पंथ-जीवन का कँटीला मन-बटोही है हठीला।
तयशुदा है अंत लेकिन, रुक न जाना कहीं, मीत तुम हारकर।
अश्रु किसके लिए, दर्द किस बात का।
सब छलावा यहाँ, एक दो रात का।
मुस्कुराते वही, गुनगानते हैं जो, दूसरों की खुशी-में-खुशी जानकार।
किस पराजय से डर, चाह किस जीत की।
व्यर्थ है लालसा, राह में मीत की।
काल से नित समर, लड़ते रहना अथक, थम न जाना कहीं, मृत्यु का ध्यानकर।।
रुक न जाना कहीं, मीत तुम हारकर ||
किसलिए बन्धनों में बँधे जा रहे। .मधु समझकर ये विष क्यूँ पिए जा रहे।
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