परे प्रगतिशील लेखन के सरोकारों और तत्कालीन प्रश्नों से लगातार जुड़े रहे। इस बीच माक्र्सवादी विचारधारा को उन्होंने भारतीय समाज की ठोस परिस्थितियों का आकलन करके ही लागू करने पर जोर दिया। अपनी पुस्तक ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ एवं ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ में इस सम्बन्ध में उन्होंने सम्यक प्रकाश डाला। अन्ततः सन् 1953-54 के दौरान पुनः एक बार वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनाये गये।  



  एक कर्मयोगी योद्धा की तरह राहुल सांकृत्यायन ने बिहार के किसान-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। सन् 1940 के दौरान किसान-आन्दोलन के सिलसिले में उन्हें एक वर्ष की जेल हुई तो देवली कैम्प के इस जेल-प्रवास के दौरान उन्होंने ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ ग्रन्थ की रचना कर डाली। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के पश्चात जेल से निकलने पर किसान आन्दोलन के उस समय के शीर्ष नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक पत्र ‘हुंकार’ का उन्हें सम्पादक बनाया गया। ब्रिटिश सरकार ने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाते हुए गैर कांग्रेसी पत्र-पत्रिकाओं मंे चार अंकों हेतु ‘गुण्डों से लड़िए’ शीर्षक से एक विज्ञापन जारी किया। इसमें एक व्यक्ति गाँधी टोपी व जवाहर बण्डी पहने आग लगाता हुआ दिखाया गया था। राहुल सांकृत्यायन ने इस विज्ञापन को छापने से इन्कार कर दिया पर विज्ञापन की मोटी धनराशि देखकर स्वामी सहजानन्द ने इसे छापने पर जोर दिया। अन्ततः राहुल ने अपने को पत्रिका के सम्पादन से ही अलग कर लिया। इसी प्रकार सन् 1940 में ‘बिहार प्रान्तीय किसान सभा’ के अध्यक्ष रूप में जमींदारांे के आतंक की परवाह किए बिना वे किसान सत्याग्रहियों के साथ खेतों में उतर हँसिया लेकर गन्ना काटने लगे। प्रतिरोध स्वरूप जमींदार के लठैतों ने उनके सिर पर वार कर लहुलुहान कर दिया पर वे हिम्मत नहीं हारे। इसी तरह न जाने कितनी बार उन्होंने जनसंघर्षों का सक्रिय नेतृत्व किया और अपनी आवाज को मुखर अभिव्यक्ति दी।


दृष्टिकोण


 राहुल सांकृत्यायन सदैव घुमक्कड़ ही रहे। उनके शब्दों में- ‘‘समदर्शिता घुमक्कड़ का एकमात्र दृष्टिकोण है और आत्मीयता उसके हरेक बर्ताव का सार।’’ यही कारण था कि सारे संसार को अपना घर समझने वाले राहुल सन् 1910 में घर छोड़ने के पश्चात पुनः सन् 1943 में ही  अपने ननिहाल पन्दहा पहुँचे। वस्तुतः बचपन में अपने घुमक्कड़ी स्वभाव के कारण पिताजी से मिली डांट के पश्चात उन्होंने प्रण लिया था कि वे अपनी उम्र के पचासवें वर्ष में ही घर में कदम रखेंगे। चूँकि उनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा ननिहाल में ही हुआ था सो ननिहाल के प्रति ज्यादा स्नेह स्वाभाविक था। बहरहाल जब वे पन्दहा पहुँचे तो कोई उन्हें पहचान न सका पर अन्ततः लोहार नामक एक वृद्ध व्यक्ति ने उन्हें पहचाना और स्नेहासक्ति रूधे कण्ठ से ‘कुलवन्ती के पूत केदार’ कहकर राहुल को अपनी बाँहों में भर लिया। अपनी जन्मभूमि पर एक बुजुर्ग की परिचित आवाज ने राहुल को भावविभोर कर दिया। उन्होंने अपनी डायरी में इसका उल्लेख भी किया है- ‘‘लाहौर नाना ने जब यह कहा कि ‘अरे ई जब भागत जाय त े भगईया गिरत जाय’ तब मेरे सामने अपना बचपन नाचने लगा। उन दिनों गाँव के बच्चे छोटी पतली धोती भगई पहना करते थे। गाँववासी बड़े बुजुर्गो का यह भाव देखकर मुझे महसूस होने लगा कि तुलसी बाबा ने यह झूठ कहा है कि-‘‘तुलसी तहां न जाइये, जहाँ जन्म को ठांव, भाव भगति को मरम न जाने धरे पाछिलो नांव’’


