Friday, May 29, 2020

इन्टरनेट से जुड़ी कुछ सावधानियां


आज हमारा देश व पूरा विश्व कोरोना वायरस से जूझ रहा है इस मुश्किल घड़ी में साइबर अपराधियों को मौका नहीं देना चाहिए कि वह चारों तरफ भय फैलायें तथा हमें इस खतरे की कड़ी को भी तोड़ना है |


पूरा विश्व वायरस को रोकने में लगा है हमारे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अनुरोध पर मार्च से ही लॉकडाउन लागू कर दिया गया था जिस कारण हमारा घर ही हमारा कार्यस्थल बन गया तथा इन्टरनेट मीटिंग करने का एक माध्यम भी बन गया । इस समय जो लोग इस तकनीक से बहुत ज्यादा परिचित भी नहीं थे, उन लोगों ने भी इसका प्रयोग करके अपनी जिन्दगी में इसको शामिल किया है तथा इसके द्वारा अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाया है । यहाँ तक कि सभी स्कूल व कॉलेज की पढ़ाई भी इन्टरनेट के माध्यम से की जा रही है उसी पर होमवर्क दिया जाता है तथा उसी पर प्रस्तुत (सबमिट) भी कराया जाता है यहाँ तक कि गांव में भी इसी सुविधा का प्रयोग किया जा रहा है । एक दूरसंचार विभाग की रिपोर्ट के अनुसार मार्च के अंतिम एक सप्ताह में लगभग 3,00,000 टेराबाइट डाटा इस्तेमाल किया गया इस प्रकार कई सॉफ्टवेयर हैं जिनके इस्तेमाल से हम घर बैठे ही अपने ऑफिस की विभिन्न जिम्मेंदारियाँ निभा रहे हैं हम देखते हैं कि एक तरफ यह सुविधा कितनी सहायक है वही दूसरी तरफ इससे कई प्रकार के नुकसान भी हैं । जिसका हमें इस्तेमाल करने से पहले ध्यान रखना चाहिए । इस प्रकार की डिजिटल क्लासों का नुकसार सबसे ज्यादा हमारे स्वास्थ्य पर पड़ रहा है बच्चों का खेलना तो बन्द हो गया है तथा हाथ में मोबाइल या लेपटॉप आ गया है जिससे वह स्कूल व कॉलेज की कक्षायें करने के साथ-साथ सारा दिन उसी पर खेल खेलते रहते हैं या कभी इस प्रकार की विडियो भी देखते हैं जो उन्हें नहीं देखनी चाहिए । इससे बच्चों की आंखों पर असर पड़ रहा है और एक ही जगह पर बैठे रहने किसी-किसी को मोटापे की समस्या भी आ सकती है वैसे तो इस समय बाहर का वातावरण बहुत शुध्द हो गया है पक्षियों की आवाजें आने लगी है । पर जब बच्चे बाहर ही नहीं निकलेंगे तो खेलेंगें कैसे ?


वही बड़ों के लिए भी यह एक चुनौती का समय है । जहाँ आदमी अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में व्यस्त रहता था वहीं पर एकदम खाली हो गया है वह भी मोबाइल, लेपटॉप तथा कम्प्यूटर पर अपना समय निकालता है, जिसके कारण उसे कई स्वास्थ्य संबन्धि समस्या हो जाती है जिन लोगों को पहले से ही कोई स्वास्थ्य समस्या हो उन लोगों के साथ और बड़ी समस्या है |


इन सबके चलते हमें साइबर स्क्यिोरिटी के लिए जागरुक होना चाहिए कोविड-19 के समय पर जो सॉफ्टवेयर हम इस्तेमाल कर रहे हैं वह हमारे डाटा को सुरक्षित रखता है या नहीं ये पता होना चाहिए कई बार इस प्रकार के लिंक आ जाते हैं जो हमारे डिवाइस के लिए हारिकारक होते हैं तथा हमारा डाटा भी सुरक्षित नहीं रहता है । कई बार ई-मेल भी हैक हो जाती है जिसके द्वारा हमारी सारी जानकारी साइबर अपराधियों को मिल सकती है इस समय सब कुछ डिजिटल हो गया है । हम मोबाइल फोन का ज्यादा उपयोग कर रहे हैं कई बार इसमें गलत खबर भी आ जाती है जैसे अभी 17 अप्रैल 2020 में ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) ने सभी टेक्निकल इंस्टीट्यूट से सोशल मीडिया के माध्यम से फैल रही गलत खबरों से सावधान रहने के लिए कहा है, काउंसिल ने सभी संस्थानों से किसी भी खबर के लिए सिर्फ आधिकारिक वेबसाइट को ही मान्यता देने और मानने का निर्देश दिया है इसी प्रकार एक गलत खबर यह भी फैली कि वाटसएप ने अब केवल एक बार में एक चैट ही फॉरवर्ड होगी |


हाल में ही एक ऐप चला जो कि 100 लोगों को एक साथ जोड़कर विडियों कॉन्फेंसिंग कर सकता है वह जूम एप है जिसे लागों ने अपने सिस्टम तथा अपने मोबाइल पर इन्स्टाल किया जिसकी मदद से ऑनलाइन मीटिंग आदि होने लगी, इस ऐप की लोकप्रियता एकदम तेजी से बढी । कुछ समय बाद पता चला कि वह हमारे सिस्टम के आंकड़ों के लिए सुरक्षित नहीं है इसी के चलते भारत तथा विदेशों पर इस ऐप पर रोक लगाई गई अब इस ऐप को इस्तेमाल करने से पहले भारत की कंम्प्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम ने कुछ सावधानियां बताई । इन सब बातों का ध्यान रखते हुए इस ऐप को इस्तेमाल कर सकते हैं । जैसे पासवर्ड मुश्किल रखना चाहिए तथा बिना मेनेजर की आज्ञा के मीटिंग में भागीदारी नहीं कर सकते हैं |


इए प्रकार यह सुविधायों क तरफ हमारे लिए जरुरत बन गई हैं वहीं दूसरी तरफ परेशानी का कारण भी । इन सब के साथ-साथ हम अपने सिस्टम को किस प्रकार बचा सकते है ?


हमें अपने सिस्टम को इस्तेमाल करते समय निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए :


(1) अच्छा एंटीवायरस सॉफ्टवेयर इंस्टाल करें |


(2) कोई नकली सॉफ्टवेयर डाउनलोड न करें, इनके जरिये वायरस आपके सिस्टम में आ सकता है यह एक सॉफ्टवेयर है जो किसी की जानकारी या आंकड़े की चोरी के लिए बनाया जाता है |


(3) एंटीवायरस के नकली पॉप-अप पर कभी क्लिक न करें ।


(4) अपने सिस्टम के ऑपरेटिंग सिस्टम को हमेंशा अपडेट रखें |


(5) पायरेटड ऐप से हमेशा बचें |


(6) किसी एप को डाउनलोड करने से पहले परमिशन चेक करें ।


(7) अपना पासवर्ड कठिन रखें तथा घर के वाई-फाई को सिक्योर बनाएं ।


(8) फोन को लॉक करें |


(9) अगर आप का डिवाइस खो जाता है तो उन स्थिति में आप आंकडों को घर बैठे मिटा सकें, ऐसी व्यवस्था बनाएँ |


(10) ओपन इंटरनेट नेटवर्क से वित्तिय लेन-देन बिल्कुल न करें ।


अगर हम कुछ सावधानियों का पालन करें तो इस लॉकडाउन में हम अपने स्वास्थ्य और जिंदगी दोनों को सुरक्षित रख सकते हैं और अनेक आनन्द उठा सकते हैं |


सर्वेक्षण के आधार पर खबरों से 'जनमत' तैयार करना

बर्लिन में आयोजित जनमत सर्वेक्षण शोध के वैश्विक संघ के 60वें वार्षिक सम्मेलन (डब्ल्यूएपीओआर) में 'जनमत और 21वीं सदी की चुनौतियां' विषय पर प्रस्तुत पत्र :


ऐतिहासिक रूप से मीडिया और जनमत सर्वेक्षण के बीच एक बेहद प्रगाढ और अनोखा रिश्ता देखा जा सकता है। (मान एंड ऐम्प, ओरेन, 1992)। मीडिया संगठनसर्वेक्षक और राजनीतिज्ञ लगभग रोजाना ही जनमत सर्वेक्षण की अवधारणा से, जिसकी पुष्टि चुनाव परिणामों के जरिए होती है, दो-चार होते हैं। सबसे बुनियादी स्तर पर, मीडिया अपनी खबरों में जनमत सर्वेक्षण के नतीजों को शामिल कर एक उपयोगी भूमिका अदा करता है। और इस प्रकार, वह नागरिकों की मंशा की जानकारी और बड़े पैमाने पर आम जनता और राजनीति की दुनिया के विभिन्न खिलाड़ियों तक पहुंचाता है। चूंकि मतदान को जनता की सोच को नापने का एक अहम पैमाना माना जाता है, लिहाजा इसे लोकतंत्र की आम प्रक्रियाओं से जोड़ा जा सकता है(लैड, 1980, पेज 574). ___ इन दिनों, मीडिया के खबर गढ़ने की प्रक्रिया में सर्वेक्षण एक आवश्यक हिस्सा बन गया है। चूंकि मीडिया अब न सिर्फ बाहरी शोध संस्थानों के सर्वेक्षणों के नतीजों के बारे में खबरें देता हैं बल्कि सर्वेक्षणों की अनुमति या उसे अंजाम देने के जरिए खुद भी उसकी प्रक्रिया में शामिल होता है, इसलिए यह कहा जाता है कि सर्वेक्षणों की कवरेज अब खुद में समाचारों की एक बीट बन गई है। (डी व्रीज एंड एम्प, सेमेट्को, । 2002, पीपी. 369-370) समाचार मीडिया और सर्वेक्षण के बीच इस करीबी संबंध के कारण, जनता के मत और सर्वेक्षण के बारे में सूचना प्रसारित करके जनमत की एक खास छवि गढ़ने में मीडिया की भूमिका अहम मानी जाती है। लेकिन बर्नेट (2001), हर्बस्ट (1998), सुहोनन (2001) और बिलिएट (1993-2000) जैसे लेखकों ने इसका आलोचनात्मक मूल्यांकन भी किया है। उनका मानना है कि पत्रकार जनमत सर्वेक्षणों की खबरें देकर एवं उसकी व्याख्या करके और जनता की राय से जुड़ी बातों के सरलीकरण का खुलासा करके जनमत निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। 


इससे पहले कि हम इस किस्म के मीडिया प्रभावों के बारे में चर्चा करें, इस बात का अध्ययन जरूरी है कि आखिर न्यूज मीडिया जनमत सर्वेक्षणों की रिपोर्टिंग किस प्रकार करता है। (ब्रटस्टनाइडर, 1997) मुख्य रूप से यही इस पत्र का उद्देश्य भी है - मीडिया द्वारा जनमत सर्वेक्षण का प्रस्तुतिकरण और सर्वेक्षण के नतीजों पर आधारित ख़बरों के जरिए जनमत की छवि . गढ़ने में मीडिया की भूमिका का आकलन करना। .


यह अध्ययन फ्लेमिश (बेल्जियम') मामले के जरिए किया गया। लंबे समय से, अमेरिका में चुनावों के दौरान मीडिया संगठनों की सक्रिय भूमिका देखने को मिलती है। लेकिन हाल के कुछ सालों से, बेल्जियम में भी जनमत सर्वेक्षणों में मीडिया की दिलचस्पी बढ़ती दिखाई देती है। फिर भी, बेल्जियम । की मीडिया में सर्वेक्षण से जुड़े बहुत थोड़े ही अनुभवसिद्ध आंकड़े उपलब्ध हैं। इसी अंतर को पाटने के लिए फ्लेमिश समाचार मीडिया द्वारा कवर किए गए बहुप्रचारित जनमत सर्वेक्षण की प्रकृति और मात्रा का व्यवस्थित विश्लेषण किया गया। इसमें मीडिया द्वारा सर्वेक्षण को दी जाने वाली तवज्जो (क्या फ्लैंडर्स ने सर्वेक्षण से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट्स में बढोतरी के अन्तर्राष्ट्रीय रुझानों का पालन -फिया है) और जनमत सर्वेक्षण के बारे में प्रकाशनों की औपचारिक गुणवत्ता (चुनाव के बारे में फ्लेमिश समाचार रिपोर्टों की प्रणाली सबधी गुणवत्ता का स्तर क्या है) से जुड़े सवाल को उठाया गया। इस बारे में आम धारणा यह है कि मीडिया वर्षों से अपने सर्वेक्षण संबंधी प्रकाशनों की पद्धति की-गुणवत्ता पर ध्यान दिए बिना जनमत सर्वेक्षणों के आधार पर खबरें बना रहा है.. लिहाजा , मीडिया द्वारा जनमत सर्वेक्षणों पर . आधारित खबरों के प्रस्तुतिकरण का मूल्यांकन . कई बिंदुओं पर केन्द्रित करके किया जाएगा। पहला, खबरों में सर्वेक्षणों के बारे में मूल्यांकन संबंधी निर्णयों की अभिव्यक्ति पर ध्यान केंद्रित किया जाएगादूसरा, यह देखा जायेगा कि सर्वेक्षण से जुड़ी खबरों में किस · हद तक तथ्यपरकता बरती गयी हैऔर तीसरा, किस तरह से जनमत के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए सर्वेक्षणों की तलना की गयी है (मीडिया इन तत्वों का उपयोग सर्वेक्षण के बारे में 'खबर' बनाने के लिए किस हद तक करता है?) 


इस अध्ययन में 2000, 2002, 2004, 2006 के दौरान बेल्जियम के छह सबसे महत्वपर्ण फ्लेमिश (बेल्जियम की दो आधिकारिक भाषाओं में से एक) अखबारों में प्रकाशित जनमत सर्वेक्षणों से जुड़े विभिन्न - लेखों का विश्लेषण शामिल है। सर्वेक्षणों को । संदर्भित करते सभी लेखों पर विचार किया गया, जिनमें सर्वेक्षण के नतीजों से जुड़ी ही सूचनात्मक रिपोर्ट, उन पर आधारित पण की पद्धतियों तथ्यात्मक विश्लेषण या सर्वेक्षण की पद्धतियों से जुड़ी टिप्पणियां शामिल हैं। इसमें सिर्फ चुनावी सर्वेक्षण ही नहीं, बल्कि अध्ययन के लिए चने गये वर्षों की अवधि में छपे सभी किस्म के सर्वेक्षणों से संबंधित लेखों पर भी विचार किया गया |


खबरों के रूप में सर्वेक्षण 


मीडिया अपनी खबरों में नियमित रूप पसे सर्वेक्षणों का इस्तेमाल करना कि मीडिया मीडिया संगठन नियमित रूप से खद ही सर्वेक्ष सर्वेक्षण आयोजित करते रहनाजा उनक उनके जल्दी लिए सर्वेक्षण से पहुंचना आसान होन 2000, पेज 285)खबरों में गण द्वारा मापी गयी लोगों की राय को बनियादी व्यवहार या नजरिए के खोजपर्णाक के रूप में नहीं दर्शाया जाता. बल्मिषण के नतीजों का इस्तेमाल मख्य रूप से खबरों के महत्व . के नजरिए से किया जाता है (ब्रेट्सनाइडर, --1997, पेज 250)। क्रेस्पी के नोटस (1980, पेज 464-465) के अनसार, मीडिया का प्राथमिक उद्देश्य जनमत सर्वेक्षण के तमाम · पहलुओं की रिपोर्टिंग खबरों के तौर पर · उसमें अन्तर्निहित रुचि की वजह से करना है।


जनमत सर्वेक्षण को कवर करना खबर के लिहाज से उपयोगी माना जाता है क्योंकि वे जनता की राय को मापते हैं। माना जाता है कि लोकतंत्र में जनता की राय को जानना आवश्यक है (पलेट्जेट, 1980, पेज 496)। इस प्रकार की राजनीतिक प्रणाली में, आम जनता की आवाज सबसे पहले मतदान के जरिए आभव्यक्त होती है। चूंकि अपने मत के जरिए लाग प्रत्यक्ष और तत्काल प्रभाव से राजनीति पर प्रभाव डालते हैं. भाव से राजनीति पर प्रभाव डालते हैं, अतः वोट देने के उनके शुरुआती इरादे और अत: वोट देने के उनके शुरुआती इरादे और चुनाव वाले दिन मतदान के वास्तविक फैसले को खबर के महत्वपूर्ण स्रोत के फैसले को खबर के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा जाता है |


नतीजतन, मतदान से जडी शमशा नतीजतन, मतदान से जुड़ी शुरुआती पसंद का नियमित रूप से सर्वेक्षण और मीडिया हमेशा अगले सर्वेक्षण बनाये रखता है जिसकी वजह से मग एक 'नियमित आशिक चुनाव' बन जाता __ का नियमित रूप से सर्वेक्षण होता है और मीडिया हमेशा अगले सर्वेक्षण पर नजर से रखता है जिसकी वजह से सर्वेक्षण नियमित आशिक चुनाव' बन जाता है। _


संभावित चुनाव परिणाम का अनमा लगाना और चुनावी प्रचार की प्रक्रिया को कवर करना भी पाठकों की इन अपेक्षाओं को पूरा करता है कि कौन चुनाव जीतने जा रहा है (क्रेस्पी, 1980, पेज 465-466)। इन चुनावी अवधियों के दौरान, समाचार मीडिया आर. सवक्षण का सामान्य राजनीतिक प्रणाली का आवश्यक तत्व माना गय 2002, पेज 382-383) निश्चित रूप र पिछले शोध में यह पाया गया कि चुनावों के दौरान समाचार कवरेज में ज्यादातर चुनाव परिणाम और नागरिकों के अन्य विचारों की रिपोटिंग हुई है (एंडरसन 2000, पेज 288, ब्रेट्सनाइडर 1997, पेज. 252-254, स्मिथ एंड एम्प वीराल, 1985 · पेज 65)। 


