Thursday, May 28, 2020

यस बैंक के बहाने वित्तीय क्षेत्र के उदारीकरण की राजनीति व उसकी नाकामियां

आश्चर्य की बात यह है कि यह सब धोखाधड़ी, मनमानी और लूट ऐसे निजी बैंकों में चल रही थी, जिनके बारे में उदारीकरण और निजीकरण के पैरोकारों की दलील रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की काहिली, भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों का एकमात्र जवाब निजी बैंक और ___ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण है। सच यह है कि यस बैंक का संकट काफी हद तक_ नवउदारवादी आर्थिक सुधारों और उनके तहत अंधाधुंध आगे बढ़ाए गए उदारीकरण और निजीकरण का संकट है। लेकिन इस संकट के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही भाजपा और कांग्रेस शायद ही इस सच्चाई को स्वीकार करें |


क्षेत्र के बड़े और चर्चित बैंक-यस बैंक के डूबने और उसे संभालने के लिए रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप और उसके तहत सरकारी क्षेत्र के बैंक-भारतीय स्टेट बैंक को आगे करने के फैसले के साथ ही राजनाति भा शुरू हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के बीच यस बैंक के डबने के लिए एक-दसरे को जिम्मेदार ठहराने की जुबानी जंग तज हा गई है। भाजपा का आरोप है कि यस बैंक के दिवालिया होने के कगार पर पहुंचने के बीज कांग्रेस के नेतत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों, याराना पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज और भ्रष्टाचार के बोलबाले के दौरान ही पड़ गए थे। दूसरी ओर, कांग्रेस ने यस बैंक के डूबने के पीछे मोदी सरकार की वित्तीय संस्थाओं को संभालने में असता और सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराने में देर नहीं की। अन्य विपक्षी पार्टियां भी यस बैंक की बदहाली के लिए मोदी सरकार पर उंगली उठा रही हैं। .


मोदी सरकार और विपक्षी पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति अप्रत्याशित नहीं है। लेकिन इससे यस बैंक के संकट के वास्तविक कारणों और लेकिन इससे यस बैंक के संकट उसके लिए जिम्मेदार लोगों पर असल सवाल है कि हाल के महीनों में पहले पीएमसी बैंक और अब यस बैंक के दिवालिया होने की नौबत क्यों आई? यही नहीं, आईएलएंडएफएस और डीएचएफएल जैसी बड़ी नॉन-बैंकिंग फाइनैंस कंपनियां क्यों डूब गईं? 


सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी तू-तू, मैं-मैं से ज्यादा जरूरी सवाल है कि देश में वित्तीय क्षेत्र खासकर निजी और सरकारी क्षेत्र के कई बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों की हालत खराब क्यों है? सरकारी और निजी क्षेत्र के कई बैंक और नॉनबकिंग फाइनेंस कंपनियां डबे हए कों (एनपीए) के लगातार बढ़ते बोझ के कारण बेहाल क्यों हैं? सवाल यह भी है कि आखिर, बैंकिंग रेग्यूलेटर-रिजर्व बैंक और शेयर बाजार रेग्यूलेटर-सेबी से लेकर क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां, आंतरिक ऑडिटर और बोर्ड के स्वतंत्र निदेशक क्या कर रहे थे? उन्होंने खतरे की झंडी पहले क्यों नहीं दिखाई? इन निजी और सरकारी बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों को लंबे समय तक आम निवेशकों और जमाकर्ताओं की गाढ़ी कमाई के पैसे को मनमाने तरीके से इस्तेमाल करने की इजाजत क्यों दी गई? उनके खिलाफ कार्रवाई करने में इतनी देर क्यों हुई?