         घुमक्कड़ी स्वभाव वाले राहुल सांकृत्यायन सार्वदेशिक दृष्टि की ऐसी प्रतिभा थे, जिनकी साहित्य, इतिहास, दर्शन संस्कृति सभी पर समान पकड़ थी। विलक्षण व्यक्तित्व के अद्भुत मनीषी, चिन्तक, दार्शनिक, साहित्यकार, लेखक, कर्मयोगी और सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत रूप में राहुल ने जिन्दगी के सभी पक्षों को जिया। यही कारण है कि उनकी रचनाधर्मिता शुद्ध कलावादी साहित्य नहीं है, वरन् वह समाज, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, विज्ञान, धर्म, दर्शन इत्यादि से अनुप्राणित है जो रूढ़ धारणाओं पर कुठाराघात करती है तथा जीवन-सापेक्ष बनकर समाज की प्रगतिशील शक्तियों को संगठित कर संघर्ष एवं गतिशीलता की राह दिखाती है। ऐसे मनीषी को अपने जीवन के अंतिम दिनों में ‘स्मृति लोप’ जैसी अवस्था से गुजरना पड़ा एवं इलाज हेतु उन्हें मास्को भी ले जाया गया। पर घुमक्कडी को कौन बाँध पाया है, सो मार्च 1963 में वे पुनः मास्को से दिल्ली आ गए और 14 अप्रैल, 1963 को सत्तर वर्ष की आयु में सन्यास से साम्यवाद तक का उनका सफर पूरा हो गया पर उनका जीवन दर्शन और घुमक्कड़ी स्वभाव आज भी  हमारे बीच जीवित है।


कोरोना से संक्रमित भारत की अस्थिर अर्थ व्यवस्था


भारत विश्वगुरु बनने की प्रशस्त एवं परिकल्पित मार्ग में बड़ी आपदा के रूप में कोरोना वायरस संक्रमक आज के विश्व की विकसित एवं अल्पविकसित अर्थ व्यवस्था है | भारत की आर्थिक संरचना जिस तरह से विगत कई वर्षों से सुव्यवस्थित हो रही थी| जिससे प्रतीत हो रहा था कि आने वाले कल में भारत वैश्विक परिदृश्य में एक अहम भूमिका अदा कर सकता है | भारत की आर्थिक दशा एवं दिशा इस दीर्घकालीन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु देश की मौजूदा सरकार एवं आर्थिक निर्माता एक व्यवस्थित कार्यक्रम द्वारा लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे और जिस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु कहीं कोई शंसय भी नहीं था | विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था में अमरीका , चीन , रूस तथा इंग्लैंड भी भारत की आर्थिक प्रगति के प्रति आश्वस्त थे | भारतीय अर्थ व्यवस्था तेजी से श्रेष्ठता की ओर कदम दर कदम मजबूती से अग्रसर हो रही थी |


जब भारत की अर्थ व्यवस्था कठोर निर्णय से कठिन परिवर्तन के दौर से गुजर रही थी उस ही समय चीन द्वारा संक्रमित कोरोना वायरस ने भारत की अर्थ व्यवस्था को अव्यवस्था की ओर धकेल दिया है जिससे भारत की अर्थ व्यवस्था लगभग 20 साल पीछे चली गई है | आर्थिक मामलों में जानकारों का कहना है कि भारत को पुन: आर्थिक प्रगति का रास्ता तय करने में काफी समय लग जाएगा | सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थ व्यवस्था को पटरी में लाने के लिए भी काफी कुछ करना होगा | लॉक डाउन से जो आर्थिक लॉक आउट जैसा माहौल बना इस माहौल को मेहनत , मशीन तथा मुनाफे में बदलने के लिए काफी मशक्कत करनी होगी और इसके बदलाव में देश के  सभी आर्थिक यूनिटों , फैक्ट्रियों तथा संस्थाओं को अहम योगदान देंना होगा | इस समय सम्पूर्ण विश्व एक मुश्किल घड़ी में है ऐसे में सतर्कता एवं स्वच्छ नागरिक के रूप में देश समाज तथा परिवार को स्वस्थ , समृद्ध तथा सुरक्षित रखना होगा |


कोरोना संक्रमित भारतीय अर्थव्यवस्था तथा समस्त प्रकार के आर्थिक सिद्धांत पुन: परिभाषित हो कर एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने खड़े हैं | वर्तमान में उपभोग एवं उपयोग तो है मगर सिर्फ अतिआवश्यक वस्तुओं का ही जो कि राष्ट्रीय उत्पादन एवं आय के चक्रीय सिद्धान्त के विपरीत है जिसके कारण अर्थ व्यवस्था पंगुता की ओर चल रही है | भारतीय अर्थ व्यवस्था का आधार निचला उपभोगता एवं कुटीर उद्योग हैं | इसलिए इस दौर के अधिक समय तक होने से अर्थव्यवस्था में परिचालन क्षमता में काफी कमी होगी | क्योंकि न ही श्रम एवं श्रमिक की मांग है और न ही उत्पादन के घटक की जरूरत पड़ रही है | उत्पादन और विनियम चक्र पूरी तरह से ध्वस्त है , जिसका प्रभाव आने वाले दिनों में आम आदमी पर कहर बन बरसेगा | इस समय श्रम एवं आय के अवसर को संकुचित कर दिया गया है , जबकि व्यय में कई गुना वृद्धि हुई है | आम जनता की आय की कमी से सरकारी खजाने में भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जबकि सरकारी खर्चों में कई गुना वृद्धि हुई है , जिससे आने वाले दिनों में बजटीय घाटा होगा | इस समस्या उभरने हेतु हमें जितना जल्दी हो सके लॉक डाउन के विकल्पों के बारे मे सोचना होगा और अमल करना होगा |


