Wednesday, May 27, 2020

हिंदुत्व और हिंदू शब्द की राजनीति


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 27 दिसंबर, 2019 के अपने एक भाषण में कहा कि संघ भारत की 130 करोड की आबादी को हिदू समाज मानता है: 'भारत माता का सपूत चाहे वह कोई भी भाषा बोले. चाहे वह किसी भी क्षेत्र का को, किसी स्वरूप में पूजा करता हो या किसी भी तरह की पूजा में विश्वास नहीं करता हो, एक हिंदू है... 'इस संबंध में, संघ के लिए भारत के सभी 130 करोड़लोग हिंदू समाज है।" उन्होंने आगे कहाः 'एक प्रसिद्ध कहावत है विविधता में एकतालेकिन हमारा देश उससे एक कदम आगे है। सिर्फ विविधता में एकता नहीं बल्कि एकता की विविधता। हम विविधता में एकता नहीं तलाश कर रहे हैं। हम ऐसी एकता तलाश कर रहे हैं जिसमें से विविधता आए और एकता हासिल करने के विविध रास्ते हैं।' इस वक्तव्य में भागवत ने रवींद्रनाथ टैगोर के 1904 के प्रसिद्ध 'स्वदेशी समाज' नाम के निबंध को भी अपने कथन के समर्थन में उद्धृत करते हुए कहा, 'हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अंतर्निहित अंतर्विरोधों के बाद भी हिंदू समाज देश को एकजुट करने का रास्ता तलाशने में सक्षम है। यह भी कहा कि भारत देश परंपरा से हिंदुत्ववादी है। हालांकि यह टैगोर के निबंध से उद्धरण परी तरहसच नहीं है क्योंकि टैगोर इस निबंध में जब हिंदू समाज की बात करते हैं तो वह सिर्फ हिंद समाज की बात करते हैं न कि परे भारतीय समाज की |


इस बयान से कछ महीने पहले सितंबर. 2019 को भागवत ने ही कहा था कि किसी भी हिंदू को देश छोडकर नहीं जाना पडेगा। यह बयान उन्होंने असम की एनआरसी की रिपोर्ट के प्रकाशित होने के कही थी। सरसंघचालक के सितंबर वाले बयान से यह जाहिर है कि उनका यह आश्वासन सिर्फ हिंदुओं के लिए है और इसमें वे मुसलमान सामल नहीं हैं जिनका एनआरसी में नाम नहीं हाल ही में भारतीय संसद के द्वारा पारित किए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम में भी अप्रवासी को भारत की नागरिकता की बाहर रखा गया है, जबकि पाकिस्बांग्लादेश और अफगनिस्तान के अन्य धार्मिक समुदायों का यह अधिकार दिया गया है। 


भागवत के इन दो बयानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्टीय सेवक संघ हिंदू' शब्द का प्रयोग दो अलग-अलग अर्थों में कर रहा है। इसमें कुछ नया नहीं है बल्कि इस प्रकार के शब्दजाल और भ्रांतियां संघ-और आम तौर पर संघ परिवार के सभी घटक. जिसमें भाजपा भी शामिल है-दशकों से फैला रहा है। लइस कैरोल के मशहर चरित्र हम्प्टी-डम्पटी की तरह संघ भी शब्दों के अर्थों को अपने नियंत्रण में रखकर उनको अलग संदर्भो में अपनी जरूरत के हिसाब से अर्थ देना चाहता है, और वैसे भी उसका दो-मुंहे सांप वाला चरित्र जग जाहिर है। इसी प्रकार का शब्दार्थ का खेल संघ परिवार सेक्युलरिजम के अनुवाद केसाथ भी कई दशकों से इस आग्रह के साथ खेलता आ रहा है कि सेक्युलरिजम का सही अनुवाद पंथ-निरपेक्ष होना चाहिए न कि धर्म-निरपेक्ष ।इस आग्रह के पीछे तर्क यह दिया जाता है कि हिंदूइज्म एक पंथ नहीं बल्कि धर्म है लेकिन इसके साथ ही वैधानिक तौर पर जिस धर्म या पंथ को हिंदू जाना जाता है उसका कुछ और नाम भी देने को तैयार नहीं हैं जैसे की वैदिक पंथ या ब्राह्मण पंथ।


