Tuesday, June 30, 2020

शिक्षा का उद्देश्य एवं शिक्षण संस्था का उत्तरदायित्व

 


शिक्षा मानव सभ्यता की सर्वागीण विकास की एक अहम् कड़ी है | प्राचीन काल से वर्तमान काल तक के समय अंतराल में शिक्षा का स्वरुप उद्देश्य एवं प्रफुलिकता में अहम परिवर्तन देखने को मिला, ठीक ऐसे ही शिक्षण संस्थानों के वातावरण में भी समय एवं वैश्विक जरूरत के हिसाब से समय-समय पर परिवर्तन आवश्यक होता गया | 
आज की शिक्षा व्यवस्था छात्र छात्राओं में क्रिएटिव, क्वालिटेटिव एवं क्वांटिटेटिव धारणा में मौलिक परिवर्तन लाई है | 
छात्र छात्रा हमारे ऐसेट भी हैं और लाइबिल्टी भी, दूरदर्शी शिक्षक,  छात्र छात्राओं के जीवन के शिल्पकार होते हैं | जो अपनी साधना, संघर्ष एवं सहिषुणत: के साथ छात्रों के बौद्धिक विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं तथा छात्रों के जीवन में मानव कल्याण के  मूल्य बोध की बुनियाद का निर्माण करते हैं | 
विगत कुछ वर्षों से शिक्षा व्यवस्था के अंदर एक निराशा जनक स्तिथि पैदा हुई है, छात्र छात्राओं में शिक्षा के प्रति रूचि और उत्साह कम हुआ है तो वहीं  बढ़ती उदासीनता समग्र शिक्षा व्यवस्था पर एक प्रश्न चिन्ह लगाती है| 


हमारा युवा वर्ग अपना कौशल, दक्षता एवं कर्तव्य निष्ठा से इस देश की नई  तक़दीर लिखना और देश की तस्वीर बदलना चाहता है| 


लेकिन मै बड़े दुख के साथ कहना चाहता हुँ कि हमारी शिक्षा व्यवस्था उद्देश्य साधने में अनुपयोगी रही है | 


हमें हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को  सफल,  सक्रिय, आधुनिक एवं युगउपयोगी बनाना होगा जिसके लिए शिक्षण संस्था को एक विशेष भूमिका अदा करनी होगा | 


गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षण संस्था को हर प्रकार की संकीर्ण नीति से ऊपर उठ कर देश समाज और युवा शक्ति के निर्माण में अपना समस्त सकारात्मक ऊर्जा का इस्तेमाल करना होगा | जिससे छात्र छात्राओं का बौद्धिक प्रगति के साथ साथ जीविका उपार्जन भी  बन सके |


Monday, June 29, 2020

'रोल ऑफ सोसाइटी इन अनलॉक वन'

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय एनएसएस और श्रम विभाग एवं यूनिसेफ के नया सवेरा के संयुक्त प्रयास 'मुस्कुराए कानपुर' के अंतर्गत आज 'रोल ऑफ सोसाइटी इन अनलॉक वन' विषय पर वेबीनार का आयोजन किया गया!
 वेबीनार का शुभारंभ विधायक डॉ अरुण पाठक ,  सिटी एंबेसडर डॉ सुधांशु राय और उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष टीकम चंद सेठिया द्वारा किया गया!
 इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ अरुण पाठक ने कहा अनलॉक में लोगों की आवाजाही काफी बढ़ रही है ऐसी स्थिति में लॉक डाउन की अपेक्षा ज्यादा सतर्कता और सावधानी रखने की जरूरत है! उन्होंने मुस्कुराए कानपुर अभियान के लिए संयोजक डॉ सुधांशु राय की सराहना करते हुए कहा उनके द्वारा इस लॉकडाउन की अवधि में एक लंबी श्रंखला को जोड़ते हुए जनमानस में प्रभावी सघन जागरूकता की जा रही है ! उन्होंने कहा वर्तमान परिदृश्य में समाज को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा उन्होंने बाल श्रम उन्मूलन और उनके लिए शिक्षा की सुविधा को  बढ़ाने पर बल दिया !
मुस्कुराए कानपुर के सिटी एंबेसडर डॉ सुधांशु राय ने कहा यह समय हमारे आत्मविश्वास और धैर्य के परीक्षण का समय है और इस परीक्षा की घड़ी में जो व्यक्ति सावधानी रखेगा वही सुरक्षित रहेगा!
टीकम चंद सेठिया ने कहा आत्मनिर्भर कानपुर अभियान की भी शुरुआत की जा रही है!