कोरोना वायरस के संक्रमण के उपरांत सम्पूर्ण देश में जिस तरह आम जनता ने केंद्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर इस मुश्किल घड़ी में एकता को एक निष्ठावान कर्तव्यनिष्ठ नागरिक होने का संदेश दिया है वह अत्यंत काबिले तारीफ है और इस तरह का व्यवहार नवजागरण "एक भारत श्रेष्ठ भारत" की अवधारणा को चरितार्थ करता है | कुछ अप्रिय घटनाओं को छोड़कर हर एक नागरिक अपने सामाजिक दायित्वों को बखूबी निर्वहन कर रहे हैं | हमें आशा है कि जल्द ही हम सब इस आर्थिक तथा सामाजिक मुश्किलों से विजय प्राप्त करेंगे |   


   


लॉकडाउन में सहयोग के लिए आगे आई प्रशांत किशोर की इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी


वैश्विक महामारी करोना की वजह से हुए लॉक डाउन में लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है , जिसका सबसे बुरा प्रभाव आर्थिक रूप से सबसे निचले पायदान के लोगों पर पड़ रहा है |


इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रशांत किशोर के इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) “सबकी रसोई” नाम से एक कार्यक्रम शुरू कर रही है जिसके माध्यम से समाज के ज़रूरतमंद तबके को लॉकडाउन के दौरान रोजाना भोजन मुहैया कराने का प्रयास किया जाएगा | हालांकि सरकार अपनी तरफ से प्रयास कर रही है, लेकिन कई जगहों पर ज़रूरतों के सामने उसके संसाधन सीमित पड़ते दिख रहे हैं। 


इन परिस्थितियों में सबकी रसोई एक "वर्चुअल किचन" के तौर पर काम करेगा जिसके माध्यम से समाज के सबसे ज़रूरतमंद लोगों के एक बड़े तबके को लॉकडाउन के दौरान रोजाना भोजन मुहैया कराने का प्रयास किया जाएगा।


ऐसे में इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी के साथ तीन संस्थाएं सहयोग करेंगी फूड प्रिपरेशन पार्टनर (खाना बनाने वाली बड़ी संस्थाएं) जो कि प्रमाणित ट्रैक रिकॉर्ड वाली भोजन बनाने की संस्थाएं अपने कौशल एवं संसाधनों का उपयोग करते हुए स्थापित मानकों के अनुरूप अपने किचन में भोजन तैयार करेंगी।, दूसरी पैकेजिंग एवं डिलीवरी पार्टनर (खाने को पैक करने और पहुँचाने वाले लोग) जो कि उच्चतम मानकों का अनुपालन करते हुए भोजन के पैकेट तैयार करेंगी और नियत समय पर जरुरतमंदो तक पहुँचाना सुनिश्चित करेंगी।, और तीसरी ग्रासरूट फीडिंग पार्टनर (ज़मीनी स्तर पर भोजन कराने वाले व्यक्ति या संस्थाएँ) जिसमे कि 50 से अधिक लोगों को भोजन कराने की क्षमता या इच्छा रखने वाली संस्थाएं और व्यक्ति जरूरतमंदो को सम्मानपूर्ण तरीके से भोजन कराएंगी। इस दौरान वह लॉकडाउन के सभी प्रावधानों और सोशल डिस्टेंसिंग के दिशनिर्देशों का अनुपालन करेंगी।


“सबकी रसोई की शुरुआत 5 अप्रैल से हो चुकी है और अभियान अपने पहले चरण की ओर तीव्रता से प्रगतिशील है | जिसको सफल बनाने के लिए देशभर के 1,000 से अधिक मेधावी युवा एकजुट होकर इस कार्यक्रम को चला रहे हैं और चयनित शहरों में रोजाना 1.5 लाख लोगों को भोजन मुहैया कराएंगे। 


 



 


कोरोना काल में गरीबों तक राशन पहुँचा रहे हैं हंगर हीरो

फीडिंग इंडिया एन.जी.ओ. की टीम ने कोरोना काल के इस लॉक डाउन की कठिन परिस्थितियों में भी सुरक्षा कर्मियों के सहयोग से सरकार के साथ कंधा से कंधा मिला कर इस मुश्किल घड़ी में अपना कर्तव्य निभाया जो कि अत्यंत काबिले तारीफ है और "एक भारत श्रेष्ठ भारत" की अवधारणा को चिरितार्थ करता है | 