इस प्रकार, आने वाला चुनाव न्यूज मीडिया के लिए मतदान से जुड़ी पसंद के बारे में सर्वेक्षण करने का एक मौका लेकर आ सकता हैलेकिन सामयिक रुचि के किसी मुद्दे पर एक सार्वजनिक बहस भी और अधिक साधारण एवं आम विषय से जुड़े सर्वेक्षण की रिपोर्टिंग के लिए उकसा सकती है। खबरों के लिहाज से मदों की उपयोगिता को देखते हुए, किसी खास मद्दे के बारे में खबरों का दायरा बढाने के लिए कुछ खास किस्म के सर्वेक्षणों और उनकी रिपोर्टिंग की इजाजत दी जा सकती है। रस मंटन संदर्भ में, कोवाच (1980) ने एक . 'श्रंखलाबाट 'श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया' की बात की है, जिसमें मील पूरक हों। एक सर्वेक्षण के आधार पर, राजनेता अपनी प्रतिक्रिया दें, जिसकी मीडिया Scanned with CamScanner जिसमें मीडिया और सर्वेक्षण एक दूसरे के किसी मुद्दे को उठाया जा सकता है जिस पर द्वारा रिपोर्टिंग की जा सके और इसके बाद लोगों की प्रतिक्रिया को मापने के लिए भी एक नया सर्वेक्षण किया जा सकता है (कोवाच, 1980, पेज 570-571)। इसी माजिक क्रेस्पी नही किया है जो निम्न बिंदुओं पर तर्क करते हैं: 1. समाचार क्या है और उसकी परिभाषा, 2. सर्वेक्षण की विषय-वस्तु का निर्धारण, 3. राजनीतिक प्रक्रिया पर प्रभाव, 4. खबर क्या बनती है (क्रेस्पी, 1980, पेज 466)।


जनमत सर्वेक्षणों के आधार पर इस किस्म की खबरें बनाने का सवाल तब चर्चा में आया, जब न्यूज मीडिया और सर्वेक्षणों के बीच नजदीकी संबंध स्थापित हो गएअस्सी के दशक में ही अमेरिका में इस विषय पर बात होनी शुरू हो गई थी, लेकिन हाल के वर्षों में बेल्जियम की मीडिया में सर्वेक्षणों पर आधारित खबरों के प्रकाशन में बढ़ोतरी होने की वजह से अकादमिक और राजनीतिक गलियारों में भी ये सवाल उठने लगे। यह चलन अब पूरे विश्व में बढ़ता हुआ देखा जा सकता है (अमेरिका के लिए मिलर और हर्ड 1982, लैड एंड बेन्सन 1992, ग्रेट ब्रिटेन के लिए वोरसेस्टर 1980, कनाडा के लिए एंडरसन 2000, ऑस्ट्रेलिया .के लिए स्मिथ एंड वैरल 1985, इजराइल के लिए विएमन 1983, जर्मनी के लिए ब्रेटस्नाइडर 1997, नीदरलैंड्स के लिए डी बोएर 1995)। चूंकि मीडिया और सर्वेक्षणों बोएर 1995)। चूंकि मीडिया और सर्वेक्षणों के बीच संबंधों को लेकर बेल्जियम में व्यवस्थित एवं व्यावहारिक आंकड़ों की कमी है, लिहाजा न्यूज मीडिया में सर्वेक्षणों की मौजूदगी का अध्ययन फ्लेमिश समाचारपत्रों में सर्वेक्षण रिपोर्टों की आवृत्ति और हाल के वर्षों में इनमें बढ़ोतरी पर आधारित मात्रात्मक अध्ययन के जरिए किया जा रहा है। इस अध्ययन में जिन सवालों पर गौर किया जा रहा है, वह निम्न हैः क्या इन सर्वेक्षणों का खबरों में सिर्फ जिक्र मात्र है या इन्हें ही केंद्रीय विषय-वस्तु बनाकर खबरें लिखी जा रही हैं? क्या केवल चुनाव के समय ही सर्वेक्षण प्रकाशित किए जा रहे हैं अथवा इन्हें पूरे साल समान रूप से प्रकाशित किया जाता हैक्या समाचार में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण का ज्यादा महत्व दिया गया है और सामान्य मुद्दास जुड़ सर्वेक्षणों को नजरअंदाज किया गया है?


जनमत सर्वेक्षण की एक छवि गढ़ता मीडिया


आज सर्वेक्षण जनता की राय जानने और विभिन्न विषयों पर जनता की भावनाओं को व्यक्त करने का महत्वपूर्ण साधन बन गया हैं (किम एंड वीवर, 2001, पेज 72)। मीडिया के जरिए सर्वेक्षण के नतीजों का आम जनता के बीच प्रचार-प्रसार काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह.जनता को उस समाज की राय से अवगत कराने का अवसर होता है, जिसमें वह रह रहे होते हैं (बर्नेट, 2001)। लेकिन समस्याएं तब शुरू हुई, जब पत्रकारीय नजरिया (लेख/खबरे) उन सर्वेक्षणों पर आधारित होने लगे जो कि पद्धतिगत मानकों पर खरे नहीं उतर रहे थे अथवा जब जनमत के 'एकतरफा' पहलू ..को जनता और नीति निर्माताओं के बीच..प्रसारित किया जा रहा था। जनमत सर्वेक्षण (ओपिनियन पोल) के नतीजों का मीडिया में प्रस्तुतिकरण राजनीतिक और आर्थिक नीति-निर्माताओं को समाज के मनोभावों से अवगत करवा सकता है और साथ ही नागरिकों को खुद की राय तैयार करने के लिए भी संदर्भ दे सकती है (सुहोनेन, 2001, पेज 311-333, बर्नेट, 2001, फ्रैंकोविक, 2005)। इसलिए इसे महत्वपूर्ण माना जाता है कि समाचार मीडिया जनता को जनमत की एकदम सही जानकारी दे, जिसे नियमित की एकदम सही जानकारी दे, जिसे नियमित रूप से तमाम सर्वेक्षणों से मापा जाए (बर्नेट, 2001, पेज 308)इस संदर्भ में पहला सवाल तो यही है कि अपने सर्वेक्षण के प्रकाशन में मीडिया सर्वेक्षण प्रक्रिया की प्रणालीगत सूचना को किस हद तक उजागर करे | 


जनता की राय की एक विश्वसनीय एवं बिलकुल सटीक माप के लिए यह जरूरी है कि सर्वेक्षण प्रक्रिया में कुछ पद्धतिगत मानकों का पालन किया जाए। सर्वेक्षण की सटीकता सर्वेक्षक की जिम्मेदारी है, लेकिन ऑडियंस द्वारा कथित सर्वेक्षण की सटीकता मीडिया द्वारा सर्वेक्षण कवरेज की गुणवत्ता पर निर्भर करती है (डी व्रीज एंड सेमेट्को, 2002)। सर्वेक्षण आधारित खबरों में पद्धति की सूचना को शामिल करने का सबसे प्रमुख कारण, पाठक की सर्वेक्षण के आंकड़ों को देखते हुए सटीक निष्कर्ष तक पहुंचने में मदद करना है (स्मिथ एंड विरल, 1985, पेज 71)।


सर्वेक्षण के लिए मापदंड तैयार करने वाली संस्था एसोमार/डब्ल्यूएपीओआर (2005) का कहना है कि एक लोकतांत्रिक समाज में जनता और सरकार को सही तरीके से आयोजित वैसे सर्वेक्षण अनुसंधान से अवगत करवाया जाना चाहिए जिनमें उच्च मानकों का पालन किया गया हो। ...इसलिए जो जनमत का आयोजन कर रहे हैं और जो इसकी रिपोर्टिंग कर रहे हैं, उन दोनों की ओर से पारदर्शिता और सटीकता . की आवश्यकता होती है। (ESOMAR, 2005)। लिहाजा इस प्रकार की मीडिया पारदर्शिता संबंधी चर्चाओं की वजह से, सर्वेक्षण से संबंधित मीडिया रिपोर्टों में पद्धति की जानकारी को उजागर करने के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं सहित सामान्य दिशा-निर्देशों का विकास दुनियाभर में विभिन्न पेशेवर ओपिनियन अनुसंधान संगठन करते हैं जिनमें एएपीओआर, एनसीपीपी, एसोमार/वैपोर, कासरो और फेबेलमर (बेल्जियम) शामिल हैं। ..


पिछले अध्ययनों के आधार पर पाया गया कि सर्वेक्षणों में तकनीकी रिपोटिंग की गुणवत्ता बेहद निचले स्तर की थी। यह भी पाया गया कि सर्वेक्षण की औपचारिक गुणवत्ता के संदर्भ में, टेलीविजन के मुकाबले समाचारपत्रों ने बेहतर प्रदर्शन किया (एंडरसन, 2000, पेज 286-294)। पोल कवरेज का इस प्रकार का औपचारिक गुणवत्ता विश्लेषण, सर्वेक्षण की विभिन्न रिपोर्टी, (जैसे कि सैम्पल साइज, साक्षात्कार पद्धति, जनसंख्या की परिभाषा, सवालों के शब्द वगैरह) के पद्धति संबंधी पहलुओं के मूल्यांकन द्वारा नियमित रूप से किया जाता है (ब्रेट्सनाइडर, 1997, एंडरसन, 2000य स्मिथ एंड वैरल, 1985, डी बोएर, 1995)।


)। ___ इस पेपर में इस बात की जांच की गयी है कि फ्लेमिश प्रिंट मीडिया किस स्तर तक अपने पाठकों को सर्वेक्षण प्रक्रिया की पद्धति संबंधी जानकारी देता है। इस पत्र में उन तत्वों का अध्ययन किया गया है जिनका विभिन्न सर्वेक्षण अनुसंधान संगठनों ने अपने न्यूनतम प्रकटीकरण के मानकों में जिक्र किया है (विवरण के लिए परिशिष्ट देखें) -- समाचार रिपोर्टों में न केवल सर्वेक्षणों से जुड़ी पद्धतिगत सूचना देने से, बल्कि जिस प्रकार पत्रकार सर्वेक्षण की पद्धति का स्पष्ट रूप से मूल्यांकन करता है, वह भी सर्वेक्षणों के नतीजों और उन पर आधारित संदर्भो की विश्वसनीयता को समझने में योगदान देता है। मसलन, जिस संस्थान ने सर्वेक्षण का आयोजन किया है, उसका वर्णन सम्मानित शोध संगठन अथवा संदिग्ध सर्वेक्षक के रूप सर्वेक्षक के रूप में करना, सर्वेक्षण की विश्वसनीयता और उसके परिणामों की वैधता के प्रति दृष्टिकोण विकसित करने में योगदान देता है(पैलेट्स एट अल, 1980, पेज 503-504)। एंडरसन के मुताबिक. (2000, पेज 292), सर्वेक्षण के परिणमों को पत्रकार प्रायः निश्चित, नागपाते हैं और इसलिा सेना के रूप में पस्तत करते हैं। यह सुझाव समाचार रिपोर्टों में सर्वेक्षण परिणामों को अधिक सतर्कता से ग्रहण करने की स्पष्ट चेतावनी पर आधारित है | पैलेट्स एट अल (1980, पेज 506) ने भी पाया कि पत्रकार में उस परिणाम की पड़ताल करने के बजाय समर्थन की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है जिसकी वह रिपोटिंग कर रहा है | इस वजह से ही ऑडियंस सर्वेक्षण के परिणामों की विश्वसनीयता को लेकर सचेत होने के बजाय आश्वस्त हो जाती है |


पत्रकारों द्वारा सर्वेक्षण सतीजों (स्वीकत या अस्वीकृत) के मूल्यांकन और जिस प्रकार ऑडियंस सर्वेक्षण की विश्वसनीयता का अर्थ लगाती है, इनके बीच आपसी संबंधों को देखते हुए (पैलेटज एट अल, 1980, पेज 506) समाचार रिपोटों में व्यक्त किए गए सर्वेक्षण की पद्धति का अध्ययन किया गया। चूंकि पिछले अध्ययनों में यह पाया गया था कि पत्रकारों के विपरीत, राजनेता सर्वेक्षण के परिणामों के प्रति अधिक नकारात्मक एवं आलोचनात्मक रवैया रखते हैं, विशेषकर जब परिणाम उनके हक में नहीं होते, इसलिए इस अध्ययन में जिन तत्वों पर गौर किया गया, उनमें निम्न तीन तत्व शामिल थेः 1) एक या अधिक न्यायिक पद्धति वाले लेखों की संख्या (संकेत के रूप में, कि आलोचक मीडिया किस प्रकार समाचार रिपोर्टों में सर्वेक्षण के परिणामों का इस्तेमाल करता है), 2) इन लेखों के मूल्यांकन की दिशा (सर्वेक्षण के प्रति सकारात्मक, तटस्थ या नकारात्मक) और 3) उनके स्रोत (पत्रकार, राजनीतिज्ञ, मतदान सर्वेक्षक या अकादमिक व्यक्ति) (ब्रेट्सनाइडर, 1997, पेज 249)।


मूल्यांकन आधारित फैसले के अतिरिक्त, समाचार रिपोर्टों में सवेक्षण के विषय के स्तर पर भी गौर किया गया। पत्रकारों के पास सर्वेक्षण के परिणामों की व्याख्या और प्रचार करने के तरीको की काफी स्वतंत्रता है (पैटरसन, 2005, पेज 721)। वह कच्चे आंकड़ों (प्रायः प्रतिशत) की रिपोर्ट कर सकते हैं या परिणाम को ठोस अर्थ दे सकते हैं और फिर इनका प्रयोग राजनीतिक विश्लेषण के आधार के रूप में कर सकते हैं (स्मिथ एंड वैरल, 1985, पेज 66)। चूंकि सर्वेक्षण के आंकड़े तथ्यपरक, सटीक और मात्रात्मक सूचनात्मक प्रतीत होते हैं, ७ सकते हैं और विशेषज्ञों का स्थान भी ले सकते हैं (फ्रैंकोविक, 2005, पेज 684-688, ब्रेट्सनाइडर, 1997, पेज 262)। इसलिए सर्वेक्षण व्याख्यात्मक समाचार खबरों को अधिक तथ्यपरक आधार प्रदान कर सकते हैं (रोजेंटिल, 2005, पेज 707)। इस पत्र में समाचार रिपोर्टों में प्रकाशित हो रहे सर्वेक्षण परिणामों का विश्लेषण और विषयगत व्याख्या पर फोकस के स्तर का प्रयोग मीडिया के एक संकेतक के रूप में किया गया है, जो सर्वेक्षण के कच्चे परिणामों को तब समाचार बनाते हैं, जब सर्वेक्षण के कच्चे परिणाम बमुश्किल सूचनात्मक हों और बिना किसी अतिरिक्त व्याख्या के उद्देश्य का प्रसारण कर रहे हों |


सर्वेक्षण के मीडिया प्रस्तुतिकरण के बारे में अन्य महत्वपूर्ण तत्व, जिन पर गौर किया गया था, वह सर्वेक्षण की तुलना से जुड़ा है। समाचार में हालिया सर्वेक्षण के नतीजों की तुलना अन्य सर्वेक्षणों अथवा बाहरी सचनाओं से करना, जनमत को एक निश्चित छवि प्रदान करने में योगदान दे सकता है। सर्वेक्षण परिणामों में अंतर, इसकी प्रक्रिया में प्रयोग होने वाली पद्धति के कारण आता है। यह अंतर इसलिए भी आता है क्योंकि लोगों ने विभिन्न समयों पर अपना मत प्रकट किया है। ब्रोह (1980. पेज 5100 कहते हैं कि पत्रकार इन अंतरों को मत में परिवर्तन के रूप में इसलिए दिखाते हैं ताकि चनाव के समय मतों में बदलात या वोट में अस्थिरता पर बल दिया जा सकेइसे और अधिक प्रबल बनाया जा सकता है, यदि पत्रकार तुलना के उन बिंदुओं भन य समय बिंद नोटनिता मत परिवर्तनों पर जोर दे (ब्रोह, 1980, पेज 518)। मीडिया द्वारा सर्वेक्षण की इन तलनाओं का इस्तेमाल केवल जनमत में अस्थिरता को दिखाने के लिए ही नहीं किया जा सकता, बल्कि ट्रेंड सेट करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। जनहित वाले कुछ सर्वेक्षणों जैसे कि किसी राजनीतिक उम्मीदवार की लोकप्रियता रैंकिंग, को वैसे ही समाचार बनाया जाता है जैसे कि बेरोजगारी या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को (क्रेस्पी, 1980, पेज 470)। समाचार लेखों में सर्वेक्षण की तुलनाओं का अध्ययन, इनकी संख्या और अक्सर तुलना के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बेसलाइन के अभिप्राय के संदर्भ में किया गया।


उद्देश्य - इस पत्र का प्रमुख उद्देश्य यह अध्ययन करना है कि न्यूज मीडिया ने अपनी समाचार रिपोटों में जनमत सर्वेक्षण परिणामों का उपयोग किस प्रकार किया है। सबसे पहले, ..खबरों में सर्वेक्षण की मात्रा अथवा दृश्यता का अध्ययन इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए किया जाता है कि क्या (बेल्जियम के) पत्रकारों ने सर्वेक्षण के प्रति बढ़ रहे मीडिया के ध्यान पर अन्तर्राष्ट्रीय रुझानों का अनुपालन किया हैसमाचार में सर्वेक्षण. की मात्रा के इस सामान्य विवरण के अतिरिक्त, सर्वेक्षण पर फ्लेमिश (बेल्जियम की) समाचार रिपोर्टों की पद्धति की गुणवत्ता का भी मूल्यांकन किया गयाइस औपचारिक गुणवत्ता तक पहुंचने के लिए, वैश्विक स्तर पर बनाये गये उन निर्देशों का प्रयोग किया गया है, जो समाचार में दिखाए जाने वाले सर्वेक्षणों की पद्धति के बारे में न्यूनतम जानकारी की बात कहते हैं।


इसके बाद, जनमत पर आधारित खबरों को बनाने में मीडिया ने क्या भूमिका अदा की है, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए सर्वेक्षणों के समाचार प्रस्तुतिकरण की जांच बारीकी स का जाएगा। इसके तहत जनमत सर्वेक्षण क तान पहलुओं पर विचार किया गया, 1) सवक्षण की विश्वसनीयता पर मूल्यांकन, 2) सर्वेक्षण रिपोर्टों में विषय का समावेशन और 3) सर्वेक्षण की तुलना का प्रयोग। शोध के इन उद्देश्यों का अध्ययन मीडिया, सर्वेक्षण और जनमत के बीच जटिल संबंधों को समझने में मदद करेगा | 


आंकड़े और पद्धति शोध के इन उद्देश्यों को बेल्जियम में प्रसारण के नजरिए से सबसे प्रमुख छह समाचारपत्रों जिनमें खुद को गुणवत्तापरक समाचार पत्र कहने वाले डी स्टैंडर्ड, दी टीज्द, डी मॉर्गन और अन्य लोकप्रिय समाचार पत्र गैजेट वन आंतवेर्पन, हेट न्यूजब्लैडंड, हेट लास्टिन्यूज में जनमत सर्वेक्षण आधारित लेखों की विषयवस्तु के विश्लेषण के आधार पर निर्धारित किया गया हैचयन के इस प्रकार से, .. सबसे अधिक समाचार संपादकों के साथ ..ही, पत्रों के विभिन्न राजनीतिक स्रोतों का भी प्रतिनिधित्व किया गया। 


