बर्लिन में आयोजित जनमत सर्वेक्षण शोध के वैश्विक संघ के 60वें वार्षिक सम्मेलन (डब्ल्यूएपीओआर) में 'जनमत और 21वीं सदी की चुनौतियां' विषय पर प्रस्तुत पत्र :
ऐतिहासिक रूप से मीडिया और जनमत सर्वेक्षण के बीच एक बेहद प्रगाढ और अनोखा रिश्ता देखा जा सकता है। (मान एंड ऐम्प, ओरेन, 1992)। मीडिया संगठनसर्वेक्षक और राजनीतिज्ञ लगभग रोजाना ही जनमत सर्वेक्षण की अवधारणा से, जिसकी पुष्टि चुनाव परिणामों के जरिए होती है, दो-चार होते हैं। सबसे बुनियादी स्तर पर, मीडिया अपनी खबरों में जनमत सर्वेक्षण के नतीजों को शामिल कर एक उपयोगी भूमिका अदा करता है। और इस प्रकार, वह नागरिकों की मंशा की जानकारी और बड़े पैमाने पर आम जनता और राजनीति की दुनिया के विभिन्न खिलाड़ियों तक पहुंचाता है। चूंकि मतदान को जनता की सोच को नापने का एक अहम पैमाना माना जाता है, लिहाजा इसे लोकतंत्र की आम प्रक्रियाओं से जोड़ा जा सकता है(लैड, 1980, पेज 574). ___ इन दिनों, मीडिया के खबर गढ़ने की प्रक्रिया में सर्वेक्षण एक आवश्यक हिस्सा बन गया है। चूंकि मीडिया अब न सिर्फ बाहरी शोध संस्थानों के सर्वेक्षणों के नतीजों के बारे में खबरें देता हैं बल्कि सर्वेक्षणों की अनुमति या उसे अंजाम देने के जरिए खुद भी उसकी प्रक्रिया में शामिल होता है, इसलिए यह कहा जाता है कि सर्वेक्षणों की कवरेज अब खुद में समाचारों की एक बीट बन गई है। (डी व्रीज एंड एम्प, सेमेट्को, । 2002, पीपी. 369-370) समाचार मीडिया और सर्वेक्षण के बीच इस करीबी संबंध के कारण, जनता के मत और सर्वेक्षण के बारे में सूचना प्रसारित करके जनमत की एक खास छवि गढ़ने में मीडिया की भूमिका अहम मानी जाती है। लेकिन बर्नेट (2001), हर्बस्ट (1998), सुहोनन (2001) और बिलिएट (1993-2000) जैसे लेखकों ने इसका आलोचनात्मक मूल्यांकन भी किया है। उनका मानना है कि पत्रकार जनमत सर्वेक्षणों की खबरें देकर एवं उसकी व्याख्या करके और जनता की राय से जुड़ी बातों के सरलीकरण का खुलासा करके जनमत निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
इससे पहले कि हम इस किस्म के मीडिया प्रभावों के बारे में चर्चा करें, इस बात का अध्ययन जरूरी है कि आखिर न्यूज मीडिया जनमत सर्वेक्षणों की रिपोर्टिंग किस प्रकार करता है। (ब्रटस्टनाइडर, 1997) मुख्य रूप से यही इस पत्र का उद्देश्य भी है - मीडिया द्वारा जनमत सर्वेक्षण का प्रस्तुतिकरण और सर्वेक्षण के नतीजों पर आधारित ख़बरों के जरिए जनमत की छवि . गढ़ने में मीडिया की भूमिका का आकलन करना। .
यह अध्ययन फ्लेमिश (बेल्जियम') मामले के जरिए किया गया। लंबे समय से, अमेरिका में चुनावों के दौरान मीडिया संगठनों की सक्रिय भूमिका देखने को मिलती है। लेकिन हाल के कुछ सालों से, बेल्जियम में भी जनमत सर्वेक्षणों में मीडिया की दिलचस्पी बढ़ती दिखाई देती है। फिर भी, बेल्जियम । की मीडिया में सर्वेक्षण से जुड़े बहुत थोड़े ही अनुभवसिद्ध आंकड़े उपलब्ध हैं। इसी अंतर को पाटने के लिए फ्लेमिश समाचार मीडिया द्वारा कवर किए गए बहुप्रचारित जनमत सर्वेक्षण की प्रकृति और मात्रा का व्यवस्थित विश्लेषण किया गया। इसमें मीडिया द्वारा सर्वेक्षण को दी जाने वाली तवज्जो (क्या फ्लैंडर्स ने सर्वेक्षण से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट्स में बढोतरी के अन्तर्राष्ट्रीय रुझानों का पालन -फिया है) और जनमत सर्वेक्षण के बारे में प्रकाशनों की औपचारिक गुणवत्ता (चुनाव के बारे में फ्लेमिश समाचार रिपोर्टों की प्रणाली सबधी गुणवत्ता का स्तर क्या है) से जुड़े सवाल को उठाया गया। इस बारे में आम धारणा यह है कि मीडिया वर्षों से अपने सर्वेक्षण संबंधी प्रकाशनों की पद्धति की-गुणवत्ता पर ध्यान दिए बिना जनमत सर्वेक्षणों के आधार पर खबरें बना रहा है.. लिहाजा , मीडिया द्वारा जनमत सर्वेक्षणों पर . आधारित खबरों के प्रस्तुतिकरण का मूल्यांकन . कई बिंदुओं पर केन्द्रित करके किया जाएगा। पहला, खबरों में सर्वेक्षणों के बारे में मूल्यांकन संबंधी निर्णयों की अभिव्यक्ति पर ध्यान केंद्रित किया जाएगादूसरा, यह देखा जायेगा कि सर्वेक्षण से जुड़ी खबरों में किस · हद तक तथ्यपरकता बरती गयी हैऔर तीसरा, किस तरह से जनमत के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए सर्वेक्षणों की तलना की गयी है (मीडिया इन तत्वों का उपयोग सर्वेक्षण के बारे में 'खबर' बनाने के लिए किस हद तक करता है?)
