सब रब धे बंदे ने,
न कोई पेडे, न चंगे ने।
फकीरी पैशा है जिसदा,
उसदे न कोई काज; न पंगे ने।
तुर पैदे ने मीला,
पावे होन खड़ावा या पैर नंगे ने।
जदो व जुल्मी कोई भटके,
हक/सच तो बाबा जी ने सब पुठे टंगे ने।
सब रब धे बंदे ने,
न कोई पेडे, न चंगे ने।
फकीरी होवे पैशा जिसदा,
ओ रब दे रंग विच रंगे ने,
सब सजदा कर कर गया,
जो अकड़ अकड़ सामने तो लंगे ने।
जीडे सोचते ने,थले लावन नूं,
औ दिमाग शैतान ते गंदे ने।
मल मल हथ मे यार(रब) मनावा,
जो वेख वेख मेनू हसदे औ अन्ने ने।
सब रब दे बंदे ने,
न कोई पेडे, न चंगे ने।
फकीर इक इक सां विच करदे सिमरन,
होनदे उनदे दिल ते दिमाग विच दंगे ने।
सबदी खाली झोलिया परती,
जो रहन गुरु दे संगे ने।
उस धरत विच कोई की वश करे,
जिथे मेरे बाबा जी खंगे ने।
हे सच मे डुबा एक फकीर मेरा गुरु, मुझे तो बस जन्नत ए दरबार जाना हैं।
करके हर घड़ी,हर पल सजदा अपने गुरु "बाबा बलदेव शाह जी" का,इनसे एक पाक रिश्ता निभाना हैं।
फकीरों का नियम तो बस हक और सच है, बस जिन्दगी का यही नियम बनाना हैं।
चल देता हूँ वक्त-बेवक्त दरबार मे मैं, यह तो बस मेरे रब से मिलने का बहाना हैं।
भरदी खाली झोलियां मेरे बाबा जी ने सबकी, हे कर्जदार मेरे बाबा जी का सारा जमाना हैं।
छोड़ के बस्ती कलयुग की, अब यह जीवन मेरे गुरु के रहमो कर्म के नाम करवाना हैं।
बंद करदे सारी दुनिया अपने दरवाजे मेरे लिए फिर भी बेपरवाह हूँ मैं, मुझे तो अपने बाबा जी के दिल मे घर बनाना हैं।
झूठ बोले कोई पाखंडी मेरे रब के दरबार में, ऐसे ढोंगी से बाबा जी ने खुद ही सच बुलवाना हैं।
हे पाक दरबार मेरे बाबा जी का, सच्चे मन से शीश झुकाना हैं।
करता हूं सजदा लख लख बार, मन मेरा तो बाबा जी का दिवाना हैं।
रखे कदम मेरे बाबा जी के दरबार मे अगर कोई, पहले उसे उच्च-नीच, अमीर-गरीब, जात-पात की सोच को भुलाना हैं।
दिन रात मग्न है फकीर इबादत मे दरबार पर ,फिर भी उस पाक जमीन से किसी ने क्या चुराना हैं। है खुद अंतर्यामी जो,उस बाबा जी किसी ने क्या छुपाना हैं ।
है हर सवाल का जवाब मेरे गुरु के पास, वो तो सर्वोत्तम ज्ञान का खजाना हैं।
कहते है गुरु जी कण कण मे रब है, हर जीव मे रब है; तो किसी भी पशु, पक्षी और अन्य जीवों को नहीं सताना हैं।
मेरा देह ही सब कुछ है और तन, मनहसे किसी को दु:ख देना ऐसी सोच को हटाना हैं।
असंभव को संभव कर दिया, नवाजा अपनी झोली से भक्तों को खजाना हैं।
शब्दों का कोई मोल नहीं दरबार मे, गुरु की वाणी का तो खामोशी मे भी मधुर तराना हैं।
क्या डुबाऐ गा कोई उसको जो "रब का बन्दा" और "गुरु का दिवाना" हैं।
बात है सब "दुआ और फरियाद" की सच्ची बाकी तो बस फसाना हैं।
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