द्वारा समाज के व्यक्तियों के तरह प्रचार के द्वारा समाज का यथा पचार एक मनोहार जिसके समाज के वाकियों की सोच या ' (जनमत) पर प्रभाव लाता है। इस कद्वारा समाज का यथा आवश्यक म नियंत्रण किया जाता है। इस प्रकार प्रचार एक प्रयास है ताकि जनमत का दिशा का निर्धारण इच्छित एवं पूर्व निर्धारित लक्ष्य पाने के लिए हो सकता है। सभी सामाजिक वैज्ञानिक मानते हैं कि प्रचार एक मनोवैज्ञानिक साधन है। मनोविज्ञान का अर्थ मन का विज्ञान हुआ अर्थात मन की भावनाओं को समझना है। यदि हम जनमत को इच्छा के अनुरूप निर्धारण करना चाहते हैं तो प्रचार का मनोविज्ञान समझना होगाइसके लिए व्यक्ति एवं समाज का चेतन, अवचेतन एवं अवचेतन एवं अचेतन-सचेतनता की तीनों अवस्थाओं का अध्ययन कर तीनों अवस्थाओं पर प्रभावित करना होगा।
सत्ता व्यवस्था पर आरोप लगता है कि सत्ता चाहती है कि जनता का पेट खाली रहे क्योंकि खाली पेट वाले दिमाग में विचार प्रक्रिया निरस्त रहती है। खाली पेट वाले पहले पेट भरने के जतन में व्यस्त रहते हैं, विचार प्रक्रिया ठप रहती है। ऐसी अवस्था में शिक्षा का कोई अर्थ नहीं होता और तब प्रचार के कुछ आसान एवं सस्ते तरीके मिल जाते हैं। जनता के सामने धुंध पैदा करनी होती है ताकि अस्पष्ट स्थिति में सत्ता पक्ष के प्रचार तंत्र जनता को बहला सके, ऐसा भी आरोप लगता हैजनता तमाशबीन होती है और तमाशा/नौटंकी में तालियां खूब बजती हैं। इन तमाशा, नौटंकियों में जनता की अवचेतन की कमजोरियों का ही दोहन किए जाने का आरोप लगाया जाता है |
प्रत्यक्ष प्रचार को चेतन प्रचार तथा अप्रत्यक्ष स्तर का प्रचार भी कहा जा सकता है। प्रत्यक्ष प्रचार में लोगों को प्रचार करने वालों के उद्देश्य का पता होता है। जैसे अमुक सामान या सेवा उत्तम है या अमुक राजनीतिक दल अच्छा है। लेकिन प्रत्यक्ष प्रचार में प्रचार करने वाले के बारे में उद्देश्य का पता नहीं रहता तथा यह भी पता नहीं होता कि यह प्रचार भी है। भारत में वर्ष 2016 में की गई नोटबंदी को कुछ लोग प्रत्यक्ष प्रचार की श्रेणी में, तो कुछ लोग इसे अप्रत्यक्ष प्रचार की श्रेणी में रखते हैं। कुछ लोग इसे प्रचार की श्रेणी में ही रखे जाने पर आपत्ति व्यक्त करते हैं कि यह एक आर्थिक निर्णय था, प्रचार नहीं था। जबकि प्रत्यक्ष या अप्रत्क्ष प्रचार की श्रेणी में इस निर्णय को मानने वालों के अपने तर्क हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि सत्ता व्यवस्था ने इसके द्वारा निम्न आर्थिक एवं मध्यम वर्ग को जो बहुसंख्यक मतदाता है, को प्रभावित करने के लिए उनके अचेतन मनोवैज्ञानिक अवस्था का दोहन किया है। इस वर्ग ने अपने आर्थिक संकट के लिए उनके अनुसार घोषित शत्रु उच्च वर्ग को पस्त कर दिया, ऐसा माना जाता है कि ऐसी धुंध से जनता उस समय उत्साहित हो गई।
सकारात्मक एवं रचनात्मक प्रचार को शिक्षा का स्वरूप भी कह सकते हैं। वैसे शिक्षा एवं प्रचार दोनों को पूरक भी माना जा सकता है। क्योंकि शिक्षा के माध्यम से तर्कपूर्ण एवं उचित संदेशों के द्वारा अपने विचारों को जनता में आसानी से पहुंचाया जा सकता है। शिक्षा के माध्यम से छात्रों के अंदर मनोवैज्ञानिक प्रभाव के द्वारा उनके विचारों तथा व्यवहार को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करने का सचेतन प्रयास किया जाता है। इसी कारण विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में