भी प्रतिनिधित्व किया गया। सबसे पहले तो, समाचारपत्रों में प्रकाशित उन लेखों पर विचार किया गया जिनके शीर्षकों अथवा लेख के कथ्य में सर्वेक्षण का . जिक्र. था। इनमें साल 2000 (अक्टूबर में स्थानीय चुनाव), 2002 (कोई चुनाव नहीं), • 2004 (जून में यूरोपियन और क्षेत्रीय चुनाव) और 2006 (अक्टूबर में स्थानीय चुनाव) शामिल थे। ऐसा इसलिए ताकि चुनावी और गैर चुनावी, दोनों अवधियों के लेखों पर गौर किया जा सके। इनमें सभी प्रकार के लेख, जैसे कि सर्वेक्षण के परिणाम पर आधारित समाचार रिपोर्ट, साक्षात्कार और मत जताने वाले लेख, उनकी व्याख्या और पद्धतिगत मूल्यांकन पर भी विचार किया गया। इनके अलावा, लेखों के चयन में, जनता का मत और बेल्जियम के उत्तरदाताओं की भागीदारी का भी ध्यान रखा गया। आंकड़ों के संग्रह (डेटा कलेक्शन) के दौरान पाया गया कि दो खास सर्वेक्षण ('De Stemmenkamploen' and 'Het GrootsteBuurtonderroek') जिन्होंने 2006 के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, के लेखों को सही तरीके से नहीं चुना गया, क्योंकि उनके नाम में 'सर्वेक्षण' शब्द का जिक्र नहीं था। इसलिए कुछ लेखों का चयन इस आधार पर भी किया गया कि उन्हें मीडिया में सर्वेक्षण के नाम पर काफी दिखाया गया है। (चयनित लेखों की संख्या और उनकी चयन प्रक्रिया के अवलोकन हेतु परिशिष्ट देखें)


समाचार में सर्वेक्षण की दृश्यता के.सामान्य विवरण के लिए, उन सभी लेखों पर विचार किया गया, जिनमें साफ तौर पर जनमत सर्वेक्षण का जिक्र था (कुल लेख=2744)अन्य प्रश्नों (जैसे कि पद्धति, गुणवत्ता) पर विचार करने के लिए, केवल उन लेखों का ... अध्ययन किया गया, जिनमें सर्वेक्षण का.. दबदबा था (अर्थात वे लेख जिनका कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण परिणाम, व्याख्या और कार्य पद्धति के बारे में बात कर रहा हो)। इस प्रकार केवल उन लेखों पर विचार किया गया, जो सर्वेक्षण के बारे में मजबूती से बात करते हों।


परिणाम


परिणाम परिणामों की प्रस्तुति खासतौर पर तीन वर्गों को ध्यान में रखकर बुनी जाती है, जिनमें सर्वेक्षण पर मीडिया का सामान्य ध्यान, इसकी पद्धति आधारित गुणवत्ता और सर्वेक्षण की विश्वसनीयता, समग्र रिपोटिंग का तरीका : और सर्वेक्षण की तुलना का प्रयोग पर शामिल हैं। 


सर्वेक्षण पर मीडिया का ध्यान


सबसे पहले, समाचार मीडिया में सर्वेक्षण की महत्ता का अध्ययन किया गया क्योंकि यह माना जा रहा था कि बेल्जियम में इसकी महत्ता काफी बढ़ी हैसर्वेक्षण संबंधी लेखों पर आधारित इस अध्ययन में (कुल लेख=2744), समय के साथ सर्वेक्षण लेखों की संख्या में वृद्धि देखी गई।


बेल्जियम के छह सबसे महत्वपूर्ण समाचारपत्रों में जनमत सर्वेक्षण को लेकर प्रकाशित लेखों में अच्छी खासी बढ़ोतरी 2000 से 2006 की समयावधि के दौरान देखने को मिली। इन छह सालों में, सर्वेक्षण को संदर्भित करती लेखों की संख्या जहां 2000 में 227 थी, तो वहीं 2002 में 338 हुई, 2004 में 706 और फिर 2006 में 1473 तक पहुंच गई। इन लेखों में वृद्धि की उम्मीद अमेरिका और नीदरलैंड्स सरीखे देशों में बढ़ रहे रुझानों को देखते हुए लगाई जा रही थी। हालांकि, सर्वेक्षण को लेकर मीडिया अटेंशन के मामले में महत्वपूर्ण प्रगति काफी पहले ही देखी गई थी (उदाहरणार्थ 1980 में अमेरिका में), लेकिन फ्लैंडर्स (बेल्जियम) में सर्वेक्षण को लेकर लेखों की मात्रा में इतनी बड़ी बढ़ोतरी हाल ही के वर्षों में देखी गई है। . 


. लगभग सभी छह समाचारपत्र, जिन पर जा गौर किया जा रहा है (डी टीज्ड के अलावा), प्रकाशित सर्वेक्षण पर आधारित लेखों की संख्या में 2000 से 2006 के बीच सालाना बढ़ोतरी हुई। यह बढ़ोतरी सबसे ज्यादा क्वालिटी पेपर माने जाने वाले समाचार पत्र डी सँडडर्ड और लोकप्रिय समाचारपत्र हेड न्यूजब्लाड में देखी गई, जिन्हें कोरेलियो नाम का एक ही संगठन संपादित करता है। इस बढ़ोतरी को समाचार पत्र संगठन अंशतः 2006 के 'सबसे बड़े पड़ोसी (नेबरहुड) सर्वेक्षण' के तौर समझा सकते हैं, जिसमें पंचायती/जातिगत/सांप्रदायिक चुनाव से पहले लगभग सभी स्थानीय समुदायों के लोगों (307) ने स्थानीय नीतियों और तत्कालीन मेयर के बारे में सर्वेक्षण में हिस्सा लिया थाचूंकि 2006 में इस तरह के कई स्थानीय सर्वेक्षण हुए थे, अतः इस साल को अपवाद माना जा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि 2007 के बाद भी सर्वेक्षणों सकता है कि 2007 के बाद भी सर्वेक्षणों को मीडिया की ओर से काफी तवज्जो को मीडिया की ओर से काफी न मिलती रही है, लेकिन जैसा कि ग्राफ में मिलती रही है, लेकिन जैसा कि गा दिखाया गया है कि 2006 में बढ़ोतरी और आगे बढ़ने के बना लगी(देखें ग्राफ-1) 



लगीयों तो प्रकाशित सर्वेक्षण ही संख्या में भारी बढ़ोतरी देखी अगर पूरे लेख में शब्दों की तो सर्वेक्षण से जुड़े शब्द " स्थिर हो गए हैं। इसके अध्यय सर्वेक्षण में शाब्दिक योगदान के लेखों को चार श्रेणियों में वर्गी गया था 1) सर्वेक्षण पर प्रमुख को लेख का 60 प्रतिशत हिस्सा सर्वे तो प्रकाशित सर्वेक्षण लेखों की कुल में भारी बढ़ोतरी देखी गई, लेकिन लेख में शब्दों की सीमा को देखें, क्षण से जुड़े शब्द समय के साथ गए हैंइसके अध्ययन के लिए, शाब्दिक योगदान के अनुपात में मार श्रेणियों में वर्गीकृत किया तो सर्वेक्षण पर प्रमुख फोकस, यदि 160 प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण के बारे में ही है, 2) महत्वपर्ण थीम के सर्वेक्षण, यदि लेख का 30-60 प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण के संदर्भ में हैं. 3) सर्वेक्षण का सीमांत-उपयोग, यदि लेख का 10-30 का प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण के बारे में बात करता है, 4) सर्वेक्षण का महज संदर्भ के से भी कम हिस्से में सर्वेक्षण की बात की गई है। प्रत्येक श्रेणी में सर्वेक्षण संबंधित लेखों का प्रतिशत दर्शाया गया हैं। (ग्राफ-2) इस लेख से यह समझा जा सकता है कि अधिकतर समाचारपत्रों ने सर्वेक्षण पर प्रमुख फोकस रखा (जिसमें लेख का 60 प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण पर आधारित था)। यह भी पाया गया कि कई लेखों में सर्वेक्षण का प्रयोग न सिर्फ प्रमुख थीम के तौर पर किया गया था, बल्कि उन्हें पूरी तरह सर्वेक्षण, उसके परिणाम और व्याख्या को समर्पित कर दिया गया था। जब सर्वेक्षण का इस्तेमाल इस प्रकार समाचार में किया गया, तो वह लेख के प्रमुख विषय के रूप में उभरकर आते हैं और ऐसा कम दिखता है कि अन्य मुद्दे पर आधारित समाचार में उनका प्रयोग महज संदर्भ अथवा चित्रण हेतु किया गया है। सामान्य तौर पर, सर्वेक्षण पर प्रमुख फोकस या प्रमुख थीम वाले लेखों और ऐसे लेख जिनमें सर्वेक्षण का प्रयोग सीमांत रूप में किया गया है, में 2000 से 2006 के बीच ज्यादा बदलाव नहीं आया। केवल 2006 में मध्यम श्रेणी के लेखों में अन्य वर्षों के मुकाबले हल्की सी बढ़ोतरी हुई। क्या सर्वेक्षण आधारित लेखों का प्रकाशन पूरे वर्ष समान रूप से हुआ है या केवल राजनीतिक चुनाव के दौरान उन पर ध्यान केंद्रित किया गया है, इसके अध्ययन के लिए प्रकाशन तिथि पर गौर करना अभी बाकी है। .


इस बात का अध्ययन करने के लिए कि सर्वेक्षण आधारित लेख पूरे साल में समान रूप से प्रचारित किये जाते हैं या राजनीतिक चुनावों के दौरान केन्द्रित होते हैं, लेख के प्रकाशन की तारीख को ध्यान में रखा जाता है। 


भले ही प्रचारित किए गए सभी सर्वेक्षण राजनीतिक चुनाव से संबंधित नहीं थे, फिर · भी ग्राफ-3 में दिखाया गया है कि बड़ी मात्रा में सर्वेक्षण से जुड़े लेख आखिरी महीने में मतदान की तारीख से ठीक पहले प्रकाशित किए गए। सन् 2000 में फ्लैंडर्स/बेल्जियम में जब स्थानीय चुनाव हुए थे, चुनावों के ठीक पहले सितंबर और अक्तूबर के महीनों में भारी संख्या में सर्वेक्षण पर आधारित लेख प्रकाशित किए गएहालांकि चुनावों की तारीख से छह माह पहले अप्रैल में भी सर्वेक्षण पर आधारित बड़ी संख्या में लेखों की संख्या में वद्धि देखी जा सकती है। इसी तरह सन 2006 में जब स्थानीय चुनाव कराए गए थे, संचार माध्यमों ने चुनावों की तारीख से ठीक पहले के महीने में पिछले साल के उसी माह की तुलना में सर्वेक्षण सम्बंधी लेखों को ज्यादा महत्व दिया गयासन् 2004 में भी चुनाव की तारीख से पहले कई महीनों तक सर्वेक्षण संबंधी लेखों की संख्या ज्यादा रही। सन् 2002 में जब फ्लैंडर्स में कोई चनाव नहीं होने थे, फिर भी कई महीनों तक सर्वेक्षण संबंधी लेखों में वृद्धि देखी गई। संक्षेप में हम कह सकते _ हैं कि जब चुनाव होते हैं, मतदान की तारीख से पहले के महीनों में सर्वेक्षण संबंधित · लेखों की संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है और मतदान समाप्त होते ही उनकी संख्या एकदम गिर जाती है |


एकदम गिर जाती हैसर्वेक्षण और.मतदानों से जुड़ी खबरें चुनावों की ही देन है, लेकिन कुछ दूसरी तरह की घटनाओं से संबंधित सर्वेक्षण लेखों की संख्या अभी भी काफी है। नीचे दिए गए ग्राफ में उन लेखों को वर्गीकृत किया गया है जिनमें सर्वेक्षण को प्रमुखता दी गईहै। (कल संख्या-1359) उन लेखों को सर्वेक्षण के प्रकार और विषय के अनुसार बांटा गया है जैसे कि (1) चुनाव जिनमें राजनीतिक दलों और राजनीतिक उम्मीदवारों की लोकप्रियता की मंशा से सर्वेक्षण किए जाते हैं (2) चुनावों से इतर दूसरे विषयों पर सर्वेक्षण जो कि चुनाव से संबंधित न हो या (3) दोनों का संयोजन हो।




ग्राफ-4 में देखा जा सकता है कि अखबारी लेखों में लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा वह है जिन्हें चुनावी लेखों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिनमें मतदाताओं के इरादे या राजनीतिक पार्टियों की लोकप्रियता पर रायशुमारी की जाती है। प्रतिशत की यह दर हमेशा ही एक जैसी बनी रहती है, वर्ष 2002 को छोड़कर जब फ्लैंडर्स में कोई चुनाव नहीं हुए। उस साल दूसरे आम विषयों पर तमाम सर्वेक्षणों पर अध्ययन छपे। सन् 2000 में आम विषयों के बारे सर्वेक्षण पर लिखे गए लेखों में से 16 प्रतिशत लेखों को 'राजनीतिक रूप से प्रासंगिक' कहा जा सकता है, सन् 2002 में यह 23 प्रतिशत है, 2004 में 23 प्रतिशत और 2006 में 21 प्रतिशत है। कहने का मतलब है कि सर्वेक्षण के विषय को राजनीति से सीधा-सीधा जोड़ा जा सकता हैराजनीतिक विश्वास, नीतिगत संतुष्टि या राजनीतिक बहस के मुद्दों (जैसे कि प्रवासियों के मतदान के अधिकार, रात्रिकालीन उड़ाने आदि) के बारे में सर्वेक्षण। सर्वेक्षण के विषय में संचार माध्यमों में प्रकाशित सामग्री की औपचारिक गुणवत्ता सर्वेक्षणों पर आधारित मीडिया में जो सामग्री दी जाती है, उनकी गुणवत्ता की परख के लिए यह जरूरी माना जाता है कि सर्वेक्षण शोध संगठन (ईएसओएमएआर/ डब्ल्यूएपीओआर, एएपीओआर, एनसीपीपी, सीएएसआरओ, फेबलमार) के तौर तरीकों या उसकी पूरी प्रणाली की सूचना जनता के सामने रखें, लेकिन मीडिया की सामग्री में प्रणाली या पद्धति के बारे में कम से कम जानकारी दी जाती है। सिर्फ उन्हीं लेखों को प्रमुखता दी जाती है जिनमें सर्वेक्षणों का हवाला दिया जाता है (कम से कम 60 प्रतिशत लेखों में सर्वेक्षण का जिक्र होता है) (कुल संख्या-1359)। नीचे दी गई तालिका लेखों में पद्धति संबंधी तत्वों के प्रतिशत के बारे में बताती है। कुछ पहलुओं के मामले में, एक विस्तृत या कम विस्तृत तरीके से जानकारी का खुलासा करने के बीच अंतर किया है। 


फ्लेमिश अखबारों में प्रकाशित जिन लेखों में प्रणाली संबंधी तत्वों का साफ तौर पर उल्लेख किया गया है, उनका. संबंध सर्वेक्षण संबंधी सामान्य जानकारी से ही रहा हैमसलन, सर्वेक्षणकर्ता के कुछ संदर्भ (प्रायोजक और सर्वेक्षण करने वाली संस्था के बीच कभी विभेद किया जाता है, कभी नहीं किया जाता है) और सर्वेक्षण नमूने का ठीक-ठीक आकार क्या थाआंकड़ों के संकलन के बारे में सूचनाएं कम दी जाती है। मसलन, सर्वेक्षण के तौर-तरीके और उनकी तारीख । यह भी देखना जरूरी होता है कि सर्वे की तारीख के साथ फील्डवर्क को जोड़ा गया है या नहींकिसी लेख में सर्वेक्षण संबंधी तकनीकी सूचनाएं किस हद तक दी जाती है, हमने यह देखा है। औसतन सात प्रतिशत लेखों में त्रुटियों का सटीक जाता ह आर कवल तीन प्रतिशत लेखों में मूल्यांकन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया का जिक्र किया गया। सन् च के वर्षों में बार में सभी " सूचनाएं देने का दखन को मिला। आर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। समाचारपत्रों में छपे लेखों में जहां पद्धति संबंधी सूचनाएं स्पष्ट तौर पर दी गई हैं, उस आधार पर एक तालिका (इंडेक्स) तैयार की गई जिसमें यह देखा जा सकता है कि प्रति लेख में कितने पहलुओं के बारे में जानकारी दी गई है। पिछली तालिका में (ए-एच) कुछ निश्चित तत्वों के आधार पर एक निश्चित मानदंड और कुछ कमतर खास तत्वों (a-b,d,h) के आधार पर तैयार एक कमतर निश्चित मानदंड के बीच फर्क करने की कोशिश की गई है। यदि लेख में प्रणाली संबंधी एक भी...तत्व का जिक्र नहीं किया गया है तो उसका मानदंड शन्य है और जब सारे तत्व मिलते हैं तो अधिकतम मानदंड 7 दिया है। समाचार पत्रों में प्रकाशित सभी लेखों का सालाना मध्यमान या औरत याफ-5 में दिया गया है।


चंकि मां के अनसार अधिकतम 7 अंक दिए जा सकते हैं इसलिए जाहिर रूप से पटनिधी तत्वों को स्पष्ट रूप से प्रकाशित करने का सचकांक अध्ययन के चार सालों में ही रहा। यही कोई 0.5 और 2.5 के बीच रहा। वह भी तब जब निश्चित मानदंड कम निश्चित मानदंडों से कम देखने को मिले। ऐसा लगता है कि मध्यमान सचकांक मल्य लगातार गिरते जा . रहे जिसका फ्लेमिश अखबारों में सर्वेक्षण के प्रकाशन की पद्धति संबंधी गुणवत्ता का हास होना नीचे कछ ऐसे तत्वों पर प्रकाश डाला गया जो संचार माध्यमों द्वारा सर्वेक्षणों के बारे में निश्चित तौर पर प्रस्तुत किए जाते हैं।



संचार माध्यमों द्वारा सर्वेक्षणों का प्रस्तुतिकरण : संचार माध्यमों द्वारा सर्वेक्षणों को प्रस्तुत करने के तरीकों के तीन पहलुओं पर विचार किया गया है, 1) सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता के बारे में मूल्यांकनकारी निर्णय, 2) सर्वेक्षण की रिपोर्टों में दर्शाई गई व्यक्तिपरता का ...अंश,-3) सर्वेक्षण में तुलनाओं का इस्तेमाल।


पद्धति संबंधी मूल्यांकन की प्रस्तुति


सर्वेक्षण पर आधारित खबरों में दी गई पद्धति संबंधी सूचनाओं की मांग के लिहाज से औपचारिक अध्ययन करने के बाद, सर्वेक्षणों में जाहिर तौर पर इस्तेमाल की गई पद्धति का मूल्याकनात्मक अध्ययन किया गया है। सर्वेक्षणों के नतीजों का किस तरह आलोचनात्मक मूल्याकन किया जाए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पत्रकार बाहरी मतों का चयन किस नजरिए से कर सर्वेक्षण की विश्वसनीयता या अविश्वसनीयता पर जोर देने से जनता को इस बात का इशारा मिलने की संभावना हो जाती है कि किसी सर्वेक्षण विशेष को किस तरह से देखना है और उसके नतीजों से क्या अर्थ निकालने हैं |


- इस सन्दर्भ में पहली जरूरी बात तो यह कि संचार माध्यम अपने द्वारा प्रचारित सर्वेक्षणों के मामले में किस हद तक आलोचनात्मक या अनालोचनात्मक रवैया अपना सकते हैं, यह जानने के लिए सर्वेक्षण की पद्धति के बारे में एक या एक से अधिक मूल्यांकन वाले सर्वेक्षण आधारित लेखों की संख्या को ग्राफ-6 में दिखाया गया है। 




यह बढ़कर 76 प्रतिशत हो गया। बढ़ती.. संख्या से यह साफ तौर पर संकेत मिलते . हैं कि समाचार पत्र अपने द्वारा प्रकाशित लेखों में सर्वेक्षणों के नतीजों को बिना आलोचनात्मक नजरिये के इस्तेमाल करते हैं। .


