Thursday, May 28, 2020

सर्वेक्षण के आंकड़े और जनता की राय

आकड़ों पर आधारित पत्रकारिता का चलन पिछले एक दशक के दौरान तेजी से बढ़ा हैआंकड़ों का महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है या उनकी व्याख्या किस तरह से की जा रही है। आंकड़ों का एक स्त्रोत विभिन्न तरह के सर्वेक्षण या अध्ययन होते हैं। इन सर्वेक्षणों या अध्ययनों से जो आंकड़े तैयार किए जाते हैं, उनको कई बार मीडिया संस्थान खबरों के रूप में पेश करते हैंसर्वेक्षण कंपनियां चुनाव के दौरान ओपिनियन पोल या एग्जिट पोल करती रही हैं या फिर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनने को लेकर सर्वेक्षण करती है। इन कंपनियों के एग्जिट पोल पर उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि ये एग्जेक्ट पोल नहीं है। लेकिन इन सर्वेक्षणों को लोगों की राय के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है। 


इस अध्ययन में सर्वेक्षण कंपनी के सर्वे को मीडिया द्वारा प्रस्तत करने के तौर-तरीकों, सर्वेक्षण को करने के लिए अपनायी जाने वाली अध्ययन पद्धति (मसलन- किस तरह के सवाल पूछे गए. 500 असम के लोगों के अलावा बाकी 2500 लोग जिनको सर्वेक्षण ल किया गया उनके बारे में जानकारी) र सवेक्षण के उद्देश्यों की पड़ताल करने की कोशिश की जायेगी।


मीडिया द्वारा सर्वेक्षण की खबरों के रूप में प्रस्तुति


आईएएनएस-सीवोटर ने 17 से 19 दिसंबर दिसंबर 2019 के दौरान एक स्नैप पोल में नमूने के तौर तीन हजार लोगों के बीच एक सर्वेक्षण किया, इस सर्वेक्षण में असम से सबसे अधिक लोग यानी कि 500 लोगों को शामिल किया गया। इस सर्वेक्षण के आंकड़ों को कई मीडिया संस्थानों ने 21 दिसंबर 2019 को खबरों के रूप में प्रस्तुत किया। यहां नमूने के तौर पर आजतक, दैनिक जागरण, दैनिक हिन्दुस्तान और आउटलुक मैग्जीन की वेबसाइट के शीर्षक को देखा जा सकता है|


आज तक का शीर्षक- भारत में 62 प्रतिशत लोग सीएए के समर्थन में, असम के 68% लोग विरोध में-सर्वे


दैनिक जागरण अखबार की वेबसाइट का शीर्षक- देशभर में 62 फीसद लोग नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में सर्वे


दैनिक हिन्दुस्तान अखबार की वेबसाइट - का शीर्षक- देशभर में 62% लोगों ने CAA और NRC किया समर्थनः सर्वे'


आउटलुक पत्रिका की वेबसाइट का शीर्षक- 62% people across India support CAA: Surveys


इस सर्वेक्षण की खबर को आजतक, दैनिक जागरण, आउटलुक ने 21 दिसंबर 2019 को अपनी वेबसाइट पर लगाया जबकि हिन्दुस्तान ने 22 दिसंबर 2019 को अपनी वेबसाइट पर यह खबर दी। आजतक, दैनिक जागरण और आउटलुक ने शीर्षक में लिखा है कि 62 फीसदी लोग नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन में हैं जबकि दैनिक हिन्दुस्तान ने 


खबर को शीर्षक चुपके से सीएए के साथ ही एनआरसी जोड़ दिया और लिखा कि 62 प्रतिशत लोग सीएए और एनआरसी का समर्थन करते हैं। इन शीर्षकों में एक और महत्वपूर्ण बात देखने को मिलती है कि इन सभी मीडिया संस्थानों ने अपने शीर्षक में लिखा है - देशभर में या भारत में यानी इस सर्वेक्षण को देशभर में किए जाने के रूप में प्रचारित किया।


आज तक की खबर का इंट्रो नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर मचे बवाल के बीच हुए एक सर्वे में बड़ी संख्या में लोगों ने सीएए को समर्थन किया है। इस सर्वे में देश के 6 प्रतिशत लोगों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का समर्थन किया हैवहीं जराग के 68 प्रतिशत लोग इस कानून के खिलाफ हैं। आईएएनएस-सीवोटर सर्वेक्षण में शनिवार को इस बात की जानकारी सामने आई |


आउटलुक की खबर का इंट्रो- About 62 per cent of the citizens of the coun. try are In favour of the citizenship Amendment Act, while about 68 por' cent citlaens In Assam are against the Act, according to a IANS&CVoter snap poll released on Saturday.