फीडिंग इंडिया के साथियों द्वारा आपसी सहयोग से सड़क किनारे रहने वाले गरीब परिवार तथा जुग्गी झोपड़ी में रहने वाले नागरिकों को खाने के लिए पका हुआ भोजन तथा कच्चा राशन वितरित किया | मानवता का फर्ज़ निभाते हुए कानपुर नगर के अंबेडकर नगर क्षेत्र के अलावा चकरपुर मंडी , नौबस्ता तथा आवास विकास जैसे इलाकों में घूम घूम कर 500 से अधिक जरूरतमंद नागरिकों को भोजन करा कर इस कार्यक्रम को सफलता के पैमाने पर स्थापित किया गया |



सहयोगियों के रूप में संस्था से अभिषेक शुक्ला , अमर अवस्थी , अनूप कुशवाहा , अरुण जासवाल , अमन कश्यप , दीपक राजपूत ,दीपक मिश्रा , दीपू , सचिन मिश्रा , शिव सेंगर , रमनदीप , रोहित राठोर , ध्रुव शर्मा , आदि लोग मौजूद रहे |    



Tuesday, April 7, 2020

मानवीयता की दुश्मन जमात 'तब्लीगी समाज'


आज जब पूरी दुनिया वैश्विक महामारी कोरोना के गहराते संकट से बुरी तरह जूझ रही है और अभी तक जहां विश्व समुदाय को इसका कोई कारगर इलाज नही मिल पाया है,ऐसी दारुन विभीषिका के समय में तब्लीगी समाज की घिनौनी करतूतों ने सम्पूर्ण मानवीय समाज को शर्मिंदा कर दिया है।समस्त सरकारी निर्देशों और नियमों को धता बताते हुए इस समाज के दकियानूसी ,ज़ाहिल और मानवीयता के दुश्मन लोगों ने भारी संख्या में दिल्ली में निज़ामुद्दीन में एक दरगाह में  में देश दुनिया के लोगों को मरकस के नाम पर इकट्ठा किया social distancing के निर्देश की खुलकर अवहेलना की और इस जमात के मुखिया मौलाना साद ने भड़काऊ भाषण देकर एकत्रित लोगों को संक्रमण फैलाने के लिए उकसाया।अनेक वायरल वीडियो इसकी प्रमाण हैं।वास्तव में तब्लीगी समाज ने भारतवर्ष में कोरोना संक्रमण की नियंत्रित स्थिति को बेकाबू करने और भारतवर्ष में विनाश का दुष्चक्र रचने के उद्देश्य से ही दरगाह में जमात विशेष के लोगों को इकट्ठा किया।एक सोची समझी साजिश के चलते तब्लीगी जमात के लोगों ने भारत के कोने कोने में पहुंचकर समूचे देश को भयावह स्थिति में पहुंचा दिया।जिसके कारण भारतवर्ष में संक्रमित लोगों की संख्या विगत चार दिन में ही दुगुनी हो गई।
वास्तव में भारत में कोरोना संक्रमण का बेतहाशा प्रसार करके हालात को बेकाबू बनाकर भारतीय संस्कृति ,परंपरा ,विश्वास और संस्कारों को आघात पहुँचाना ही  इस जमात विशेष का लक्ष्य है।
इस जमात का इससे भी अधिक घृणित चेहरा बेनकाब हुआ है। जो स्वास्थ्यकर्मी निःस्वार्थ रूप से इस जमात के लोगों का इलाज करने का प्रयास कर रहे हैं इस जमात के लोग जीवन रक्षकों पर ही जानलेवा हमला कर रहे हैं , इनकी मदद कर रहे पुलिसकर्मियों पर डंडों और पत्थरों से हमला कर रहे हैं ,यही नहीं हैवानियत की सारी सीमाओं को तोड़कर पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों के मोह पर थूक रहे हैं ताकि उनको भी कोरोना से संक्रमित करके अपने नापाक उद्देश्यों को अंजाम दे सकें।इससे भी गिरी हुई असभ्यता और अश्लीलता की सूचक हरकतें करके सेवा एवं इलाज करने वाली नर्सों के सामने अश्लील इशारे कर रहे हैं।सच्चाई तो यह है कि ऐसे लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में थूकते हैं।भारत की निर्दोष जनता को महामारी का ग्रास बनाने के लिए बेलौस घूमने वाले इन आतंकी मानसिकता वाले तब्लीगी जमात के लोगों के शरीर के इलाज की नही बल्कि इनके मानसिक ट्रीटमेंट के लिए कड़े प्रशासनिक कदम और कठोर दंड देने की त्वरित आवश्यकता है।
जिस लॉक डाउन को सफल करने के लिए सारा देश सन्नद्ध है उसे विफल करने के लिए ये जमात अपनी हरकतों के ज़रिए सोची समझी साजिश के तहत भारतवर्ष को लाशों की मंडी बनाकर तमाशा देखने का मंसूबा रखे हुए है। ऐसी जमातों के मंसूबों को नेस्तनाबूद करने की सख्त जरूरत है।
जय हिंद ।।