हैं। . ग्राफ-7 में. सर्वेक्षण संबंधी प्रकाशित लेखों में सर्वेक्षण के लिए अपनाई गई प्रणाली जब लेख में सक्षण की प्रणाली के बारे में साफ-साफ विश्लेषण किया जाता है, तब यह देखा जाता है कि सवक्षण के नतीजों को प्रकाशित करने में निष्पक्ष व सकारात्मक विवरणों का इस्तेमाल करने की बजाय नकारात्मक दिशा में जाने वाली बातों का इस्तेमाल किया जाता है । इसका मतलब है दि समाचार माध्यम सर्वेक्षणों को प्रस्तुत कि यदि समाचार माध्यम सर्वेक्षणों को प्रस्तत करते हैं, तो वह जनता की राय को अक्सर करते हैं, तो वह जनता की राय को अक्सर अविश्वनीय रूप में प्रस्तुत करते हैं। हालांकि के तरीको या प्रणाली को विश्वसनीय सर्वेक्षण के तरीका या प्रणाली को विश्वसनीय मानते है। ऐसा हान पर भी सर्वेक्षण आधारित लेखों में बड़ी संख्या उन लेखों (69 प्रतिशत) की है जिनमें सर्वेक्षण के तौर-तरीकों के बारे में किसी तरह की जानकारी नहीं दी जाती है। 


यह बात सामने आती है कि चुनाव और मिश्रित विषयों पर सर्वेक्षण (अन्य किसी मसले पर मतदान) का लेखों में मूल्यांकन सबसे ज्यादा नकारा है। जबकि सामान्य सर्वेक्षण का मूल्यांकन कुछ हद तक सकारात्मक होता । रोमी नकारात्मकता का कारण यह हो सकता कि केवल इस तरह के सर्वेक्षणों के ना उसकी वैधता का वादा जाता है। उदाहरण के लिए, वास्तविक चनावों के नती पहले कराए गए सर्वेक्षण के नतीजों से करके इसकी सटीकता को परखा जा सकता है। पर दूसरे अधिकांश मामलों में सटीकता परखने का कोई तरीका नहीं है |


मल्यांकनात्म मूल्यांकनात्मक वक्तव्यों का अध्ययन करने के लिए सर्वेक्षणों में निकाले गए नतीजों के विभिन्न आधारों के बीच हमें फर्क करना होगा। ग्राफ-8 में प्रणाली के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष को उसमें स्रोत के साथ दर्शाया गया है। (सं-520) केवल पत्रकार ही सर्वेक्षणों का मूल्यांकन (44प्रतिशत) अपने लेखों में नहीं करते बल्कि दूसरे लोग भी सर्वेक्षणों को लेकर अपना आलोचनात्मक नजरिया रखते हैं। मुख्य रूप से राजनीतिज्ञ (36 प्रतिशत) अखबारी लेखों में दिए गए सर्वेक्षण के नतीजों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। कुछ हद तक सर्वेक्षक, अकादमीशियन और दूसरे लोग (संगठनों के प्रवक्ता) सर्वेक्षण की पद्धति के आधार पर निकले निष्कर्षों पर अपनी स्पष्ट राय देते हैंअनेक स्रोतों द्वारा व्यक्त किए वक्तव्यों की दिशा पर नजर डालने पर हम पाते हैं कि अकादमीशियनों और राजनीतिकों की राय उन सर्वेक्षणों पर अमूमन ज्यादा नकारात्मक होती है, वनिस्पत पत्रकारों और सर्वेक्षकों के। पत्रकारों और मतदान सर्वेक्षकों का यह ग्रुप मतदान के मानदंडों को ज्यादातर विश्वसनीय ही बताता हैस्पष्ट है उसे मतदान सर्वेक्षण की अपनी दुकान जो चलानी होती है |


तथ्यपरकता का अंश


सर्वेक्षण की प्रणाली के मूल्यांकन के अतिरिक्त सर्वेक्षण पर लिखे गए लेखों में तथ्यपरकता के अंश पर भी हमें विचार करना चाहिए। सर्वेक्षण के नतीजों का विश्लेषण करके उनके नतीजों को निहायत तथ्यपरक ढंग से पेश करना, बजाए इसके जनता को केवल उनकी सूचना ही दी जाए, यह दिखाता है कि मीडिया इन सर्वेक्षणों को अपनी खबरों में कितने सक्रिय रूप से इस्तेमाल करता है। सर्वेक्षण के नतीजों का तथ्यपरक विश्लेषण और व्याख्या के जरिए मीडिया जनता की राय का एक निश्चित विंब बनाता है। 


उसके अध्ययन के लिए सर्वेक्षण की खबरों को वस्तुपरकता से व्यक्तिपरकता के पैमाने पर पांच बिंदुओं के आधार पर वर्गीकृत किया गया हैयदि लेखों में सर्वेक्षण के नतीजों की सूचना देने मात्र पर जोर दिया गया है तो उसे 'वस्तुपरक' की श्रेणी में रखा गया है, जिन लेखों में ज्यादातर व्यक्तिपरक विश्लेषण या व्याख्या है, इन्हें 'व्यक्तिपरक' की श्रेणी में रखा गया है और जिनमें न तो सर्वेक्षण नतीजों की केवल वस्तपरक सूचना है और ना ही मख्य रूप से व्यक्तिपरक विश्लेषण उन्हें तटस्थ या संतुलित की श्रेणी में रखा गया है। व्यक्तिपरकता के अतिरिक्त जिन तरीकों से सर्वेक्षण के नतीजों को पेश किया गया है जैसे कि ठीक-ठीक संख्या में (मसलन 70 प्रतिशत फ्लेमिश) तो उन्हें 'सटीक' की श्रेणी में और यदि सही-सही संख्या में नहीं किया गया है तो . उन्हें 'अनमानित' की श्रेणी में रखा गया है और जिन लेखों में सर्वेक्षण के नतीजों को नहीं दिया गया, न ही कोई व्याख्या की गई, उन्हें 'उपलब्ध नहीं' की श्रेणी में रखा गया है |


सर्वेक्षणों की तुलनाएं


समाचार माध्यमों में सर्वेक्षणों की प्रस्तुति का तीसरा पहलू है - सर्वेक्षणों की तुलनाओं का तुलनाओं माध्यम एक खास एक आधार पर सर्वेक्षणों के बीच तुलना करने की पद्धति का इस्तेमाल कर जनता की राय का एक खास बिंब तैयार कर सकते हैं। और इसमें जनता की राय में बदलावों का एक ख़ास विंब तैयार हो सकता. हैं। सन् 2000 से 2006 के बीच प्रकाशित 15.33 प्रतिशत प्रभावशाली लेखों में से (30.68 प्रतिशत लेखों में) एक सर्वेक्षण के नतीजों की तुलना दूसरे सर्वेक्षण के नतीजों से की गई थी। यदि विभिन्न सर्वेक्षणों की आपस में तुलना की जाए तो उसमें एक आधार बिंदु समय होता है(पहले या हाल• के सर्वेक्षण में) या फिर सर्वेक्षणों का चरित्र । 


सर्वेक्षण संबंधी अधिकांश लेखों में विभिन्न किस्म के सर्वेक्षणों (69.32 प्रतिशत) के बीच तलना नहीं की जाती लेकिन यदि विभिन्न सर्वेक्षणों की आपस में एक . भी तुलना मिल जाती है, तो इनके नतीजों की तुलना पिछले किसी सर्वेक्षण से की गई होती है या फिर इसी तरह के किसी सर्वेक्षण से (जिसमें सर्वेक्षण और विषय वहीं हों) यद्यपि अलग न्यूनतम बिंदुओं की तुलना भी संभव है, लेकिन ज्यादातर समान सर्वेक्षणों में ही आपसी तुलनाएं की जाती है।रुझानों को यही साबित करने के लिए रुझानों को यही साबित करने के लिए भी सर्वेक्षणों की तुलनाएं की जाती है। सर्वेक्षणों के नतीजों की तुलनाओं को सर्वेक्षणों की प्रणाली को सही या गलत साबित करने के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है। 


में लाया जाता है। बहस और निष्कर्ष चूंकि आम जनता और राजनीतिक कार्यकलापों के लिए संचार माध्यमों की भूमिका को चुनाव संबंधी सूचनाएं देने में बहुत महत्वपूर्ण समझा जाता है, लिहाजा संचार माध्यमों और सर्वेक्षणों के बीच के घनिष्ठ रिश्ते की जांच पड़ताल सर्वेक्षण पर आधारित अखबारों के लेखों के विषय विश्लेषण के जरिए की जा सकती है। .अनुमान के अनुरूप, फ्लैंडर्स के अखबारों में मतदान संबंधी लेखों की संख्या बढ़ी है। 2000 में कुल 227 लेख सर्वेक्षण से संबंधित थे। सर्वेक्षण से संबधित इन लेखों की संख्या 2006 में बढ़कर 1473 लेखों की हो गई। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अन्य देशों की तुलना में बेल्जियम के फ्लैंडर्स में सर्वेक्षण सबधा लखा का रूझान दा है। सर्वेक्षणों पर आधारित बढ़ता जा रहा है। सर्वेक्षणों पर आधारित नोटों के केन्द्र में सर्वेक्षण से जुड़ी बातों का लेखों के केन्द्र में सर्वेक्षण से जुड़ी बातों का न है। यही वजह है कि अगर अनुपात यथावत है। यही वजह है कि  अगर अनुपात यथावत है। यही वजह है कि अगर खबरों में सर्वेक्षणों का उपयोग होता है, तो णों का उपयोग होता है, तो ने वाली खबर न होकर वे हाशिए पर छपने वाली खबर न होकर रूप में प्रकाशित हुई। छपने प्रमुख खबरों के रूप में प्रकाशित हुई। छपने आधार पर खबरों के लिए की तारीख के आधार पर खबरों के लिए " ता निर्धारित होती दिखाई उनकी उपयुक्तता निर्धारित होती दिखाई सी राजनीतिक चुनाव वाले देती हैकिसी राजनीतिक चुनाव वाले महीने में चुनाव की तारीख से ठीक पहले ऐसे लेखों या समाचारों की संख्या सबसे ज्यादा होती हैं। अनुभवों से..उस बात की पुष्टि की जा सकता है। दूसरा " यही निष्कर्ष निकलता है। अगर हम सपना की किस्मों पर विचार करें, तो पाते है कि केवल राजनीतिक चुनावों पर ही खबरें नहीं छपती, दूसरे मुद्दों पर हुए सर्वेक्षणों को भी खबरों के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। लब्बोलुआब यह कि संचार माध्यमों के लिए सर्वेक्षणं खबरों का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं |


चूंकि संचार माध्यमों द्वारा दी जाने वाली जनमत सर्वेक्षण की सूचनाएं विभिन्न विषयों पर जनता की राय का सचक हैं इसलिए यह जरूरी है कि लोगों को सर्वेक्षण के बारे में सही और सटीक सूचना मिले। हालांकि, दिखाई यह पद रहा है सर्वेक्षण से जुड़ी खबरों की मात्रात्मक नोनी के अनपात में न नहीं हो पा रही है। अखबारों में छपने वालोर . गई सर्वेक्षण की प्रणाली से जुड़ी सूचनाएं गई सर्वेक्षण की अपेक्षाकृत बहुत सीमित होती है। अनेकों अपेक्षाक सर्वे शोध संगठनों द्वारा जारी किए गए सर्वे शो अंतर्राष्टी अंतर्राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों में जनसंचार माध्यमों में सर्वेक्षण संबंधी खबरों के प्रकाशन के में सर्वेक्षण लिए कम-से-कम प्रणाली संबंधी सात तत्वों लिए कम से के होने की संस्तुति की गई है। फिर भी, के हो? औसतन इन तत्वों की मौजूदगी बहुत ही और कम (0.5 से 2.5 के बीच) ही रहती है। 


जनमत सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई खबरों को प्रस्तुत करते समय मीडिया जो भूमिका अदा करता है, उसका मूल्यांकन करने के लिए तीन तत्वों पर जोर देना पड़ता है। जनमत सर्वेक्षण की विश्वसनीयता, जनमत सर्वेक्षण की खबरों में व्यक्तिपरकता और जनमत सर्वेक्षण की तुलनाओं का इस्तेमाल । पहले पहलू के संबंध में यह बात सामने आती है कि मीडिया खबरों में सर्वेक्षण की प्रणाली का किस तरह से मूल्यांकन करता है, उससे मतदान के नतीजों की विश्वसनीयता बनाने में मदद मिलती है। (पालेज ए-आल-1980, चच-503-504) लेखों में सर्वेक्षण की प्रणाली के मूल्यांकनात्मक निष्कर्ष की कमी से यह निष्कर्ष निकलता है कि सर्वेक्षण के नतीजों का इस्तेमाल फ्लैंडर्स अखबार अच्छी तरह से जांच परख के बिना कर रहे हैं। यह बात पहले किए इन शाधपत्री जनता को सचेत करने की बजाय उन्हें यकीन दिलाया जाता है कि मीडिया की खबरों में सर्वेक्षण की आलोचनाएं नहीं होती(पालेज ए पक्षण आल, 1980, एण्डरसन, 2000) लेकिन ५ जब किसी सर्वेक्षण को व्यवस्थित ढंग से जांचा परखा गया, तो लगभग 31 प्रतिशत सर्वेक्षण संबंधी लेखों में तो उनके तौर • तरीकों को विश्वसनीय होने के बजाय अविश्वसनीय पाया गया। सबसे ज्यादा नकारात्मक तस्वीर चुनाव संबंधी सर्वेक्षणों की उभर कर आई। और इस पहल को उजागर करने वाले अकादमीशियन और राजनीतिज्ञ जैसे बाहरी कारक थे ।


राजनीतिज्ञ जैसे बाहरी कारक थे । सर्वेक्षण संबंधी लेखों में खबरनवीसी के सामान्य तरीकों को परखने से यह मालूम होता है कि सर्वेक्षण के नतीजों की 'वस्तुपरक' सूचना देना ही मुख्य लक्ष्य था, क्योंकि नतीजों को ठीक उसी तरह पेश किया गया था। समाचारपत्रों के लेखों में सर्वेक्षण की व्यक्तिपरक व्याख्याएं भी देखने को मिली, पर वे प्रभावशाली ढंग की नहीं थी। सर्वेक्षण की खबरों में व्यक्तिपरकता के बढ़ने का. मतलब होता है मीडिया द्वारा अपनी खबरों में सर्वेक्षण का सक्रिय रूप से इस्तेमाल करना है। इस अवधारणा को हमें सही परिप्रेक्ष्य में रख कर देखना पड़ेगा, क्योंकि इस अध्ययन में शामिल खबरों में व्यक्तिपरकता की वृद्धि का कोई संकेत नहीं था |


तीसरा पहलू जिस पर हम विचार कर रहे हैं वो यह है कि मीडिया जनमत सर्वेक्षण. प्रस्तुत करते समय सर्वेक्षणों की तुलनाएं किस तरह करता है। सर्वेक्षणों पर लिखे गए लेखों में से 45 प्रतिशत लेखों में सर्वेक्षणों के नतीजों की तलना दसरे सर्वेक्षणों या फिर चनावों के परिणामों से की गई थी। जब सर्वेक्षणों की आपस में तलना भी की गई तो एक जैसे पो सर्वेक्षणों से ही की गई जिनमें सर्वेक्षक भी एक जैसे ही थे और विषय- वस्तु भी एक जैसी थी। सिर्फ उनके वक्त में मोटा पीछे का अंतर था। तुलनाओं के बाद जो फर्क सामने आए जनमत में वास्तविक फर्क के तौर पर प्रस्तुत तुलनाओं के बाद जो फर्क सामने आए उन्हें किया गया। इस किस्म के निष्कष बार जनमत में वास्तविक फर्क के तौर पर प्रस्तुत शोध पर आधारित अपेक्षाओं के अनुरूप हा किया गया। इस किस्म के निष्कर्ष ब्रोह के शाध पर आधारित अपेक्षाओं के अनुरूप ही थेइसका अर्थ यह हुआ कि मीडिया जनमत सर्वेक्षण में जनता की राय में स्थिरता के बजाय अस्थिरता लाने की कोशिश करता है और इस तरीके से 'जनता के मत' में बदलाव पर लगातार जोर देता है। नतीजतन, हर नया सर्वेक्षण खबर बनता है क्योंकि वह पिछले वाले सर्वेक्षण से भिन्न नतीजे देता है या उसी तरह के नतीजों का बदलाव या रूझान के रूप में व्याख्या करके सर्वेक्षण पर खबरनवीसी के जरिए 'आम जनता की राय' को एक खास अंदाज में पेश करने में मददगार साबित होता है। 


 


 


 


 