इस अध्ययन में 2000, 2002, 2004, 2006 के दौरान बेल्जियम के छह सबसे महत्वपर्ण फ्लेमिश (बेल्जियम की दो आधिकारिक भाषाओं में से एक) अखबारों में प्रकाशित जनमत सर्वेक्षणों से जुड़े विभिन्न - लेखों का विश्लेषण शामिल है। सर्वेक्षणों को । संदर्भित करते सभी लेखों पर विचार किया गया, जिनमें सर्वेक्षण के नतीजों से जुड़ी ही सूचनात्मक रिपोर्ट, उन पर आधारित पण की पद्धतियों तथ्यात्मक विश्लेषण या सर्वेक्षण की पद्धतियों से जुड़ी टिप्पणियां शामिल हैं। इसमें सिर्फ चुनावी सर्वेक्षण ही नहीं, बल्कि अध्ययन के लिए चने गये वर्षों की अवधि में छपे सभी किस्म के सर्वेक्षणों से संबंधित लेखों पर भी विचार किया गया |
खबरों के रूप में सर्वेक्षण
मीडिया अपनी खबरों में नियमित रूप पसे सर्वेक्षणों का इस्तेमाल करना कि मीडिया मीडिया संगठन नियमित रूप से खद ही सर्वेक्ष सर्वेक्षण आयोजित करते रहनाजा उनक उनके जल्दी लिए सर्वेक्षण से पहुंचना आसान होन 2000, पेज 285)खबरों में गण द्वारा मापी गयी लोगों की राय को बनियादी व्यवहार या नजरिए के खोजपर्णाक के रूप में नहीं दर्शाया जाता. बल्मिषण के नतीजों का इस्तेमाल मख्य रूप से खबरों के महत्व . के नजरिए से किया जाता है (ब्रेट्सनाइडर, --1997, पेज 250)। क्रेस्पी के नोटस (1980, पेज 464-465) के अनसार, मीडिया का प्राथमिक उद्देश्य जनमत सर्वेक्षण के तमाम · पहलुओं की रिपोर्टिंग खबरों के तौर पर · उसमें अन्तर्निहित रुचि की वजह से करना है।
जनमत सर्वेक्षण को कवर करना खबर के लिहाज से उपयोगी माना जाता है क्योंकि वे जनता की राय को मापते हैं। माना जाता है कि लोकतंत्र में जनता की राय को जानना आवश्यक है (पलेट्जेट, 1980, पेज 496)। इस प्रकार की राजनीतिक प्रणाली में, आम जनता की आवाज सबसे पहले मतदान के जरिए आभव्यक्त होती है। चूंकि अपने मत के जरिए लाग प्रत्यक्ष और तत्काल प्रभाव से राजनीति पर प्रभाव डालते हैं. भाव से राजनीति पर प्रभाव डालते हैं, अतः वोट देने के उनके शुरुआती इरादे और अत: वोट देने के उनके शुरुआती इरादे और चुनाव वाले दिन मतदान के वास्तविक फैसले को खबर के महत्वपूर्ण स्रोत के फैसले को खबर के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा जाता है |
नतीजतन, मतदान से जडी शमशा नतीजतन, मतदान से जुड़ी शुरुआती पसंद का नियमित रूप से सर्वेक्षण और मीडिया हमेशा अगले सर्वेक्षण बनाये रखता है जिसकी वजह से मग एक 'नियमित आशिक चुनाव' बन जाता __ का नियमित रूप से सर्वेक्षण होता है और मीडिया हमेशा अगले सर्वेक्षण पर नजर से रखता है जिसकी वजह से सर्वेक्षण नियमित आशिक चुनाव' बन जाता है। _
संभावित चुनाव परिणाम का अनमा लगाना और चुनावी प्रचार की प्रक्रिया को कवर करना भी पाठकों की इन अपेक्षाओं को पूरा करता है कि कौन चुनाव जीतने जा रहा है (क्रेस्पी, 1980, पेज 465-466)। इन चुनावी अवधियों के दौरान, समाचार मीडिया आर. सवक्षण का सामान्य राजनीतिक प्रणाली का आवश्यक तत्व माना गय 2002, पेज 382-383) निश्चित रूप र पिछले शोध में यह पाया गया कि चुनावों के दौरान समाचार कवरेज में ज्यादातर चुनाव परिणाम और नागरिकों के अन्य विचारों की रिपोटिंग हुई है (एंडरसन 2000, पेज 288, ब्रेट्सनाइडर 1997, पेज. 252-254, स्मिथ एंड एम्प वीराल, 1985 · पेज 65)।
इस प्रकार, आने वाला चुनाव न्यूज मीडिया के लिए मतदान से जुड़ी पसंद के बारे में सर्वेक्षण करने का एक मौका लेकर आ सकता हैलेकिन सामयिक रुचि के किसी मुद्दे पर एक सार्वजनिक बहस भी और अधिक साधारण एवं आम विषय से जुड़े सर्वेक्षण की रिपोर्टिंग के लिए उकसा सकती है। खबरों के लिहाज से मदों की उपयोगिता को देखते हुए, किसी खास मद्दे के बारे में खबरों का दायरा बढाने के लिए कुछ खास किस्म के सर्वेक्षणों और उनकी रिपोर्टिंग की इजाजत दी जा सकती है। रस मंटन संदर्भ में, कोवाच (1980) ने एक . 'श्रंखलाबाट 'श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया' की बात की है, जिसमें मील पूरक हों। एक सर्वेक्षण के आधार पर, राजनेता अपनी प्रतिक्रिया दें, जिसकी मीडिया Scanned with CamScanner जिसमें मीडिया और सर्वेक्षण एक दूसरे के किसी मुद्दे को उठाया जा सकता है जिस पर द्वारा रिपोर्टिंग की जा सके और इसके बाद लोगों की प्रतिक्रिया को मापने के लिए भी एक नया सर्वेक्षण किया जा सकता है (कोवाच, 1980, पेज 570-571)। इसी माजिक क्रेस्पी नही किया है जो निम्न बिंदुओं पर तर्क करते हैं: 1. समाचार क्या है और उसकी परिभाषा, 2. सर्वेक्षण की विषय-वस्तु का निर्धारण, 3. राजनीतिक प्रक्रिया पर प्रभाव, 4. खबर क्या बनती है (क्रेस्पी, 1980, पेज 466)।
जनमत सर्वेक्षणों के आधार पर इस किस्म की खबरें बनाने का सवाल तब चर्चा में आया, जब न्यूज मीडिया और सर्वेक्षणों के बीच नजदीकी संबंध स्थापित हो गएअस्सी के दशक में ही अमेरिका में इस विषय पर बात होनी शुरू हो गई थी, लेकिन हाल के वर्षों में बेल्जियम की मीडिया में सर्वेक्षणों पर आधारित खबरों के प्रकाशन में बढ़ोतरी होने की वजह से अकादमिक और राजनीतिक गलियारों में भी ये सवाल उठने लगे। यह चलन अब पूरे विश्व में बढ़ता हुआ देखा जा सकता है (अमेरिका के लिए मिलर और हर्ड 1982, लैड एंड बेन्सन 1992, ग्रेट ब्रिटेन के लिए वोरसेस्टर 1980, कनाडा के लिए एंडरसन 2000, ऑस्ट्रेलिया .के लिए स्मिथ एंड वैरल 1985, इजराइल के लिए विएमन 1983, जर्मनी के लिए ब्रेटस्नाइडर 1997, नीदरलैंड्स के लिए डी बोएर 1995)। चूंकि मीडिया और सर्वेक्षणों बोएर 1995)। चूंकि मीडिया और सर्वेक्षणों के बीच संबंधों को लेकर बेल्जियम में व्यवस्थित एवं व्यावहारिक आंकड़ों की कमी है, लिहाजा न्यूज मीडिया में सर्वेक्षणों की मौजूदगी का अध्ययन फ्लेमिश समाचारपत्रों में सर्वेक्षण रिपोर्टों की आवृत्ति और हाल के वर्षों में इनमें बढ़ोतरी पर आधारित मात्रात्मक अध्ययन के जरिए किया जा रहा है। इस अध्ययन में जिन सवालों पर गौर किया जा रहा है, वह निम्न हैः क्या इन सर्वेक्षणों का खबरों में सिर्फ जिक्र मात्र है या इन्हें ही केंद्रीय विषय-वस्तु बनाकर खबरें लिखी जा रही हैं? क्या केवल चुनाव के समय ही सर्वेक्षण प्रकाशित किए जा रहे हैं अथवा इन्हें पूरे साल समान रूप से प्रकाशित किया जाता हैक्या समाचार में चुनाव पूर्व सर्वेक्षण का ज्यादा महत्व दिया गया है और सामान्य मुद्दास जुड़ सर्वेक्षणों को नजरअंदाज किया गया है?
जनमत सर्वेक्षण की एक छवि गढ़ता मीडिया
आज सर्वेक्षण जनता की राय जानने और विभिन्न विषयों पर जनता की भावनाओं को व्यक्त करने का महत्वपूर्ण साधन बन गया हैं (किम एंड वीवर, 2001, पेज 72)। मीडिया के जरिए सर्वेक्षण के नतीजों का आम जनता के बीच प्रचार-प्रसार काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह.जनता को उस समाज की राय से अवगत कराने का अवसर होता है, जिसमें वह रह रहे होते हैं (बर्नेट, 2001)। लेकिन समस्याएं तब शुरू हुई, जब पत्रकारीय नजरिया (लेख/खबरे) उन सर्वेक्षणों पर आधारित होने लगे जो कि पद्धतिगत मानकों पर खरे नहीं उतर रहे थे अथवा जब जनमत के 'एकतरफा' पहलू ..को जनता और नीति निर्माताओं के बीच..प्रसारित किया जा रहा था। जनमत सर्वेक्षण (ओपिनियन पोल) के नतीजों का मीडिया में प्रस्तुतिकरण राजनीतिक और आर्थिक नीति-निर्माताओं को समाज के मनोभावों से अवगत करवा सकता है और साथ ही नागरिकों को खुद की राय तैयार करने के लिए भी संदर्भ दे सकती है (सुहोनेन, 2001, पेज 311-333, बर्नेट, 2001, फ्रैंकोविक, 2005)। इसलिए इसे महत्वपूर्ण माना जाता है कि समाचार मीडिया जनता को जनमत की एकदम सही जानकारी दे, जिसे नियमित की एकदम सही जानकारी दे, जिसे नियमित रूप से तमाम सर्वेक्षणों से मापा जाए (बर्नेट, 2001, पेज 308)इस संदर्भ में पहला सवाल तो यही है कि अपने सर्वेक्षण के प्रकाशन में मीडिया सर्वेक्षण प्रक्रिया की प्रणालीगत सूचना को किस हद तक उजागर करे |
जनता की राय की एक विश्वसनीय एवं बिलकुल सटीक माप के लिए यह जरूरी है कि सर्वेक्षण प्रक्रिया में कुछ पद्धतिगत मानकों का पालन किया जाए। सर्वेक्षण की सटीकता सर्वेक्षक की जिम्मेदारी है, लेकिन ऑडियंस द्वारा कथित सर्वेक्षण की सटीकता मीडिया द्वारा सर्वेक्षण कवरेज की गुणवत्ता पर निर्भर करती है (डी व्रीज एंड सेमेट्को, 2002)। सर्वेक्षण आधारित खबरों में पद्धति की सूचना को शामिल करने का सबसे प्रमुख कारण, पाठक की सर्वेक्षण के आंकड़ों को देखते हुए सटीक निष्कर्ष तक पहुंचने में मदद करना है (स्मिथ एंड विरल, 1985, पेज 71)।
सर्वेक्षण के लिए मापदंड तैयार करने वाली संस्था एसोमार/डब्ल्यूएपीओआर (2005) का कहना है कि एक लोकतांत्रिक समाज में जनता और सरकार को सही तरीके से आयोजित वैसे सर्वेक्षण अनुसंधान से अवगत करवाया जाना चाहिए जिनमें उच्च मानकों का पालन किया गया हो। ...इसलिए जो जनमत का आयोजन कर रहे हैं और जो इसकी रिपोर्टिंग कर रहे हैं, उन दोनों की ओर से पारदर्शिता और सटीकता . की आवश्यकता होती है। (ESOMAR, 2005)। लिहाजा इस प्रकार की मीडिया पारदर्शिता संबंधी चर्चाओं की वजह से, सर्वेक्षण से संबंधित मीडिया रिपोर्टों में पद्धति की जानकारी को उजागर करने के लिए न्यूनतम आवश्यकताओं सहित सामान्य दिशा-निर्देशों का विकास दुनियाभर में विभिन्न पेशेवर ओपिनियन अनुसंधान संगठन करते हैं जिनमें एएपीओआर, एनसीपीपी, एसोमार/वैपोर, कासरो और फेबेलमर (बेल्जियम) शामिल हैं। ..
