Thursday, April 16, 2020

जरा सा थम लें


बहुत चला अब तक तू भारत
ले थोड़ा विश्राम तू थम कर


तेरा कोई आदि न जाने
क्या कर लेगा अंत भी कोई


न कर ऐसा , न बन वैसा
कोई नहीं है तेरे जैसा


अपने एक सृजन की खातिर
थम जाती कई मास को नारी


ये थमना क्या थमना  कहलाता
ये ब्रह्मा का काज वो करती


क्यों माता का तप तुम हरते
क्यों न कुछ दिन घर में रहते


बहुत तुमने है जग को जाना
अब थोड़ा अपने को जानो


तुमसे ही बनता ये भारत
बदल कर देखो अपनी आदत


गागर में सागर को भर लो
घर में ही संसार को रच लो


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