Thursday, May 28, 2020

ईश्वर


ईश्वर की खोज की बात ही गलत है। स्वयं को २ खोजो. ईश्वर मिलेगा। स्वयं को खोजो, ईश्वर तम्हें खोजेगा। स्वयं को न खोजा, लाख सिर पटको ईश्वर की तलाश में-और कुछ भी मिल जाए, ईश्वर मिलने वाला नहीं हैजो स्वयं को ही नहीं जानता, वह अधिकारी नहीं है ईश्वर को जानने का; उसकी कोई पात्रता नहीं है। पहले पात्र बनो।


आत्म-अज्ञान सबसे बड़ी अपात्रता है। वही तो एकमात्र पाप है। और सब पाप तो उसी महापाप की छायाएं हैं। और सारे पापों से लोग लड़ते हैं-क्रोध से लड़ेंगे, काम से लड़ेंगे, लोभ से लड़ेंगे, द्वेष से लड़ेंगे, मद-मत्सर से लड़ेंगे-और एक बात भूल ही जाएंगे कि भीतर अंधकार है। और ये सांप-बिच्छू उस अंधकार में पलते हैं। भीतर रोशनी चाहिए, प्रकाश चाहिए, आत्मबोध चाहिएध्यान की बात पूछो, ईश्वर की चर्चा ही मत उठाओ। ध्यान की बात पूछो, ईश्वर की चर्चा ही मत उठाओ। बीज बोए नहीं और फूलों की बात करने लगे! कहां से , फूल आएंगे? हां, प्लास्टिक के फूल मिल सकते हैं बाजार में। मंदिरों में, मस्जिदों में, गुरुद्वारों में, गिरजाघरों में प्लास्टिक के भगवान हैं, आदमी के गढ़े हुए भगवान . हैं। वे मिल सकेंगे। और अगर तुमने ज्यादा मेहनत की, - बहुत कल्पना को दौड़ाया, तो तुम्हारी कल्पना में भी धनुर्धारी राम का दर्शन हो जाएगा। सपना है वह, इससे ज्यादा नहीं। कि मोर-मुकुट बांधे हुए कृशण खड़े हो जाएंगे। वह भी तुम्हारी कल्पना है, इससे ज्यादा नहींजब तक तुम जागते नहीं हो भीतर, जब तक तुम भीतर : सोए हुए हो--उसी निंद्रा को मैं आत्म-अज्ञान कह रहा हूं-तब तक तुम जो भी करोगे, गलत ही होगा। विद्याधर, ईश्वर को क्यों खोजना है? ईश्वर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? और अगर ईश्वर तुमसे छिपना चाहता है...जरूर छिपना चाहता होगा, नहीं तो मिल जाता, खुद ही तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता। आखिर यह ताली दोनों तरफ से बजनी है, यह आग दोनों तरफ लगनी है। एक हाथ से ताली नहीं बजती। अगर परमात्मा तुम्हें नहीं खोजना चाहता है और भागा-भागा फिरता है, तो तुम कितना ही खोजो, तुम्हारी बिसात कितनी है? तुम्हारे हाथ कितने दूर जा सकेंगे? तुम्हारी पहुंच की सीमा है और वह असीम है। वह अपने को छिपा-छिपा लेगा। लेकिन लोग सोचते हैं यह बड़ी तात्विक बात है-ईश्वर को खोजना। अपने को खोजेंगे नहीं, ईश्वर को खोजने. के लिए राजी हैं। असली सवाल यह है: मैं हूं, तो क्या हूं? का हूं?


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