पिछले अध्ययनों के आधार पर पाया गया कि सर्वेक्षणों में तकनीकी रिपोटिंग की गुणवत्ता बेहद निचले स्तर की थी। यह भी पाया गया कि सर्वेक्षण की औपचारिक गुणवत्ता के संदर्भ में, टेलीविजन के मुकाबले समाचारपत्रों ने बेहतर प्रदर्शन किया (एंडरसन, 2000, पेज 286-294)। पोल कवरेज का इस प्रकार का औपचारिक गुणवत्ता विश्लेषण, सर्वेक्षण की विभिन्न रिपोर्टी, (जैसे कि सैम्पल साइज, साक्षात्कार पद्धति, जनसंख्या की परिभाषा, सवालों के शब्द वगैरह) के पद्धति संबंधी पहलुओं के मूल्यांकन द्वारा नियमित रूप से किया जाता है (ब्रेट्सनाइडर, 1997, एंडरसन, 2000य स्मिथ एंड वैरल, 1985, डी बोएर, 1995)।
)। ___ इस पेपर में इस बात की जांच की गयी है कि फ्लेमिश प्रिंट मीडिया किस स्तर तक अपने पाठकों को सर्वेक्षण प्रक्रिया की पद्धति संबंधी जानकारी देता है। इस पत्र में उन तत्वों का अध्ययन किया गया है जिनका विभिन्न सर्वेक्षण अनुसंधान संगठनों ने अपने न्यूनतम प्रकटीकरण के मानकों में जिक्र किया है (विवरण के लिए परिशिष्ट देखें) -- समाचार रिपोर्टों में न केवल सर्वेक्षणों से जुड़ी पद्धतिगत सूचना देने से, बल्कि जिस प्रकार पत्रकार सर्वेक्षण की पद्धति का स्पष्ट रूप से मूल्यांकन करता है, वह भी सर्वेक्षणों के नतीजों और उन पर आधारित संदर्भो की विश्वसनीयता को समझने में योगदान देता है। मसलन, जिस संस्थान ने सर्वेक्षण का आयोजन किया है, उसका वर्णन सम्मानित शोध संगठन अथवा संदिग्ध सर्वेक्षक के रूप सर्वेक्षक के रूप में करना, सर्वेक्षण की विश्वसनीयता और उसके परिणामों की वैधता के प्रति दृष्टिकोण विकसित करने में योगदान देता है(पैलेट्स एट अल, 1980, पेज 503-504)। एंडरसन के मुताबिक. (2000, पेज 292), सर्वेक्षण के परिणमों को पत्रकार प्रायः निश्चित, नागपाते हैं और इसलिा सेना के रूप में पस्तत करते हैं। यह सुझाव समाचार रिपोर्टों में सर्वेक्षण परिणामों को अधिक सतर्कता से ग्रहण करने की स्पष्ट चेतावनी पर आधारित है | पैलेट्स एट अल (1980, पेज 506) ने भी पाया कि पत्रकार में उस परिणाम की पड़ताल करने के बजाय समर्थन की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है जिसकी वह रिपोटिंग कर रहा है | इस वजह से ही ऑडियंस सर्वेक्षण के परिणामों की विश्वसनीयता को लेकर सचेत होने के बजाय आश्वस्त हो जाती है |
पत्रकारों द्वारा सर्वेक्षण सतीजों (स्वीकत या अस्वीकृत) के मूल्यांकन और जिस प्रकार ऑडियंस सर्वेक्षण की विश्वसनीयता का अर्थ लगाती है, इनके बीच आपसी संबंधों को देखते हुए (पैलेटज एट अल, 1980, पेज 506) समाचार रिपोटों में व्यक्त किए गए सर्वेक्षण की पद्धति का अध्ययन किया गया। चूंकि पिछले अध्ययनों में यह पाया गया था कि पत्रकारों के विपरीत, राजनेता सर्वेक्षण के परिणामों के प्रति अधिक नकारात्मक एवं आलोचनात्मक रवैया रखते हैं, विशेषकर जब परिणाम उनके हक में नहीं होते, इसलिए इस अध्ययन में जिन तत्वों पर गौर किया गया, उनमें निम्न तीन तत्व शामिल थेः 1) एक या अधिक न्यायिक पद्धति वाले लेखों की संख्या (संकेत के रूप में, कि आलोचक मीडिया किस प्रकार समाचार रिपोर्टों में सर्वेक्षण के परिणामों का इस्तेमाल करता है), 2) इन लेखों के मूल्यांकन की दिशा (सर्वेक्षण के प्रति सकारात्मक, तटस्थ या नकारात्मक) और 3) उनके स्रोत (पत्रकार, राजनीतिज्ञ, मतदान सर्वेक्षक या अकादमिक व्यक्ति) (ब्रेट्सनाइडर, 1997, पेज 249)।
मूल्यांकन आधारित फैसले के अतिरिक्त, समाचार रिपोर्टों में सवेक्षण के विषय के स्तर पर भी गौर किया गया। पत्रकारों के पास सर्वेक्षण के परिणामों की व्याख्या और प्रचार करने के तरीको की काफी स्वतंत्रता है (पैटरसन, 2005, पेज 721)। वह कच्चे आंकड़ों (प्रायः प्रतिशत) की रिपोर्ट कर सकते हैं या परिणाम को ठोस अर्थ दे सकते हैं और फिर इनका प्रयोग राजनीतिक विश्लेषण के आधार के रूप में कर सकते हैं (स्मिथ एंड वैरल, 1985, पेज 66)। चूंकि सर्वेक्षण के आंकड़े तथ्यपरक, सटीक और मात्रात्मक सूचनात्मक प्रतीत होते हैं, ७ सकते हैं और विशेषज्ञों का स्थान भी ले सकते हैं (फ्रैंकोविक, 2005, पेज 684-688, ब्रेट्सनाइडर, 1997, पेज 262)। इसलिए सर्वेक्षण व्याख्यात्मक समाचार खबरों को अधिक तथ्यपरक आधार प्रदान कर सकते हैं (रोजेंटिल, 2005, पेज 707)। इस पत्र में समाचार रिपोर्टों में प्रकाशित हो रहे सर्वेक्षण परिणामों का विश्लेषण और विषयगत व्याख्या पर फोकस के स्तर का प्रयोग मीडिया के एक संकेतक के रूप में किया गया है, जो सर्वेक्षण के कच्चे परिणामों को तब समाचार बनाते हैं, जब सर्वेक्षण के कच्चे परिणाम बमुश्किल सूचनात्मक हों और बिना किसी अतिरिक्त व्याख्या के उद्देश्य का प्रसारण कर रहे हों |
सर्वेक्षण के मीडिया प्रस्तुतिकरण के बारे में अन्य महत्वपूर्ण तत्व, जिन पर गौर किया गया था, वह सर्वेक्षण की तुलना से जुड़ा है। समाचार में हालिया सर्वेक्षण के नतीजों की तुलना अन्य सर्वेक्षणों अथवा बाहरी सचनाओं से करना, जनमत को एक निश्चित छवि प्रदान करने में योगदान दे सकता है। सर्वेक्षण परिणामों में अंतर, इसकी प्रक्रिया में प्रयोग होने वाली पद्धति के कारण आता है। यह अंतर इसलिए भी आता है क्योंकि लोगों ने विभिन्न समयों पर अपना मत प्रकट किया है। ब्रोह (1980. पेज 5100 कहते हैं कि पत्रकार इन अंतरों को मत में परिवर्तन के रूप में इसलिए दिखाते हैं ताकि चनाव के समय मतों में बदलात या वोट में अस्थिरता पर बल दिया जा सकेइसे और अधिक प्रबल बनाया जा सकता है, यदि पत्रकार तुलना के उन बिंदुओं भन य समय बिंद नोटनिता मत परिवर्तनों पर जोर दे (ब्रोह, 1980, पेज 518)। मीडिया द्वारा सर्वेक्षण की इन तलनाओं का इस्तेमाल केवल जनमत में अस्थिरता को दिखाने के लिए ही नहीं किया जा सकता, बल्कि ट्रेंड सेट करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। जनहित वाले कुछ सर्वेक्षणों जैसे कि किसी राजनीतिक उम्मीदवार की लोकप्रियता रैंकिंग, को वैसे ही समाचार बनाया जाता है जैसे कि बेरोजगारी या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को (क्रेस्पी, 1980, पेज 470)। समाचार लेखों में सर्वेक्षण की तुलनाओं का अध्ययन, इनकी संख्या और अक्सर तुलना के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बेसलाइन के अभिप्राय के संदर्भ में किया गया।