दैनिक जागरण की खबर का इंट्रो- देश भर के करीब 62 फीसद लोग नागरिकता' संशोधन कानून का समर्थन करते हैंकेवल असम के करीब 68 फीसद लोग इसके खिलाफ हैं। 55.9 फीसद लोगों का मानना है कि सीएए और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) केवल घुसपैठियों के खिलाफ है, जबकि 31.9 फीसद इसे मुस्लिगों के खिलाफ मानते हैंदेश भर के करीब 6.5.4 फीसद जीर असम के 76.0 फीसद लोग चाहते हैं कि एनआरसी पूरे देश में लागू होना चाहिए | यह जानकारी आईएएनएस द्वारा शनिवार को जारी स्नैप पोल सर्वे में दी गई है |


दैनिक हिंदुस्तान की खबर का इंट्रो नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर कराए गए आईएएनएस - सीवोटर सर्वेक्षण में शनिवार को यह जानकारी सामने आई है कि क्षेत्रीय , राज्य और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर इन्हे लेकर जनता के बीच मतभेद है |


गौरतलब है कि आजतक और आउटलुक की खबर में नागरिकता संशोधन अधिनियम के संबंध में सर्वेक्षण किए जाने की बात कही गई है, जबकि दैनिक जागरण और दैनिक हिंदुस्तान ने अपने इंट्रो में नागरिकता संशोधन अधिनियम के साथ राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनजारसी) को भी शामिल कर लिया है। यहाँ पर चार मीडिया संस्थानों में से दो मीडिया संस्थान लिखते हैं कि सर्वे सीएए और एनजारसी को लेकर हुआ जबकि बाकी दो मीडिया संस्थान लिखते हैं कि सौ सीएए को लेकर हुआ। इससे पता चलता है कि सर्वेक्षण के विषय को लेकर "ी गीडिया संस्थानों के बीच अस्पष्टता है |


पहले यह समझा जाना चाहिए कि स्नैप पोल होता क्या है। स्नैप पोल आमतौर पर महत्वपूर्ण मुद्दों पर लोगों के मिजाज की जांच करने के लिए एक अल्प अवधि सूचना के भीतर किया जाता है, जो राजनीतिक, आर्थिक आदि हो सकते हैंस्नैप पोल शीघ्रता से तुरंत उपयोग के लिए जानकारी एकत्र करते हैं"


सर्वेक्षण करने के तौर-तरीकों पर सवाल इस सर्वेक्षण की खबरों में कहीं भी सर्वेक्षण करने के तौर-तरीका जैसे सर्वेक्षण के सवाल,राम को अलावा अन्य राज्य में कितने कितने लोगों को समान में शामिल किया गया, यह जानकारी नहीं मिलती है। समाजकंपनिया गाण में शामिल लोगों को और को गोपनीय बनाए रखने की कोशिश करती हैं, जिसके कारण इनके सर्वे की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।


किसी भी अध्यन या सर्वेक्षण को समझाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है कि उसकी अध्ययन की पद्धति को समझा जाए। खासकर, अखिल भारतीय स्तर पर अध्ययन करके निष्कर्ष प्रस्तुत करने का दावा करने वाली किसी भी पड़ताल की अध्ययन-पद्धति को समझना आवश्यक हैइसरो पाठकों और अन्य अनुसंधानकर्ताओं को इस अध्ययन के दायरे और इसकी सीमागों को समझने में सहायता मिलती है।'