कड़वी सच्चाई


कड़वी कड़वी सच्चाई यह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष खासकर कांग्रेस इन सवालों के जवाब ईमानदारी से खोजने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे कि देश में वित्तीय क्षेत्र की मौजूदा बेहाल स्थिति और पहले. पीएमसी बैंक और अब यस बैंक के साथ-साथ कई नॉन-बैंकिंग फाइनैंस कंपनियों के संकट की जिम्मेदारी और जवाबदेही, दोनों की बनती हैंभाजपा और कांग्रेस, दोनों ही वित्तीय क्षेत्र के उदारीकरण और निजीकरण की पक्षधर रही हैं। नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत शुरू आर्थिक सुधारों के पिछले तीन दशकों में दोनों पार्टियों ने अर्थव्यवस्था के इस सबसे बुनियादी लेकिन संवेदनशील क्षेत्र में उदारीकरण और निजीकरण को जोरशोर से आगे बढ़ाया। इसके तहत सरकारी बैंकों में विनिवेश के जरिए निजीकरण का रास्ता खोला गया, निजी बैंकों व नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों को प्रोत्साहित किया गया। उन पर नियंत्रण ढीला कर दिया गया। 



उन पर नियंत्रण ढीला कर यही नहीं, यूपीए सरकार के कार्यकाल में नवउदारवादी अर्थ नीति के तहत जीडीपी वृद्धि दर की रफ्तार को किसी भी तरह बढ़ाने और अधिक से अधिक तेज करने का व्यामोह (ऑब्सेशन) इस कदर हावी था कि वित्तीय क्षेत्र खासकर सरकारी और निजी बैंकों को कॉरपोरेट क्षेत्र में निवेश के लिए अधिक से अधिक, ज्यादातर मामलों में मनमाने तरीके से, कर्ज देने को प्रोत्साहित किया गया। ध्यान नहीं रखा गया कि जिन कॉरपोरेट्स को कर्ज दिया जा रहा है, उनका ट्रैक रिकॉर्ड क्या है? एक होड़ या कहिए कि लूट मची हुई थी। सब बहती गंगा में हाथ धोने में लगे हुए थे। कहीं कोई सवाल नहीं उठ रहा था कि यह क्या हो रहा है? चहंओर सिर्फ गुणगान था क्योंकि अर्थव्यवस्था यानी जीडीपी अपेक्षाकृत तेज गति से बढ़ रही थी। कहने की जरूरत नहीं कि जीडीपी की इस तेज 'कृत्रिम' रफ्तार में काफी हद तक योगदान इस नवउदारवादी अर्थ नीतिनिर्देशित कथित 'निवेश का भी था। यह आर्थिक विकास का नवउदारवादी मॉडल था, जिसमें बैंकों और दूसरी वित्तीय संस्थाओं को बिना किसी सवाला जवाब के कॉरपोरेट्स की सेवा में लगा दिया गया था। यूपीए सरकार कॉरपोरेट उद्यमियों और निजी क्षेत्र की पशु भावना' (एनिमल स्पिरिट) को जगाने में लगी हुई थी। मान लिया गया था कि बाजार का 'अदृश्य हाथ' और निजी क्षेत्र की प्रतियोगिता सब कुछ संभाल लेंगे।