उद्देश्य - इस पत्र का प्रमुख उद्देश्य यह अध्ययन करना है कि न्यूज मीडिया ने अपनी समाचार रिपोटों में जनमत सर्वेक्षण परिणामों का उपयोग किस प्रकार किया है। सबसे पहले, ..खबरों में सर्वेक्षण की मात्रा अथवा दृश्यता का अध्ययन इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए किया जाता है कि क्या (बेल्जियम के) पत्रकारों ने सर्वेक्षण के प्रति बढ़ रहे मीडिया के ध्यान पर अन्तर्राष्ट्रीय रुझानों का अनुपालन किया हैसमाचार में सर्वेक्षण. की मात्रा के इस सामान्य विवरण के अतिरिक्त, सर्वेक्षण पर फ्लेमिश (बेल्जियम की) समाचार रिपोर्टों की पद्धति की गुणवत्ता का भी मूल्यांकन किया गयाइस औपचारिक गुणवत्ता तक पहुंचने के लिए, वैश्विक स्तर पर बनाये गये उन निर्देशों का प्रयोग किया गया है, जो समाचार में दिखाए जाने वाले सर्वेक्षणों की पद्धति के बारे में न्यूनतम जानकारी की बात कहते हैं।
इसके बाद, जनमत पर आधारित खबरों को बनाने में मीडिया ने क्या भूमिका अदा की है, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए सर्वेक्षणों के समाचार प्रस्तुतिकरण की जांच बारीकी स का जाएगा। इसके तहत जनमत सर्वेक्षण क तान पहलुओं पर विचार किया गया, 1) सवक्षण की विश्वसनीयता पर मूल्यांकन, 2) सर्वेक्षण रिपोर्टों में विषय का समावेशन और 3) सर्वेक्षण की तुलना का प्रयोग। शोध के इन उद्देश्यों का अध्ययन मीडिया, सर्वेक्षण और जनमत के बीच जटिल संबंधों को समझने में मदद करेगा |
आंकड़े और पद्धति शोध के इन उद्देश्यों को बेल्जियम में प्रसारण के नजरिए से सबसे प्रमुख छह समाचारपत्रों जिनमें खुद को गुणवत्तापरक समाचार पत्र कहने वाले डी स्टैंडर्ड, दी टीज्द, डी मॉर्गन और अन्य लोकप्रिय समाचार पत्र गैजेट वन आंतवेर्पन, हेट न्यूजब्लैडंड, हेट लास्टिन्यूज में जनमत सर्वेक्षण आधारित लेखों की विषयवस्तु के विश्लेषण के आधार पर निर्धारित किया गया हैचयन के इस प्रकार से, .. सबसे अधिक समाचार संपादकों के साथ ..ही, पत्रों के विभिन्न राजनीतिक स्रोतों का भी प्रतिनिधित्व किया गया।
भी प्रतिनिधित्व किया गया। सबसे पहले तो, समाचारपत्रों में प्रकाशित उन लेखों पर विचार किया गया जिनके शीर्षकों अथवा लेख के कथ्य में सर्वेक्षण का . जिक्र. था। इनमें साल 2000 (अक्टूबर में स्थानीय चुनाव), 2002 (कोई चुनाव नहीं), • 2004 (जून में यूरोपियन और क्षेत्रीय चुनाव) और 2006 (अक्टूबर में स्थानीय चुनाव) शामिल थे। ऐसा इसलिए ताकि चुनावी और गैर चुनावी, दोनों अवधियों के लेखों पर गौर किया जा सके। इनमें सभी प्रकार के लेख, जैसे कि सर्वेक्षण के परिणाम पर आधारित समाचार रिपोर्ट, साक्षात्कार और मत जताने वाले लेख, उनकी व्याख्या और पद्धतिगत मूल्यांकन पर भी विचार किया गया। इनके अलावा, लेखों के चयन में, जनता का मत और बेल्जियम के उत्तरदाताओं की भागीदारी का भी ध्यान रखा गया। आंकड़ों के संग्रह (डेटा कलेक्शन) के दौरान पाया गया कि दो खास सर्वेक्षण ('De Stemmenkamploen' and 'Het GrootsteBuurtonderroek') जिन्होंने 2006 के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, के लेखों को सही तरीके से नहीं चुना गया, क्योंकि उनके नाम में 'सर्वेक्षण' शब्द का जिक्र नहीं था। इसलिए कुछ लेखों का चयन इस आधार पर भी किया गया कि उन्हें मीडिया में सर्वेक्षण के नाम पर काफी दिखाया गया है। (चयनित लेखों की संख्या और उनकी चयन प्रक्रिया के अवलोकन हेतु परिशिष्ट देखें)
समाचार में सर्वेक्षण की दृश्यता के.सामान्य विवरण के लिए, उन सभी लेखों पर विचार किया गया, जिनमें साफ तौर पर जनमत सर्वेक्षण का जिक्र था (कुल लेख=2744)अन्य प्रश्नों (जैसे कि पद्धति, गुणवत्ता) पर विचार करने के लिए, केवल उन लेखों का ... अध्ययन किया गया, जिनमें सर्वेक्षण का.. दबदबा था (अर्थात वे लेख जिनका कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण परिणाम, व्याख्या और कार्य पद्धति के बारे में बात कर रहा हो)। इस प्रकार केवल उन लेखों पर विचार किया गया, जो सर्वेक्षण के बारे में मजबूती से बात करते हों।
परिणाम
परिणाम परिणामों की प्रस्तुति खासतौर पर तीन वर्गों को ध्यान में रखकर बुनी जाती है, जिनमें सर्वेक्षण पर मीडिया का सामान्य ध्यान, इसकी पद्धति आधारित गुणवत्ता और सर्वेक्षण की विश्वसनीयता, समग्र रिपोटिंग का तरीका : और सर्वेक्षण की तुलना का प्रयोग पर शामिल हैं।
सर्वेक्षण पर मीडिया का ध्यान
सबसे पहले, समाचार मीडिया में सर्वेक्षण की महत्ता का अध्ययन किया गया क्योंकि यह माना जा रहा था कि बेल्जियम में इसकी महत्ता काफी बढ़ी हैसर्वेक्षण संबंधी लेखों पर आधारित इस अध्ययन में (कुल लेख=2744), समय के साथ सर्वेक्षण लेखों की संख्या में वृद्धि देखी गई।
बेल्जियम के छह सबसे महत्वपूर्ण समाचारपत्रों में जनमत सर्वेक्षण को लेकर प्रकाशित लेखों में अच्छी खासी बढ़ोतरी 2000 से 2006 की समयावधि के दौरान देखने को मिली। इन छह सालों में, सर्वेक्षण को संदर्भित करती लेखों की संख्या जहां 2000 में 227 थी, तो वहीं 2002 में 338 हुई, 2004 में 706 और फिर 2006 में 1473 तक पहुंच गई। इन लेखों में वृद्धि की उम्मीद अमेरिका और नीदरलैंड्स सरीखे देशों में बढ़ रहे रुझानों को देखते हुए लगाई जा रही थी। हालांकि, सर्वेक्षण को लेकर मीडिया अटेंशन के मामले में महत्वपूर्ण प्रगति काफी पहले ही देखी गई थी (उदाहरणार्थ 1980 में अमेरिका में), लेकिन फ्लैंडर्स (बेल्जियम) में सर्वेक्षण को लेकर लेखों की मात्रा में इतनी बड़ी बढ़ोतरी हाल ही के वर्षों में देखी गई है। .