हस्तक्षेप कर जनमत को प्रभावित करने, खासकर नकारात्मक एवं विध्वासात्मक प्रभाव पैदा करने के आरोप लगाए जाते हैं। जनमत निर्धारण में शिक्षा का प्रभाव दीर्घकालीन होता है। इसी कारण हमारे ऐतिहासिक समाज में बहुसंख्यक समाज को शिक्षा से वंचित कर दिया गया तथा शिक्षित प्रचारक अपने गलत उद्देश्य की सामाजिक व्यवस्था थोपने एवं संचालित किए रहने में कामयाब रहे, जिसे अब दिमागी गुलामी भी कहा जाता है। जनमत का ऐसा प्रभाव होता है कि वह अपनी गुलामी को समझना और मानना ही नहीं चाहता, उसे फेंकना तो दूर की बात है। यहां प्रचार का अध्ययन भी आवश्यक है। शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति एवं समाज का समचित सर्वांगीण विकास संभव है। इसी कारण डॉ. अंबेडकर शिक्षा पर जोर देते रहते हैं। शिक्षा के व्यापक प्रचार प्रसार के लिए प्रचार के पहलुओं को समझकर अमल में लाने के लिए विचार करना होगा |
समय एवं उद्देश्य के अनुसार प्रचार मं...से भाषण देते हैं, पर्चे बांटते हैं, गाना सुनाते हैं, वीडियो दिखाते हैं, सोशल नेटवर्किंग का प्रयोग करते हैं। वर्ष 1937 में अमेरिकी जनता को शिक्षित करने के लिए प्रचार विश्लेषण संस्था- द इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोपेगेंडा ऐनालिसिस की स्थापना की गई। इस • व्यवस्थित अध्ययन से कई बातें सामने आईं। प्रचार में मनोवैज्ञानिक अवलोकन एवं विधियों का उपयोग करके मनुष्यों की मनोवृत्तियों तथा मानव व्यवहार को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया जा सकता है। प्रचार जानबूझकर किया जाता है, यह विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। प्रचार सुझावों के रूप में होता है। इसमें असत्यता और अस्पष्टता भी होती है। यंग किम्बल (A Handbook of Social Psychology, 1957) मानते हैं कि प्रचार के कार्य में सुझावों की मुख्य भूमिका होती है। सुझावों के विकल्पों के द्वारा व्यक्ति को इच्छित दिशा में धकेला जाता और उपलब्ध - विकल्प में ही एक को अपना मानता है और उसके समर्थन में जी जान से लगा रहता हैसवाल है कि आप भारत की किस व्यवस्था को पसंद करते हैं। सत्तर साल पुरानी व्यवस्था को या वर्तमान व्यवस्था को। यहां दो विकल्प हैं। आप इन दो विकल्पों में व्यवस्था की ..बात में असत्यता को तलाश सकते हैं। इस तरह यह सवाल आपके विचारों को एक हजार साल पुरानी व्यवस्था की दुर्दशा या उसके पूर्व की अवस्था की ओर जाने नहीं देता हैयानी दुर्दशा के अन्य कारणों की ओर ध्यान जाने से रोकता है और जनमत निर्धारण में अपनी भूमिका निर्धारित कर देता है।
प्रचार अध्ययन में उपरोक्त प्रचार विश्लेषण संस्था के द्वारा सात अन्य प्रचार विधाएं निम्न हैं।
1. Name-Calling Technique : इस विधि में प्रचारक अपने समर्थकों और अनुयायियों को अच्छे-अच्छे नामों के द्वारा अलंकृत करता है तथा विरोधियों को बुरे नामों एवं अलंकरणों से पुकारा जाता है। स्वयं को सच्चा राष्ट्रभक्त, देशप्रेमी, समाजवादी, हिंदूवादी तथा विरोधियों को देशद्रोही, अवसरवादी, शोषक, कालाधन वाला इत्यादि कहता हैइस प्रकार के नामों से कम पढ़े लिखे और भावुक लोग तुरंत प्रभावित होकर प्रचारक की बातों में आ जाते
