Sunday, April 19, 2020

लॉक डाउन और सामाजिक निहितार्थ


वर्तमान समय बड़ा संकट पूर्ण है एक ओर पूरा देश और विश्व कोरोना नामक वैश्विक महामारी से आक्रांत है तो दूसरी ओर पूरा मानवीय समाज मानवीय  विभीषिका से दो चार हो रहा है। जितनी विकट समस्या  इस वैश्विक बीमारी से उबरने की है संभवतः उससे कहीं कम इस समय उपजी सामाजिक परेशानियों  की भी नहीं है और  कोरोना ने आज समूचे विश्व के गति चक्र को रोककर लगभग पूर्णत:'चक्का जाम' कर दिया है प्रकृति के साथ खिलवाड़ का  इससे भयावह परिणाम और क्या होगा कि समूचा मानवीय समाज ही एक दूसरे से दूरी बनाने अर्थात 'सोशल डिस्टेंसिंग 'के लिए  आज विवश हो गया है। प्रशासन के द्वारा अपील की जा रही है कि लोग सामाजिक रूप से जितना एक दूसरे से दूर रहेंगे उतना ही इस महामारी के प्रकोप और प्रसार से बचेंगे और जितना निकट आएंगे इस बीमारी के गंभीर दुष्परिणाम के भागीदार बनेंगे ।इसी  समसामयिक जरूरत के मद्देनजर भारत में भी दुनिया के अन्य देशों की तरह लॉक डाउन तथा कर्फ्यू लगाया गया। हर सिक्के के जैसे दो पहलू होते हैं, इस लॉक डाउन के भी दोनों पहलू हैं ।कोरोना महामारी के निदान स्वरूप तो लॉक डाउन एवं  social distancing लाभप्रद एवं सकारात्मक एकमात्र तरीका है लेकिन लोगों के सामाजिक जीवन एवं सामाजिक चरित्र  को लॉक डाउन ने कितनी बुरी तरह से 'ताला बंद'कर दिया है, इसका जीवंत प्रमाण प्रवासी मजदूरों एवं विद्यार्थियों के अस्तित्व और भविष्य पर बड़ी मार को माना जा सकता है। अपने मूल स्थान से मीलो दूर रोजी रोटी के इंतजाम के लिए करोड़ों गरीब लोग सुदूरवर्ती राज्यों में जाकर वर्षों से मेहनत मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का किसी तरह पेट पाल रहे थे लेकिन कोरोना महामारी के चलते दिनांक 24 मार्च 2020 को हुए को हुए लॉक डाउन ने जैसे इन प्रवासी करोड़ों मजदूरों की किस्मत और जिंदगी की रफ्तार को पूरी तरह ताला बंद कर दिया लगभग हर उद्यमी फैक्ट्री मालिक तथा कंपनी के स्वामी ने लॉक डाउन के चलते  कामकाज ठप होते ही बेबस और गरीब मजदूरों को अचानक नौकरी से निकाल दिया और  यह गरीब मजदूर जिन घरों में किराए किराएदार की हैसियत से रह रहे थे ,उनके मकान मालिकों ने भी किराया ना दे पाने के कारण उन्हें घर खाली करने पर मजबूर कर दिया ऐसी विपदा की घड़ी में यह मजदूर पलायन करने एवं अपने मूल स्थान पर जाने के लिए विवश हो गए एक और नौकरी से बिना किसी गलती ही के अचानक निकाल दिए जाने और और मकान का किराया न चुका पाने के कारण अपने परिवार के लिए दो  जून की रोटी तक का इंतजाम न कर पाने के कारण ये  प्रवासी मजदूर अचानक रातों-रात अपने गांव जाने के लिए मजबूर हो गए और  इस महामारी के भय से अधिक   यह लोग भूख के भीषण  संत्रास भयभीत होकर बिना संक्रमण की चिंता किए आनंद विहार नोएडा गाजियाबाद आदि बस टर्मिनल पर पहुंचकर न केवल समाज एवं प्रशासन के लिए वरन सर्वप्रथम अपने ही जीवन के लिए सुरक्षा का विकराल संकट खड़ा कर लिया वस्तुतः संकट की इस घड़ी में इन मजदूरों की व्यथा एवं आवश्यकता को समझते हुए ठोस एवं कारगर कदम उठाए  जाने आवश्यक  बहुत आवश्यक हैं।