नवउदारवादी आर्थिक रणनीति का नतीजा


मजे की बात यह है कि यह नवउदारवादी आर्थिक रणनीति कमोबेश मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में भी बदस्तूर जारी रही। लेकिन हकीकत यह थी कि कॉरपोरेट्स का एनिमल स्पिरिट' अत्यधिक जोखिम उठाने और काफी हद तक र जुए में बदल गया। यही नहीं, कई कॉरपोरेट्स और उद्यमियों ने राजनेताओंमंत्रियों-अफसरों से नजदीकी का फायदा उठाया और ऐसे में 'याराना पूंजीवाद' को फलने-फूलने का खूब मौका मिला। लेकिन यह एक गुब्बारा था, जिसे एक दिन फूटना ही था। इसकी हवा यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के आखिरी वर्षों में निकलने लगी थी। इसके बावजूद इसे न सिर्फ जान-बूझकर अनदेखा किया गया. बल्कि गुब्बारे में हवा भरने की कोशिशें जारी रहीं। उदाहरण के लिए यस बैंक के मामले को लीजिए जिसे एक समय देश में स्टार निजी बैंक और बैंकिंग क्षेत्र में सुधारों के चमकते उदाहरण के बतौर पेश किया गया था। यह बैंक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार के कार्यकाल के आखिरी महीनों में एनडीए सरकार के का शुरू हुआ। यूपीए सरकार के कार्यकाल में तेजी से बढते हए निजी क्षेत्र के टॉप बैंकों की सूची में पहुंच गया। मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में भी यस बैंक बिना किसी रोकटोक के उसी तेज रफ्तार से बढ़ता रहा। यस बैंक को 'सफल निजी बैंक' और 'कॉरपोरेट गवर्नेस' के अवार्ड मिलते रहे। लेकिन यस बैंक की चमकदार सफलता' की सच्चाई अब सामने आ रही हैरिपोर्टों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2014 तक यस बैंक के कुल नॉन-परफार्मिंग एसेट्स (एनपीए) यानी खराब कर्ज 55,000 करोड़ रुपये थे जो 2016 तक बढ़कर 98,000 और 2019 तक पहुंचते-पहुंचते 22,41,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गए। जाहिर है कि यह स्थिति मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही यहां तक पहुंची है, भले ही इसके बीज यूपीए सरकार के कार्यकाल में पड़ गए थे। ऐसा भी नहीं है कि यस बैंक की बिगड़ती स्थिति से मौजूदा सरकार वाकिफ नहीं थी। सच यह है कि बैंक के मनमाने और आपराधिक तरीके से कर्ज बांटने के बारे में पहली चेतावनी यूबीएस ने 2015 में ही जारी कर दी थी जब उसने रिपोर्ट दी थी कि यस बैंक ने अपनी कुल परिसंपत्तियों (नेट वर्थ) से भी ज्यादा कर्ज बांट दिया है, जिनमें से ज्यादा कर्ज ऐसी कंपनियों को दिया गया है, जो शायद ही उसे वापस लौटाएं।




जो शायद ही उसे वापस लौटाएं। जांच एजेंसियों के हवाले से आ रही रिपोर्टों से साफ है कि यस बैंक के प्रमोटर राणा कपूर खुद उन कंपनियों को कर्ज बांटने में शामिल थे जो न सिर्फ जोखिम भरे थे, बल्कि जिनके बारे में अंदेशा था कि ये कंपनियां शायद हीकर्ज लौटाएं। कई सौदों में कर्ज लेने वाली कंपनियों ने बदले में राणा कपुर के परिवारजनों की कंपनियों में भारी-भरकम रकम निवेश किया। हैरानी की बात नहीं है कि ऐसे ही एक और मामले में एक और स्टार निजी बैंकआईसीआईसीआई बैंक की बहुचर्चित सीईओ चंदा कोचर को बैंक से हटना : पड़ा है। दोहराने की जरूरत नहीं है कि ऐसा सिर्फ इन दो निजी बैंकों में ही र नहीं, बल्कि कई और निजी बैंकों और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों में भी चल रहा था, जो अब अर्थव्यवस्था की सुस्ती और बिगड़ती स्थिति के बीच " खुलकर सामने आ रहा है। 


आश्चर्य की बात यह है कि यह सब धोखाधड़ी, मनमानी और लट ऐसे निजी बैंकों में चल रही थी जिनके बारे में उदारीकरण और निजीकरण के पैरोकारों की दलील रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की काहिली, भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों का एकमात्र जवाब निजी बैंक और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण है। सच यह है कि यस बैंक का संकट काफी हद तक नंवउदारवादी आर्थिक सुधारो, और उनके तहत अंधाधुंध आगे बढ़ाए गए उदारीकरण और निजीकरण का संकट है। लेकिन इस संकट के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही भाजपा और कांग्रेस शायद ही इस सच्चाई को स्वीकार करें।


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