2. Glittering Generalities : प्रचारक की प्रचार विधियों में प्रचारक लोक बातों, नारों के द्वारा जनता को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करता है। भारत की अधिकांश जनता मानसिक गुलाम और भावुक है। इस कारण जनता लोक लुभावन नारों में जल्दी आ जाती है। मसलन-'गरीबों की सरकार', 'आम आदमी की पार्टी', 'अच्छे दिन आने वाले हैं', 'मुफ्त राशन', 'दलित का . उत्थान' आदि।
3. Transfer : प्रचारक अपनी बात को .. जनता. तक पहुंचाने के लिए. अलौकिक शक्तियों के नाम का सहारा लेता है। अपने प्रचार में वह · देवी-देवता, पीर फकीर और जनसमुदायों में स्थापित महापुरुषों आदि का प्रयोग करता है। प्रचारक को पता होता है कि जनसमुदाय की भावना इन प्रतीकों से जुड़ी रहती है। अलौकिक शक्तियों में गंगा पूजा, डॉ. अंबेडकर और पटेल से जुड़े भावनात्मक स्थलों, संदेशों का उपयोग करते हैं।
4. Testomonial Method : इस विधि में प्रचारक तथा उनका समूह जाने माने, सम्मानित तथा स्थापित व्यक्तियों या संस्तुतियों को अपने पक्ष में करके दिखाते हैं। इससे यह साबित हो जाता है कि अमुक प्रसिद्ध व्यक्ति भी हमारे समर्थक थे या हम उनके ही समर्थक हैं। उदाहरण के लिए चुनाव के समय राजनीतिक दल अपने पक्ष में जनप्रिय छवि वाले को अपने पक्ष में दिखाते हैं। जैसे शाही इमाम, शंकराचार्य, अन्ना हजारे, फिल्मी सितारे या खिलाड़ी आदि।
5. simple Folkway : जनता की भावना को अपने पक्ष में नियंत्रित करने के लिए नेता या प्रचारक वे कार्य करते हैं जो जनता तथा जनसामान्य व्यक्ति लोकाचार में करते हैं। इससे जनता में यह संदेश जाता है कि हम भी आम जनता जैसे ही हैं और आपकी भावनाओं से सहानुभूति रखते हैं। दलितों के घर जाकर भोजन करना या महात्मा गांधी का अर्धनग्न बदन रहना या विपदा की घड़ी में शामिल होना आदि भी इसी का उदाहरण है।
6. Card Stacking : छल-कपट तथा तोड़-जोड़ का प्रयोग किसी के कहे या किए गए कार्य को अपने लाभ के लिए व्याख्यापित किया जाता है। जैसे आरक्षण के संबंध में दिए गए व्यक्तव्य को भिन्न-भिन्न अर्थों में विभिन्न लोग प्रयोग करते हैं |
7. Bandwagon Technique : इस विधि में यह प्रचारित किया जाता हैं कि जनता का सहयोग व समर्थन “प्रचारक को प्राप्त हो रहा है अर्थात इस प्रविधि में भ्रामक विजय का . ढिंढोरा पीटा जाता है। इस प्रकार के ‘प्रचार में प्रचारक यह सिद्ध करता है कि वह जो प्रचार कर रहा है, उसे बहुसंख्यक आबादी का समर्थन करता है। इसमें भ्रामक सार्वभौमिकता का प्रभाव दिखा कर जनता का ध्यान अपनी ओर केंद्रित किया जाता है। चुनाव के समय चुनावी सर्वेक्षण में किसी के पक्ष में मतदाता का रुख दिखाना मतदाता पर किसी के पक्ष में मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना है। प्रचार को सफल बनाने में मीडिया अत्या. महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत सभी स्थापित प्रिंट तथा डिजिटल मीडिया पर यथास्थिति बनाए रखने का गंभीर आरोप है। इसका ढांचा बहुसंख्यक का प्रतिनिधित्व भी नहीं करता है। वर्तमान समाज में युवाओं एवं सूचना तकनीक के कारण सोशल मीडिया और इंटरनेट की उपयोगिता बदलती जा रही है। उपरोक्त का अध्ययन कर समाज एवं भारत में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी अशिक्षा, मानसिक गुलामी, बीमारी, संकीर्णतावाद आदि दूर कर सुंदर, सफल, विकसित और सुसंस्कृत समाज बनाया जा सकता है और देश को आगे बढ़ाया जा सकता है |
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