. लगभग सभी छह समाचारपत्र, जिन पर जा गौर किया जा रहा है (डी टीज्ड के अलावा), प्रकाशित सर्वेक्षण पर आधारित लेखों की संख्या में 2000 से 2006 के बीच सालाना बढ़ोतरी हुई। यह बढ़ोतरी सबसे ज्यादा क्वालिटी पेपर माने जाने वाले समाचार पत्र डी सँडडर्ड और लोकप्रिय समाचारपत्र हेड न्यूजब्लाड में देखी गई, जिन्हें कोरेलियो नाम का एक ही संगठन संपादित करता है। इस बढ़ोतरी को समाचार पत्र संगठन अंशतः 2006 के 'सबसे बड़े पड़ोसी (नेबरहुड) सर्वेक्षण' के तौर समझा सकते हैं, जिसमें पंचायती/जातिगत/सांप्रदायिक चुनाव से पहले लगभग सभी स्थानीय समुदायों के लोगों (307) ने स्थानीय नीतियों और तत्कालीन मेयर के बारे में सर्वेक्षण में हिस्सा लिया थाचूंकि 2006 में इस तरह के कई स्थानीय सर्वेक्षण हुए थे, अतः इस साल को अपवाद माना जा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि 2007 के बाद भी सर्वेक्षणों सकता है कि 2007 के बाद भी सर्वेक्षणों को मीडिया की ओर से काफी तवज्जो को मीडिया की ओर से काफी न मिलती रही है, लेकिन जैसा कि ग्राफ में मिलती रही है, लेकिन जैसा कि गा दिखाया गया है कि 2006 में बढ़ोतरी और आगे बढ़ने के बना लगी(देखें ग्राफ-1)

लगीयों तो प्रकाशित सर्वेक्षण ही संख्या में भारी बढ़ोतरी देखी अगर पूरे लेख में शब्दों की तो सर्वेक्षण से जुड़े शब्द " स्थिर हो गए हैं। इसके अध्यय सर्वेक्षण में शाब्दिक योगदान के लेखों को चार श्रेणियों में वर्गी गया था 1) सर्वेक्षण पर प्रमुख को लेख का 60 प्रतिशत हिस्सा सर्वे तो प्रकाशित सर्वेक्षण लेखों की कुल में भारी बढ़ोतरी देखी गई, लेकिन लेख में शब्दों की सीमा को देखें, क्षण से जुड़े शब्द समय के साथ गए हैंइसके अध्ययन के लिए, शाब्दिक योगदान के अनुपात में मार श्रेणियों में वर्गीकृत किया तो सर्वेक्षण पर प्रमुख फोकस, यदि 160 प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण के बारे में ही है, 2) महत्वपर्ण थीम के सर्वेक्षण, यदि लेख का 30-60 प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण के संदर्भ में हैं. 3) सर्वेक्षण का सीमांत-उपयोग, यदि लेख का 10-30 का प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण के बारे में बात करता है, 4) सर्वेक्षण का महज संदर्भ के से भी कम हिस्से में सर्वेक्षण की बात की गई है। प्रत्येक श्रेणी में सर्वेक्षण संबंधित लेखों का प्रतिशत दर्शाया गया हैं। (ग्राफ-2) इस लेख से यह समझा जा सकता है कि अधिकतर समाचारपत्रों ने सर्वेक्षण पर प्रमुख फोकस रखा (जिसमें लेख का 60 प्रतिशत हिस्सा सर्वेक्षण पर आधारित था)। यह भी पाया गया कि कई लेखों में सर्वेक्षण का प्रयोग न सिर्फ प्रमुख थीम के तौर पर किया गया था, बल्कि उन्हें पूरी तरह सर्वेक्षण, उसके परिणाम और व्याख्या को समर्पित कर दिया गया था। जब सर्वेक्षण का इस्तेमाल इस प्रकार समाचार में किया गया, तो वह लेख के प्रमुख विषय के रूप में उभरकर आते हैं और ऐसा कम दिखता है कि अन्य मुद्दे पर आधारित समाचार में उनका प्रयोग महज संदर्भ अथवा चित्रण हेतु किया गया है। सामान्य तौर पर, सर्वेक्षण पर प्रमुख फोकस या प्रमुख थीम वाले लेखों और ऐसे लेख जिनमें सर्वेक्षण का प्रयोग सीमांत रूप में किया गया है, में 2000 से 2006 के बीच ज्यादा बदलाव नहीं आया। केवल 2006 में मध्यम श्रेणी के लेखों में अन्य वर्षों के मुकाबले हल्की सी बढ़ोतरी हुई। क्या सर्वेक्षण आधारित लेखों का प्रकाशन पूरे वर्ष समान रूप से हुआ है या केवल राजनीतिक चुनाव के दौरान उन पर ध्यान केंद्रित किया गया है, इसके अध्ययन के लिए प्रकाशन तिथि पर गौर करना अभी बाकी है। .