शुभांक उपाध्याय


माँ का प्यार, हम नहीं करते उनसे इकरार |


माँ हमेशा मेरे साथ रहती है, माँ की आँखें मेरे साथ हमेशा बहती है |


माँ ने हमें खिलाया हमें पिलाया और था हमें सिखाया,


हमनें उनको तो न पूछा ,उन्होंने हमेशा हमारे हर प्रश्न को था बुझा |


 


माँ जब भी मुझे याद तुम्हारी आती है, मेरी आँखें नम हो जाती हैं |


मैं तुम्हे दवाई भी न दिला सका, न तुम्हारा एक होनहार बेटा कहला सका |


जब-जब मैं तुम्हे बुलाया करता था, तुम मेरे पास आ जाया करती थी |


मैंने एक प्यारी माँ को पाया था, जिसकी कद्र मैं न कर पाया था |


 


वो माँ कितनी भोली थी, जिसने लगाई भगवान को रोली थी |


वो माँ मेरी जान है, मेरी माँ बहुत महान है |


माँ

 


कितनी प्यारी है वो माँ, जिसको पूछा भी हमने कहाँ |


माँ ने हमेशा हमारी मदद की, और उस माँ की हमने इबादत भी न की |


कितनी भोली थी वो माँ, जिसकी वजह से मैं आज यहाँ खड़ा हूँ |


तुम वापस आ जाओ न माँ, जाने मैं तुम्हारे बिना ये कहाँ खो गया हूँ |


 


कितनी प्यारी थी वो माँ, जिसकी वजह से मैं सुरक्षित हूँ |


वो माँ का प्यार था निराला , जिसकी वजह से आज मैं जिंदा हूँ |


वो रातें जब मैं याद करता हूँ, जब सोते समय वो माँ मुझे कहानियाँ सुनाया करती थी |


वो दिन जब मैं याद करता हूँ, जब वो माँ मुझे अपने हाथों से खिलाया करती थी |


वो माँ कितनी भोली थी, जिससे लगवाई ईश्वर ने रोली थी |


वो माँ को मेरा प्रणाम है, ओ माँ तू बहुत महान है |


वो माँ को मेरा प्रणाम है, ओ माँ तू बहुत महान है |


कोरोना वायरस में क्या करें क्या न करें


आज का समय, कल का इतिहास होगा और इतिहास के कई पन्नों यह गवाही दे रहे हैं कि संपूर्ण मानवजाति को हर सौ वर्षों में एक बार ऐसी महामारियों से लड़ना पड़ा है जिसके कारण मनुष्य और उसकी रोजमर्रा के कार्यशैली पर विराम लगता रहा है। इन महामारियों के समय पर इलाज न होने पर कई मासूमों को जान गंवानी पड़ीं। इतिहास के बीते समय से सबक लेकर इन्सान को सतर्क रहने की आवश्यकता है परन्तु लगातार बढ़ती टेक्नोलॉजी, व्यस्त जीवन और लापरवाही में मानव यह भूल गया कि आदमी को अपने कार्यो और गति को नियंत्रित करने की आवश्यकता है।
कुछ बुनियादी नैतिकता और नियमों को पालन करने की आवश्यकता है।
मानवता को न भूलकर; भगवान् पर विश्वास बनाये रखने की आवश्यकता है।
खुदके द्वारा किये गए नवाचारों और अविष्कारो पर गर्व महसूस करके खुदको भगवान् मानने की मूर्खता न करके, सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
इन महामारियों की ऐतिहासिक रिपोर्ट के अनुसार :-
1720 – प्लेग या ताऊन, ब्लैक डैथ।
1820 – काॅलरा या हैजा।
1920 – ब्रबोनिक प्लेग या स्पेनिश फ्लू ।
2020 -कोरोना वायरस या कोविड़-19 ।


🔅ध्यानपूर्वक सोचने की बात यह है कि ” कोरोना वायरस (कोविड-19) ” कहां से और केसे आया ?
👉🏻 क्या यह कोरोना नहीं कर्मा हैं?
👉🏻 क्या यह भगवान् का अभिशाप हैं?
👉🏻 क्या यह किसी वनजीव का कोई वायरस हैं?
👉🏻 क्या यह कोई प्राकृतिक आपदा है?
👉🏻 क्या यह किसी पवित्र आत्मा की भविष्यवाणी है जिसे कई लोग धर्म से जोडकर यह दावा करते हैं कि यह इनके ईश्वर के दूत की भविष्यवाणी है ताकि मानव अपने दुष्कर्मों पर लगाम लगा सके?
👉🏻 क्या यह चीन देश द्वारा स्वनिर्मित वायरस है; जो चीन देश ने अपने प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ बायोवार यानि जैव हमले के लिए उपयोग करने के इरादे से बनाया हे?
कोरोना वायरस या कोविड़-19 के अस्तित्व का जो भी कारण हो पर आज यह अधिक घातक और जानलेवा वायरस पूरे विश्व में तेजी से फैल रहा है और कई मासूमों की जान ले चुका है।
जिसके विश्वभर में फैलने का विशेष कारण है लापरवाही आज लापरवाही आत्महत्या के समान है ।
लापरवाही यानि सरकार और स्वास्थ्य संबंधी नियमों का लगातार उल्लंघन करना ।
इस घातक आपदा को गंभीरता से न लेना।केवल सरकार को इसे रोकने का जिम्मा सौंपना और इसके प्रसार से बचने के लिए अपने दम पर कोई प्रयास नहीं करना।
और इसका एकमात्र इलाज है “सावधानी”