Thursday, May 28, 2020

सर्वेक्षण के आंकड़े और जनता की राय

आकड़ों पर आधारित पत्रकारिता का चलन पिछले एक दशक के दौरान तेजी से बढ़ा हैआंकड़ों का महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है या उनकी व्याख्या किस तरह से की जा रही है। आंकड़ों का एक स्त्रोत विभिन्न तरह के सर्वेक्षण या अध्ययन होते हैं। इन सर्वेक्षणों या अध्ययनों से जो आंकड़े तैयार किए जाते हैं, उनको कई बार मीडिया संस्थान खबरों के रूप में पेश करते हैंसर्वेक्षण कंपनियां चुनाव के दौरान ओपिनियन पोल या एग्जिट पोल करती रही हैं या फिर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनने को लेकर सर्वेक्षण करती है। इन कंपनियों के एग्जिट पोल पर उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि ये एग्जेक्ट पोल नहीं है। लेकिन इन सर्वेक्षणों को लोगों की राय के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है। 


इस अध्ययन में सर्वेक्षण कंपनी के सर्वे को मीडिया द्वारा प्रस्तत करने के तौर-तरीकों, सर्वेक्षण को करने के लिए अपनायी जाने वाली अध्ययन पद्धति (मसलन- किस तरह के सवाल पूछे गए. 500 असम के लोगों के अलावा बाकी 2500 लोग जिनको सर्वेक्षण ल किया गया उनके बारे में जानकारी) र सवेक्षण के उद्देश्यों की पड़ताल करने की कोशिश की जायेगी।


मीडिया द्वारा सर्वेक्षण की खबरों के रूप में प्रस्तुति


आईएएनएस-सीवोटर ने 17 से 19 दिसंबर दिसंबर 2019 के दौरान एक स्नैप पोल में नमूने के तौर तीन हजार लोगों के बीच एक सर्वेक्षण किया, इस सर्वेक्षण में असम से सबसे अधिक लोग यानी कि 500 लोगों को शामिल किया गया। इस सर्वेक्षण के आंकड़ों को कई मीडिया संस्थानों ने 21 दिसंबर 2019 को खबरों के रूप में प्रस्तुत किया। यहां नमूने के तौर पर आजतक, दैनिक जागरण, दैनिक हिन्दुस्तान और आउटलुक मैग्जीन की वेबसाइट के शीर्षक को देखा जा सकता है|


आज तक का शीर्षक- भारत में 62 प्रतिशत लोग सीएए के समर्थन में, असम के 68% लोग विरोध में-सर्वे


दैनिक जागरण अखबार की वेबसाइट का शीर्षक- देशभर में 62 फीसद लोग नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में सर्वे


दैनिक हिन्दुस्तान अखबार की वेबसाइट - का शीर्षक- देशभर में 62% लोगों ने CAA और NRC किया समर्थनः सर्वे'


आउटलुक पत्रिका की वेबसाइट का शीर्षक- 62% people across India support CAA: Surveys


इस सर्वेक्षण की खबर को आजतक, दैनिक जागरण, आउटलुक ने 21 दिसंबर 2019 को अपनी वेबसाइट पर लगाया जबकि हिन्दुस्तान ने 22 दिसंबर 2019 को अपनी वेबसाइट पर यह खबर दी। आजतक, दैनिक जागरण और आउटलुक ने शीर्षक में लिखा है कि 62 फीसदी लोग नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन में हैं जबकि दैनिक हिन्दुस्तान ने 


खबर को शीर्षक चुपके से सीएए के साथ ही एनआरसी जोड़ दिया और लिखा कि 62 प्रतिशत लोग सीएए और एनआरसी का समर्थन करते हैं। इन शीर्षकों में एक और महत्वपूर्ण बात देखने को मिलती है कि इन सभी मीडिया संस्थानों ने अपने शीर्षक में लिखा है - देशभर में या भारत में यानी इस सर्वेक्षण को देशभर में किए जाने के रूप में प्रचारित किया।


आज तक की खबर का इंट्रो नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर मचे बवाल के बीच हुए एक सर्वे में बड़ी संख्या में लोगों ने सीएए को समर्थन किया है। इस सर्वे में देश के 6 प्रतिशत लोगों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का समर्थन किया हैवहीं जराग के 68 प्रतिशत लोग इस कानून के खिलाफ हैं। आईएएनएस-सीवोटर सर्वेक्षण में शनिवार को इस बात की जानकारी सामने आई |


आउटलुक की खबर का इंट्रो- About 62 per cent of the citizens of the coun. try are In favour of the citizenship Amendment Act, while about 68 por' cent citlaens In Assam are against the Act, according to a IANS&CVoter snap poll released on Saturday.


दैनिक जागरण की खबर का इंट्रो- देश भर के करीब 62 फीसद लोग नागरिकता' संशोधन कानून का समर्थन करते हैंकेवल असम के करीब 68 फीसद लोग इसके खिलाफ हैं। 55.9 फीसद लोगों का मानना है कि सीएए और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) केवल घुसपैठियों के खिलाफ है, जबकि 31.9 फीसद इसे मुस्लिगों के खिलाफ मानते हैंदेश भर के करीब 6.5.4 फीसद जीर असम के 76.0 फीसद लोग चाहते हैं कि एनआरसी पूरे देश में लागू होना चाहिए | यह जानकारी आईएएनएस द्वारा शनिवार को जारी स्नैप पोल सर्वे में दी गई है |


दैनिक हिंदुस्तान की खबर का इंट्रो नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर कराए गए आईएएनएस - सीवोटर सर्वेक्षण में शनिवार को यह जानकारी सामने आई है कि क्षेत्रीय , राज्य और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर इन्हे लेकर जनता के बीच मतभेद है |


गौरतलब है कि आजतक और आउटलुक की खबर में नागरिकता संशोधन अधिनियम के संबंध में सर्वेक्षण किए जाने की बात कही गई है, जबकि दैनिक जागरण और दैनिक हिंदुस्तान ने अपने इंट्रो में नागरिकता संशोधन अधिनियम के साथ राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनजारसी) को भी शामिल कर लिया है। यहाँ पर चार मीडिया संस्थानों में से दो मीडिया संस्थान लिखते हैं कि सर्वे सीएए और एनजारसी को लेकर हुआ जबकि बाकी दो मीडिया संस्थान लिखते हैं कि सौ सीएए को लेकर हुआ। इससे पता चलता है कि सर्वेक्षण के विषय को लेकर "ी गीडिया संस्थानों के बीच अस्पष्टता है |


पहले यह समझा जाना चाहिए कि स्नैप पोल होता क्या है। स्नैप पोल आमतौर पर महत्वपूर्ण मुद्दों पर लोगों के मिजाज की जांच करने के लिए एक अल्प अवधि सूचना के भीतर किया जाता है, जो राजनीतिक, आर्थिक आदि हो सकते हैंस्नैप पोल शीघ्रता से तुरंत उपयोग के लिए जानकारी एकत्र करते हैं"


सर्वेक्षण करने के तौर-तरीकों पर सवाल इस सर्वेक्षण की खबरों में कहीं भी सर्वेक्षण करने के तौर-तरीका जैसे सर्वेक्षण के सवाल,राम को अलावा अन्य राज्य में कितने कितने लोगों को समान में शामिल किया गया, यह जानकारी नहीं मिलती है। समाजकंपनिया गाण में शामिल लोगों को और को गोपनीय बनाए रखने की कोशिश करती हैं, जिसके कारण इनके सर्वे की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।


किसी भी अध्यन या सर्वेक्षण को समझाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है कि उसकी अध्ययन की पद्धति को समझा जाए। खासकर, अखिल भारतीय स्तर पर अध्ययन करके निष्कर्ष प्रस्तुत करने का दावा करने वाली किसी भी पड़ताल की अध्ययन-पद्धति को समझना आवश्यक हैइसरो पाठकों और अन्य अनुसंधानकर्ताओं को इस अध्ययन के दायरे और इसकी सीमागों को समझने में सहायता मिलती है।'


अध्यन पद्धति में भी दो चीजें सबसे महत्वपूर्ण होती हैं। पहला, नमूने का आकार (सैंपल साइज) और दूसरा, पूछे जाने वाले.सवाल। 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान एबीपी न्यूज और नीलसन ने लगभग 1-189 लोगों के बीच स्नैप पोल सवें द्वारा यह जानने का प्रयास किया था कि दिल्ली का मुख्यमंत्री कौन बनेगा। इसी संदर्भ में वोटर्स मूड रिसर्च (वीएमजार) के डायरेक्टर तणित प्रकाश कहते हैं कि 'गुजरात में छह करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। लेकिन हमारा हाल ही में किया गया चुनावी सर्वे सिर्फ छह हजार लोगों पर था।" जब एक राज्य का मुख्यमंत्री कौन बनेगा यह जानने के लिए इसी तरह के सने में 1489 लोगों के शामिल किया जाता है और एक राज्य में अन्य सर्वे के दौरान 6,000 हजार लोगों को शामिल किया जाता है, तो सीएए जैसे संवेदनशील मसले पर महज 3,000 लोगों के बीच सर्वेक्षण करके उसे देशभर में किए जाने का दावा क्यों किया गया। इस संदर्भ में रॉयल स्टैटिस्टिकल सोसाइटी की डॉ. रोजर्स कहती हैं कि जिन लोगों को सर्वेक्षण में शामिल किया जाता है, उनकी संख्या को देखना महत्वपूर्ण होता है। वह कहती हैं कि अगर मैं लोगों के अलग-अलग नमूने लेती हूं, तो मुझे हर बार एक ही जवाब नहीं मिलेगा। उनका कहना है कि, "मेरे सैम्पल का आकार जितना बड़ा होगा, मेरा परिणाम उतना ही ज्यादा विश्वसनीय होगायदि मझे केवल अपने नमूने के तौर पर कम संख्या में लोगों मिले हैं तो यह एक जवाब के रूप में विश्वसनीय नहीं होगा और इसे कई किस्म की अनिश्चितताओं से जूझना होगा। 


सर्वेक्षण से तैयार किए गए आंकड़े एक बड़े तबके का प्रतिनिधित्व करने का एहसास कराते हैंजैसे कि आईएएनएस-सीवोटर के सर्वे के आंकड़े के नतीजों में कहा जाता है कि 62 प्रतिशत लोग सीएए के समर्थन में हैं। ये मत 62 प्रतिशत देश की आबादी का नहीं है बल्कि महज 3,000 लोगों में 62 प्रतिशत का मत है। सैंपल साइज जितना छोटा होगा, वह उतना ही बड़े आंकड़े का एहसास करायेगा। एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं- 100 लोगों के बीच एक सर्वेक्षण किया जाए, तो 60 लोगों की उस विषय में सहमति को 60 प्रतिशत के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, लेकिन अगर यही सर्वेक्षण 1000 लोगों के बीच किया जाए तब 60 लोगों के बजाए 600 लोगों की उस विषय पर सहमति होने पर ही 60 प्रतिशत का आंकड़ा आयेगा। यानी जितना छोटा सैंपल साइज होगा, उसे उतने ही बड़े आंकड़े के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा। ज्यादा लोगों को सर्वेक्षण में शामिल करने से ही सेंपल साइज को सटीक नहीं कहा जा सकता। सैंपल साइज में इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अलग-अलग लिंग, वर्ग, आय, शिक्षा, पेशे वाले लोग हों |


सर्वेक्षण के सवाल


इस तरह के सर्वेक्षणों के लिए ऐसे सवालों को तैयार करने की कोशिश की जाती है जिनका जवाब सिर्फ हां या ना में लिया जा सके। डॉ. रोजर्स कहती हैं कि यदि आप देखते हैं कि 70 प्रतिशत महिलाएं सहमत हैं, तो मैं हमेशा पूछती हूँ उनसे क्या सवाल पूछा गया? और पता चलता है कि "सर्वे करने वालों ने इन महिलाओं से कहा कि क्या आप इस कथन से सहमत हैं?" 


वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि ज्यादातर लोग सिर्फ टिक करेंगे कि हां मैं इससे सहमत हूं। यदि उनसे एक सवाल किया जाए जैसे- “यह शैम्पू आपके बालों को कैसा महसूस कराता है?" तो वे अलग जवाब दे सकती हैं।" ज्यादातर सवाल इसी तरह के पूछे जाते हैं कि क्या आप इस कथन से सहमत हैं, उदाहरण के लिए आप इस तरह के जवाबों को आकार और उसे आंकड़ों के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।"


क्या इस तरह के सवालों को आधार बनाकर एक सर्वेक्षण करके उसके नतीजों को विश्वसनीय कहा जा सकता है? ऐसे सवालों से क्या लोगों की राय को जाना जा सकता है, जिसमें सिर्फ सहमत्-या असहमत होने का विकल्प हो।


सर्वेक्षण का उद्देश्य और उसकी खबर की टाइमिंग मोटेतौर पर देखे तो इस तरह के सर्वेक्षण चुनावों के दौरान ही किए जाते हैं। लेकिन इस बार यह सर्वेक्षण उस मुद्दे पर किया गया जिसके विरोध में देश के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। 16 दिसंबर की शाम, नगांव और चबुआ में एक विरोध प्रदर्शन में 10,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। जब किसी मुद्दे पर हजारों की संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हों। उस समय तीन हजार लोगों के बीच एक सर्वे करके उसको देशभर में किए गए सर्वेक्षण के रूप में प्रचारित करने को कैसे पूरे देश का जनमत कहा जा सकता है? घल्कि इस तरह के सर्वेक्षण जनता की राय न होकर सरकार के हितों की पूर्ति करने वाले ज्यादा दिखते हैं |


सीएए के समर्थन में नतीजे नहीं, तो पोल डिलीट यहां एक और बात महत्वपूर्ण है कि इस सर्वेक्षण को मीडिया ने काफी तवज्जो दी। लेकिन सीएए को लेकर अन्य ऑनलाइन पोल (ऑनलाइन सर्वेक्षण) भी संस्था या पत्रकारों ने किए। जी न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी ने भी 24 दिसंबर 2019 को अपने ट्विटर अकाउंट पर एक पोल शुरू किया था और पूछा कि क्या भारत की जनता सीएए का समर्थन करती है या नहीं? इस पोल में 52 फीसदी यूजर्स ने सीएए के खिलाफ वोट कियाइसके अलावा सुधीर चौधरी ने ही फेसबुक अकाउंट पर भी एक पोल किया था और वहां भी 61 फीसदी वोट इसके खिलाफ पड़े। लेकिन 4 दिन बाद चौधरी ने दावा किया कि उनके ट्विटर पोल के साथ छेडछाड़ चुनावों के दौरान ही किए जाते हैं। लेकिन इस बार यह सर्वेक्षण उस मुद्दे पर किया गया जिसके विरोध में देश के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। 16 दिसंबर की शाम, नगांव और चबुआ में एक विरोध प्रदर्शन में 10,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। जब किसी मुद्दे पर हजारों की संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हों। उस समय तीन हजार लोगों के बीच एक सर्वे करके उसको देशभर में किए गए सर्वेक्षण के रूप में प्रचारित करने को कैसे पूरे देश का जनमत कहा जा सकता है? घल्कि इस तरह के सर्वेक्षण जनता की राय न होकर सरकार के हितों की पूर्ति करने वाले ज्यादा दिखते हैं | 



सीएए के समर्थन में नतीजे नहीं, तो पोल डिलीट


यहां एक और बात महत्वपूर्ण है कि इस सर्वेक्षण को मीडिया ने काफी तवज्जो दी। लेकिन सीएए को लेकर अन्य ऑनलाइन पोल (ऑनलाइन सर्वेक्षण) भी संस्था या पत्रकारों ने किए। जी न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी ने भी 24 दिसंबर 2019 को अपने ट्विटर अकाउंट पर एक पोल शुरू किया था और पूछा कि क्या भारत की जनता सीएए का समर्थन करती है या नहीं? इस पोल में 52 फीसदी यूजर्स ने सीएए के खिलाफ वोट कियाइसके अलावा सुधीर चौधरी ने ही फेसबुक अकाउंट पर भी एक पोल किया था और वहां भी 61 फीसदी वोट इसके खिलाफ पड़े। लेकिन 4 दिन बाद चौधरी ने दावा किया कि उनके ट्विटर पोल के साथ छेडछाड़ की गई है और कहा कि ट्रोल्स ने असली जनता की राय को हाईजैक कर लिया हैएक अन्य ऑनलाइन पोल सद्गुरु जग्गी वासुदेव की संस्था ईशा फाउंडेशन ने ट्विटर पर शुरू किया था। 30 दिसंबर को शुरू किए गए इस पोल में यूजर्स से पूछा गया था कि क्या उनके मुताबिक CAA-NRC के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन सही हैं? इस पोल के साथ ही सद्गुरु का वीडियो भी पोस्ट किया गया था, जिसमें वो दोनों कानूनों के बारे में बता रहे हैं। लेकिन यह पोल ट्विटर से गायब हो गया। इस पोल में 62 फीसदी लोगों ने विरोध-प्रदर्शनों के समर्थन में वोट किए, जबकि 38 फीसदी ने इन . प्रदर्शनों को गलत ठहराया। एक और ट्विटर पोल हिंदी अखबार दैनिक जागरण के अकाउंट से भी शुरू किया गया थाइसमें सवाल था- 'क्या सीएए का विरोध वोट बैंक की राजनीति का नतीजा है?' यहां भी प्रदर्शन के समर्थक हावी रहे। 54 फीसदी यूजर्स ने इसका जवाब 'ना' में दिया जवाब 'ना' में दियाहालांकि दैनिक जागरण ने अपना पोल और उसके नतीजे नहीं हटाये।


यहां देखा जा सकता है कि ईशा फाउंडेशन, जी न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी और दैनिक जागरण के पोल के नतीजे सीएए के समर्थन में नहीं आये। इन पोल के नतीजों को आईएएनएस-सीवोटर के नतीजों की तरह मीडिया संस्थानों द्वारा पेश नहीं किया गया क्योंकि ये नतीजे सीएए के . विरोध में थे। हालांकि कुछ ऑनलाइन पोर्टल पर इन पोल के डिलीट होने की खबरें जरूर दी गई। पहले सरकार की आलोचना करने वाली खबरों को मीडिया संस्थानों द्वारा हटाया गया। अब सरकार के कामकाज या सीएए पर किए गए पोल को भी मीडिया संस्थान प्रस्तुत करने से बच रहे हैं।


नागरिकता संशोधन कानून को लेकर आईएएनएस-सीवोटर के सर्वे से लेकर ईशा फाउंडेशन, जी न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी और दैनिक जागरण के पोल से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि जिन सर्वेक्षण के नतीजे सत्ता के अनुकूल होते हैं, उन्हें प्रस्तुत किया जाता है। जिन सर्वेक्षण के नतीजे सत्ता के अनुकूल नहीं होते हैं उन्हें दबाने की कोशिश की जाती हैआईएएनएस-सीवोटर द्वारा हड़बड़ी में छोटे सैंपल साइज को आधार बनाकर सर्वेक्षण करने से पता चलता है कि यह सर्वेक्षण लोगों की राय जानने के बजाए सत्ता के अनुकूल नतीजों को प्रस्तुत करने के लिए किया गया था।