इस बात का अध्ययन करने के लिए कि सर्वेक्षण आधारित लेख पूरे साल में समान रूप से प्रचारित किये जाते हैं या राजनीतिक चुनावों के दौरान केन्द्रित होते हैं, लेख के प्रकाशन की तारीख को ध्यान में रखा जाता है।
भले ही प्रचारित किए गए सभी सर्वेक्षण राजनीतिक चुनाव से संबंधित नहीं थे, फिर · भी ग्राफ-3 में दिखाया गया है कि बड़ी मात्रा में सर्वेक्षण से जुड़े लेख आखिरी महीने में मतदान की तारीख से ठीक पहले प्रकाशित किए गए। सन् 2000 में फ्लैंडर्स/बेल्जियम में जब स्थानीय चुनाव हुए थे, चुनावों के ठीक पहले सितंबर और अक्तूबर के महीनों में भारी संख्या में सर्वेक्षण पर आधारित लेख प्रकाशित किए गएहालांकि चुनावों की तारीख से छह माह पहले अप्रैल में भी सर्वेक्षण पर आधारित बड़ी संख्या में लेखों की संख्या में वद्धि देखी जा सकती है। इसी तरह सन 2006 में जब स्थानीय चुनाव कराए गए थे, संचार माध्यमों ने चुनावों की तारीख से ठीक पहले के महीने में पिछले साल के उसी माह की तुलना में सर्वेक्षण सम्बंधी लेखों को ज्यादा महत्व दिया गयासन् 2004 में भी चुनाव की तारीख से पहले कई महीनों तक सर्वेक्षण संबंधी लेखों की संख्या ज्यादा रही। सन् 2002 में जब फ्लैंडर्स में कोई चनाव नहीं होने थे, फिर भी कई महीनों तक सर्वेक्षण संबंधी लेखों में वृद्धि देखी गई। संक्षेप में हम कह सकते _ हैं कि जब चुनाव होते हैं, मतदान की तारीख से पहले के महीनों में सर्वेक्षण संबंधित · लेखों की संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है और मतदान समाप्त होते ही उनकी संख्या एकदम गिर जाती है |
एकदम गिर जाती हैसर्वेक्षण और.मतदानों से जुड़ी खबरें चुनावों की ही देन है, लेकिन कुछ दूसरी तरह की घटनाओं से संबंधित सर्वेक्षण लेखों की संख्या अभी भी काफी है। नीचे दिए गए ग्राफ में उन लेखों को वर्गीकृत किया गया है जिनमें सर्वेक्षण को प्रमुखता दी गईहै। (कल संख्या-1359) उन लेखों को सर्वेक्षण के प्रकार और विषय के अनुसार बांटा गया है जैसे कि (1) चुनाव जिनमें राजनीतिक दलों और राजनीतिक उम्मीदवारों की लोकप्रियता की मंशा से सर्वेक्षण किए जाते हैं (2) चुनावों से इतर दूसरे विषयों पर सर्वेक्षण जो कि चुनाव से संबंधित न हो या (3) दोनों का संयोजन हो।



ग्राफ-4 में देखा जा सकता है कि अखबारी लेखों में लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा वह है जिन्हें चुनावी लेखों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिनमें मतदाताओं के इरादे या राजनीतिक पार्टियों की लोकप्रियता पर रायशुमारी की जाती है। प्रतिशत की यह दर हमेशा ही एक जैसी बनी रहती है, वर्ष 2002 को छोड़कर जब फ्लैंडर्स में कोई चुनाव नहीं हुए। उस साल दूसरे आम विषयों पर तमाम सर्वेक्षणों पर अध्ययन छपे। सन् 2000 में आम विषयों के बारे सर्वेक्षण पर लिखे गए लेखों में से 16 प्रतिशत लेखों को 'राजनीतिक रूप से प्रासंगिक' कहा जा सकता है, सन् 2002 में यह 23 प्रतिशत है, 2004 में 23 प्रतिशत और 2006 में 21 प्रतिशत है। कहने का मतलब है कि सर्वेक्षण के विषय को राजनीति से सीधा-सीधा जोड़ा जा सकता हैराजनीतिक विश्वास, नीतिगत संतुष्टि या राजनीतिक बहस के मुद्दों (जैसे कि प्रवासियों के मतदान के अधिकार, रात्रिकालीन उड़ाने आदि) के बारे में सर्वेक्षण। सर्वेक्षण के विषय में संचार माध्यमों में प्रकाशित सामग्री की औपचारिक गुणवत्ता सर्वेक्षणों पर आधारित मीडिया में जो सामग्री दी जाती है, उनकी गुणवत्ता की परख के लिए यह जरूरी माना जाता है कि सर्वेक्षण शोध संगठन (ईएसओएमएआर/ डब्ल्यूएपीओआर, एएपीओआर, एनसीपीपी, सीएएसआरओ, फेबलमार) के तौर तरीकों या उसकी पूरी प्रणाली की सूचना जनता के सामने रखें, लेकिन मीडिया की सामग्री में प्रणाली या पद्धति के बारे में कम से कम जानकारी दी जाती है। सिर्फ उन्हीं लेखों को प्रमुखता दी जाती है जिनमें सर्वेक्षणों का हवाला दिया जाता है (कम से कम 60 प्रतिशत लेखों में सर्वेक्षण का जिक्र होता है) (कुल संख्या-1359)। नीचे दी गई तालिका लेखों में पद्धति संबंधी तत्वों के प्रतिशत के बारे में बताती है। कुछ पहलुओं के मामले में, एक विस्तृत या कम विस्तृत तरीके से जानकारी का खुलासा करने के बीच अंतर किया है।
फ्लेमिश अखबारों में प्रकाशित जिन लेखों में प्रणाली संबंधी तत्वों का साफ तौर पर उल्लेख किया गया है, उनका. संबंध सर्वेक्षण संबंधी सामान्य जानकारी से ही रहा हैमसलन, सर्वेक्षणकर्ता के कुछ संदर्भ (प्रायोजक और सर्वेक्षण करने वाली संस्था के बीच कभी विभेद किया जाता है, कभी नहीं किया जाता है) और सर्वेक्षण नमूने का ठीक-ठीक आकार क्या थाआंकड़ों के संकलन के बारे में सूचनाएं कम दी जाती है। मसलन, सर्वेक्षण के तौर-तरीके और उनकी तारीख । यह भी देखना जरूरी होता है कि सर्वे की तारीख के साथ फील्डवर्क को जोड़ा गया है या नहींकिसी लेख में सर्वेक्षण संबंधी तकनीकी सूचनाएं किस हद तक दी जाती है, हमने यह देखा है। औसतन सात प्रतिशत लेखों में त्रुटियों का सटीक जाता ह आर कवल तीन प्रतिशत लेखों में मूल्यांकन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया का जिक्र किया गया। सन् च के वर्षों में बार में सभी " सूचनाएं देने का दखन को मिला। आर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। समाचारपत्रों में छपे लेखों में जहां पद्धति संबंधी सूचनाएं स्पष्ट तौर पर दी गई हैं, उस आधार पर एक तालिका (इंडेक्स) तैयार की गई जिसमें यह देखा जा सकता है कि प्रति लेख में कितने पहलुओं के बारे में जानकारी दी गई है। पिछली तालिका में (ए-एच) कुछ निश्चित तत्वों के आधार पर एक निश्चित मानदंड और कुछ कमतर खास तत्वों (a-b,d,h) के आधार पर तैयार एक कमतर निश्चित मानदंड के बीच फर्क करने की कोशिश की गई है। यदि लेख में प्रणाली संबंधी एक भी...तत्व का जिक्र नहीं किया गया है तो उसका मानदंड शन्य है और जब सारे तत्व मिलते हैं तो अधिकतम मानदंड 7 दिया है। समाचार पत्रों में प्रकाशित सभी लेखों का सालाना मध्यमान या औरत याफ-5 में दिया गया है।
चंकि मां के अनसार अधिकतम 7 अंक दिए जा सकते हैं इसलिए जाहिर रूप से पटनिधी तत्वों को स्पष्ट रूप से प्रकाशित करने का सचकांक अध्ययन के चार सालों में ही रहा। यही कोई 0.5 और 2.5 के बीच रहा। वह भी तब जब निश्चित मानदंड कम निश्चित मानदंडों से कम देखने को मिले। ऐसा लगता है कि मध्यमान सचकांक मल्य लगातार गिरते जा . रहे जिसका फ्लेमिश अखबारों में सर्वेक्षण के प्रकाशन की पद्धति संबंधी गुणवत्ता का हास होना नीचे कछ ऐसे तत्वों पर प्रकाश डाला गया जो संचार माध्यमों द्वारा सर्वेक्षणों के बारे में निश्चित तौर पर प्रस्तुत किए जाते हैं।


संचार माध्यमों द्वारा सर्वेक्षणों का प्रस्तुतिकरण : संचार माध्यमों द्वारा सर्वेक्षणों को प्रस्तुत करने के तरीकों के तीन पहलुओं पर विचार किया गया है, 1) सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता के बारे में मूल्यांकनकारी निर्णय, 2) सर्वेक्षण की रिपोर्टों में दर्शाई गई व्यक्तिपरता का ...अंश,-3) सर्वेक्षण में तुलनाओं का इस्तेमाल।
पद्धति संबंधी मूल्यांकन की प्रस्तुति
सर्वेक्षण पर आधारित खबरों में दी गई पद्धति संबंधी सूचनाओं की मांग के लिहाज से औपचारिक अध्ययन करने के बाद, सर्वेक्षणों में जाहिर तौर पर इस्तेमाल की गई पद्धति का मूल्याकनात्मक अध्ययन किया गया है। सर्वेक्षणों के नतीजों का किस तरह आलोचनात्मक मूल्याकन किया जाए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पत्रकार बाहरी मतों का चयन किस नजरिए से कर सर्वेक्षण की विश्वसनीयता या अविश्वसनीयता पर जोर देने से जनता को इस बात का इशारा मिलने की संभावना हो जाती है कि किसी सर्वेक्षण विशेष को किस तरह से देखना है और उसके नतीजों से क्या अर्थ निकालने हैं |
- इस सन्दर्भ में पहली जरूरी बात तो यह कि संचार माध्यम अपने द्वारा प्रचारित सर्वेक्षणों के मामले में किस हद तक आलोचनात्मक या अनालोचनात्मक रवैया अपना सकते हैं, यह जानने के लिए सर्वेक्षण की पद्धति के बारे में एक या एक से अधिक मूल्यांकन वाले सर्वेक्षण आधारित लेखों की संख्या को ग्राफ-6 में दिखाया गया है।


यह बढ़कर 76 प्रतिशत हो गया। बढ़ती.. संख्या से यह साफ तौर पर संकेत मिलते . हैं कि समाचार पत्र अपने द्वारा प्रकाशित लेखों में सर्वेक्षणों के नतीजों को बिना आलोचनात्मक नजरिये के इस्तेमाल करते हैं। .