कोरोना के फैलने के कारण
👉🏻 लापरवाही।
👉🏻 चीन द्वारा पूरे विश्व को गुमराह करना।
👉🏻 अधूरा ज्ञान।
👉🏻पहले से ही पीड़ित देशों से सबक नहीं लेना।
👉🏻 खुद को कोरोना संक्रमित होने के बावजूद भी सबसे छुपाना।
👉🏻 वनजीव और पशुओं के साथ छेड़छाड़।
👉🏻 सरकारी नियमों का उल्लंघन करना।
👉🏻 विदेश से आने वाले पर्यटकों की ठीक से स्कैनिंग न होना ।
👉🏻 सही और सच्चाई छुपाकर खुद के बचाव के लिए झूठी अफवाहें फैलाना।
👉🏻 सावधानी न बरतना।
👉🏻 बेवज़ह सड़कों पर घूमना।
👉🏻 पेट को कूड़ेदान समझना ;जीने के लिए खाने की जगह केवल खाने के लिए जीना जिस वजह से हर जीव को खा लेना।
👉🏻 खांसी, बुखार या अन्य शारीरिक पीड़ा को नजरअंदाज करना।
👉🏻बिना मास्क और शरीर को ढके इन दिनों बाहर निकलना।
👉🏻 विदेशी देशों से आई महामारी के दौरान अभी भी विदेश से ऑनलाइन खरीदारी करना।
👉🏻 हाइजीन, साफ-सफाई और सैनिटाइजेसन को लेकर लापरवाही बरतना।


क्या करें
👉🏻 खासी या छींकने पर मुहँ को अच्छी तरह से ढके, टिशू या मास्क का इस्तेमाल करे।
👉🏻अगर कोई व्यक्ति आपके बिल्कुल नजदीक खासे या छींके तो कुछ सेकंड तक टुकड़ों में साँस ले।
👉🏻सफाई के लिए अपने हाथों को लगातार धोते रहें। हाथ गंदे नहीं होने पर भी धोएं।
ध्यान रखें इन सभी कार्यों में लापरवाही न करें और अपने दोनो हाथ कोहनी तक लगभग 25-30 सेकंड तक अवश्य धोएं :-
👉🏻छींकने और खांसने के बाद।
👉🏻 बीमार व्यक्ति से मुलाकात के बाद।
👉🏻शौचालय के इस्तेमाल के बाद।
👉🏻 खाने बनाने और खाने के बाद।
👉🏻 पशुओं को छूने के बाद।
👉🏻 बाहर से आने के बाद।
👉🏻 घर और बाहर की सफाई के बाद।
👉🏻 सफर के दौरान।
👉🏻 कुछ भी खाने से पहले, दवा तक खाने से पहले।
👉🏻 दरवाजे के हत्थे को संभलकर छुए।
👉🏻 फलों और सब्जियों को अच्छे से धोएं। सब्जियों को अच्छे से पकाये।
👉🏻6 से कम और 60 से अधिक उम्र के सभी विशेष सावधानी बरतें।
👉🏻 रिमोट और मोबाइल फोन को हर 3-4 घण्टे मे सेनाटाइस करे।
👉🏻कमरे का तापमान ज्यादा रखे।
👉🏻 ताजी हवा के लिए खिड़कियां खुली रखे।
👉🏻 घर से बाहर मास्क और पूरे कपड़े पहनकर निकले।
👉🏻 यदि आपको खांसी और बुखार महसूस होता है तो लोगों से दूरी बनाए रखे और ऐसा होने पर तुरंत डॉक्टर को संपर्क करें ।
👉🏻 यदि आप खाने के लिए अपने दाहिने हाथ का उपयोग करते हैं और दाहिने हाथ से ही अपना अधिकतम कार्य भी करते हैं, तो कोशिश करे, अपने बाएं हाथ के उपयोग से छोटे-छोटे काम करे जैसे कि दरवाजे-खिड़कियों को खोलने और बंद करना, किसी भी बटन को दबाने, खरीदे गए सामान को पकड़ने और पैसों और सिक्कों को छूना।
👉🏻 यदि कोई आवश्यक पार्सल आता है तो उसे तुरंत न छूए बल्कि सावधानीपूर्वक उसे किसी टेबल पर रखवा कर एक दिन बाद खोले।
👉🏻खाने-पीने पर विशेष परहेज करें ; कोशिश करें कि घर का बना खाना खाये।
👉🏻सामाजिक दूरी बनाये रखें।