लेकिन अगर यह सिर्फ किसी शब्दजाल या शब्दार्थ संबंधी कोई भ्रांति होती तो शायद मामला उतना गंभीर नहीं होता।'हिंदू' शब्द के इस बहुआयामी प्रयोग की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है, जिसका संबंध सिर्फ आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद, हिदू राष्ट्रवाद और हिंदुत्व से गहरा संबंध है बल्कि जा हिंदुत्व की 'हिंदू' शब्द की राजनीति के केंद्र में है।


धर्म अध्ययन के प्रसिद्ध मित विद्वान अरविंद शर्मा ने अपने लेख ऑन हिंद, हिंदुस्तान, हिंदूइज्म, एंड हिंदुत्व में आ सिंधु' और 'इंडस' शब्दों के इतिहास 'हिंदू', 'सिधु विश्लेषण करते हुए दिखाया है कि इन शब्दों का विर से प्राचीन उपयोग- जैसे की पारसी, यूनानी, और चीनी स्रोतों में -भौगोलिक या क्षेत्रीय अर्थ में हुए । इस प्रयोग में इन शब्दों का अर्थ सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्रों के निवासियों के लिए होता था। लेकिन चीनी स्रोतों के साथ ही इनका अर्थ इस क्षेत्र के निवासियों के धार्मिक विश्वासों के वर्णन के रूप में भी होना शुरू हो..जाता है। यह एक नकारात्मक उपयोग था। जिसके अंतर्गत 'हिंद सिंध नदी के पूर्व के निवासियों के विभिन्न धार्मिक विश्वासों को दिया गया सामूहिक नाम था। इन्हीं दो अर्थों में हिंदूशब्द का प्रयोग 11वीं शताब्दी और उसके बाद के मुस्लिम, फारसी और आदी मिलता है अल-बरूनी-जो महमूद गजनी के साथ भारत आया था-की किताब अलहिंदमें भी इस शब्द का प्रयोग इन्हीं दो अर्थों में होता है। अल-बरूनी इस विमर्श में एक और पहलू जोड़ता है जो बीसवीं शताब्दी तकप्रचलित है। एक तरफ तो वह बौद्धों और वैदिक ब्राह्मण धर्म के मानने वालों के बीच भेदों को स्वीकार करते हैं, दूसरी तरफ वह न सिर्फ इन दोनों समुदायों को, बल्कि हिंदुस्तान के उन तमाम समुदायों को जो मुस्लिम नहीं हैं, हिंदूनाम देते हैंतत्कालीन हिंदुस्तान में विद्यमान तमाम धार्मिक मतों, संप्रदायों और विश्वासों और पूजा पद्धतियों के आंतरिक भेदों को स्वीकार करते हुए अलबरूनी उनको एकता के सूत्र में इस आधार पर भी पिरोने की कोशिश करते हैं कि वे सब हिंदू हैं जो पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं! 