किसी भी मुद्दे पर सर्वेक्षण या अध्ययन का अपना महत्व होता हैखासकर जब किसी अध्ययन या सर्वेक्षण के लिए यह दावा किया जाए कि उसे देशभर के लोगों के बीच किया गया है, तब उस अध्ययनया सर्वेक्षण की लोगों के लिए उपयोगिता और बढ़ जाती है। आम लोगों, शोधार्थियों और संचार के माध्यमों द्वारा उस सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता हैं। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि जब भी इस तरह के सर्वेक्षण या अध्ययन को प्रस्तुत किया जाए, तो उसकी अध्ययन पद्धति के बारे मेंपूरी जानकारी दी जाए, ताकि उसकी विश्वसनीयता पर सवाल न उठे।


प्रचार की भूमिका और 7 विधाएँ 

द्वारा समाज के व्यक्तियों के तरह प्रचार के द्वारा समाज का यथा पचार एक मनोहार जिसके समाज के वाकियों की सोच या ' (जनमत) पर प्रभाव लाता है। इस कद्वारा समाज का यथा आवश्यक म नियंत्रण किया जाता है। इस प्रकार प्रचार एक प्रयास है ताकि जनमत का दिशा का निर्धारण इच्छित एवं पूर्व निर्धारित लक्ष्य पाने के लिए हो सकता है। सभी सामाजिक वैज्ञानिक मानते हैं कि प्रचार एक मनोवैज्ञानिक साधन है। मनोविज्ञान का अर्थ मन का विज्ञान हुआ अर्थात मन की भावनाओं को समझना है। यदि हम जनमत को इच्छा के अनुरूप निर्धारण करना चाहते हैं तो प्रचार का मनोविज्ञान समझना होगाइसके लिए व्यक्ति एवं समाज का चेतन, अवचेतन एवं अवचेतन एवं अचेतन-सचेतनता की तीनों अवस्थाओं का अध्ययन कर तीनों अवस्थाओं पर प्रभावित करना होगा। 


सत्ता व्यवस्था पर आरोप लगता है कि सत्ता चाहती है कि जनता का पेट खाली रहे क्योंकि खाली पेट वाले दिमाग में विचार प्रक्रिया निरस्त रहती है। खाली पेट वाले पहले पेट भरने के जतन में व्यस्त रहते हैं, विचार प्रक्रिया ठप रहती है। ऐसी अवस्था में शिक्षा का कोई अर्थ नहीं होता और तब प्रचार के कुछ आसान एवं सस्ते तरीके मिल जाते हैं। जनता के सामने धुंध पैदा करनी होती है ताकि अस्पष्ट स्थिति में सत्ता पक्ष के प्रचार तंत्र जनता को बहला सके, ऐसा भी आरोप लगता हैजनता तमाशबीन होती है और तमाशा/नौटंकी में तालियां खूब बजती हैं। इन तमाशा, नौटंकियों में जनता की अवचेतन की कमजोरियों का ही दोहन किए जाने का आरोप लगाया जाता है | 


प्रत्यक्ष प्रचार को चेतन प्रचार तथा अप्रत्यक्ष स्तर का प्रचार भी कहा जा सकता है। प्रत्यक्ष प्रचार में लोगों को प्रचार करने वालों के उद्देश्य का पता होता है। जैसे अमुक सामान या सेवा उत्तम है या अमुक राजनीतिक दल अच्छा है। लेकिन प्रत्यक्ष प्रचार में प्रचार करने वाले के बारे में उद्देश्य का पता नहीं रहता तथा यह भी पता नहीं होता कि यह प्रचार भी है। भारत में वर्ष 2016 में की गई नोटबंदी को कुछ लोग प्रत्यक्ष प्रचार की श्रेणी में, तो कुछ लोग इसे अप्रत्यक्ष प्रचार की श्रेणी में रखते हैं। कुछ लोग इसे प्रचार की श्रेणी में ही रखे जाने पर आपत्ति व्यक्त करते हैं कि यह एक आर्थिक निर्णय था, प्रचार नहीं था। जबकि प्रत्यक्ष या अप्रत्क्ष प्रचार की श्रेणी में इस निर्णय को मानने वालों के अपने तर्क हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि सत्ता व्यवस्था ने इसके द्वारा निम्न आर्थिक एवं मध्यम वर्ग को जो बहुसंख्यक मतदाता है, को प्रभावित करने के लिए उनके अचेतन मनोवैज्ञानिक अवस्था का दोहन किया है। इस वर्ग ने अपने आर्थिक संकट के लिए उनके अनुसार घोषित शत्रु उच्च वर्ग को पस्त कर दिया, ऐसा माना जाता है कि ऐसी धुंध से जनता उस समय उत्साहित हो गई।


सकारात्मक एवं रचनात्मक प्रचार को शिक्षा का स्वरूप भी कह सकते हैं। वैसे शिक्षा एवं प्रचार दोनों को पूरक भी माना जा सकता है। क्योंकि शिक्षा के माध्यम से तर्कपूर्ण एवं उचित संदेशों के द्वारा अपने विचारों को जनता में आसानी से पहुंचाया जा सकता है। शिक्षा के माध्यम से छात्रों के अंदर मनोवैज्ञानिक प्रभाव के द्वारा उनके विचारों तथा व्यवहार को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करने का सचेतन प्रयास किया जाता है। इसी कारण विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में हस्तक्षेप कर जनमत को प्रभावित करने, खासकर नकारात्मक एवं विध्वासात्मक प्रभाव पैदा करने के आरोप लगाए जाते हैं। जनमत निर्धारण में शिक्षा का प्रभाव दीर्घकालीन होता है। इसी कारण हमारे ऐतिहासिक समाज में बहुसंख्यक समाज को शिक्षा से वंचित कर दिया गया तथा शिक्षित प्रचारक अपने गलत उद्देश्य की सामाजिक व्यवस्था थोपने एवं संचालित किए रहने में कामयाब रहे, जिसे अब दिमागी गुलामी भी कहा जाता है। जनमत का ऐसा प्रभाव होता है कि वह अपनी गुलामी को समझना और मानना ही नहीं चाहता, उसे फेंकना तो दूर की बात है। यहां प्रचार का अध्ययन भी आवश्यक है। शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति एवं समाज का समचित सर्वांगीण विकास संभव है। इसी कारण डॉ. अंबेडकर शिक्षा पर जोर देते रहते हैं। शिक्षा के व्यापक प्रचार प्रसार के लिए प्रचार के पहलुओं को समझकर अमल में लाने के लिए विचार करना होगा |


समय एवं उद्देश्य के अनुसार प्रचार मं...से भाषण देते हैं, पर्चे बांटते हैं, गाना सुनाते हैं, वीडियो दिखाते हैं, सोशल नेटवर्किंग का प्रयोग करते हैं। वर्ष 1937 में अमेरिकी जनता को शिक्षित करने के लिए प्रचार विश्लेषण संस्था- द इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोपेगेंडा ऐनालिसिस की स्थापना की गई। इस • व्यवस्थित अध्ययन से कई बातें सामने आईं। प्रचार में मनोवैज्ञानिक अवलोकन एवं विधियों का उपयोग करके मनुष्यों की मनोवृत्तियों तथा मानव व्यवहार को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया जा सकता है। प्रचार जानबूझकर किया जाता है, यह विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। प्रचार सुझावों के रूप में होता है। इसमें असत्यता और अस्पष्टता भी होती है। यंग किम्बल (A Handbook of Social Psychology, 1957) मानते हैं कि प्रचार के कार्य में सुझावों की मुख्य भूमिका होती है। सुझावों के विकल्पों के द्वारा व्यक्ति को इच्छित दिशा में धकेला जाता और उपलब्ध - विकल्प में ही एक को अपना मानता है और उसके समर्थन में जी जान से लगा रहता हैसवाल है कि आप भारत की किस व्यवस्था को पसंद करते हैं। सत्तर साल पुरानी व्यवस्था को या वर्तमान व्यवस्था को। यहां दो विकल्प हैं। आप इन दो विकल्पों में व्यवस्था की ..बात में असत्यता को तलाश सकते हैं। इस तरह यह सवाल आपके विचारों को एक हजार साल पुरानी व्यवस्था की दुर्दशा या उसके पूर्व की अवस्था की ओर जाने नहीं देता हैयानी दुर्दशा के अन्य कारणों की ओर ध्यान जाने से रोकता है और जनमत निर्धारण में अपनी भूमिका निर्धारित कर देता है।



प्रचार अध्ययन में उपरोक्त प्रचार विश्लेषण संस्था के द्वारा सात अन्य प्रचार विधाएं निम्न हैं।


1. Name-Calling Technique : इस विधि में प्रचारक अपने समर्थकों और अनुयायियों को अच्छे-अच्छे नामों के द्वारा अलंकृत करता है तथा विरोधियों को बुरे नामों एवं अलंकरणों से पुकारा जाता है। स्वयं को सच्चा राष्ट्रभक्त, देशप्रेमी, समाजवादी, हिंदूवादी तथा विरोधियों को देशद्रोही, अवसरवादी, शोषक, कालाधन वाला इत्यादि कहता हैइस प्रकार के नामों से कम पढ़े लिखे और भावुक लोग तुरंत प्रभावित होकर प्रचारक की बातों में आ जाते


2. Glittering Generalities : प्रचारक की प्रचार विधियों में प्रचारक लोक बातों, नारों के द्वारा जनता को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करता है। भारत की अधिकांश जनता मानसिक गुलाम और भावुक है। इस कारण जनता लोक लुभावन नारों में जल्दी आ जाती है। मसलन-'गरीबों की सरकार', 'आम आदमी की पार्टी', 'अच्छे दिन आने वाले हैं', 'मुफ्त राशन', 'दलित का . उत्थान' आदि।


3. Transfer : प्रचारक अपनी बात को .. जनता. तक पहुंचाने के लिए. अलौकिक शक्तियों के नाम का सहारा लेता है। अपने प्रचार में वह · देवी-देवता, पीर फकीर और जनसमुदायों में स्थापित महापुरुषों आदि का प्रयोग करता है। प्रचारक को पता होता है कि जनसमुदाय की भावना इन प्रतीकों से जुड़ी रहती है। अलौकिक शक्तियों में गंगा पूजा, डॉ. अंबेडकर और पटेल से जुड़े भावनात्मक स्थलों, संदेशों का उपयोग करते हैं।


4. Testomonial Method : इस विधि में प्रचारक तथा उनका समूह जाने माने, सम्मानित तथा स्थापित व्यक्तियों या संस्तुतियों को अपने पक्ष में करके दिखाते हैं। इससे यह साबित हो जाता है कि अमुक प्रसिद्ध व्यक्ति भी हमारे समर्थक थे या हम उनके ही समर्थक हैं। उदाहरण के लिए चुनाव के समय राजनीतिक दल अपने पक्ष में जनप्रिय छवि वाले को अपने पक्ष में दिखाते हैं। जैसे शाही इमाम, शंकराचार्य, अन्ना हजारे, फिल्मी सितारे या खिलाड़ी आदि।


5. simple Folkway : जनता की भावना को अपने पक्ष में नियंत्रित करने के लिए नेता या प्रचारक वे कार्य करते हैं जो जनता तथा जनसामान्य व्यक्ति लोकाचार में करते हैं। इससे जनता में यह संदेश जाता है कि हम भी आम जनता जैसे ही हैं और आपकी भावनाओं से सहानुभूति रखते हैं। दलितों के घर जाकर भोजन करना या महात्मा गांधी का अर्धनग्न बदन रहना या विपदा की घड़ी में शामिल होना आदि भी इसी का उदाहरण है। 


6. Card Stacking : छल-कपट तथा तोड़-जोड़ का प्रयोग किसी के कहे या किए गए कार्य को अपने लाभ के लिए व्याख्यापित किया जाता है। जैसे आरक्षण के संबंध में दिए गए व्यक्तव्य को भिन्न-भिन्न अर्थों में विभिन्न लोग प्रयोग करते हैं |


7. Bandwagon Technique : इस विधि में यह प्रचारित किया जाता हैं कि जनता का सहयोग व समर्थन “प्रचारक को प्राप्त हो रहा है अर्थात इस प्रविधि में भ्रामक विजय का . ढिंढोरा पीटा जाता है। इस प्रकार के ‘प्रचार में प्रचारक यह सिद्ध करता है कि वह जो प्रचार कर रहा है, उसे बहुसंख्यक आबादी का समर्थन करता है। इसमें भ्रामक सार्वभौमिकता का प्रभाव दिखा कर जनता का ध्यान अपनी ओर केंद्रित किया जाता है। चुनाव के समय चुनावी सर्वेक्षण में किसी के पक्ष में मतदाता का रुख दिखाना मतदाता पर किसी के पक्ष में मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना है। प्रचार को सफल बनाने में मीडिया अत्या. महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत सभी स्थापित प्रिंट तथा डिजिटल मीडिया पर यथास्थिति बनाए रखने का गंभीर आरोप है। इसका ढांचा बहुसंख्यक का प्रतिनिधित्व भी नहीं करता है। वर्तमान समाज में युवाओं एवं सूचना तकनीक के कारण सोशल मीडिया और इंटरनेट की उपयोगिता बदलती जा रही है। उपरोक्त का अध्ययन कर समाज एवं भारत में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी अशिक्षा, मानसिक गुलामी, बीमारी, संकीर्णतावाद आदि दूर कर सुंदर, सफल, विकसित और सुसंस्कृत समाज बनाया जा सकता है और देश को आगे बढ़ाया जा सकता है |


 


 


यस बैंक के बहाने वित्तीय क्षेत्र के उदारीकरण की राजनीति व उसकी नाकामियां

आश्चर्य की बात यह है कि यह सब धोखाधड़ी, मनमानी और लूट ऐसे निजी बैंकों में चल रही थी, जिनके बारे में उदारीकरण और निजीकरण के पैरोकारों की दलील रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की काहिली, भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों का एकमात्र जवाब निजी बैंक और ___ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण है। सच यह है कि यस बैंक का संकट काफी हद तक_ नवउदारवादी आर्थिक सुधारों और उनके तहत अंधाधुंध आगे बढ़ाए गए उदारीकरण और निजीकरण का संकट है। लेकिन इस संकट के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही भाजपा और कांग्रेस शायद ही इस सच्चाई को स्वीकार करें |


क्षेत्र के बड़े और चर्चित बैंक-यस बैंक के डूबने और उसे संभालने के लिए रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप और उसके तहत सरकारी क्षेत्र के बैंक-भारतीय स्टेट बैंक को आगे करने के फैसले के साथ ही राजनाति भा शुरू हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के बीच यस बैंक के डबने के लिए एक-दसरे को जिम्मेदार ठहराने की जुबानी जंग तज हा गई है। भाजपा का आरोप है कि यस बैंक के दिवालिया होने के कगार पर पहुंचने के बीज कांग्रेस के नेतत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों, याराना पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज और भ्रष्टाचार के बोलबाले के दौरान ही पड़ गए थे। दूसरी ओर, कांग्रेस ने यस बैंक के डूबने के पीछे मोदी सरकार की वित्तीय संस्थाओं को संभालने में असता और सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराने में देर नहीं की। अन्य विपक्षी पार्टियां भी यस बैंक की बदहाली के लिए मोदी सरकार पर उंगली उठा रही हैं। .


मोदी सरकार और विपक्षी पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति अप्रत्याशित नहीं है। लेकिन इससे यस बैंक के संकट के वास्तविक कारणों और लेकिन इससे यस बैंक के संकट उसके लिए जिम्मेदार लोगों पर असल सवाल है कि हाल के महीनों में पहले पीएमसी बैंक और अब यस बैंक के दिवालिया होने की नौबत क्यों आई? यही नहीं, आईएलएंडएफएस और डीएचएफएल जैसी बड़ी नॉन-बैंकिंग फाइनैंस कंपनियां क्यों डूब गईं? 


सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी तू-तू, मैं-मैं से ज्यादा जरूरी सवाल है कि देश में वित्तीय क्षेत्र खासकर निजी और सरकारी क्षेत्र के कई बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों की हालत खराब क्यों है? सरकारी और निजी क्षेत्र के कई बैंक और नॉनबकिंग फाइनेंस कंपनियां डबे हए कों (एनपीए) के लगातार बढ़ते बोझ के कारण बेहाल क्यों हैं? सवाल यह भी है कि आखिर, बैंकिंग रेग्यूलेटर-रिजर्व बैंक और शेयर बाजार रेग्यूलेटर-सेबी से लेकर क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां, आंतरिक ऑडिटर और बोर्ड के स्वतंत्र निदेशक क्या कर रहे थे? उन्होंने खतरे की झंडी पहले क्यों नहीं दिखाई? इन निजी और सरकारी बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों को लंबे समय तक आम निवेशकों और जमाकर्ताओं की गाढ़ी कमाई के पैसे को मनमाने तरीके से इस्तेमाल करने की इजाजत क्यों दी गई? उनके खिलाफ कार्रवाई करने में इतनी देर क्यों हुई?