मुख्य अतिथि अरुण पाठक और मुस्कुराए कानपुर के सिटी एंबेसडर डॉ सुधांशु राय के द्वारा मुस्कुराए कानपुर के स्पेशल एंबेसडर, सोशल चैंपियंस ,सोशल लीडर्स और मुस्कुराए कानपुर मित्र के नामों की घोषणा की गई, जिसमें  स्पेशल एंबेस्डर के रूप में श्री लायंस क्लब के पूर्व गवर्नर गोपाल तुलस्यान विश्वविद्यालय की डॉक्टर अर्पणा कटियार अलायंस क्लब के अध्यक्ष श्री मनोज शुक्ला नगर निगम के पूर्व अधिकारी श्री राजीव शुक्ला पी आई ए के अध्यक्ष श्री मनोज बंका रजत श्री फाउंडेशन की श्रीमती दीप्ति सिंह पहल सेवा संस्थान की सुरभि द्विवेदी डीजी कॉलेज की डॉ सुनीता आर्य और अभिनव बनाए गए! 
 प्रमोशन एंबेसडर बेसिक शिक्षा की रुचि त्रिवेदी और सोशल रिसर्च फाउंडेशन के डॉक्टर राजीव मिश्रा बनाए गए  मोटिवेशनल एंबेसडर अंतरराष्ट्रीय टीटी खिलाड़ी संजीव पाठक और अलायंस क्लब के इंटरनेशनल गवर्नर  पंकज श्रीवास्तव  बनाए गए !
 क्रिएटिव एंबेस्डर चीफ वार्डन सिविल डिफेंस दिनेश कटियार  और मोटिवेशनल स्पीकर संजीव दीक्षित का नाम चयनित हुआ  ! योगा एंबेसडर के रूप में भावना श्रीवास्तव और जीएस कोस्टा के नाम की घोषणा की गई!
 सोशल चैंपियन  के रूप में लायंस गवर्नर वंदना निगम डीएवी कॉलेज के डॉ राजीव श्रीवास्तव एंकर शिवांगी द्विवेदी नारी शक्ति वूमेन एंपावरमेंट की कविता दीक्षित निदान फाउंडेशन की शिखा अग्रवाल बेसिक शिक्षक डॉ दीप्ति श्रीवास्तव और अश्वनी वर्मा घोषित हुए तो वही सोशल लीडर्स में बेसिक शिक्षक डॉक्टर अनुराग पांडे गुरु नानक की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ आरती बाजपेई शिक्षक डॉ अनुपम देशवाल डॉ रचना पांडे बृहस्पति महाविद्यालय की डॉक्टर नीता अग्निहोत्री बनी!
 मुस्कुराए कानपुर मित्र के रूप में डॉ अपूर्वा वशिष्ठ मनहर कांत  प्रभा पांडे सौम्या गुप्ता बनाई गई! सलाहकार के रूप में एनएसएस समन्वयक  डॉ केएन मिश्रा पूर्व वित्त अधिकारी संध्या मोहन समाजसेवी शेखर वर्मा कानपुर विद्या मंदिर की प्राचार्य डॉ मृदुला शुक्ला डॉक्टर अवध दुबे दीनदयाल शोध केंद्र के निदेशक डॉ श्याम बाबू गुप्ता का नाम चयनित किया गया!


 सह संयोजिका आशी खान ने सभी स्पेशल एंबेस्डर एवं अन्य एंबेस्डर को शुभकामनाएं देते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया !
इस अवसर पर टीकम चंद्र सेठिया डॉक्टर कामायनी शर्मा डॉ विनय त्रिवेदी  पूजा गुप्ता प्रतीक श्रीवास्तव इत्यादि उपस्थित रहे!


हिन्दी प्रचारिणी सभा मॉरिशस और भगत सिंह फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में सफल हुई अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी  

कोरोना संकट के दौरान सफल सम्पन्न हुआ हिन्दी प्रचारिणी सभा, मॉरीशस और भगत सिंह फाउंडेशन, भारत के संयुक्त तत्वाधन में अंतराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी 


दिल्ली विश्वविद्यालय की वरिष्ठ प्रोफेसर डॉमाला मिश्र के संयोजकत्व में मॉरिशस की हिंदी प्रचारिणी सभा तथा भारत के भगत सिंह फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का विराट एवं बृहत्तम आयोजन 22 जून 2020 से 24 जून 2020 तक सुबह 1बजे से सायं बजे तक किया गया।  


इस आयोजन के सह संयोजक डॉ राकेश कुमार दुबे तथा आयोजन सचिव अर्चना पाठक के साथ ही आयोजन समिति में मनीषा , शशि पाठक , मृगांक सिंह तथा शुभांगी आदि का काफी सराहनीय योगदान रहा |


 "कोविड-19 के दौर में शैक्षिक संस्थानों में ऑनलाइन शिक्षणप्रशिक्षण एवं प्रशासनविषयक इस अंतरराष्ट्रीय वेबसंगोष्ठी की मुख्य समन्वयक एवं संयोजिका अदिति महाविद्यालय (दिल्लीविश्वविद्यालयकी वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ.माला मिश्र द्वारा इस संगोष्ठी का अत्यधिक कुशल व सशक्त सन्चालन किया गया। आज कोविड 19 जैसे कठिन समय में शिक्षा को ग्रहण करना अत्यधिक कठिन बन चुका है और ऐसे में जब ऑनलाइन शिक्षा पर अधिक जोर दिया जा रहा है तथा ऑनलाइन शिक्षा का महत्व इस कठिन दौर ने समझाया है। लेकिन इसकी अपनी चुनौतियां भी हैं और उनका निदान किस तरह से और किस रूप में प्राप्त किया जा सकता हैइसी लक्ष्य की सिद्धि इस संगोष्ठी का अभीष्ट था। इसी को लेकर अंतरराष्ट्रीय वेबसंगोष्ठी में लगातार तीन दिन बहुत ही गंभीर स्तर पर बड़े-बड़े विद्वतजनों के द्वारा विचार मंथन होता रहा।



इस बौद्धिक ज्ञानयज्ञ का इस संकट काल में इतने व्यापक रूप में आयोजन हुआ जिसमें देश और दुनिया के लगभग अधिकतम विद्वानों का सम्भवत: प्रथमतः एक स्थान पर इतना सार्थक प्रतिनिधित्व हुआ। इस वेब संगोष्ठी में देश दुनिया से सैकड़ों प्रतिभागी शामिल रहे। इस संगोष्ठी में लब्ध प्रतिष्ठित अनेक कुलाधिपतियों, 20 से अधिक कुलपतियों, 20 से अधिक पूर्वकुलपतियों अधिष्ठाताओंनिदेशकों, 20 से अधिक प्राचार्यों तथा आचार्यों, अकादमिक अधिकारियों, 100 से अधिक अतिविशिष्टवक्ताओं, शोधार्थियों व विद्यार्थियों की उपस्थिति रही। संभवतः यह कोरोना काल में यह अपने किस्म की एकदम अनूठी संगोष्ठी रही। इसमें एक साथ इतने महत्वपूर्ण100 से अधिक विद्वानों की समवेत बौद्धिक आहुति ने सम्पूर्ण देश और विश्व के बुद्धिजीवियों को विचार-मंथन हेतु एक मंच पर उपस्थित कर दिया जो कि मील का पत्थर बन गया। देश विदेश के प्रायः हर क्षेत्र और विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के अतिरिक्त्त शिक्षण, प्रशिक्षण और प्रशासन के हर महत्वपूर्ण संस्थान के अनुभवों को साझा करने हेतु आकाशवाणी, दूरदर्शन विभिन्न प्रशिक्षण संस्थानों को भी इसमें सम्मिलित किया गया जो निसंदेह अतुलनीय था।




इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल माननीय केशरीनाथ त्रिपाठी जी उपस्थित थे। माननीय केशरीनाथ त्रिपाठी जी ने भारत की पारंपरिक शिक्षा पद्धति को ही शिक्षा का मूल आधार बताया एवं जीवन मूल्यों  से संपृक्त शिक्षा की आवश्यकता का संदेश दिया। इतने अधिक समसामयिक विषय पर आयोजन करने के लिए आयोजकों को बधाई दी। केसरीनाथ त्रिपाठी जी ने कहा- "इस वैश्विक संकट के दौर में ऐसा भव्य और विराट बौद्धिक महायज्ञ कराने की क्षमता डॉ. माला मिश्र में ही है। "मॉरिशस से विश्व हिंदी सचिवालय के सचिव प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र इसमें विशेष अतिथि के बतौर आमंत्रित थे। प्रोफेसर विनोद कुमार मिश्र ने भारत एवं मॉरिशस की सांस्कृतिक परम्पराओं के सातत्य में नए विकल्पों के स्वीकार को समसामयिक परिदृश्य में मौजू बताया।


हरियाणा सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति प्रोफेसर पी. एल चतुर्वेदी जी ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि ऑनलाइन शिक्षण अस्थाई कार्यक्रम के लिए ठीक है लेकिन सतत लक्ष्य सिद्धि के लिए यह पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि अगर ऐसी ही शिक्षा चलती रही तो विद्यार्थी जीवन में दुर्गमता भी उत्पन्न हो सकती हैं। जो शिक्षा किसी विद्यालय या महाविद्यालय में जाकर प्राप्त की जाती है वह शिक्षा शायद ऑनलाइन शिक्षण के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती क्योंकि जब एक विद्यार्थी स्कूल जाता है या कॉलेज जाता है तो वह वहां से बहुत कुछ सीखता है उसमें आत्मीयता और भावनात्मक संस्पर्श होता है जोकि घर बैठे ऑनलाइन शिक्षण से संभव नहीं है। पारस्परिक संबंध निर्माण पारंपरिक व्यवस्था में ही संभव है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के पूर्वकुलपति प्रोफेस रगिरीश्वर मिश्र ने कहा कि शिक्षा का अर्थ व्यक्तिव को पूर्णता प्रदान करना है। वही शिक्षा व्यवस्था सार्थक हो सकती है जो सर्वाधिक विकास करे। पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय की कुलपति सोमा बंद्योपाध्याय ने ऑनलाइन शिक्षण एवं प्रश्न की चुनातियाँ की व्यवहारिक समीक्षा की। अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय के पूर्वकुलपति मोहन लाल छीपा ने परंपरागत ज्ञान मूल्यों के सकारात्मक स्वीकार को जरूरी बताया। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर के सरीलाल वर्मा ने संस्कार धर्मी शिक्षण के गुणों का व्याख्यान करते हुए प्रशासनिक पक्ष को भी गंभीरता पूर्वक विश्लेषित किया। माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफे. संजय द्विवेदी ने नई पीढ़ी की ज़रूरतों को समझने और उनके अनुसार ही उनका समाधान करने वाली शिक्षा की उपादेयता पर विस्तृत और सार्थक चर्चा की। सूचना की बमबारी के स्थान पर एकाग्रताधर्मी शिक्षण को उपादेय बताया। अटल बिहारी वाजपेयी विश्व विद्यालय के वर्तमान कुलपति प्रोफेसर रामदेव भारद्वाज ने स्वावलंबी एवं सशक्त मनुष्य बनाने वाली पद्धतियों को ही शिक्षा का आधार बताते हुए ग्रामीण संदर्भों की भी युक्तियुक्त  समीक्षा की। प्रोफेसर जी.बी.पांडेय ने ऑनलाइन शिक्षण के सकारात्मक पहलुओं पर  सार्थक विमर्श प्रस्तुत किया। प्रोफेसर बालास्वामी ने इस कोरोना काल में परीक्षाओं को शिक्षण एवं प्रशासन की दृष्टि से बड़ी चुनौती बताया। भारतीय प्रशानिक अधिकारी डॉ. रश्मि सिंह ने प्रशासन की मूल चिंताओं को जताते हुए उसके समाधान के कारगर उपायों पर  सुचिंतित तरीकों से प्रकाश डाला। सांस्कृतिक कार्यक्रम के रूप में सार्थक संदेश देने हेतु प्रसिद्ध नवोदित अंतरराष्ट्रीय कथक नृत्यांगना शुभांगी की कोरोना मुक्ति गीत पर सुंदर, सार्थक एवं भाव प्रवण नृत्य की वीडियो द्वारा प्रस्तुति ने समस्त श्रोतावृन्द को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रख्यात समीक्षक संदीप अवस्थी ने सहजता के साथ जीवन मूल्यों के अंगीकार को ही समस्त व्यवस्थाओं का मूल बताया। हिंदी के मूर्धन्य विद्वान साहित्यकार प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित ने साहित्यिक समरसता को अपनाते हुए भारतीय गुरुकुल परंपरा के अनुसा रगुरुशिष्य पारस्परिकता विकसित करने वाली पद्धति को ही वर्तमान संकट में अधिक प्रासंगिक बताया। कुलपति प्रोफेसर हरिमोहन ने अपने विस्तीर्ण अनुभवों से अर्जित उपादेय जीवनधर्मी शिक्षा और प्रशासन संबंधी चर्चा को वक्तव्य का आधार बनाया। आईआईएमसी के पूर्व निदेशक प्रोफेसर राम जी लाल जांगिड़ ने पत्रकारिता की व्यावहारिक शिक्षा व प्रशिक्षण के लिए ऑनलाइन शिक्षण की सीमा रेखाओं की सोदाहरण चर्चा करते हुए प्रत्यक्ष पद्धति से शिक्षण को ही ज्यादा उपयोगी बताया 


दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज महाविद्यालय की प्राचार्या डॉरमा ने मूल-भूत सरंचनागत ढांचा सही करने की पैरवी की। जानकी देवी महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राचार्या डॉ. स्वातिपल ने ऑनलाइन शिक्षणप्रशिक्षण एवं प्रशासन को कोविड 19 का सबसे सशक्त हथियार बताया। कानपुर से प्राचार्य डॉशालिनी मिश्र ने ग्रामीण एवं कस्बाई स्तर पर महिलाओं की घरेलू समस्याओं पर बेबाकी पूर्वक व्याख्यान किया। प्रयागराज से प्रोफेसर जहाँ आराने आदर्श मनुष्य बनने की शिक्षा को ही आदर्श बताया। केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रोफेसर उमापति दीक्षित ने संस्कारों के साथ-साथ सरकार के उन्नयन को परम आवश्यक बताया। मॉरिशस के प्रसिद्ध विद्वान राजहीरामणि ने पूर्णता प्रदान करने वाली शिक्षा की अनिवार्यता को आधार बताया। महात्मा गांधी संस्थानमॉरिशस की प्रोफेसर अलका धनपत ने मॉरिशस के दृष्टांतों के परिप्रेक्ष्य में शिक्षाप्रशिक्षण एवं प्रशासन की समस्याओं एवं समाधान को बखूबी विवेचित किया। दक्षिण अफ्रीका से डॉलोकेश महाराज ने अपने देश के ग्रामीण संदर्भ को उभारते हुए अपने वक्तव्य को पल्लवित किया। दक्षिण अफ्रीका से ही डॉहीरालाल सेवनाथ ने हिंदी शिक्षण की व्यवहारिक चुनौतियों की समसामयिक चर्चा की। मेलबर्न से डॉकौशल किशोर श्रीवास्तव ने पश्चिमी देशोंभारत तथा विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया के शैक्षिक संस्थानों की तुलनात्मक स्थिति पर गंभीरता पूर्वक क्रमबद्ध तरीके से विचार रखे। विद्यालयी चिंताओं पर स्तर-भेद के मूल आधारों पर बहुत सार्थक एवं गहन चर्चा करते हुए प्राचार्यों डॉ. सुनील त्रिवेदीएचआर शर्मानिधि चौधरीमीनू शर्मा इत्यादि ने भी अपने उपयोगी तथा व्यवहारिक वक्तव्यों से प्रतिभागियों को लाभान्वित किया। आकाशवाणी से डॉ. अमरनाथ अमत और दूरदर्शन से डॉराजीव कुमार शुक्ल ने पत्रकारिता प्रशिक्षण की समस्याओं एवं उनके संभावित निदानों पर सटीकता से प्रकाश डाला। अमरीका से डॉसीमा बजावेद ने भारत एवं अमरीका के मूल-भूत ढांचे की भिन्नता को उकेर कर अपने अनुभव साझा किए। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के अध्यक्ष सुंदरम पार्थसार थीनेइस विराट संकल्पना एवं सफल सलाह के लिए संयोजिका एवं मुख्य समन्वयक  डॉमाला मिश्र की हिम्मत का लोहा मानते हुए उन्हें आशीर्वचनों से संबोधित किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर के.एन तिवारी ने काव्यात्मक रूपमें परिस्थितियों को बयां किया। झारखंड के प्रोफेसर जे.बी.पांडेय के कोरोना संबंधी व्याख्यान को गीतात्मक संस्पर्श के द्वारा अभिव्यक्त करने का प्रयास भी बहुत अधिक प्रभावी रहा। भारत पेट्रोलिय ममंत्रालय के मीडिया प्रभाग में डीन वरिष्ठ प्रोफेसर केजीसुरेश ने विषय को सूत्रात्मक रूप में बहुत ही व्यवहारिक एवं सुंदर रूप में उपयोगी बिंदुओं से समन्वित कर संप्रेषित किया।



कुल सत्रों में लगभग 20 घंटे तक चली इस विराट संगोष्ठी का रूपरेखाबद्ध सुचारू आयोजन हुआ। प्रत्येक सत्र के अंत में प्रश्न सत्र का संचालन किया गया जिसमें कुछ प्रश्नों को आमंत्रित किया गया। हर सत्र के अंत में चयनित प्रपत्रों का प्रतिभागियों द्वारा सारांश वाचन किया गया।अंत मेमॉरिशसदक्षिण अफ्रीकाऑस्ट्रेलियानेपालबांग्लादेशसिंगापुरइंग्लैंडअमरीकाभूटान आदि देशों सहित भारत वर्ष के उत्कृष्ट विद्वानों ने इस संगोष्ठी को सार्थक बनाया। इस संगोष्ठी में एक अन्य इतिहास बनाते हुए यू.जी.सीइम्पैक्टफैक्टर युक्त संतसाहित्य की परंपरा विषयक पुस्तक का प्राचार्या रहंसा शुक्ल ने संयोजिका डॉ.माला मिश्र के द्वारा अंतरराष्ट्रीय लोकार्पण करवाया। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पूर्व प्राचार्य डॉसुनील त्रिवेदी ने प्राथमिकमाध्यमिकउच्च शिक्षा एवं प्रशिक्षण के साथ-साथ प्रशासनिक चुनौतियों एवं संभावनाओं की सार्थक एवं सोदाहरण विवेचना की।