पुनर्जन्म दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में भी धर्मों, मतों, विश्वासों और पूजा पद्धतियों की यह विविधता प्रचलित रहती है लेकिन इसके साथ ही इस काल में दो अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू इसमें जुड़ते हैं। एक तो यह कि हिंदू शब्द का इस्तेमाल- जो पहले सिर्फ गैर-हिंदू करते थे -हिंदुओं के द्वारा, अपने आपको चिह्नित करने के लिए होने लगा; यानी उनकी अपनी पहचान की चेतना को इंगित करने लगा।हिंद शब्द और अवधारणा के इतिहास के लिहाज से यह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। दूसरी तरफ इस्लाम धर्म और मुसलमानों केसंपर्क में आने से कछनई पजा पद्धतियां, विश्वास और संप्रदाय - जो इस संपर्क और मिश्रण से पैदा हुए - इस विविधता में जुड़ जाते हैं । उदाहरण के तौर पर गैरमुसलमानों द्वारा सूफी पीरों में विश्वास और मुसलमानों में जातियों का विकास।इसके साथ ही कुछ ऐसे समुदाय भी उभरे जिनको सीधेसीधे हिंदू या मुसलमान के खाकों में बांटना मश्किलें तब आसान नहीं था और ऐसी तमाम मुश्किलें तब सामने आई जब ब्रिटिश राज ने अपनी जनगणना में समदायों को धार्मिक आधार पर स्पष्ट खानों औपनिवेशिक काल से' रवानों त करना शुरू किया। माल से पहले हिंदू शब्द का या वैदिक धर्म के मानने वाले समदाय अपने लिए करना शुरू करते हैं और कुछ हद तक हिंदू सांस्कृतिक आत्म-चेतना का. विकास भी होता है, लेकिन वृहत्तर समाज को धार्मिक मतों, संप्रदायों, और पूजा पद्धतियों की विविधता और मिश्रण ही चरितार्थ करते रहे |


ही चरितार्थ करते रहेहिंदू शब्द के इतिहास में और हिंद सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के इतिहास में औपनिवेशिक शासन ने निर्णायक भूमिका निभाई जिसके दूरगामी परिणाम निकले। इस दृष्टि से औपनिवेशिक काल में हुए कुछ परिवर्तन निर्णायक सिद्ध हुए। 19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन ने सभी धर्मों के कानूनों में संशोधन कर सभी धार्मिक समुदायों को अखिल भारतीय स्तर पर वर्गीकृत किया और उनको एक स्पष्ट कानूनी पहचान देने का काम किया। वहीं दूसरी तरफ औपनिवेशिक जनगणना ने धर्म और जाति के आधार पर गणना कर धार्मिक और जाति समुदायों को स्पष्ट प्रशासनिक पहचान दी जिसके भारतीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़े। जनगणना की इन विधियों में उन मिश्रित पहचानों के लिए कोई जगह नहीं थी जैसे की गुजरात का एक समुदाय जो 'हिंदू-मोहम्मडन' के नाम से जाना जाता था। विभिन्न जनगणनाओं के दौरान इस तरह के बहुत सारे उदाहरण औपनिवेशिक प्रशासकों के सामने आए। राजनीतिक विमर्श की दृष्टि से औपनिवेशिक जनगणनाओं का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव बहुसंख्यक' और 'अल्पसंख्यक' श्रेणियों का आविर्भाव था। 20वीं सदी के पहले दशक में मुस्लिम लीग के बनने के बाद इन श्रेणियों का सीधा संबंध राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ गया जिस पर मोरले-मिंटो संवैधानिक सुधारों ने अपनी मोहर लगाकर भारतीय राजनीति में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता के आधुनिक राजनीतिक रूप को जन्म दिया।


प्रशासनिक और वैधानिक परिवर्तनों के साथ ही 19वीं सदी के शुरुआती दशकों से ही एक समानांतर विमर्श सभ्यता, संस्कृति और धर्म के सवालों पर केंद्रित था। इस विमर्श की पृष्ठभूमि. में औपनिवेशिक शासन का वह आख्यान था जिसे 'सिविलाइजिंग मिशन' के नाम भयान में भारत के सभी धर्मोंजिसे सिविल जाता विशेष विशेष तौर पर हिंदू धर्म-को असभ्य बताया गया और हिंदू समाज के पिछड़ेपन के लिए को जिम्मेदार ठहरायाइसी काल में ईसाई मिशनरी इस आख्यान का इस्तेमाल ईसाई धर्म प्रचार के लिए और धर्म परिवर्तन के लिए भी कर रहे थे । प्रतिक्रिया स्वरूप 19वीं सदी के शरुआती दशकों से ही मध्यवर्गीय और शिक्षित हिंदुओं में - विशेष तौर पर सवर्ण हिंदुओं मेंदो धाराएं धर्म के सवाल पर उभरती हैं: एक सुधारवादी आंदोलन की धारा और दूसरी धर्मसभाओं के रूप में जिसका जोर धर्म सुधार की बजाय धर्म बचाव पर रहा; हालांकि धर्म सभाएं भी पूरी तरह से समाज-सुधार की विरोधी नहीं थीं।इन धाराओं के आपसी विरोध के बावजूद दोनों धाराएं आधुनिक हिंदू धर्म का नेतृत्व करती हैं और विभिन्न रूपों में हिंदू आधुनिकता के जन्म और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं19वीं सदी में इन धाराओं के नेतृत्व जहां एक तरफ राममोहन रॉय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महादेव गोविंद रानाडे, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे दिग्गज समाज सुधारकथे, वहीं दूसरी तरफ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालगंगाधर तिलक सरीखेलेखक और राजनेता थे।