कड़वी सच्चाई


कड़वी कड़वी सच्चाई यह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष खासकर कांग्रेस इन सवालों के जवाब ईमानदारी से खोजने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि देश में वित्तीय क्षेत्र की मौजूदा बेहाल स्थिति और पहले. पीएमसी बैंक और अब यस बैंक के साथ-साथ कई नॉन-बैंकिंग फाइनैंस कंपनियों के संकट की जिम्मेदारी और जवाबदेही, दोनों की बनती हैंभाजपा और कांग्रेस, दोनों ही वित्तीय क्षेत्र के उदारीकरण और निजीकरण की पक्षधर रही हैं। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत शुरू आर्थिक सुधारों के पिछले तीन दशकों में दोनों पार्टियों ने अर्थव्यवस्था के इस सबसे बुनियादी लेकिन संवेदनशील क्षेत्र में उदारीकरण और निजीकरण को जोरशोर से आगे बढ़ाया। इसके तहत सरकारी बैंकों में विनिवेश के जरिए निजीकरण का रास्ता खोला गया, निजी बैंकों व नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों को प्रोत्साहित किया गया। उन पर नियंत्रण ढीला कर दिया गया। 



उन पर नियंत्रण ढीला कर यही नहीं, यूपीए सरकार के कार्यकाल में नवउदारवादी अर्थ नीति के तहत जीडीपी वृद्धि दर की रफ्तार को किसी भी तरह बढ़ाने और अधिक से अधिक तेज करने का व्यामोह (ऑब्सेशन) इस कदर हावी था कि वित्तीय क्षेत्र खासकर सरकारी और निजी बैंकों को कॉरपोरेट क्षेत्र में निवेश के लिए अधिक से अधिक, ज्यादातर मामलों में मनमाने तरीके से, कर्ज देने को प्रोत्साहित किया गया। ध्यान नहीं रखा गया कि जिन कॉरपोरेट्स को कर्ज दिया जा रहा है, उनका ट्रैक रिकॉर्ड क्या है? एक होड़ या कहिए कि लूट मची हुई थी। सब बहती गंगा में हाथ धोने में लगे हुए थे। कहीं कोई सवाल नहीं उठ रहा था कि यह क्या हो रहा है? चहंओर सिर्फ गुणगान था क्योंकि अर्थव्यवस्था यानी जीडीपी अपेक्षाकृत तेज गति से बढ़ रही थी। कहने की जरूरत नहीं कि जीडीपी की इस तेज 'कृत्रिम' रफ्तार में काफी हद तक योगदान इस नवउदारवादी अर्थ नीतिनिर्देशित कथित 'निवेश का भी था। यह आर्थिक विकास का नवउदारवादी मॉडल था, जिसमें बैंकों और दूसरी वित्तीय संस्थाओं को बिना किसी सवाला जवाब के कॉरपोरेट्स की सेवा में लगा दिया गया था। यूपीए सरकार कॉरपोरेट उद्यमियों और निजी क्षेत्र की पशु भावना' (एनिमल स्पिरिट) को जगाने में लगी हुई थी। मान लिया गया था कि बाजार का 'अदृश्य हाथ' और निजी क्षेत्र की प्रतियोगिता सब कुछ संभाल लेंगे।


नवउदारवादी आर्थिक रणनीति का नतीजा


मजे की बात यह है कि यह नवउदारवादी आर्थिक रणनीति कमोबेश मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में भी बदस्तूर जारी रही। लेकिन हकीकत यह थी कि कॉरपोरेट्स का एनिमल स्पिरिट' अत्यधिक जोखिम उठाने और काफी हद तक र जुए में बदल गया। यही नहीं, कई कॉरपोरेट्स और उद्यमियों ने राजनेताओंमंत्रियों-अफसरों से नजदीकी का फायदा उठाया और ऐसे में 'याराना पूंजीवाद' को फलने-फूलने का खूब मौका मिला। लेकिन यह एक गुब्बारा था, जिसे एक दिन फूटना ही था। इसकी हवा यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के आखिरी वर्षों में निकलने लगी थी। इसके बावजूद इसे न सिर्फ जान-बूझकर अनदेखा किया गया. बल्कि गुब्बारे में हवा भरने की कोशिशें जारी रहीं। उदाहरण के लिए यस बैंक के मामले को लीजिए जिसे एक समय देश में स्टार निजी बैंक और बैंकिंग क्षेत्र में सुधारों के चमकते उदाहरण के बतौर पेश किया गया था। यह बैंक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार के कार्यकाल के आखिरी महीनों में एनडीए सरकार के का शुरू हुआ। यूपीए सरकार के कार्यकाल में तेजी से बढते हए निजी क्षेत्र के टॉप बैंकों की सूची में पहुंच गया। मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में भी यस बैंक बिना किसी रोकटोक के उसी तेज रफ्तार से बढ़ता रहा। यस बैंक को 'सफल निजी बैंक' और 'कॉरपोरेट गवर्नेस' के अवार्ड मिलते रहे। लेकिन यस बैंक की चमकदार सफलता' की सच्चाई अब सामने आ रही हैरिपोर्टों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2014 तक यस बैंक के कुल नॉन-परफार्मिंग एसेट्स (एनपीए) यानी खराब कर्ज 55,000 करोड़ रुपये थे जो 2016 तक बढ़कर 98,000 और 2019 तक पहुंचते-पहुंचते 22,41,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गए। जाहिर है कि यह स्थिति मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही यहां तक पहुंची है, भले ही इसके बीज यूपीए सरकार के कार्यकाल में पड़ गए थे। ऐसा भी नहीं है कि यस बैंक की बिगड़ती स्थिति से मौजूदा सरकार वाकिफ नहीं थी। सच यह है कि बैंक के मनमाने और आपराधिक तरीके से कर्ज बांटने के बारे में पहली चेतावनी यूबीएस ने 2015 में ही जारी कर दी थी जब उसने रिपोर्ट दी थी कि यस बैंक ने अपनी कुल परिसंपत्तियों (नेट वर्थ) से भी ज्यादा कर्ज बांट दिया है, जिनमें से ज्यादा कर्ज ऐसी कंपनियों को दिया गया है, जो शायद ही उसे वापस लौटाएं।




जो शायद ही उसे वापस लौटाएं। जांच एजेंसियों के हवाले से आ रही रिपोर्टों से साफ है कि यस बैंक के प्रमोटर राणा कपूर खुद उन कंपनियों को कर्ज बांटने में शामिल थे जो न सिर्फ जोखिम भरे थे, बल्कि जिनके बारे में अंदेशा था कि ये कंपनियां शायद हीकर्ज लौटाएं। कई सौदों में कर्ज लेने वाली कंपनियों ने बदले में राणा कपुर के परिवारजनों की कंपनियों में भारी-भरकम रकम निवेश किया। हैरानी की बात नहीं है कि ऐसे ही एक और मामले में एक और स्टार निजी बैंकआईसीआईसीआई बैंक की बहुचर्चित सीईओ चंदा कोचर को बैंक से हटना : पड़ा है। दोहराने की जरूरत नहीं है कि ऐसा सिर्फ इन दो निजी बैंकों में ही र नहीं, बल्कि कई और निजी बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों में भी चल रहा था, जो अब अर्थव्यवस्था की सुस्ती और बिगड़ती स्थिति के बीच " खुलकर सामने आ रहा है। 


आश्चर्य की बात यह है कि यह सब धोखाधड़ी, मनमानी और लट ऐसे निजी बैंकों में चल रही थी जिनके बारे में उदारीकरण और निजीकरण के पैरोकारों की दलील रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की काहिली, भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों का एकमात्र जवाब निजी बैंक और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण है। सच यह है कि यस बैंक का संकट काफी हद तक नंवउदारवादी आर्थिक सुधारो, और उनके तहत अंधाधुंध आगे बढ़ाए गए उदारीकरण और निजीकरण का संकट है। लेकिन इस संकट के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही भाजपा और कांग्रेस शायद ही इस सच्चाई को स्वीकार करें।


अमेरिकी राष्ट्रपतियों का भारत आना


सोनू सूद : फिल्मों का खलनायक और असल ज़िंदगी का हीरो

जहाँ वो नंगे पैर अपने आशियाने की और भाग रहे थे वहाँ बाकि सब वायरस की राग गुनगुना रहे थे वो अपनी गरीबी के आलम में अंदर ही अंदर घुट गए वो पैसों से ही नहीं मदद से भी लुट गए |



अब मदद की बारी थी सबकी उम्मीदें जारी थी पूरा करने कोई तो आया जो भी उनका सपना था सबको समझ में आया फिल्मों का खलनायक सोनू सूद ही अपना था जहाँ सब मगरूर थे अपने कामों में वहाँ उसने कमान संभाली पहुँचाऊगा सबको घर मैं उनके उसने सबको जुबान ये दे डाली हर कोई परेशान था सबको अपने घर पहुंचना था बिना पैसे और साधन के एक डर भी खटकना था हर किसी ने संदेश भेजें उसने किसी की उम्मीद नहीं तोड़ी सबको घर पहुचाने की तसल्ली देकर एक नई उम्मीद जोड़ी करके बसों का इंतज़ाम पहुँचाकर सबको घर वो इंसानियत का वजूद बन गया देखो आज फिल्मों का खलनायक असल जिंदगी का हीरो बन गया।


ईश्वर


ईश्वर की खोज की बात ही गलत है। स्वयं को २ खोजो. ईश्वर मिलेगा। स्वयं को खोजो, ईश्वर तम्हें खोजेगा। स्वयं को न खोजा, लाख सिर पटको ईश्वर की तलाश में-और कुछ भी मिल जाए, ईश्वर मिलने वाला नहीं हैजो स्वयं को ही नहीं जानता, वह अधिकारी नहीं है ईश्वर को जानने का; उसकी कोई पात्रता नहीं है। पहले पात्र बनो।


आत्म-अज्ञान सबसे बड़ी अपात्रता है। वही तो एकमात्र पाप है। और सब पाप तो उसी महापाप की छायाएं हैं। और सारे पापों से लोग लड़ते हैं-क्रोध से लड़ेंगे, काम से लड़ेंगे, लोभ से लड़ेंगे, द्वेष से लड़ेंगे, मद-मत्सर से लड़ेंगे-और एक बात भूल ही जाएंगे कि भीतर अंधकार है। और ये सांप-बिच्छू उस अंधकार में पलते हैं। भीतर रोशनी चाहिए, प्रकाश चाहिए, आत्मबोध चाहिएध्यान की बात पूछो, ईश्वर की चर्चा ही मत उठाओ। ध्यान की बात पूछो, ईश्वर की चर्चा ही मत उठाओ। बीज बोए नहीं और फूलों की बात करने लगे! कहां से , फूल आएंगे? हां, प्लास्टिक के फूल मिल सकते हैं बाजार में। मंदिरों में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में, गिरजाघरों में प्लास्टिक के भगवान हैं, आदमी के गढ़े हुए भगवान . हैं। वे मिल सकेंगे। और अगर तुमने ज्यादा मेहनत की, - बहुत कल्पना को दौड़ाया, तो तुम्हारी कल्पना में भी धनुर्धारी राम का दर्शन हो जाएगा। सपना है वह, इससे ज्यादा नहीं। कि मोर-मुकुट बांधे हुए कृशण खड़े हो जाएंगे। वह भी तुम्हारी कल्पना है, इससे ज्यादा नहींजब तक तुम जागते नहीं हो भीतर, जब तक तुम भीतर : सोए हुए हो--उसी निंद्रा को मैं आत्म-अज्ञान कह रहा हूं-तब तक तुम जो भी करोगे, गलत ही होगा। विद्याधर, ईश्वर को क्यों खोजना है? ईश्वर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? और अगर ईश्वर तुमसे छिपना चाहता है...जरूर छिपना चाहता होगा, नहीं तो मिल जाता, खुद ही तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता। आखिर यह ताली दोनों तरफ से बजनी है, यह आग दोनों तरफ लगनी है। एक हाथ से ताली नहीं बजती। अगर परमात्मा तुम्हें नहीं खोजना चाहता है और भागा-भागा फिरता है, तो तुम कितना ही खोजो, तुम्हारी बिसात कितनी है? तुम्हारे हाथ कितने दूर जा सकेंगे? तुम्हारी पहुंच की सीमा है और वह असीम है। वह अपने को छिपा-छिपा लेगा। लेकिन लोग सोचते हैं यह बड़ी तात्विक बात है-ईश्वर को खोजना। अपने को खोजेंगे नहीं, ईश्वर को खोजने. के लिए राजी हैं। असली सवाल यह है: मैं हूं, तो क्या हूं? का हूं?


शाकाहार


आदमी को, स्वाभाविक रूप से, शाकाहारी होना चाहिए, क्योंकि पूरा शरीर शाकाहारी, भोजन के लिए बना है। वैज्ञानिक इस तथ्य को मानते हैं कि मानव शरीर का संपूर्ण ढांचा दिखाता है कि आदमी गैर-शाकाहारी नहीं होना . चाहिए। आदमी बंदरों से आया है। बंदर शाकाहारी हैं, पूर्ण शाकाहारी। अगर, डार्विन सही है तो आदमी को शाकाहारी होना चाहिए |


चाहिए। अब जांचने के तरीके हैं कि जानवरों की एक . निश्चित प्रजाति शाकाहारी है या मांसाहारीः यह आंतं पर 'निर्भर करता है, आंतों की लंबाई पर। मांसाहारी पशुओं के पास बहुत छोटी आंत होती है। बाघ, शेर इनके पास बहुत ही छोटी आंत है, क्योंकि मांस पहले से ही एक पचा हुआ भोजन है। इसे पचाने के लिए लंबी आंत की जरूरत नहीं है। पाचन का काम जानवर द्वारा कर दिया , गया है। अब तुम पशु का मांस खा रहे हो.। यह पहले से ही पचा हुआ है, लंबी आंत की कोई जरूरत नहीं है। आदमी की आंत सबसे लंबी हैइसका मतलब है कि आदमी शाकाहारी है। एक लंबी पाचन क्रिया की ..जरूरत है, और वहां बहुत मलमूत्र होगा जिसे बाहर..निकालना होगा। अगर आदमी मांसाहारी नहीं है और वह मांस खाता चला जाता है, तो शरीर पर बोझ पड़ता.है। पूरब में, सभी महान ध्यानियों ने, बुद्ध, महावीर, ने इस तथ्य पर बल दिया हैअहिंसा की किसी अवधारणा की वजह से नहीं, वह गौण बात है, पर अगर तुम यथार्थतः गहरे ध्यान में जाना चाहते हो तो तुम्हारे शरीर को हल्का होने की जरूरत है, प्राकृतिक, '' निर्भार, प्रवाहित। तुम्हारे शरीर को बोझ हटाने की - जरूरत है; और एक मांसाहारी का शरीर बहुत बोझिल होता हैजरा देखो, क्या होता है जब तुम एक पशु को मारते हो, क्या होता है पशु को, जब वह मारा जाता है? 


बेशक, कोई भी मारा जाना नहीं चाहताअगर कोई तुम्हें मारता है, तुम स्वेच्छा से नहीं मरोगे। अगर एक शेर तुम पर कूदता है और तुमको मारता है, तुम्हारे मन पर क्या बीतेगी? वही होता है जब तुम एक शेर को मारते हो। वेदना, भय, मृत्यु, पीड़ा, चिंता, क्रोध, हिंसा, उदासी ये सब चीजें पशु को होती हैं। उसके पूरे शरीर पर हिंसा, वेदना फैल जाती है। पूरा शरीर विष से भर • जाता है। शरीर की सब ग्रंथियां जहर छोड़ती हैं क्योंकि जानवर न चाहते हुए भी मर रहा है। और फिर तुम मांस खाते हो, वह मांस सारा विषं वहन करता है जो कि पशु द्वारा छोड़ा गया है। 


 


Wednesday, May 27, 2020

हिंदुत्व और हिंदू शब्द की राजनीति


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 27 दिसंबर, 2019 के अपने एक भाषण में कहा कि संघ भारत की 130 करोड की आबादी को हिदू समाज मानता है: 'भारत माता का सपूत चाहे वह कोई भी भाषा बोले. चाहे वह किसी भी क्षेत्र का को, किसी स्वरूप में पूजा करता हो या किसी भी तरह की पूजा में विश्वास नहीं करता हो, एक हिंदू है... 'इस संबंध में, संघ के लिए भारत के सभी 130 करोड़लोग हिंदू समाज है।" उन्होंने आगे कहाः 'एक प्रसिद्ध कहावत है विविधता में एकतालेकिन हमारा देश उससे एक कदम आगे है। सिर्फ विविधता में एकता नहीं बल्कि एकता की विविधता। हम विविधता में एकता नहीं तलाश कर रहे हैं। हम ऐसी एकता तलाश कर रहे हैं जिसमें से विविधता आए और एकता हासिल करने के विविध रास्ते हैं।' इस वक्तव्य में भागवत ने रवींद्रनाथ टैगोर के 1904 के प्रसिद्ध 'स्वदेशी समाज' नाम के निबंध को भी अपने कथन के समर्थन में उद्धृत करते हुए कहा, 'हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अंतर्निहित अंतर्विरोधों के बाद भी हिंदू समाज देश को एकजुट करने का रास्ता तलाशने में सक्षम है। यह भी कहा कि भारत देश परंपरा से हिंदुत्ववादी है। हालांकि यह टैगोर के निबंध से उद्धरण परी तरहसच नहीं है क्योंकि टैगोर इस निबंध में जब हिंदू समाज की बात करते हैं तो वह सिर्फ हिंद समाज की बात करते हैं न कि परे भारतीय समाज की |


इस बयान से कछ महीने पहले सितंबर. 2019 को भागवत ने ही कहा था कि किसी भी हिंदू को देश छोडकर नहीं जाना पडेगा। यह बयान उन्होंने असम की एनआरसी की रिपोर्ट के प्रकाशित होने के कही थी। सरसंघचालक के सितंबर वाले बयान से यह जाहिर है कि उनका यह आश्वासन सिर्फ हिंदुओं के लिए है और इसमें वे मुसलमान सामल नहीं हैं जिनका एनआरसी में नाम नहीं हाल ही में भारतीय संसद के द्वारा पारित किए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम में भी अप्रवासी को भारत की नागरिकता की बाहर रखा गया है, जबकि पाकिस्बांग्लादेश और अफगनिस्तान के अन्य धार्मिक समुदायों का यह अधिकार दिया गया है। 


भागवत के इन दो बयानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्टीय सेवक संघ हिंदू' शब्द का प्रयोग दो अलग-अलग अर्थों में कर रहा है। इसमें कुछ नया नहीं है बल्कि इस प्रकार के शब्दजाल और भ्रांतियां संघ-और आम तौर पर संघ परिवार के सभी घटक. जिसमें भाजपा भी शामिल है-दशकों से फैला रहा है। लइस कैरोल के मशहर चरित्र हम्प्टी-डम्पटी की तरह संघ भी शब्दों के अर्थों को अपने नियंत्रण में रखकर उनको अलग संदर्भो में अपनी जरूरत के हिसाब से अर्थ देना चाहता है, और वैसे भी उसका दो-मुंहे सांप वाला चरित्र जग जाहिर है। इसी प्रकार का शब्दार्थ का खेल संघ परिवार सेक्युलरिजम के अनुवाद केसाथ भी कई दशकों से इस आग्रह के साथ खेलता आ रहा है कि सेक्युलरिजम का सही अनुवाद पंथ-निरपेक्ष होना चाहिए न कि धर्म-निरपेक्ष ।इस आग्रह के पीछे तर्क यह दिया जाता है कि हिंदूइज्म एक पंथ नहीं बल्कि धर्म है लेकिन इसके साथ ही वैधानिक तौर पर जिस धर्म या पंथ को हिंदू जाना जाता है उसका कुछ और नाम भी देने को तैयार नहीं हैं जैसे की वैदिक पंथ या ब्राह्मण पंथ।


लेकिन अगर यह सिर्फ किसी शब्दजाल या शब्दार्थ संबंधी कोई भ्रांति होती तो शायद मामला उतना गंभीर नहीं होता।'हिंदू' शब्द के इस बहुआयामी प्रयोग की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है, जिसका संबंध सिर्फ आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद, हिदू राष्ट्रवाद और हिंदुत्व से गहरा संबंध है बल्कि जा हिंदुत्व की 'हिंदू' शब्द की राजनीति के केंद्र में है।


धर्म अध्ययन के प्रसिद्ध मित विद्वान अरविंद शर्मा ने अपने लेख ऑन हिंद, हिंदुस्तान, हिंदूइज्म, एंड हिंदुत्व में आ सिंधु' और 'इंडस' शब्दों के इतिहास 'हिंदू', 'सिधु विश्लेषण करते हुए दिखाया है कि इन शब्दों का विर से प्राचीन उपयोग- जैसे की पारसी, यूनानी, और चीनी स्रोतों में -भौगोलिक या क्षेत्रीय अर्थ में हुए । इस प्रयोग में इन शब्दों का अर्थ सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्रों के निवासियों के लिए होता था। लेकिन चीनी स्रोतों के साथ ही इनका अर्थ इस क्षेत्र के निवासियों के धार्मिक विश्वासों के वर्णन के रूप में भी होना शुरू हो..जाता है। यह एक नकारात्मक उपयोग था। जिसके अंतर्गत 'हिंद सिंध नदी के पूर्व के निवासियों के विभिन्न धार्मिक विश्वासों को दिया गया सामूहिक नाम था। इन्हीं दो अर्थों में हिंदूशब्द का प्रयोग 11वीं शताब्दी और उसके बाद के मुस्लिम, फारसी और आदी मिलता है अल-बरूनी-जो महमूद गजनी के साथ भारत आया था-की किताब अलहिंदमें भी इस शब्द का प्रयोग इन्हीं दो अर्थों में होता है। अल-बरूनी इस विमर्श में एक और पहलू जोड़ता है जो बीसवीं शताब्दी तकप्रचलित है। एक तरफ तो वह बौद्धों और वैदिक ब्राह्मण धर्म के मानने वालों के बीच भेदों को स्वीकार करते हैं, दूसरी तरफ वह न सिर्फ इन दोनों समुदायों को, बल्कि हिंदुस्तान के उन तमाम समुदायों को जो मुस्लिम नहीं हैं, हिंदूनाम देते हैंतत्कालीन हिंदुस्तान में विद्यमान तमाम धार्मिक मतों, संप्रदायों और विश्वासों और पूजा पद्धतियों के आंतरिक भेदों को स्वीकार करते हुए अलबरूनी उनको एकता के सूत्र में इस आधार पर भी पिरोने की कोशिश करते हैं कि वे सब हिंदू हैं जो पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं! 