अन्य अनेक अतिथियों व विद्वानों ने भी बताया कि इस समय के लिए ऑनलाइन शिक्षा अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कोविड-19 ऐसे महामारी से बचते हुए शिक्षा प्राप्त करने का यह एकमात्र साधन है। जिससे विद्यार्थी अपने ज्ञान को सुचारू रूप से अर्जित कर सकते हैं, और आने वाले भविष्य के लिए तैयार हो सकते हैं। ताकि उनका आने वाला भविष्य इस महामारी से प्रभावित न हो।


समापन सत्र के अंत में हिंदी प्रचारिणी सभा, मॉरिशस के उपाध्यक्ष श्री  यन्तुदेव बुधु ने भारत और मॉरिशस की सांस्कृतिक विरासत एवं साहित्यिक थाती का विस्तृत उल्लेख करते हुए सभी का औपचारिक धन्यवाद  ज्ञापन किया, महत्वपूर्ण बिंदुओं की चर्चा करते हुए हिंदी के विस्तार की संभावनाओं को प्रकट किया और समाधान के कारगर उपायों पर विमर्श किया तथा इस भव्य एवं सुंदर तीन दिवसीय आयोजन की सफलता के लिए संयोजिका डॉ. माला मिश्र के प्रति उद्गार प्रकट किए कि इतने बृहत्तम फलक पर एकांतिक रूप से प्रयास कर के सारे विश्व को इस सारस्वत अनुष्ठान के लिए एक मंच पर एकत्रित करने का चुनौतीपूर्ण कार्य केवल डॉ. माला मिश्र ही कर सकती थीं।


इस संगोष्ठी में प्रो. संजीव भानावतडॉ. रामशरण गौड़वरिष्ठ पत्रकार शम्भूनाथ शुक्लवीरेंद्र कुमार यादववरिष्ठ चिंतक लक्ष्मीनारायण भालासत्यवती कॉलेज के प्राचार्य डॉविजयशंकर मिश्र,अम्बेडकर विश्वविद्यालय के प्रो. सत्यकेतु सांकृतप्रोअनिल अंकित रायडॉ. विक्रम सिंहश्री भगवान चौधरीश्री देवेंद्र सचदेवादौलत राम कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राचार्या डॉ. सविता रायडॉ. ए.के.भागीडॉ. मधु कौशिकप्रोदिवाकर शर्माडॉकुमार रत्नमप्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा प्रोगीता नायकडॉममता दुबेडॉ.एसएस अवस्थीडॉ.रविटेक चंदानीडॉ.एच.आर.शर्माडॉमहेश कुमार शर्माडॉरामबक्षडॉनिधि चौधरीडॉएलसी निगमडॉमीनू तिवारीडॉ. नीलम ऋषिकल्पबिशम्भर नेवरडॉ. लक्ष्मीडॉ. मनोजदयालडॉ. अम्बरीश सक्सेनाडॉ. अमिता पांडेयप्रोबीकेतिवारीडॉ. अर्जुन चव्हाणवरिष्ठ पत्रकार अरशद फरीदीडॉगिरिराजशरण अग्रवालप्रोचितरंजनकारडॉ. महेन्द्रपाल शर्माडॉ. अमरनाथ अमरडॉ. राजीव कुमार शुक्लडॉ. जसिपाल राणा, डॉ. आलोक पुराणिकपार्थ सारथी थपलियालडॉसीमा बजावेदडॉ. मनोज कुमार (वर्धा), डॉ. अधीश काधकेप्राचार्य प्रतुषवत्सलाडॉ. सुधाकर पाठकसी.जे.एम.सी.से डॉराकेश कुमारविपुलपंवार (विदेशमंत्रालय), डॉ. प्रकाश चुरदेकरराजीव श्रीवास्तवसुधीर सोनीडॉप्रमोद कुमार डॉ. शालिनी मिश्राडॉ. मोहन बैरागीडॉ. ऋषि कुमार मिश्राप्रोअरुण कुमार भगतडॉ. आलोक कुमार पांडेयडॉ. अनुपम कुमार भाटियाप्रखर श्रीवास्तवभागयेन्द्र पटेलबबिता यादव (उपप्राचार्या), रवींद्र माहेश्वरीडॉ. ज्ञानतोष झाडॉ. हरनेक सिंह गिलडॉ. पृथ्वीराज थापर आदि ने भी बौद्धिक योगदान दिया।



 औपचारिक रूप से समापन की घोषणा करने से पूर्व मुख्य समंवयक और संयोजिका डॉ. माला मिश्र ने समस्त आयोजन समिति, भगत सिंह फाउंडेशन एवं हिंदी प्रचारिणी सभा, मॉरिशस के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की एवं  अपने विचार साझा किए। इस विराट एवं  भव्यतम अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की बीज परिकल्पना का उद्देश्य समूचे विश्व की साझी संकटशीलता को बताते हुए सभी की चिंताओं को एक मंच पर उठाने और निदान तक पहुंचने की योजना को साझा किया। ऑनलाइन प्लेटफार्म को वर्तमान शिक्षण, प्रशिक्षण एवं प्रशासन की दृष्टि से आवश्यक विकल्प बताते हुए उन्होंने मशीनी बनने के स्थान पर आत्मबोध से सुसंस्कृत परिपूर्ण एवं आत्मविश्वास से संवलित स्वावलंबी संस्कार पूर्ण आदर्श मनुष्य का निर्माण कर सर्वांगीण विकास धर्मी बनाने वाले शिक्षण, प्रशिक्षण व हितकारी प्रशासन को ही श्रेयस्कर निदान के रूप में मूल्यवान बताया और वसुधैव कुटुम्बकम के आदर्श की स्थापना के मूल-भूत आदर्श के ध्येय सिद्धि को शिक्षा का मूल-मंत्र स्वीकार करने का संदेश देते हुए, सर्वेभवन्तुसुखिनः, सर्वेसंतुनिरामया: की स्वस्ति कामना कर कोविड-19 से मुक्ति दिलाने में पुनःपुनःविश्व गुरु भारत की निर्विशिष्ट भूमिका के प्रति सुदृढ़ विश्वास जताया। और इस प्रकार इस त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी रूपी आत्ममंथनकारी ज्ञान यज्ञ का सफल बौद्धिक आयोजन सम्पन्न हुआ।