क्या न करें
👉🏻 लापरवाही और असावधानी न बरतें।
👉🏻 सरकारी और स्वास्थ्य संबंधी नियमों का उल्लंघन न करें।
👉🏻 बेवज़ह घर से बाहर न निकलें।
👉🏻 खरीदारी या किसी अन्य कारणों में प्लास्टिक का उपयोग हरगिज न करें।
👉🏻 चेहरे, नाक और आँखों को छूने से बचे।
👉🏻 लिफ्ट के बटन हाथ से न दबाएं, पेन या अन्य वस्तु का प्रयोग करे।
👉🏻 वनजीव के साथ छेड़छाड़ न करे।
👉🏻 पशुओं को न छूए।
👉🏻वातावरण मे गंदगी न फैलाए।
👉🏻सामाजिक मेलजोल, भ्रमण और यात्रा, सार्वजनिक सम्मेलन, सभा, पिकनिक और सार्वजनिक पार्क मे फिलहाल जाने से परहेज करें।
👉🏻 पशुओं के मांस स को न खाएं।
👉🏻बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा न लें।
👉🏻अफवाहों या नकली कोरोना संबंधित वीडियो पर विश्वास न करें।
👉🏻 भीड़ में शामिल होने से बचें ।
👉🏻 सार्वजनिक स्‍थानों पर थूकने से बचें।
👉🏻 खेतों की ओर जाने, जीवित पशुओं के बाजार में जानें से बचें।
👉🏻 जहां जानवर का वध किया जाता हो, वहां जानें से बचें।
👉🏻 बुखार, खांसी और जुकाम हो तो यात्रा न करें।


करोना का वातावरण में असर
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। आज जहां पूरा विश्व इस गंभीर महामारी ” कोरोना वायरस (कोविड-19)” से जूझ रहा है, संपूर्ण मानवजाति कई प्रकार की आथिर्क और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना कर रहीं है वहीं इस वायरस के प्रकोप को रोकने के लिए सभी यातायात, ट्रांसपोर्ट, छोटी-बड़ी सभी फैक्ट्रियों, कारखानों और मिलो पूरी तरह से बंद कर दी गई है। जिसके कारण इन फैक्टरियों से निकलने वाला जानलेवा एवं दूषित कूड़ा पर भी रोक लग गई है जोकि बहते पानी और सड़कों पर फ़ैका जाता है। वायु और जल प्रदूषण कुछ हद तक नियंत्रित है।
धरती पर हीटिंग गैसों जैसे कार्बोनडाईऑक्साइड और नाइट्रोगेन्डॉक्साइड का उत्सर्जन में तेजी से गिरावट आई है। सारे विश्वभर में एक साथ प्रदूषण में रूकावट की वजह से मानों प्रकृति खुद को ठीक एवं निरन्तर करने के लिए आत्मसात हो रही है। पर्यावरण में संतुलन बन रहा हैं।
👉🏻 सड़कों पर दुर्घटना हादसे नहीं हो रहे हैं।
👉🏻वनजीवो के व्यापार में रोक लग गई है।
👉🏻 पेड़ों को व्यापार कारण नहीं काटा जा रहा है।
👉🏻 वातावरण में हानिकारक उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी आई है।
👉🏻वायु और जल प्रदूषण में भारी कमी।
👉🏻 पानी नाव यातायात के अभाव में साफ होता दिखाई दे रहे हैं।
इतना बड़ा पर्यावरण संतुलन इतने बड़े विश्व स्तर पर करना नामुमकिन था।