19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ये दोनों धाराएं सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में थीं। यह कहना भी पूरी तरह से सही नहीं है की इन दोनों धाराओं में सिर्फ विरोध है क्योंकि एक ऐसा दायरा भी है जिसमें ये दोनों धाराएं काफी कुछ साझा करती हैं। जैसे कि दोनों धाराओं में एक तरफ ईसाई मिशिनरियों का विरोध साझा जमीन है, वहीं दूसरी तरफ हिंदू पुनरुत्थानवादी पुट दोनों में विद्यमान है। जिस विमर्श को हम हिंदू राष्ट्रवाद के नाम से जानते हैं उसमें इन दोनों धाराओं का योगदान है। बाद में हिंद राष्टवाद के विमर्श में स्वामी विवेकानंद और श्री अरबिंदो ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 19वीं सदी के इन्हीं विमर्शों ने ही पहली बार 'हिंदइज्म' शब्द को भी अंग्रेजी में लोकप्रिय बनाया।कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि हिंदडज्म' शब्द का पहला इस्तेमाल राजा राममोहन रॉय ने 1816 माकन था जिसके बाद मैक्सम्यलर आदि संस्कृत प्राच्यवादी विद्वानों ने इसका प्रयोग किया। 19 सदी में हिंदुइज्म' जिसका हिंदी अनुवाद हिंदू-धर्म ही होना चाहिए न कि हिंदुत्व, हालांकि हिंदुत्ववादी इस फर्क को मिटाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं -- की अवधारणा का उदय और उसका इस्तेमाल 'हिंदू' और संबंधित शब्दों के इतिहास में और हिंदू सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के विकास में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।


इस लेख की विषयवस्तु की दृष्टि से 19वीं सदी के विमर्शों का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि इनमें हिंदू और 'हिंदुइज्म' का इस्तेमाल धर्म और क्षेत्रीय अर्थों के अलावा हिंदू सभ्यता और संस्कृति के तौर पर भी होने लगाजैसा कि बंकिम और टैगोर दोनों ने लिखा है कि सभ्यता (सिविलाइजेशन) और संस्कृति (कल्चर) दोनों अवधारणाएं पश्चिम की देन हैं और दोनों का आधुनिक काल से पहले भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल नहीं होता और न ही उनके लिए शब्द थे। लेकिन इन दोनों अवधारणाओं का सफल अनुवाद हुआ और दोनों का हिंदू राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद में महत्त्वपूर्ण योगदान है। बंकिम ने अपनी पुस्तक धर्मतत्वमें हिंदू धर्म को अनुशीलन (कल्चर का संस्कृति से पहले का बांग्ला अनुवाद) का पर्याय बताया है। सव्यसाची भट्टाचार्य ने अपनी किताब टॉकिंग-- बैक : द आइडिया ऑफ सिविलाइजेशन इन इंडियन नेशनलिस्ट डिस्कॉर्स में इस अवधारणा का विस्तार से विवेचन कर दिखाया है कि सभ्यता की अवधारणा का इस्तेमाल सभी महत्त्वपूर्ण राष्ट्रवादी चिंतकों ने भारतीय राष्ट्र के 'एकता का आधार के रूप में किया।


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