Sunday, June 28, 2020

पायलट ने AirAsia पर सुरक्षा मानकों के उल्लंघन का लगाया आरोप, DGCA ने जारी किया नोटिस

DGCA ने एक पायलट द्वारा एयर एशिया (AirAsia) एयरलाइन्स सुरक्षा मानकों का उल्लघंन करने के आरोप लगाये जाने के दो हफ्ते बाद एयरलाइन्स के एक शीर्ष अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया.



नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने एक पायलट द्वारा एयर एशिया (AirAsia) एयरलाइन्स सुरक्षा मानकों का उल्लघंन करने के आरोप लगाये जाने के दो हफ्ते बाद एयरलाइन्स के एक शीर्ष अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी किया. बता दें कि पायलट फ्लाइंग बीस्ट नाम से लोकप्रिय यूट्यूब चैनल चलाता है. DGCA के अधिकारियों ने बताया, 'पायलट के आरोपों के बाद एयर एशिया के परिचालन प्रमुख मनीष उप्पल को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है.'


एयर एशिया इंडिया के प्रवक्ता ने कहा, 'एयर एशिया इंडिया नोटिस मिलने की पुष्टि करता है और हम तथ्यों की अन्वेषण प्रक्रिया में नियामक की सहायता कर रहे हैं. हम नियामक का पूरी तरह से सहयोग करेंगे.' उल्लेखनीय है कि लोकप्रिय यूट्यूबर कैप्टन गौरव तनेजा ने 14 जून को ट्वीट किया था कि एयर एशिया ने विमानों के सुरक्षित परिचालन और यात्रियों के साथ खड़ा होने की वजह से उन्हें निलंबित कर दिया.


तनेजा ने 15 जून को यूट्यूब पर विस्तृत वीडियो जारी किया जिसका शीर्षक था, 'पायलट की मेरी नौकरी से निलंबित किए जाने के पीछे का कारण.' तनेजा ने वीडियो में आरोप लगाया कि विमानन कंपनी ने पायलटों से 98 प्रतिशत तक विमानों को 'फ्लैप-3' मोड में उतारने को कहा जिससे ईंधन की बचत होती है. उन्होंने कहा कि अगर पायलट 98 प्रतिशत विमानों को उतारने की प्रक्रिया में 'फ्लैप-3' मोड का अनुपालन नहीं करते तो एयरलाइन्स उसे मानक परिचालन प्रक्रिया (SOP) का उल्लंघन मानती है.


उल्लेखनीय है कि फ्लैप विमान के पंखों का हिस्सा होता है, जिसका इस्तेमाल विमान को उतारने और उड़ान भरते वक्त अवरोधक बल के तौर पर किया जाता है. डीजीसीए ने 15 जून को ट्विटर पर कहा कि उसने विमानन कंपनी के खिलाफ कुछ हितधारकों की चिंता को संज्ञान में लिया है. नियामक ने कहा, 'डीजीसीए ने उठाए गए मामले पर जांच शुरू कर दी है और जांच के नतीजों के आधार पर उचित कार्रवाई करेगा.' डीजीसीए के वरिष्ठ अधिकारियों ने 15 जून को ही पुष्टि की थी कि तनेजा के आरोप के मद्देनजर एयर एशिया जांच के दायरे में है. 


Friday, June 26, 2020

कानपुर - सोशल डिस्टेंसिंग के साथ सम्पन्न हुई जगन्नाथ रथ यात्रा

कानपुर में जनरलगंज स्थित श्री जगन्नाथ मन्दिर में भक्तों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भगवान के दर्शन किए।



यहां भगवान का अभिषेक और पूजन किया गया। इसके बाद उन्हें स्वादिष्ट व्यंजनों का भोग लगाया गया।ठाकुर भले बिराजे जी उड़ीसा जगन्नाथ पुरी में और आरती ओम जय जगदीश हरे से भक्तों ने भगवान की आराधना की प्राचीन परंपराओं के अनुसार रथयात्रा को इस बार स्थगित कर दिया गया है। लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग के साथ परंपरा का निर्वहन किया गया । श्री जगन्नाथ जी महाराज जगन्नाथ जी की गली, जनरलगंज, में जगन्नाथ रथयात्रा की परम्परा नहीं टूटने दी कानपुर नगर के जनरलगंज क्षेत्र में स्थित 210 वर्षीय प्राचीन मन्दिर श्री जगन्नाथ जी महाराज मंदिर है। 



शताब्दियों से अनवरत चली आ रही रथयात्रा परम्परा की कोरोना महामारी भी हरा नहीं सकी और सभी प्राचीन परम्पराओं का निर्वहन पिछले बर्ष बड़े हर्षोल्लास से किया गया था पर बार कोरोना महामारी के चलते प्रशासन के निर्देशानुसार रथयात्रा की अनुमति नहीं थी जिसके चलते मंदिर प्रशासन ने समस्त निर्देशों के पालन करते हुये श्री जगन्नाथ जी, बहन सुभहा जी और बलदाऊ जी की मन्दिर प्रांगण में ही रथ पर सवार कर परम्परा को टूटने से बचाया और सदियों से-चली आ रही परम्परा की विजय हुई। रथयाला आयोजन में विशेष रुप से ज्ञानेन्द्र गुप्ता , उप प्रबन्धक गोपाल गुप्ता , राजेश गुप्ता एवं भयंक सक्सेना, संजय मालानी आदि उपस्थित थे ।