कोरोना वायरस का समाज पर असर
👉🏻आज सरकार के आदेश के अनुसार सभी तरह के कार्यो मे प्रतिबंध लगा हुआ है जिसके कारण दैनिक मजदूर वर्ग को दो वक्त की रोटी जुटाने में भी काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हैं और गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वाले लोगों को कई दिन तो भूखे पेट सोना पड़ा है।
👉🏻 यातायात सेवाएं पूरी तरह से बंद होने के कारण, अपने घरों से दूर किसी अन्य राजधानी में काम कर रहे मजदूरों को अपने घरों में वापसी के लिए मीलों पैदल चलने पड़ रह हैं और रास्ते में खाने के बंद ड़ाबो के कारण भूखे पैदल चलना पड़ रहा है।
👉🏻 सबकुछ बंद होने के कारण सड़कों पर रह रहे लावारिस जानवरों को भी भूख का सामना करना पड़ रहा हैं।
👉🏻 आज मानवता और देशभक्ति के कर्तव्य निभाने का समय है। हो सके तो गरीब मजदूरों और बेजुबान जानवरों के लिए रोटी का इंतजाम करे।
👉🏻 बिना कारण जाने घर से बाहर न निकलने वाले लोगों पर लाठी से हमला या दुर्व्यवहार न करें। सही कारण होने पर उस मजबूर व्यक्ति को सहयोग दे।
👉🏻 बेघर लोगों को मास्क, स्वच्छता उत्पाद प्रदान करे क्योंकि यही लोग सबसे ज्यादा मुश्किल समय से गुजर रहे हैं।
👉🏻 रोटी खिलाते समय या अन्य किसी प्रकार की जरूरत की चीजें देते समय, हाथों की उँगलियों से V बनाकर और टेढ़े-मेढ़े मुहँ बनाकर तस्वीर और सेल्फी न खींचे।
👉🏻 निस्वार्थ सेवा करते वक्त अपनी वाहवाही न करें। किसी की भी सहायता करते वक्त दान या अन्य किसी प्रकार की मदद लेने वालों की तस्वीरें बिना उनकी अनुमति के सोशल साइट्स जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्वीटर आदि में न डालें। किसी भी गरीब की भावनाओं को ढे़स न पहुंचाए ।
👉🏻 यदि कोई समाज कल्याण दल, गैर सरकारी संगठन या सामाजिक कार्यकर्ता ऐसे है जो इन दिनों कोरोना वायरस से किसी भी तरह से पीड़ित लोगों की सामाजिक मदद एवं आर्थिक मदद करने में जुटे हैं तो ऐसे समूह या लोगों की जानकारी आप ज्यादा से ज्यादा सबको दे, इन सहायक दलों की जानकारी आप निस्संदेह बिना किसी झिझक के अपनी सोशल साइट्स में डाले ताकि अन्य मजबूर और हालात द्वारा मजबूर व्यक्ति इनसे संपर्क कर सके। ऐसी सेवाओं की
वीडियो फैलाए ताकि इससे सबको प्रेरणा मिलती रहे और अधिक से अधिक लोग एकजुट होकर मानव एवं पशुओं की सेवा में अपना सहयोग दे।
👉🏻 यदि भूलवश इन्सान से कोई गलती या पाप हो जाता है तो हर व्यक्ति उसे समाज से छुपाने का गहरा प्रयास करता हैं ठीक उसी प्रकार निस्वार्थ की गयी;किसी भी तरह की और किसी भी प्राणी की सेवा को बढ़ाकर न दिखाए, बल्कि आपके द्वारा किए पुण्य से अपने बच्चों और आस-पड़ोस के लोगों को प्रेरणा दे और मानवता का कर्तव्य निभाए।


” करोना “का समय यानी ” करो ना का समय”
करो न असावधानी,
मिलाओ न हाथ,
सामाजिक दूरी बढाओ,
देश को बचाओ ।।
लापरवाही को छोड़ो,
स्वच्छता से नाता जोडो।
दो सरकार का साथ,
मानो प्रधानमंत्री जी की हर बात।
खासते और छिकते वक्त मुहँ को ढको,
बेवजह कदम घर से बाहर न रखो।
तापमान शरीर का अगर बड़े,
तो कोई भूल न करे।
तुरंत करवाना नजदीकी हस्पताल में जाँच ,
भेद न करना कोई किसी से,
इस संकट की स्थिति में एक ही है हम पांच(हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई और जैन)।।
दो रोटी खुद खाकर;
दो रोटी भूखे मजदूर और भूखे जानवर को भी खिलानी है।
पर विशेष ध्यान रखना होगा
कि करते समय इस पुण्यकर्म कोई तस्वीर नहीं खिंचवानी है ।।
दुआ करते हैं हमसब मिलकर कि
रहे सुरक्षित दुनिया का हर एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी और रहे सलामत हर चिकित्सा, सफाई कर्मचारी और सभी पुलिस अधिकारी।
न आए कोई विपत्ति इनपर,
दिल से हम सब इनके आभारी ।
इन्हीं सभी की तरह हमे भी पालन करना होगा हर नियम सरकारी।।
एकजुट होकर हम सभी को मानवता का कर्तव्य निभाना है।
अपनाकर इन्सानियत के धर्म को करोना को पूरे विश्व से मिटाना है।
किसी भी सुझाव और सलाह के लिए यहाँ सम्पर्क करें।
भारत सरकार, कोरोना हेल्प डेस्क फ़ोन नंबर
-📞90131 51515
जय हिंद🇮🇳
लेखिका – केसर रानी (परमीत)
जम्मू-कश्मीर


प्रेम का भटकाव


हम भटकते रहे यू उनकी तलाश में, 
वो भी हमको भटकाते रहे! 


हम अनजान थे उनकी महफ़िलों से, 
वो भी हमकोअनजान बनाते रहे!


 यूं तो हमसे बेहद प्यार करते हैं, 
बंद कमरे में हमको ये समझाते रहे!


 जब बात यू उड़ीं पूरे जमानें में, 
वो मुकर गए हमसे, हमें अपना बनाने से!


 हम याद करते रहे उनकें सभी वादों को, 
वो भी हमको याद दिलाते रहे! 


हम तो पागल थे उनके प्यार में, 
वो भी हमको पागल बनाते रहे!


Featured Post

सूर्य या चंद्र की खगोलीय घटना होने की संभावना

सुमित कुमार श्रीवास्तव  ( वैज्ञानिक अधिकारी) भारत वर्ष में उपच्छायी चंद्र ग्रहण दिनांक 5 मई 2023 को रात्रि में 8.45 से 1.02 बजे तक दिखाई दे...