Thursday, April 16, 2020

श्रद्धांजलि डॉ राजेंद्र बहादुर सिंह

स्वर्गीय. डॉ राजेंद्र बहादुर सिंह (1951-2019)



शिक्षक , स्वतंत्र लेखक एवं सांस्कृतिक वार्ताकार के रूप में जाने जाते हैं। उनका जन्म बाराबंकी के पूरे बैश गांव में एक शिक्षक परिवार में हुआ था । अंग्रेजी साहित्य , इतिहास , राजनीति शास्त्र , भारतीय दर्शन , वांग्मय  पर उनका समान अधिकार था ।  महाभारत तथा रामायण पर उन्होंने विशेष अध्ययन किया।
प्रिअंबिल टू द कंस्टीटूशन ऑफ़ इंडिया : आईडियल्स एंड वर्किंग , द मर्ज़िनल्स, ह्यूमन राइट्स : अ ग्लोबल कंसर्न , राष्ट्र गौरव , हमारी सांस्कृतिक अस्मिता ,उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।  एक शिक्षक के रूप में भाषा शिक्षण को सुगम बनाने हेतु उन्होंने वर्कशीट्स और मॉडल भी विकसित किये थे। मानव धर्म ,यूनाइटेड नेशंस : अ मॉडल  सज़्ज़ेशन, वाल्मीकि : अ पोलिटिकल थिंकर, अ डिक्शनरी ऑफ़ पोलिटिकल साइंस , इंडियन माइथोलॉजी एंड कल्चर , उनकी अप्रकाशित रचनाएँ हैं । उन्होंने सांस्कृतिक , साहित्यिक एवं राजनतिक मुद्दों पर सैकड़ों निबंध  लिखे , लिबर्टैरियनिज़्म  , सदर्न राइट्स मूवमेंट्स जैसे विषयों पर भी उन्होंने कार्य किया और उनके लेख द आइडियाज एंड मूवमेंट्स दैट शेप्ड अमेरिका में कैलिफोर्निआ से प्रकाशित होकर काफी सराहनीय रहे हैं ।


                                                    14 अप्रैल 2019 को उनका देहांत हो गया ।


                स्वप्न कुसुम


स्वप्न कुसुम से मिले विचार पुनः जग उठे,


बिंदु के प्रसार से प्रकाश बिंदु बन चले ,


और फिर प्रकाशपर्व इधर मन कुटीर में ।


किन्तु यह  प्रतीति सब विगत का बिम्ब अब


युग हुआ विलीन वह जहाँ कहीं हम रहे ।


नया प्रहार आ चला , नयी सृष्टि तो नहीं,


पर नया स्वरुप यह।


                   मिथक


मिथक कहें पाप हो , सत्य सुने जगत कहाँ ,


यहाँ वही बिके चले , बस आवरण धुला हुआ ।


अनेक बने संत वो दस्यु जो प्रत्यक्ष थे


सत्य कहाँ ,सत्य कहाँ कहाँ कहाँ वर्जना ।


ज्ञान की रश्मि, पर अभी चिर अखंड है ,


अनंत तक रहे ये दृढ़, जले चले प्रकाशमान ।


         चक्र यही है भौतिकता का


आकाशदीप टिम टिम जलता था, आम्र तरु की दृढ़ शाखा में ,


कहते तुमको राह दिखाता जैसे तुमने इधर दिखायी ।


जलती रही वर्तिका लहरा तुम भी तो कर्मठ ही बीते,


कर्तव्यों से बिंधे बिंधाए , कर्मठ पथ पर चलते चलते।


प्रतिदिन अनंत तक इच्छायें मेरी, मुझसे कहती, आकर


और तुम्हारे रोज़ कथानक आते रहते ।


चक्र यही है भौतिकता का, आकर हम, चलते रहते हैं ,


और अचानक एक दिवस पथ अनंत पर चल पड़ते हैं।


            अनंत में विलीन तुम


निर्माण अनंत कर गए ज्ञान कर्म पथ अनंत


गूँज रहे कथन कई दृष्टि के घोष बने ।


दृश्य सभी सजीव हैं , स्वर्गदीप जल चुका


अनंत में विलीन तुम अनुगूंज किन्तु व्याप्त इधर ।


 मिथक , युद्ध राजनीति साहित्य , कला , दृष्टि आदि


रोज़ नयी लिये सृष्टि नयी लिये प्रफुंजिका।


       उसकी गति पर कैसा चिंतन


विश्वास कर्म की गति पर , कर्म पथी जो रहे निरंतर


उसकी गति पर कैसा चिंतन , कर्मठ गति पर कैसा चिंतन ।


नारायण का कथन और भाष्यों की प्रस्तुति,


कर्मठ बन ऋषियों सा जीवन फिर अनंत पथ , अब क्या चिंतन !


पौरुष से जो राह बनाता किसी अनर्गल से न नाता


स्वाभिमान सा पुंज जले तो फिर ऐसा वैसा क्या चिंतन ।


जब तक जीवन प्रांजल जीवन फिर तो क्या ,क्या अनंत का वर्णन ।


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