मेरे डैडी " केसरी उर्फ केसर सिंह"
हाँ कोयल के कूकने की आवाज आती थी ,मेरे घर के सामने वाले पेड़ से,,
परवाह नहीं थी मुझको दुनिया की और रोज सुबह देरी से उठती थी मैं।
"उठ जाओ दुनिया कहा से कहा पहुँच गयी" बोलकर यह,
हर रोज डैडी मुझे जगाते थे।
सुनकर मुस्काना और फिर सो जाना, चिंता नहीं थी तब कोई, और मन में था अटूट विश्वास,क्योंकि उस वक्त मेरे डैडी,मेरे हीरो का साथ था मेरे पास।
अब वैसी नीद नहीं आती,
अब वैसी मुस्कान नहीं आती,
जीवन के इस मोड़ में कशमकश से न जाने क्यों आखें नम सी हो जाती ।
घर के आंगन में जब भी अब कोयल है गाती,
कोयल की कूकू में अब वह मिठास नहीं है आती ।
बिना बोले मेरे मन का हर दर्द सूनने वाला, मिला न फिर मुझे "डैडी" सा साथी ।
अनजान थी तब मैं पैसों की कीमत से और न ही मुझे तब रूपये का था मोल पता ,
क्योंकि जितना मांगा था जेबखर्च,
हँसकर था मेरे डैडी ने मेरे हाथ में रखा।
दौड़-धूप मे बिता दिया उन्होंने अपना जीवन सारा,
और मेरी हर ख्वाहिश पूरी करने को न वो थका, न हारा ।
कुछ ख्वाहिशें तो मेरे डैडी की भी जरूर होगी लेकिन जिम्मेदारियों के तले अपने कंधो पर था बच्चों के भविष्य का सपना रखा,
जीवन तो काटकर चल दिए,,, फिर भी जीवन जीने का स्वाद उन्होंने कभी न चखा।
डैडी जब पास थे तो हर रिश्ता ख्याल रखता था,
कैसी है सेहत मेरी और क्या है उद्देश्य मेरा,ऐसा सवाल करता था।
डैडी नहीं है अब यहां पर आज भी वही लोग हैं, ओर है वही बस्ती।
तन पर कपड़ा बेशक महँगा पर दिमाग में सोच घटिया और सस्ती।
गर्व है मुझे डैडी मेरे अलग थे और ऐसे कर्म कर गये, मिटी न आज भी उनकी हस्ती।
बढती जा रही अब उम्र मानो बचपन से सीधा बूढ़ी हो गयी।
पिता का अभाव हो जिस घर में वहां जिम्मेदारी के तले जवानी कहा रही।
थे मैले कपड़े उनके और रहती थी हाथों में कालख लगी,
फिर भी कहते थे "मत देखो कीमत", लेलो बाजार से जो है पसंद और लगता सही।
मैं पगली अपनी पसंद पर रहती थी अडी,
और डैडी के दम पर तब, कीमत तो देखी नहीं मेने कभी।
शिक्षा पूरी कर आज जब मैं कमाने लगी,
सोच-समझकर करती हूँ खर्च , जैसे हो न जाए हिसाब में गलती कही।
यदि अभाव हो जीवन में किसी भी चीज का तो पिता का साया पूरी कर देती है हर कमी,
और न रहे अगर उनका हाथ सिर पर तो अच्छा वक़्त भी देता हर क्षण चेतावनी नयी।
साथ थे डैडी तो रिश्ते थे कोमल जेसे रूई,
अब वार करते है जुबान से और चुभती है बातें जैसे सूई।
साथ था डैडी का जबतक,
थी मैं मुश्किलों से अनजान,
झुकती थी दुनिया सुनकर "केसरी" उनका नाम।
और कर देते थे मानो वो मेरी,
हर मजिल को आसान।
है कई दुख और तकलीफें जीवन में मेरे,
फिर भी अरमानों के दम पर
तेरे
हर दिन सुबह शाम सवेरे,
आगे बढ़ती जाऊंगी मैं क्योंकि इन दो आँखों में मेरे,
सपने हैं "डैडी" सिर्फ तेरे ।
सदियाँ बीत गयी अब बिन तेरे
फिर भी मेरी यादों में तेरे प्यार के बसेरे।
सीखाया हमेशा था आपने यह, कि किसी की आँखों मे,
आये न कभी मेरे कारण पानी,
चलूँ सदा पथ पर तेरे और दुनिया गर्व से कहे मुझे, तेरी "केसर रानी"।
जीवन मे अब मेरे जब भी कोई खुशी के दिन आएगे,
रंगीन कपड़े पहनकर सब नाचेगे गायेंगे,
फिर भी यह व्याकुल दिल मांगे रब से दुआ रोते रोते,
काश मेरे जीवन के हर खास पलो में "मेरे डैडी" साथ होते।
बस एक दुआ है मेरी परमात्मा से,
जहाँ पर भी है डैडी मेरे, वह सदा खुश रहे।
और हाथ जोड़ रब से, मांगू मैं वरदान यह,
"हर व्यक्ति के जीवन के खास दिनों में उनके माँ-बाप साथ रहे।
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