हैं। . ग्राफ-7 में. सर्वेक्षण संबंधी प्रकाशित लेखों में सर्वेक्षण के लिए अपनाई गई प्रणाली जब लेख में सक्षण की प्रणाली के बारे में साफ-साफ विश्लेषण किया जाता है, तब यह देखा जाता है कि सवक्षण के नतीजों को प्रकाशित करने में निष्पक्ष व सकारात्मक विवरणों का इस्तेमाल करने की बजाय नकारात्मक दिशा में जाने वाली बातों का इस्तेमाल किया जाता है । इसका मतलब है दि समाचार माध्यम सर्वेक्षणों को प्रस्तुत कि यदि समाचार माध्यम सर्वेक्षणों को प्रस्तत करते हैं, तो वह जनता की राय को अक्सर करते हैं, तो वह जनता की राय को अक्सर अविश्वनीय रूप में प्रस्तुत करते हैं। हालांकि के तरीको या प्रणाली को विश्वसनीय सर्वेक्षण के तरीका या प्रणाली को विश्वसनीय मानते है। ऐसा हान पर भी सर्वेक्षण आधारित लेखों में बड़ी संख्या उन लेखों (69 प्रतिशत) की है जिनमें सर्वेक्षण के तौर-तरीकों के बारे में किसी तरह की जानकारी नहीं दी जाती है।
यह बात सामने आती है कि चुनाव और मिश्रित विषयों पर सर्वेक्षण (अन्य किसी मसले पर मतदान) का लेखों में मूल्यांकन सबसे ज्यादा नकारा है। जबकि सामान्य सर्वेक्षण का मूल्यांकन कुछ हद तक सकारात्मक होता । रोमी नकारात्मकता का कारण यह हो सकता कि केवल इस तरह के सर्वेक्षणों के ना उसकी वैधता का वादा जाता है। उदाहरण के लिए, वास्तविक चनावों के नती पहले कराए गए सर्वेक्षण के नतीजों से करके इसकी सटीकता को परखा जा सकता है। पर दूसरे अधिकांश मामलों में सटीकता परखने का कोई तरीका नहीं है |
मल्यांकनात्म मूल्यांकनात्मक वक्तव्यों का अध्ययन करने के लिए सर्वेक्षणों में निकाले गए नतीजों के विभिन्न आधारों के बीच हमें फर्क करना होगा। ग्राफ-8 में प्रणाली के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष को उसमें स्रोत के साथ दर्शाया गया है। (सं-520) केवल पत्रकार ही सर्वेक्षणों का मूल्यांकन (44प्रतिशत) अपने लेखों में नहीं करते बल्कि दूसरे लोग भी सर्वेक्षणों को लेकर अपना आलोचनात्मक नजरिया रखते हैं। मुख्य रूप से राजनीतिज्ञ (36 प्रतिशत) अखबारी लेखों में दिए गए सर्वेक्षण के नतीजों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। कुछ हद तक सर्वेक्षक, अकादमीशियन और दूसरे लोग (संगठनों के प्रवक्ता) सर्वेक्षण की पद्धति के आधार पर निकले निष्कर्षों पर अपनी स्पष्ट राय देते हैंअनेक स्रोतों द्वारा व्यक्त किए वक्तव्यों की दिशा पर नजर डालने पर हम पाते हैं कि अकादमीशियनों और राजनीतिकों की राय उन सर्वेक्षणों पर अमूमन ज्यादा नकारात्मक होती है, वनिस्पत पत्रकारों और सर्वेक्षकों के। पत्रकारों और मतदान सर्वेक्षकों का यह ग्रुप मतदान के मानदंडों को ज्यादातर विश्वसनीय ही बताता हैस्पष्ट है उसे मतदान सर्वेक्षण की अपनी दुकान जो चलानी होती है |
तथ्यपरकता का अंश
सर्वेक्षण की प्रणाली के मूल्यांकन के अतिरिक्त सर्वेक्षण पर लिखे गए लेखों में तथ्यपरकता के अंश पर भी हमें विचार करना चाहिए। सर्वेक्षण के नतीजों का विश्लेषण करके उनके नतीजों को निहायत तथ्यपरक ढंग से पेश करना, बजाए इसके जनता को केवल उनकी सूचना ही दी जाए, यह दिखाता है कि मीडिया इन सर्वेक्षणों को अपनी खबरों में कितने सक्रिय रूप से इस्तेमाल करता है। सर्वेक्षण के नतीजों का तथ्यपरक विश्लेषण और व्याख्या के जरिए मीडिया जनता की राय का एक निश्चित विंब बनाता है।
उसके अध्ययन के लिए सर्वेक्षण की खबरों को वस्तुपरकता से व्यक्तिपरकता के पैमाने पर पांच बिंदुओं के आधार पर वर्गीकृत किया गया हैयदि लेखों में सर्वेक्षण के नतीजों की सूचना देने मात्र पर जोर दिया गया है तो उसे 'वस्तुपरक' की श्रेणी में रखा गया है, जिन लेखों में ज्यादातर व्यक्तिपरक विश्लेषण या व्याख्या है, इन्हें 'व्यक्तिपरक' की श्रेणी में रखा गया है और जिनमें न तो सर्वेक्षण नतीजों की केवल वस्तपरक सूचना है और ना ही मख्य रूप से व्यक्तिपरक विश्लेषण उन्हें तटस्थ या संतुलित की श्रेणी में रखा गया है। व्यक्तिपरकता के अतिरिक्त जिन तरीकों से सर्वेक्षण के नतीजों को पेश किया गया है जैसे कि ठीक-ठीक संख्या में (मसलन 70 प्रतिशत फ्लेमिश) तो उन्हें 'सटीक' की श्रेणी में और यदि सही-सही संख्या में नहीं किया गया है तो . उन्हें 'अनमानित' की श्रेणी में रखा गया है और जिन लेखों में सर्वेक्षण के नतीजों को नहीं दिया गया, न ही कोई व्याख्या की गई, उन्हें 'उपलब्ध नहीं' की श्रेणी में रखा गया है |
सर्वेक्षणों की तुलनाएं
समाचार माध्यमों में सर्वेक्षणों की प्रस्तुति का तीसरा पहलू है - सर्वेक्षणों की तुलनाओं का तुलनाओं माध्यम एक खास एक आधार पर सर्वेक्षणों के बीच तुलना करने की पद्धति का इस्तेमाल कर जनता की राय का एक खास बिंब तैयार कर सकते हैं। और इसमें जनता की राय में बदलावों का एक ख़ास विंब तैयार हो सकता. हैं। सन् 2000 से 2006 के बीच प्रकाशित 15.33 प्रतिशत प्रभावशाली लेखों में से (30.68 प्रतिशत लेखों में) एक सर्वेक्षण के नतीजों की तुलना दूसरे सर्वेक्षण के नतीजों से की गई थी। यदि विभिन्न सर्वेक्षणों की आपस में तुलना की जाए तो उसमें एक आधार बिंदु समय होता है(पहले या हाल• के सर्वेक्षण में) या फिर सर्वेक्षणों का चरित्र ।
सर्वेक्षण संबंधी अधिकांश लेखों में विभिन्न किस्म के सर्वेक्षणों (69.32 प्रतिशत) के बीच तलना नहीं की जाती लेकिन यदि विभिन्न सर्वेक्षणों की आपस में एक . भी तुलना मिल जाती है, तो इनके नतीजों की तुलना पिछले किसी सर्वेक्षण से की गई होती है या फिर इसी तरह के किसी सर्वेक्षण से (जिसमें सर्वेक्षण और विषय वहीं हों) यद्यपि अलग न्यूनतम बिंदुओं की तुलना भी संभव है, लेकिन ज्यादातर समान सर्वेक्षणों में ही आपसी तुलनाएं की जाती है।रुझानों को यही साबित करने के लिए रुझानों को यही साबित करने के लिए भी सर्वेक्षणों की तुलनाएं की जाती है। सर्वेक्षणों के नतीजों की तुलनाओं को सर्वेक्षणों की प्रणाली को सही या गलत साबित करने के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है।