अध्यन पद्धति में भी दो चीजें सबसे महत्वपूर्ण होती हैं। पहला, नमूने का आकार (सैंपल साइज) और दूसरा, पूछे जाने वाले.सवाल। 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान एबीपी न्यूज और नीलसन ने लगभग 1-189 लोगों के बीच स्नैप पोल सवें द्वारा यह जानने का प्रयास किया था कि दिल्ली का मुख्यमंत्री कौन बनेगा। इसी संदर्भ में वोटर्स मूड रिसर्च (वीएमजार) के डायरेक्टर तणित प्रकाश कहते हैं कि 'गुजरात में छह करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। लेकिन हमारा हाल ही में किया गया चुनावी सर्वे सिर्फ छह हजार लोगों पर था।" जब एक राज्य का मुख्यमंत्री कौन बनेगा यह जानने के लिए इसी तरह के सने में 1489 लोगों के शामिल किया जाता है और एक राज्य में अन्य सर्वे के दौरान 6,000 हजार लोगों को शामिल किया जाता है, तो सीएए जैसे संवेदनशील मसले पर महज 3,000 लोगों के बीच सर्वेक्षण करके उसे देशभर में किए जाने का दावा क्यों किया गया। इस संदर्भ में रॉयल स्टैटिस्टिकल सोसाइटी की डॉ. रोजर्स कहती हैं कि जिन लोगों को सर्वेक्षण में शामिल किया जाता है, उनकी संख्या को देखना महत्वपूर्ण होता है। वह कहती हैं कि अगर मैं लोगों के अलग-अलग नमूने लेती हूं, तो मुझे हर बार एक ही जवाब नहीं मिलेगा। उनका कहना है कि, "मेरे सैम्पल का आकार जितना बड़ा होगा, मेरा परिणाम उतना ही ज्यादा विश्वसनीय होगायदि मझे केवल अपने नमूने के तौर पर कम संख्या में लोगों मिले हैं तो यह एक जवाब के रूप में विश्वसनीय नहीं होगा और इसे कई किस्म की अनिश्चितताओं से जूझना होगा। 


सर्वेक्षण से तैयार किए गए आंकड़े एक बड़े तबके का प्रतिनिधित्व करने का एहसास कराते हैंजैसे कि आईएएनएस-सीवोटर के सर्वे के आंकड़े के नतीजों में कहा जाता है कि 62 प्रतिशत लोग सीएए के समर्थन में हैं। ये मत 62 प्रतिशत देश की आबादी का नहीं है बल्कि महज 3,000 लोगों में 62 प्रतिशत का मत है। सैंपल साइज जितना छोटा होगा, वह उतना ही बड़े आंकड़े का एहसास करायेगा। एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं- 100 लोगों के बीच एक सर्वेक्षण किया जाए, तो 60 लोगों की उस विषय में सहमति को 60 प्रतिशत के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, लेकिन अगर यही सर्वेक्षण 1000 लोगों के बीच किया जाए तब 60 लोगों के बजाए 600 लोगों की उस विषय पर सहमति होने पर ही 60 प्रतिशत का आंकड़ा आयेगा। यानी जितना छोटा सैंपल साइज होगा, उसे उतने ही बड़े आंकड़े के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा। ज्यादा लोगों को सर्वेक्षण में शामिल करने से ही सेंपल साइज को सटीक नहीं कहा जा सकता। सैंपल साइज में इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अलग-अलग लिंग, वर्ग, आय, शिक्षा, पेशे वाले लोग हों |


सर्वेक्षण के सवाल


इस तरह के सर्वेक्षणों के लिए ऐसे सवालों को तैयार करने की कोशिश की जाती है जिनका जवाब सिर्फ हां या ना में लिया जा सके। डॉ. रोजर्स कहती हैं कि यदि आप देखते हैं कि 70 प्रतिशत महिलाएं सहमत हैं, तो मैं हमेशा पूछती हूँ उनसे क्या सवाल पूछा गया? और पता चलता है कि "सर्वे करने वालों ने इन महिलाओं से कहा कि क्या आप इस कथन से सहमत हैं?" 


वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि ज्यादातर लोग सिर्फ टिक करेंगे कि हां मैं इससे सहमत हूं। यदि उनसे एक सवाल किया जाए जैसे- “यह शैम्पू आपके बालों को कैसा महसूस कराता है?" तो वे अलग जवाब दे सकती हैं।" ज्यादातर सवाल इसी तरह के पूछे जाते हैं कि क्या आप इस कथन से सहमत हैं, उदाहरण के लिए आप इस तरह के जवाबों को आकार और उसे आंकड़ों के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।"


क्या इस तरह के सवालों को आधार बनाकर एक सर्वेक्षण करके उसके नतीजों को विश्वसनीय कहा जा सकता है? ऐसे सवालों से क्या लोगों की राय को जाना जा सकता है, जिसमें सिर्फ सहमत्-या असहमत होने का विकल्प हो।


सर्वेक्षण का उद्देश्य और उसकी खबर की टाइमिंग मोटेतौर पर देखे तो इस तरह के सर्वेक्षण चुनावों के दौरान ही किए जाते हैं। लेकिन इस बार यह सर्वेक्षण उस मुद्दे पर किया गया जिसके विरोध में देश के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। 16 दिसंबर की शाम, नगांव और चबुआ में एक विरोध प्रदर्शन में 10,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। जब किसी मुद्दे पर हजारों की संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हों। उस समय तीन हजार लोगों के बीच एक सर्वे करके उसको देशभर में किए गए सर्वेक्षण के रूप में प्रचारित करने को कैसे पूरे देश का जनमत कहा जा सकता है? घल्कि इस तरह के सर्वेक्षण जनता की राय न होकर सरकार के हितों की पूर्ति करने वाले ज्यादा दिखते हैं |


सीएए के समर्थन में नतीजे नहीं, तो पोल डिलीट यहां एक और बात महत्वपूर्ण है कि इस सर्वेक्षण को मीडिया ने काफी तवज्जो दी। लेकिन सीएए को लेकर अन्य ऑनलाइन पोल (ऑनलाइन सर्वेक्षण) भी संस्था या पत्रकारों ने किए। जी न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी ने भी 24 दिसंबर 2019 को अपने ट्विटर अकाउंट पर एक पोल शुरू किया था और पूछा कि क्या भारत की जनता सीएए का समर्थन करती है या नहीं? इस पोल में 52 फीसदी यूजर्स ने सीएए के खिलाफ वोट कियाइसके अलावा सुधीर चौधरी ने ही फेसबुक अकाउंट पर भी एक पोल किया था और वहां भी 61 फीसदी वोट इसके खिलाफ पड़े। लेकिन 4 दिन बाद चौधरी ने दावा किया कि उनके ट्विटर पोल के साथ छेडछाड़ चुनावों के दौरान ही किए जाते हैं। लेकिन इस बार यह सर्वेक्षण उस मुद्दे पर किया गया जिसके विरोध में देश के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। 16 दिसंबर की शाम, नगांव और चबुआ में एक विरोध प्रदर्शन में 10,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। जब किसी मुद्दे पर हजारों की संख्या में लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हों। उस समय तीन हजार लोगों के बीच एक सर्वे करके उसको देशभर में किए गए सर्वेक्षण के रूप में प्रचारित करने को कैसे पूरे देश का जनमत कहा जा सकता है? घल्कि इस तरह के सर्वेक्षण जनता की राय न होकर सरकार के हितों की पूर्ति करने वाले ज्यादा दिखते हैं | 