पुनर्जन्म दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में भी धर्मों, मतों, विश्वासों और पूजा पद्धतियों की यह विविधता प्रचलित रहती है लेकिन इसके साथ ही इस काल में दो अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू इसमें जुड़ते हैं। एक तो यह कि हिंदू शब्द का इस्तेमाल- जो पहले सिर्फ गैर-हिंदू करते थे -हिंदुओं के द्वारा, अपने आपको चिह्नित करने के लिए होने लगा; यानी उनकी अपनी पहचान की चेतना को इंगित करने लगा।हिंद शब्द और अवधारणा के इतिहास के लिहाज से यह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। दूसरी तरफ इस्लाम धर्म और मुसलमानों केसंपर्क में आने से कछनई पजा पद्धतियां, विश्वास और संप्रदाय - जो इस संपर्क और मिश्रण से पैदा हुए - इस विविधता में जुड़ जाते हैं । उदाहरण के तौर पर गैरमुसलमानों द्वारा सूफी पीरों में विश्वास और मुसलमानों में जातियों का विकास।इसके साथ ही कुछ ऐसे समुदाय भी उभरे जिनको सीधेसीधे हिंदू या मुसलमान के खाकों में बांटना मश्किलें तब आसान नहीं था और ऐसी तमाम मुश्किलें तब सामने आई जब ब्रिटिश राज ने अपनी जनगणना में समदायों को धार्मिक आधार पर स्पष्ट खानों औपनिवेशिक काल से' रवानों त करना शुरू किया। माल से पहले हिंदू शब्द का या वैदिक धर्म के मानने वाले समदाय अपने लिए करना शुरू करते हैं और कुछ हद तक हिंदू सांस्कृतिक आत्म-चेतना का. विकास भी होता है, लेकिन वृहत्तर समाज को धार्मिक मतों, संप्रदायों, और पूजा पद्धतियों की विविधता और मिश्रण ही चरितार्थ करते रहे |


ही चरितार्थ करते रहेहिंदू शब्द के इतिहास में और हिंद सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के इतिहास में औपनिवेशिक शासन ने निर्णायक भूमिका निभाई जिसके दूरगामी परिणाम निकले। इस दृष्टि से औपनिवेशिक काल में हुए कुछ परिवर्तन निर्णायक सिद्ध हुए। 19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन ने सभी धर्मों के कानूनों में संशोधन कर सभी धार्मिक समुदायों को अखिल भारतीय स्तर पर वर्गीकृत किया और उनको एक स्पष्ट कानूनी पहचान देने का काम किया। वहीं दूसरी तरफ औपनिवेशिक जनगणना ने धर्म और जाति के आधार पर गणना कर धार्मिक और जाति समुदायों को स्पष्ट प्रशासनिक पहचान दी जिसके भारतीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़े। जनगणना की इन विधियों में उन मिश्रित पहचानों के लिए कोई जगह नहीं थी जैसे की गुजरात का एक समुदाय जो 'हिंदू-मोहम्मडन' के नाम से जाना जाता था। विभिन्न जनगणनाओं के दौरान इस तरह के बहुत सारे उदाहरण औपनिवेशिक प्रशासकों के सामने आए। राजनीतिक विमर्श की दृष्टि से औपनिवेशिक जनगणनाओं का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव बहुसंख्यक' और 'अल्पसंख्यक' श्रेणियों का आविर्भाव था। 20वीं सदी के पहले दशक में मुस्लिम लीग के बनने के बाद इन श्रेणियों का सीधा संबंध राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ गया जिस पर मोरले-मिंटो संवैधानिक सुधारों ने अपनी मोहर लगाकर भारतीय राजनीति में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता के आधुनिक राजनीतिक रूप को जन्म दिया।


प्रशासनिक और वैधानिक परिवर्तनों के साथ ही 19वीं सदी के शुरुआती दशकों से ही एक समानांतर विमर्श सभ्यता, संस्कृति और धर्म के सवालों पर केंद्रित था। इस विमर्श की पृष्ठभूमि. में औपनिवेशिक शासन का वह आख्यान था जिसे 'सिविलाइजिंग मिशन' के नाम भयान में भारत के सभी धर्मोंजिसे सिविल जाता विशेष विशेष तौर पर हिंदू धर्म-को असभ्य बताया गया और हिंदू समाज के पिछड़ेपन के लिए को जिम्मेदार ठहरायाइसी काल में ईसाई मिशनरी इस आख्यान का इस्तेमाल ईसाई धर्म प्रचार के लिए और धर्म परिवर्तन के लिए भी कर रहे थे । प्रतिक्रिया स्वरूप 19वीं सदी के शरुआती दशकों से ही मध्यवर्गीय और शिक्षित हिंदुओं में - विशेष तौर पर सवर्ण हिंदुओं मेंदो धाराएं धर्म के सवाल पर उभरती हैं: एक सुधारवादी आंदोलन की धारा और दूसरी धर्मसभाओं के रूप में जिसका जोर धर्म सुधार की बजाय धर्म बचाव पर रहा; हालांकि धर्म सभाएं भी पूरी तरह से समाज-सुधार की विरोधी नहीं थीं।इन धाराओं के आपसी विरोध के बावजूद दोनों धाराएं आधुनिक हिंदू धर्म का नेतृत्व करती हैं और विभिन्न रूपों में हिंदू आधुनिकता के जन्म और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं19वीं सदी में इन धाराओं के नेतृत्व जहां एक तरफ राममोहन रॉय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महादेव गोविंद रानाडे, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे दिग्गज समाज सुधारकथे, वहीं दूसरी तरफ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालगंगाधर तिलक सरीखेलेखक और राजनेता थे।


19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ये दोनों धाराएं सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में थीं। यह कहना भी पूरी तरह से सही नहीं है की इन दोनों धाराओं में सिर्फ विरोध है क्योंकि एक ऐसा दायरा भी है जिसमें ये दोनों धाराएं काफी कुछ साझा करती हैं। जैसे कि दोनों धाराओं में एक तरफ ईसाई मिशिनरियों का विरोध साझा जमीन है, वहीं दूसरी तरफ हिंदू पुनरुत्थानवादी पुट दोनों में विद्यमान है। जिस विमर्श को हम हिंदू राष्ट्रवाद के नाम से जानते हैं उसमें इन दोनों धाराओं का योगदान है। बाद में हिंद राष्टवाद के विमर्श में स्वामी विवेकानंद और श्री अरबिंदो ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 19वीं सदी के इन्हीं विमर्शों ने ही पहली बार 'हिंदइज्म' शब्द को भी अंग्रेजी में लोकप्रिय बनाया।कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि हिंदडज्म' शब्द का पहला इस्तेमाल राजा राममोहन रॉय ने 1816 माकन था जिसके बाद मैक्सम्यलर आदि संस्कृत प्राच्यवादी विद्वानों ने इसका प्रयोग किया। 19 सदी में हिंदुइज्म' जिसका हिंदी अनुवाद हिंदू-धर्म ही होना चाहिए न कि हिंदुत्व, हालांकि हिंदुत्ववादी इस फर्क को मिटाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं -- की अवधारणा का उदय और उसका इस्तेमाल 'हिंदू' और संबंधित शब्दों के इतिहास में और हिंदू सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के विकास में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।


इस लेख की विषयवस्तु की दृष्टि से 19वीं सदी के विमर्शों का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि इनमें हिंदू और 'हिंदुइज्म' का इस्तेमाल धर्म और क्षेत्रीय अर्थों के अलावा हिंदू सभ्यता और संस्कृति के तौर पर भी होने लगाजैसा कि बंकिम और टैगोर दोनों ने लिखा है कि सभ्यता (सिविलाइजेशन) और संस्कृति (कल्चर) दोनों अवधारणाएं पश्चिम की देन हैं और दोनों का आधुनिक काल से पहले भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल नहीं होता और न ही उनके लिए शब्द थे। लेकिन इन दोनों अवधारणाओं का सफल अनुवाद हुआ और दोनों का हिंदू राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद में महत्त्वपूर्ण योगदान है। बंकिम ने अपनी पुस्तक धर्मतत्वमें हिंदू धर्म को अनुशीलन (कल्चर का संस्कृति से पहले का बांग्ला अनुवाद) का पर्याय बताया है। सव्यसाची भट्टाचार्य ने अपनी किताब टॉकिंग-- बैक : द आइडिया ऑफ सिविलाइजेशन इन इंडियन नेशनलिस्ट डिस्कॉर्स में इस अवधारणा का विस्तार से विवेचन कर दिखाया है कि सभ्यता की अवधारणा का इस्तेमाल सभी महत्त्वपूर्ण राष्ट्रवादी चिंतकों ने भारतीय राष्ट्र के 'एकता का आधार के रूप में किया।


बेटी बनी कलियुग का श्रवण कुमार


किसी ने सच कहा है.... जिसके हौसले बुलंद और इरादे नेक होते है... उसके अंधेरे काले नहीं.... सफेद होते है...जी हां... सफर शुरु हुआ... सड़कों पर तपती गर्मी थी... डगर कठिन थी...मगर मंजिल पर जाना था...पैसों की कमी थी... घर दूर था... तो क्या हुआ... लेकिन घर तो जाना था...गर्मी भी थी... भूख भी थी...लेकिन घर तो जाना था..... इस दुनिया में सबसे बड़ी चीज भूख होती है... भूख के लिए इंसान एक ओर ना सही... सात समुंदर पार तक चला जाता है... रोटी के लिए वो अपने परिवार तक से दूर हो जाता है...किसी ने सच कहा है.... इंसान के लिए भूख से बड़ा मजहब और रोटी से बड़ा ईश्वर कोई नहीं होता....भूख के लिए रोटी से बड़ा इंतजार किसी भी चीज का नहीं है.. अपने बेगानों का भी नहीं यहां तक कि नफरत का भी नहीं है...लेकिन आइए आपको मिलवाते हैं.. कैसे बदनसीब रोटी जो इंतजार ही करती रह गई उसे उसे पता ही ना चला कि  कब भूख मर गई..कोरोना लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार प्रवासी मजदूरों पर ही पड़ी है.... काम धंधा बंद होने से उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया और वे घरों की तरफ कूच कर रहे हैं



लाख कोशिशों के बावजूद उनका पलायन रुक नहीं रहा है... मजदूर न केवल बस और ट्रेन से अपने गृह राज्य पहुंच रहे हैं बल्कि बड़ी संख्या में लोग पैदल, साइकल से या फिर ट्रक से भी रवाना हुए हैं....कभी पैदल.... कभी साइकिल और कभी ट्रक की सवारी करके पहुंचे इन बाप बेटी की कहानी...बेटियां पिता का मान-सम्मान होती हैं... तो वहीं बेटी के लिए एक पिता उसकी जिंदगी के सबसे पहले हीरो होते हैं.... बेटी और बाप के प्यार की एक कहानी जो आज सबकी जुबां है और जिसकी चर्चा  अमेरिका में भी हो रही है.... एक 15 साल की बेटी घायल पिता को अपनी पुरानी सी साइकिल पर बैठाकर दिल्ली से दरभंगा पहुंच गई.... पिता मोहन पासवान का कहना है कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है तो वहीं बेटी का कहना है कि मैं अपने पिता की बेटी नहीं, बेटा हूं.....बिहार के एक छोटे से गांव की बेटी दरभंगा के ज्योति कुमारी की हौसले की चर्चा आज हर जगह हो रही है....सिरहुल्ली गांव की ज्योति लॉकडाउन में पिता को लेकर साइकिल से गुरुग्राम से दरभंगा पहुंच गई... 12 सौ किमी के इस संघर्षपूर्ण सफर को उसने जिस हौसले के साथ पूरा किया है वो सराहनीय है |


रोटी से बड़ा इंतजार किसी भी चीज का नहीं 


 
इस दुनिया में सबसे ज्यादा इंतजार अगर किसी चीज का होता है तो वो खाना है... इस दुनिया में जहां भी जिस शक्ल में जिंदगी नजर आती है.. उसका पहला इंतजार होता है खाना.. इंसानों में इस खाने को कहते हैं रोटी.. रोटी से बड़ा इंतजार किसी भी चीज का नहीं है.. प्यार का भी नहीं.. रिश्ते नातों का भी नहीं.. अपने बेगानों का भी नहीं यहां तक कि नफरत का भी नहीं है
लेकिन आइए आपको मिलवाते हैं.. कैसे बदनसीब रोटी जो इंतजार ही करती रह गई उसे उसे पता ही ना चला कि  कब भूख मर गई.. सियासत के चश्मे से देखें आप तो भूख का मर जाना कोई हादसा नहीं.. हां अगर इंसान मर जाता तो सियासत के माथे पर पसीना आ जाता.. लेकिन कोई भूखा ना रहे यही तो कलमा है इसे पढ़कर मजह-ए-सियासत का पहला कदम रखा जाता है.. तो फिर इस तरह भूख के मर जाने पर उससे किसी गम की उम्मीद करना बेईमानी है


कोरोना के इस खौफ के बीच वो सब लोग इंसान कहलाते हैं.. जो सब अपने-अपने कमरों में बंद है और आप जो सड़कों पर ये हुजूम देख रहे हैं.. ये भूख है.. सड़क के किनारे- किनारे.. बस अड्डों के आंगन में.. रेलवे लाइन के साथ-साथ पटरियों के प्लेटफार्म पर..  ये जो कभी न खत्म होने वाली कतारें सुबह शाम रात दिन आपको दिखाई दे रही है.. ये भूख है जिसे खत्म करना है करना ही पड़ेगा.. क्योंकि हिंदुस्तान तभी आत्मनिर्भर बन सकेगा


भूख की अपनी एक दुनिया है साहब.. हमारी और आपकी तरह इनका भी परिवार होता है.. मां बाप होते हैं.. बीवी- बच्चे होते हैं.. इसमें कोई शक नहीं की करोना पूरी दुनिया के लिए बड़ी आफत लेकर आया है लेकिन इस आफत में भी ये अपने लिए मौके ढूंढ लेंगे.. इस आफत ने बिलबिलाती हुई भूख जो बाहर निकलती है.. ये गर्मी और लू में ज्यादा नहीं दिखती.. ये बिलखते हुए मासूमों के चेहरे.. जवानों के पीठ पर सवार बूढ़ी बूख है.. यह मासूम भूख जो जवान की हाथ में लहरा रहा है.. जवान भारत की भूख जो भूख से मर चुके बैल की जगह खुद बैलगाड़ी खींच रहा है.. आखिर कब तक जिंदा रह पाएगी 


फिक्र मत कीजिए.. जल्दी मर जाएगी.. आप शायद भूख को नहीं जानते.. ये ऐसी नस्ल है जो खाने की तलाश में अपने- अपने गांव से हजारों मील दूर काम की तलाश में सफर कर लेती है.. और दूर-दूर बसे शहरों में जाकर दो वक्त की रोटी के लिए उनके चेहरों को चमकाती है.. जो उनकी भूख का बड़ी होशियारी से फायदा उठाता है.. जो जानता है कि भूख बड़ी ज़िद्दी और संवेदनशील है.. दो रोटी पर थोड़ा नमक रख कर दे दीजिए.. फिर ये कभी नमक हरामी नहीं करती.. जीने के लिए पैदा हुई नहीं होती..  मरना ही इसका जीना है


इस भूख का एक नाम और है.. जो कभी न खत्म होने वाली कतारें आप सड़कों पर देख रहे हैं.. उन्हें आप अंगूठे भी कह सकते हैं.. जी हां अंगूठे.. दिल्ली से लेकर बिहार तक दिखने वाली ट्रेनों में, बसों में सड़कों के फुटपातों में.. ये अंगूठों की ही कतारें हैं...असल में इनका ये नाम सियासत ने ही रखा है |


सियासतदां इन्हे अंगूठा कहते हैं.. जिन्हे हर पांच साल बाद इनकी जरूरत पड़ती है.. ये भूखे अंगूठे सड़कों पर आपको दिखाई पड़ रहे हैं.. किसी ठेले को खींचते हुए .. रिक्शे के पैडल मारते हुए.. सब्जी बेचते हुए... बोझा उठाते हुए..  मजदूरी करते हुए .. पेट के लिए गालियां खाते हुए.. मौत से जूझते हुए .. आपको धोखा होता है कि ये आप जैसे हैं .. नहीं ये इंसान नहीं है ये बस भूखे अंगूठे हैं  

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