इस दुनिया में सबसे ज्यादा इंतजार अगर किसी चीज का होता है तो वो खाना है... इस दुनिया में जहां भी जिस शक्ल में जिंदगी नजर आती है.. उसका पहला इंतजार होता है खाना.. इंसानों में इस खाने को कहते हैं रोटी.. रोटी से बड़ा इंतजार किसी भी चीज का नहीं है.. प्यार का भी नहीं.. रिश्ते नातों का भी नहीं.. अपने बेगानों का भी नहीं यहां तक कि नफरत का भी नहीं है
लेकिन आइए आपको मिलवाते हैं.. कैसे बदनसीब रोटी जो इंतजार ही करती रह गई उसे उसे पता ही ना चला कि कब भूख मर गई.. सियासत के चश्मे से देखें आप तो भूख का मर जाना कोई हादसा नहीं.. हां अगर इंसान मर जाता तो सियासत के माथे पर पसीना आ जाता.. लेकिन कोई भूखा ना रहे यही तो कलमा है इसे पढ़कर मजह-ए-सियासत का पहला कदम रखा जाता है.. तो फिर इस तरह भूख के मर जाने पर उससे किसी गम की उम्मीद करना बेईमानी है
कोरोना के इस खौफ के बीच वो सब लोग इंसान कहलाते हैं.. जो सब अपने-अपने कमरों में बंद है और आप जो सड़कों पर ये हुजूम देख रहे हैं.. ये भूख है.. सड़क के किनारे- किनारे.. बस अड्डों के आंगन में.. रेलवे लाइन के साथ-साथ पटरियों के प्लेटफार्म पर.. ये जो कभी न खत्म होने वाली कतारें सुबह शाम रात दिन आपको दिखाई दे रही है.. ये भूख है जिसे खत्म करना है करना ही पड़ेगा.. क्योंकि हिंदुस्तान तभी आत्मनिर्भर बन सकेगा
भूख की अपनी एक दुनिया है साहब.. हमारी और आपकी तरह इनका भी परिवार होता है.. मां बाप होते हैं.. बीवी- बच्चे होते हैं.. इसमें कोई शक नहीं की करोना पूरी दुनिया के लिए बड़ी आफत लेकर आया है लेकिन इस आफत में भी ये अपने लिए मौके ढूंढ लेंगे.. इस आफत ने बिलबिलाती हुई भूख जो बाहर निकलती है.. ये गर्मी और लू में ज्यादा नहीं दिखती.. ये बिलखते हुए मासूमों के चेहरे.. जवानों के पीठ पर सवार बूढ़ी बूख है.. यह मासूम भूख जो जवान की हाथ में लहरा रहा है.. जवान भारत की भूख जो भूख से मर चुके बैल की जगह खुद बैलगाड़ी खींच रहा है.. आखिर कब तक जिंदा रह पाएगी
फिक्र मत कीजिए.. जल्दी मर जाएगी.. आप शायद भूख को नहीं जानते.. ये ऐसी नस्ल है जो खाने की तलाश में अपने- अपने गांव से हजारों मील दूर काम की तलाश में सफर कर लेती है.. और दूर-दूर बसे शहरों में जाकर दो वक्त की रोटी के लिए उनके चेहरों को चमकाती है.. जो उनकी भूख का बड़ी होशियारी से फायदा उठाता है.. जो जानता है कि भूख बड़ी ज़िद्दी और संवेदनशील है.. दो रोटी पर थोड़ा नमक रख कर दे दीजिए.. फिर ये कभी नमक हरामी नहीं करती.. जीने के लिए पैदा हुई नहीं होती.. मरना ही इसका जीना है
इस भूख का एक नाम और है.. जो कभी न खत्म होने वाली कतारें आप सड़कों पर देख रहे हैं.. उन्हें आप अंगूठे भी कह सकते हैं.. जी हां अंगूठे.. दिल्ली से लेकर बिहार तक दिखने वाली ट्रेनों में, बसों में सड़कों के फुटपातों में.. ये अंगूठों की ही कतारें हैं...असल में इनका ये नाम सियासत ने ही रखा है |
सियासतदां इन्हे अंगूठा कहते हैं.. जिन्हे हर पांच साल बाद इनकी जरूरत पड़ती है.. ये भूखे अंगूठे सड़कों पर आपको दिखाई पड़ रहे हैं.. किसी ठेले को खींचते हुए .. रिक्शे के पैडल मारते हुए.. सब्जी बेचते हुए... बोझा उठाते हुए.. मजदूरी करते हुए .. पेट के लिए गालियां खाते हुए.. मौत से जूझते हुए .. आपको धोखा होता है कि ये आप जैसे हैं .. नहीं ये इंसान नहीं है ये बस भूखे अंगूठे हैं
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