स्वर्गीय. डॉ राजेंद्र बहादुर सिंह (1951-2019)

शिक्षक , स्वतंत्र लेखक एवं सांस्कृतिक वार्ताकार के रूप में जाने जाते हैं। उनका जन्म बाराबंकी के पूरे बैश गांव में एक शिक्षक परिवार में हुआ था । अंग्रेजी साहित्य , इतिहास , राजनीति शास्त्र , भारतीय दर्शन , वांग्मय पर उनका समान अधिकार था । महाभारत तथा रामायण पर उन्होंने विशेष अध्ययन किया।
प्रिअंबिल टू द कंस्टीटूशन ऑफ़ इंडिया : आईडियल्स एंड वर्किंग , द मर्ज़िनल्स, ह्यूमन राइट्स : अ ग्लोबल कंसर्न , राष्ट्र गौरव , हमारी सांस्कृतिक अस्मिता ,उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। एक शिक्षक के रूप में भाषा शिक्षण को सुगम बनाने हेतु उन्होंने वर्कशीट्स और मॉडल भी विकसित किये थे। मानव धर्म ,यूनाइटेड नेशंस : अ मॉडल सज़्ज़ेशन, वाल्मीकि : अ पोलिटिकल थिंकर, अ डिक्शनरी ऑफ़ पोलिटिकल साइंस , इंडियन माइथोलॉजी एंड कल्चर , उनकी अप्रकाशित रचनाएँ हैं । उन्होंने सांस्कृतिक , साहित्यिक एवं राजनतिक मुद्दों पर सैकड़ों निबंध लिखे , लिबर्टैरियनिज़्म , सदर्न राइट्स मूवमेंट्स जैसे विषयों पर भी उन्होंने कार्य किया और उनके लेख द आइडियाज एंड मूवमेंट्स दैट शेप्ड अमेरिका में कैलिफोर्निआ से प्रकाशित होकर काफी सराहनीय रहे हैं ।
14 अप्रैल 2019 को उनका देहांत हो गया ।
स्वप्न कुसुम
स्वप्न कुसुम से मिले विचार पुनः जग उठे,
बिंदु के प्रसार से प्रकाश बिंदु बन चले ,
और फिर प्रकाशपर्व इधर मन कुटीर में ।
किन्तु यह प्रतीति सब विगत का बिम्ब अब
युग हुआ विलीन वह जहाँ कहीं हम रहे ।
नया प्रहार आ चला , नयी सृष्टि तो नहीं,
पर नया स्वरुप यह।
मिथक
मिथक कहें पाप हो , सत्य सुने जगत कहाँ ,
यहाँ वही बिके चले , बस आवरण धुला हुआ ।
अनेक बने संत वो दस्यु जो प्रत्यक्ष थे
सत्य कहाँ ,सत्य कहाँ कहाँ कहाँ वर्जना ।
ज्ञान की रश्मि, पर अभी चिर अखंड है ,
अनंत तक रहे ये दृढ़, जले चले प्रकाशमान ।
चक्र यही है भौतिकता का
आकाशदीप टिम टिम जलता था, आम्र तरु की दृढ़ शाखा में ,
कहते तुमको राह दिखाता जैसे तुमने इधर दिखायी ।
जलती रही वर्तिका लहरा तुम भी तो कर्मठ ही बीते,
कर्तव्यों से बिंधे बिंधाए , कर्मठ पथ पर चलते चलते।
प्रतिदिन अनंत तक इच्छायें मेरी, मुझसे कहती, आकर
और तुम्हारे रोज़ कथानक आते रहते ।
चक्र यही है भौतिकता का, आकर हम, चलते रहते हैं ,
और अचानक एक दिवस पथ अनंत पर चल पड़ते हैं।
अनंत में विलीन तुम
निर्माण अनंत कर गए ज्ञान कर्म पथ अनंत
गूँज रहे कथन कई दृष्टि के घोष बने ।
दृश्य सभी सजीव हैं , स्वर्गदीप जल चुका
अनंत में विलीन तुम अनुगूंज किन्तु व्याप्त इधर ।
मिथक , युद्ध राजनीति साहित्य , कला , दृष्टि आदि
रोज़ नयी लिये सृष्टि नयी लिये प्रफुंजिका।
उसकी गति पर कैसा चिंतन
विश्वास कर्म की गति पर , कर्म पथी जो रहे निरंतर
उसकी गति पर कैसा चिंतन , कर्मठ गति पर कैसा चिंतन ।
नारायण का कथन और भाष्यों की प्रस्तुति,
कर्मठ बन ऋषियों सा जीवन फिर अनंत पथ , अब क्या चिंतन !
पौरुष से जो राह बनाता किसी अनर्गल से न नाता
स्वाभिमान सा पुंज जले तो फिर ऐसा वैसा क्या चिंतन ।
जब तक जीवन प्रांजल जीवन फिर तो क्या ,क्या अनंत का वर्णन ।