मुस्कुराए कानपुर के सिटी एंबेसडर डॉ सुधांशु राय और सोशल एंबेसडर डॉक्टर कामायनी शर्मा बनाए गए


छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के राष्ट्रीय सेवा योजना  और श्रम विभाग एवं यूनिसेफ के नया सवेरा योजना के संयुक्त प्रयास से मुस्कुराए कानपुर अभियान की शुरुआत हुई है जिसका मुख्य उद्देश्य कोरोना की सघन जागरूकता महामारी को दूर करने की रणनीतियों के साथ बाल श्रमिकों की काउंसलिंग, शिक्षा एवं बाल श्रम उन्मूलन मुख्य है!
 मुस्कुराए कानपुर का 'सिटी एंबेसडर'  विश्वविद्यालय के डॉक्टर सुधांशु राय को बनाया गया है और यूनिसेफ के प्रतिनिधि  आशी खान  सोशल  एंबेसडर  के रूप में  कार्यों को गति देंगी! भारत उत्थान न्यास की डॉक्टर कामायनी शर्मा को मुस्कुराए कानपुर का सोशल एंबेसडर  बनाया गया है! डॉक्टर कामायनी ने कहा  कि हमारा  यह प्रयास रहेगा  की जल्द से जल्द हमारा शहर कानपुर कोरोनावायरस जैसी महामारी की गिरफ्त से बाहर आकर फिर से मुस्कुराए! विश्वविद्यालय की कुलपति, कुलसचिव , एनएसएस समन्वयक डॉ केएन मिश्रा और श्रम विभाग के स्टेट कोऑर्डिनेटर सैयद रिजवान अली ने सिटी एंबेसडर और सोशल एंबेसडर को शुभकामनाएं देते हुए कहा कहा कि सिटी एंबेस्डर का यह दायित्व होना चाहिए कि वह अपने शहर कानपुर को मुस्कुराने का फिर से मौका दें!
मुस्कुराए कानपुर के समन्वयक डॉ सुधांशु राय ने बताया कि मुस्कुराए कानपुर मूवमेंट में कानपुर के विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों को 'मुस्कुराए कानपुर सोशल एंबेसडर' बनाया गया है,  जिसमें मुख्य रूप से भारत उत्थान न्यास की डॉक्टर कामायनी शर्मा,  कानपुर उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष टीकमचंद  सेठिया, फीटा अध्यक्ष उमंग अग्रवाल, होम्योपैथिक के डॉक्टर हेमंत मोहन, पीएसआईटी की निर्मला सिंह, रघुनाथ ग्रुप के चेयरमैन ओपी डालमिया,  कानपुर होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुखबीर सिंह मलिक, सेल्फ फाइनेंस कॉलेज एसोसिएशन के डॉ विनय त्रिवेदी, डिविजनल वार्डन सिविल डिफेंस आशीष बाजपेई,  मुस्कान फाउंडेशन की पूजा गुप्ता, एवं सोशल डेवलपमेंट सोसाइटी के प्रतीक श्रीवास्तव सम्मिलित हैं , जो सिटी एंबेसडर के साथ प्रभावी रणनीतियां बनाते हुए शहर को कोरोना मुक्त और बाल श्रमिक  मुक्त बनाते हुए शहर को आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएंगे! इसी क्रम में शहर के दस और सोशल एंबेसडर बनाए जाएंगे!


Tuesday, June 23, 2020

सावधान मूवमेंट ने वर्तमान परिवेश में योग की प्रासंगिकता पर की बेबिनार


कोविड 19 टीम सावधान मूवमेंट कानपुर नगर समाज के सभी वर्गों में जहाँ एक ऒर कोरोना से बचाव की जानकारी और जागरूकता का मूल मंत्र दे रहा है वही दूसरी ऒर आज 21 जून  को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष में  "वर्तमान परिवेश में योग की प्रासंगिकता" विषय पर बेबिनार का आयोजन किया। वेबीनार का शुभारंभ आईआईटी कानपुर के योगाचार्य डा0 एस0एल0 यादव  मूवमेंट के संरक्षक एवं कार्यक्रम अधिकारी  राष्ट्रीय सेवा योजना डॉ सुधांशु राय एवं भारत उत्थान न्यास महिला प्रमुख डॉक्टर कामायनी शर्मा द्वारा किया गया!
 सह  संयोजिका श्रीमती सुरभि द्विवेदी ने  दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम की शुरुआत की ! संयोजिका डॉक्टर कामायनी शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और वेबीनार की रूपरेखा के बारे में बताया!
मुख्य वक्ता डॉ एस एल यादव  ने योग की अवधारणा और महत्व के बारे में व्यापक चिंतन प्रस्तुत किया उन्होंने बताया कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना पड़ेगा !उन्होंने कहा आप स्वयं के स्वास्थ्य के चौकीदार हो और इस कार्य के लिए आपको अपने जीवन में योग को अपनाना ही पड़ेगा ! 
वेबीनार की अध्यक्षता करते हुए डा0 सिधांशु राय ने कहा योग को अपनाकर कोरोना को हराया जा सकता है उन्होंने कहा आज पूरे विश्व में योग के द्वारा भारत की ब्रांडिंग हुई है। 
सह संयोजिका भावना श्रीवास्तव ने कहा उन्होंने योग के द्वारा अपने जीवन का पुनः शुभारंभ किया है ।  पंकज शर्मा जी ने योग पर रचना प्रस्तुत की। डा0 अनुराग पांडेय ने आज्ञा चक्र के बारे में अपनी जिज्ञासाएं रखी जिसका जवाब मुख्य वक्ता द्वारा प्रदान किया गया ! सुरभि दिवेदी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया
डा0 अपूर्वा वसिष्ठ जी ने भी प्रकृति प्रेम का संदेश दिया।  वेबीनार में पूर्व वित्त अधिकारी श्रीमती संध्या मोहन डॉ रचना पांडे् ओमप्रकाश , श्रीमती शिवांगी द्विवेदी इत्यादि ने प्रतिभाग किया!


