Wednesday, May 27, 2020

बेटी बनी कलियुग का श्रवण कुमार


किसी ने सच कहा है.... जिसके हौसले बुलंद और इरादे नेक होते है... उसके अंधेरे काले नहीं.... सफेद होते है...जी हां... सफर शुरु हुआ... सड़कों पर तपती गर्मी थी... डगर कठिन थी...मगर मंजिल पर जाना था...पैसों की कमी थी... घर दूर था... तो क्या हुआ... लेकिन घर तो जाना था...गर्मी भी थी... भूख भी थी...लेकिन घर तो जाना था..... इस दुनिया में सबसे बड़ी चीज भूख होती है... भूख के लिए इंसान एक ओर ना सही... सात समुंदर पार तक चला जाता है... रोटी के लिए वो अपने परिवार तक से दूर हो जाता है...किसी ने सच कहा है.... इंसान के लिए भूख से बड़ा मजहब और रोटी से बड़ा ईश्वर कोई नहीं होता....भूख के लिए रोटी से बड़ा इंतजार किसी भी चीज का नहीं है.. अपने बेगानों का भी नहीं यहां तक कि नफरत का भी नहीं है...लेकिन आइए आपको मिलवाते हैं.. कैसे बदनसीब रोटी जो इंतजार ही करती रह गई उसे उसे पता ही ना चला कि  कब भूख मर गई..कोरोना लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार प्रवासी मजदूरों पर ही पड़ी है.... काम धंधा बंद होने से उनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया और वे घरों की तरफ कूच कर रहे हैं



लाख कोशिशों के बावजूद उनका पलायन रुक नहीं रहा है... मजदूर न केवल बस और ट्रेन से अपने गृह राज्य पहुंच रहे हैं बल्कि बड़ी संख्या में लोग पैदल, साइकल से या फिर ट्रक से भी रवाना हुए हैं....कभी पैदल.... कभी साइकिल और कभी ट्रक की सवारी करके पहुंचे इन बाप बेटी की कहानी...बेटियां पिता का मान-सम्मान होती हैं... तो वहीं बेटी के लिए एक पिता उसकी जिंदगी के सबसे पहले हीरो होते हैं.... बेटी और बाप के प्यार की एक कहानी जो आज सबकी जुबां है और जिसकी चर्चा  अमेरिका में भी हो रही है.... एक 15 साल की बेटी घायल पिता को अपनी पुरानी सी साइकिल पर बैठाकर दिल्ली से दरभंगा पहुंच गई.... पिता मोहन पासवान का कहना है कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है तो वहीं बेटी का कहना है कि मैं अपने पिता की बेटी नहीं, बेटा हूं.....बिहार के एक छोटे से गांव की बेटी दरभंगा के ज्योति कुमारी की हौसले की चर्चा आज हर जगह हो रही है....सिरहुल्ली गांव की ज्योति लॉकडाउन में पिता को लेकर साइकिल से गुरुग्राम से दरभंगा पहुंच गई... 12 सौ किमी के इस संघर्षपूर्ण सफर को उसने जिस हौसले के साथ पूरा किया है वो सराहनीय है |


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