में लाया जाता है। बहस और निष्कर्ष चूंकि आम जनता और राजनीतिक कार्यकलापों के लिए संचार माध्यमों की भूमिका को चुनाव संबंधी सूचनाएं देने में बहुत महत्वपूर्ण समझा जाता है, लिहाजा संचार माध्यमों और सर्वेक्षणों के बीच के घनिष्ठ रिश्ते की जांच पड़ताल सर्वेक्षण पर आधारित अखबारों के लेखों के विषय विश्लेषण के जरिए की जा सकती है। .अनुमान के अनुरूप, फ्लैंडर्स के अखबारों में मतदान संबंधी लेखों की संख्या बढ़ी है। 2000 में कुल 227 लेख सर्वेक्षण से संबंधित थे। सर्वेक्षण से संबधित इन लेखों की संख्या 2006 में बढ़कर 1473 लेखों की हो गई। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अन्य देशों की तुलना में बेल्जियम के फ्लैंडर्स में सर्वेक्षण सबधा लखा का रूझान दा है। सर्वेक्षणों पर आधारित बढ़ता जा रहा है। सर्वेक्षणों पर आधारित नोटों के केन्द्र में सर्वेक्षण से जुड़ी बातों का लेखों के केन्द्र में सर्वेक्षण से जुड़ी बातों का न है। यही वजह है कि अगर अनुपात यथावत है। यही वजह है कि अगर अनुपात यथावत है। यही वजह है कि अगर खबरों में सर्वेक्षणों का उपयोग होता है, तो णों का उपयोग होता है, तो ने वाली खबर न होकर वे हाशिए पर छपने वाली खबर न होकर रूप में प्रकाशित हुई। छपने प्रमुख खबरों के रूप में प्रकाशित हुई। छपने आधार पर खबरों के लिए की तारीख के आधार पर खबरों के लिए " ता निर्धारित होती दिखाई उनकी उपयुक्तता निर्धारित होती दिखाई सी राजनीतिक चुनाव वाले देती हैकिसी राजनीतिक चुनाव वाले महीने में चुनाव की तारीख से ठीक पहले ऐसे लेखों या समाचारों की संख्या सबसे ज्यादा होती हैं। अनुभवों से..उस बात की पुष्टि की जा सकता है। दूसरा " यही निष्कर्ष निकलता है। अगर हम सपना की किस्मों पर विचार करें, तो पाते है कि केवल राजनीतिक चुनावों पर ही खबरें नहीं छपती, दूसरे मुद्दों पर हुए सर्वेक्षणों को भी खबरों के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। लब्बोलुआब यह कि संचार माध्यमों के लिए सर्वेक्षणं खबरों का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं |
चूंकि संचार माध्यमों द्वारा दी जाने वाली जनमत सर्वेक्षण की सूचनाएं विभिन्न विषयों पर जनता की राय का सचक हैं इसलिए यह जरूरी है कि लोगों को सर्वेक्षण के बारे में सही और सटीक सूचना मिले। हालांकि, दिखाई यह पद रहा है सर्वेक्षण से जुड़ी खबरों की मात्रात्मक नोनी के अनपात में न नहीं हो पा रही है। अखबारों में छपने वालोर . गई सर्वेक्षण की प्रणाली से जुड़ी सूचनाएं गई सर्वेक्षण की अपेक्षाकृत बहुत सीमित होती है। अनेकों अपेक्षाक सर्वे शोध संगठनों द्वारा जारी किए गए सर्वे शो अंतर्राष्टी अंतर्राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों में जनसंचार माध्यमों में सर्वेक्षण संबंधी खबरों के प्रकाशन के में सर्वेक्षण लिए कम-से-कम प्रणाली संबंधी सात तत्वों लिए कम से के होने की संस्तुति की गई है। फिर भी, के हो? औसतन इन तत्वों की मौजूदगी बहुत ही और कम (0.5 से 2.5 के बीच) ही रहती है।
जनमत सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई खबरों को प्रस्तुत करते समय मीडिया जो भूमिका अदा करता है, उसका मूल्यांकन करने के लिए तीन तत्वों पर जोर देना पड़ता है। जनमत सर्वेक्षण की विश्वसनीयता, जनमत सर्वेक्षण की खबरों में व्यक्तिपरकता और जनमत सर्वेक्षण की तुलनाओं का इस्तेमाल । पहले पहलू के संबंध में यह बात सामने आती है कि मीडिया खबरों में सर्वेक्षण की प्रणाली का किस तरह से मूल्यांकन करता है, उससे मतदान के नतीजों की विश्वसनीयता बनाने में मदद मिलती है। (पालेज ए-आल-1980, चच-503-504) लेखों में सर्वेक्षण की प्रणाली के मूल्यांकनात्मक निष्कर्ष की कमी से यह निष्कर्ष निकलता है कि सर्वेक्षण के नतीजों का इस्तेमाल फ्लैंडर्स अखबार अच्छी तरह से जांच परख के बिना कर रहे हैं। यह बात पहले किए इन शाधपत्री जनता को सचेत करने की बजाय उन्हें यकीन दिलाया जाता है कि मीडिया की खबरों में सर्वेक्षण की आलोचनाएं नहीं होती(पालेज ए पक्षण आल, 1980, एण्डरसन, 2000) लेकिन ५ जब किसी सर्वेक्षण को व्यवस्थित ढंग से जांचा परखा गया, तो लगभग 31 प्रतिशत सर्वेक्षण संबंधी लेखों में तो उनके तौर • तरीकों को विश्वसनीय होने के बजाय अविश्वसनीय पाया गया। सबसे ज्यादा नकारात्मक तस्वीर चुनाव संबंधी सर्वेक्षणों की उभर कर आई। और इस पहल को उजागर करने वाले अकादमीशियन और राजनीतिज्ञ जैसे बाहरी कारक थे ।
राजनीतिज्ञ जैसे बाहरी कारक थे । सर्वेक्षण संबंधी लेखों में खबरनवीसी के सामान्य तरीकों को परखने से यह मालूम होता है कि सर्वेक्षण के नतीजों की 'वस्तुपरक' सूचना देना ही मुख्य लक्ष्य था, क्योंकि नतीजों को ठीक उसी तरह पेश किया गया था। समाचारपत्रों के लेखों में सर्वेक्षण की व्यक्तिपरक व्याख्याएं भी देखने को मिली, पर वे प्रभावशाली ढंग की नहीं थी। सर्वेक्षण की खबरों में व्यक्तिपरकता के बढ़ने का. मतलब होता है मीडिया द्वारा अपनी खबरों में सर्वेक्षण का सक्रिय रूप से इस्तेमाल करना है। इस अवधारणा को हमें सही परिप्रेक्ष्य में रख कर देखना पड़ेगा, क्योंकि इस अध्ययन में शामिल खबरों में व्यक्तिपरकता की वृद्धि का कोई संकेत नहीं था |
तीसरा पहलू जिस पर हम विचार कर रहे हैं वो यह है कि मीडिया जनमत सर्वेक्षण. प्रस्तुत करते समय सर्वेक्षणों की तुलनाएं किस तरह करता है। सर्वेक्षणों पर लिखे गए लेखों में से 45 प्रतिशत लेखों में सर्वेक्षणों के नतीजों की तलना दसरे सर्वेक्षणों या फिर चनावों के परिणामों से की गई थी। जब सर्वेक्षणों की आपस में तलना भी की गई तो एक जैसे पो सर्वेक्षणों से ही की गई जिनमें सर्वेक्षक भी एक जैसे ही थे और विषय- वस्तु भी एक जैसी थी। सिर्फ उनके वक्त में मोटा पीछे का अंतर था। तुलनाओं के बाद जो फर्क सामने आए जनमत में वास्तविक फर्क के तौर पर प्रस्तुत तुलनाओं के बाद जो फर्क सामने आए उन्हें किया गया। इस किस्म के निष्कष बार जनमत में वास्तविक फर्क के तौर पर प्रस्तुत शोध पर आधारित अपेक्षाओं के अनुरूप हा किया गया। इस किस्म के निष्कर्ष ब्रोह के शाध पर आधारित अपेक्षाओं के अनुरूप ही थेइसका अर्थ यह हुआ कि मीडिया जनमत सर्वेक्षण में जनता की राय में स्थिरता के बजाय अस्थिरता लाने की कोशिश करता है और इस तरीके से 'जनता के मत' में बदलाव पर लगातार जोर देता है। नतीजतन, हर नया सर्वेक्षण खबर बनता है क्योंकि वह पिछले वाले सर्वेक्षण से भिन्न नतीजे देता है या उसी तरह के नतीजों का बदलाव या रूझान के रूप में व्याख्या करके सर्वेक्षण पर खबरनवीसी के जरिए 'आम जनता की राय' को एक खास अंदाज में पेश करने में मददगार साबित होता है।