लगभग ऐसी ही पीड़ा का अनुभव विद्यार्थियों का एक बहुत बड़ा तबका कर रहा है अपनी आंखों में कुछ बनने और कुछ हासिल  कर लेने के करने के बड़े-बड़े सपने लेकर एक बड़ी संख्या में विद्यार्थी न केवल देश बल्कि दुनिया के कोने कोने में पढ़ने तथा कुछ बनने के लिए गए हुए थे इस लॉक डाउन में न जाने कितने विद्यार्थी अपने परिवार से दूर अभिशप्त एकाकी एवं मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से हीन जीवन का बोझ ढोने को विवश है दैनंदिन जीवन का खर्च वाहन करने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं है बैंकों के माध्यम से लेनदेन हेतु आवागमन की सुविधाजनक परिस्थितियां नहीं हैं। एकांतिक रूप से रहने वाले ये  विद्यार्थी शोधार्थी पर्याप्त खाद्य सामग्री एवं संसाधनों से रहित अभिशप्तता का संत्रास भोग रहे हैं किसी के पास किराया देने को पैसे नहीं हैं तो किसी के पास खाद्य सामग्री की अनुपलब्धता है, किसी को पढ़ाई की पूर्णता के इस आखिरी पड़ाव के तुरंत बाद नौकरी करके अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने का बीड़ा उठाना था तो किसी को बूढ़े और असहाय माता-पिता के इलाज का पर्याप्त प्रबंध करना था किसी को अस्वस्थ परिजनों के पास पहुंचना था इस कोरोना महामारी के चलते हुए लोग डाउन ने आज करोड़ों प्रवासियों से उनके जीवन का आधार ,उनके सपने ,उनकी खुशियां और उनके पैरों के नीचे से मानव जमीन है छीन ली हो आज इस लॉक डाउन ने हमें यह एहसास करा दिया है कि जिंदा रहते हुए नर्क भोगना कैसा होता है न कहीं स्वच्छंदतापूर्वक कहीं आ -जा सकते हैं और न ही किसी से मिल सकते हैं इंसान को इंसान के अस्तित्व से ही खतरा उत्पन्न हो गया है ।हर कोई एक- दूसरे को देख कर संक्रमण से बचने के लिए मास्क और ग्लव्स का सहारा ले रहा है एक इंसान के लिए सामने वाला दूसरा इंसान ही मानो मानव बम या कोरोना बम बन गया हो इस कटु सत्य ने संभवतः मनुष्य को यह भी सोचने के लिए विवश कर दिया है कि स्वछंदता का क्या मूल होता है ,जब बेबस पशु  -पक्षियों की स्वतंत्रता को मानव के द्वारा छीन लिया जाता है तब उन्हें कैसा महसूस होता है आज जब इस लॉक - डाउन ने लगभग समूची माननीय गतिविधियों को ताला बंद करके रख दिया है तब पशु पक्षियों को पिंजड़ा बंद कर देने वाले मनुष्य को निश्चय ही पहली बार पिंजरों की क्रूरता और भयावहता का एहसास हुआ है। वास्तव में आज की इन समसामयिक परिस्थितियों में प्रवासियों के प्रति संवेदनशील एवं सहयोगी बनकर उन्हें समाज का अविभाज्य अंग मानकर उनको संभाल देने की सख्त जरूरत तो है ही साथ ही पशु पक्षियों की पीड़ा को समझते हुए उन्हें  पिंजरों से मुक्त करने की जरूरत है ।लॉक डाउन के इस संकटकालीन समय में एक उदार, समझदार तथा संवेदनशील मनुष्य बनकर लॉक डाउन के निहितार्थ तथा संकेतार्थों को समझना और भी अधिक आवश्यक है । वास्तव में यह समय मनुष्य की परीक्षा का समय है और पूर्ण धैर्य तथा उदारतापूर्वक ही मनुष्य मानवीय संस्कारों को धार देकर श्रेष्ठ पहचान बना सकता है।


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