सीएए के समर्थन में नतीजे नहीं, तो पोल डिलीट


यहां एक और बात महत्वपूर्ण है कि इस सर्वेक्षण को मीडिया ने काफी तवज्जो दी। लेकिन सीएए को लेकर अन्य ऑनलाइन पोल (ऑनलाइन सर्वेक्षण) भी संस्था या पत्रकारों ने किए। जी न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी ने भी 24 दिसंबर 2019 को अपने ट्विटर अकाउंट पर एक पोल शुरू किया था और पूछा कि क्या भारत की जनता सीएए का समर्थन करती है या नहीं? इस पोल में 52 फीसदी यूजर्स ने सीएए के खिलाफ वोट कियाइसके अलावा सुधीर चौधरी ने ही फेसबुक अकाउंट पर भी एक पोल किया था और वहां भी 61 फीसदी वोट इसके खिलाफ पड़े। लेकिन 4 दिन बाद चौधरी ने दावा किया कि उनके ट्विटर पोल के साथ छेडछाड़ की गई है और कहा कि ट्रोल्स ने असली जनता की राय को हाईजैक कर लिया हैएक अन्य ऑनलाइन पोल सद्गुरु जग्गी वासुदेव की संस्था ईशा फाउंडेशन ने ट्विटर पर शुरू किया था। 30 दिसंबर को शुरू किए गए इस पोल में यूजर्स से पूछा गया था कि क्या उनके मुताबिक CAA-NRC के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन सही हैं? इस पोल के साथ ही सद्गुरु का वीडियो भी पोस्ट किया गया था, जिसमें वो दोनों कानूनों के बारे में बता रहे हैं। लेकिन यह पोल ट्विटर से गायब हो गया। इस पोल में 62 फीसदी लोगों ने विरोध-प्रदर्शनों के समर्थन में वोट किए, जबकि 38 फीसदी ने इन . प्रदर्शनों को गलत ठहराया। एक और ट्विटर पोल हिंदी अखबार दैनिक जागरण के अकाउंट से भी शुरू किया गया थाइसमें सवाल था- 'क्या सीएए का विरोध वोट बैंक की राजनीति का नतीजा है?' यहां भी प्रदर्शन के समर्थक हावी रहे। 54 फीसदी यूजर्स ने इसका जवाब 'ना' में दिया जवाब 'ना' में दियाहालांकि दैनिक जागरण ने अपना पोल और उसके नतीजे नहीं हटाये।


यहां देखा जा सकता है कि ईशा फाउंडेशन, जी न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी और दैनिक जागरण के पोल के नतीजे सीएए के समर्थन में नहीं आये। इन पोल के नतीजों को आईएएनएस-सीवोटर के नतीजों की तरह मीडिया संस्थानों द्वारा पेश नहीं किया गया क्योंकि ये नतीजे सीएए के . विरोध में थे। हालांकि कुछ ऑनलाइन पोर्टल पर इन पोल के डिलीट होने की खबरें जरूर दी गई। पहले सरकार की आलोचना करने वाली खबरों को मीडिया संस्थानों द्वारा हटाया गया। अब सरकार के कामकाज या सीएए पर किए गए पोल को भी मीडिया संस्थान प्रस्तुत करने से बच रहे हैं।


नागरिकता संशोधन कानून को लेकर आईएएनएस-सीवोटर के सर्वे से लेकर ईशा फाउंडेशन, जी न्यूज के एडिटर-इन-चीफ सुधीर चौधरी और दैनिक जागरण के पोल से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि जिन सर्वेक्षण के नतीजे सत्ता के अनुकूल होते हैं, उन्हें प्रस्तुत किया जाता है। जिन सर्वेक्षण के नतीजे सत्ता के अनुकूल नहीं होते हैं उन्हें दबाने की कोशिश की जाती हैआईएएनएस-सीवोटर द्वारा हड़बड़ी में छोटे सैंपल साइज को आधार बनाकर सर्वेक्षण करने से पता चलता है कि यह सर्वेक्षण लोगों की राय जानने के बजाए सत्ता के अनुकूल नतीजों को प्रस्तुत करने के लिए किया गया था।


किसी भी मुद्दे पर सर्वेक्षण या अध्ययन का अपना महत्व होता हैखासकर जब किसी अध्ययन या सर्वेक्षण के लिए यह दावा किया जाए कि उसे देशभर के लोगों के बीच किया गया है, तब उस अध्ययनया सर्वेक्षण की लोगों के लिए उपयोगिता और बढ़ जाती है। आम लोगों, शोधार्थियों और संचार के माध्यमों द्वारा उस सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता हैं। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि जब भी इस तरह के सर्वेक्षण या अध्ययन को प्रस्तुत किया जाए, तो उसकी अध्ययन पद्धति के बारे मेंपूरी जानकारी दी जाए, ताकि उसकी विश्वसनीयता पर सवाल न उठे।


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