Friday, June 19, 2020

भाषाओं की त्रिवेणी रहा राष्ट्रीय काव्य महोत्सव 

 


एक्सप्रेशंस  इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फाउंडेशन लखनऊ  और  उत्तर  महाराष्ट्र  विश्वविद्यालय जलगांव से सम्बद्ध द  बी पी सी दादासाहब नामदेव भोले कॉलेज भुसावल  के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय नेशनल पोएट्री फेस्टिवल का आयोजन किया। कार्यक्रम में मराठी , अंग्रेजी  हिंदी एवं  उर्दू भाषाओँ के सोलह कवियों ने तीन सत्रों में अपनी रचनाओं का पाठ किया।  
मराठी कवियों में शिरपुर से डॉ फुला बागुल ,सासवड पुणे से डॉ बबन चखले ,लोनार बुलडाणा से डॉ विशाल इंगोले ,सांगली से डॉ सुनील तोरने और नासिक से डॉ जयश्री वाघ ने अपने रचनाओं का पाठ किया। अंग्रेजी कवियों में लखनऊ से डॉ नरेंद्र दानी , उन्नाव से डॉ बैजनाथ गुप्ता, संभलपुर ओडिशा से मानसी महाराणा ,नासिक से डॉ किशोर निकम , नंदुरबार से डॉ जीतेन्द्र बागुल एवं पटना से डॉ शिव कुमार यादव ने अपने अंग्रेजी काव्य का पाठ किया।  
हिन्दी कवियों में लखनऊ के आलोचक एवं कवि डॉ ब्रजेश ,    श्री अरुण कुमार मिश्रा , समस्तीपुर बिहार से डॉ शम्भू नाथ झा ,सुल्तानपुर से डॉ अरुण कुमार निषाद ने अपनी कविताओं का पाठ किया।
इसी श्रृंखला में लखनऊ की प्रख्यात उर्दू -अंग्रेजी कवियत्री सुश्री वसफ़िया हसन नक़वी ने अपनी कविताओं का पाठ किया।
सभी तीनो सत्रों में कवियों ने मानवता , प्रेम , बंधुत्व ,एवं अचार विचार , व्यव्हार सम्बन्धी मूल्यों को इंगित किया।  कवियों ने समाज में फैली कुरीतियों को भी इंगित किया।



अंग्रेजी सत्र का सञ्चालन करते हुए दादासाहब नामदेव भोले कॉलेज भुसावल की अंग्रेजी विभाग की प्राध्यापक डॉ अंजलि पाटिल ने कवियों का आभार एवं स्वागत किया तथा एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फाउंडेशन की तरफ से कार्यक्रम की सहसंयोजिका सुश्री सनाविया फरीद ने सञ्चालन किया।  
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में समारोह के पैट्रन एवं कॉलेज के प्राचार्य  डॉ आर पी फलक ने अतिथयों , कवियों एवं श्रोताओं का सवागत किया , एवं राष्ट्रीय संयोजक डॉ संजय विट्ठल बाविस्कर ने वर्तमान परिवेश में इ माध्यमों द्वारा ऐसे आयोजनों के औचित्य एवं महत्त्व पर प्रकाश डाला।  एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फॉउण्डेशन्स की संस्थापक एवं अध्यक्ष प्रो आर पी सिंह एवं सचिव डॉ कुलवंत सिंह ने कवियों एवं दर्शकों को शुभकामना सन्देश प्रेषित किये। कार्यक्रम के सह आयोजक  एवं एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फॉउण्डेशन्स के तकनीकी निदेशक डॉ वैदूर्य जैन ने बताया की वर्तमान महामारी के समय काव्य एवं साहित्य जीवन को असीम प्रेरणा देते हैं।  एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फाउंडेशन इस दिशा में सदैव तत्पर है , और काव्य एवं सृजन श्रृंखला में यह उनका चौथा आयोजन है।  कार्यक्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं संयोजक डॉ संजय वी बाविस्कर ने बताया की  ऐसे आयोजनों से राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बल मिलता है , देश के विभिन्न भागों से जुड़े   कवि  संस्कृति एवं जीवन के सेतु के रूप में कार्य करते हैं। 


योगा का महत्व 


21 जून को विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता है | सबसे पहले 2015 में इस योग दिवस की शुरुवात की गई थी |


आधुनिक जीवन शैली के कारण शारीरिक , मानसिक विकृतियों को न केवल उत्पन्न कर रही है बल्कि उन्हे बढ़ा भी रही है। ऐसे में प्रकृति से निकटता जीवन को अपना कर हम सदैव निरोगा रह सकते है। हालांकि वर्तमान जीवनशैली में ऐशो आराम के संसाधन बढ़ रहे है  फिर भी मानसिक शांति नहीं है हर आदमी  दौड़ रहा है एक दूसरे से आगे निकलने की लगी है।


इस आधुनिकता की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम आधुनिक तो होते जा रहे है पर प्रकृति से दूर भी होते जा रहे है |यह सब हमारी व्यवस्था के कारण हो रहा है | हम सभी मोबाइल , टीवी , टेलीविज़न आधुनिक युग के इलेक्ट्रानिक उपकरणो से अंतर्मुखी होते जा रहे हैं और दूसरों से दूर होते जा रहे है |


इसका नतीजा यह निकलता है कि हम अवसाद , अकेलापन जैसी कई बीमारियों से गृस्त हो रहे है | पहले कई बीमारियाँ सुनने को नहीं मिलती थी जो आज के समय में बड़ी आम बीमारी है | उसमे चाहे वह कैंसर हो लीवर से संबन्धित बीमारी हो , मधुमेह या दिल का रोग आदि | इन रोगों से बचाव में योग और प्रकृतिक चिकित्सा अहम भूमिका अदा कर रही है |


हर साल की तरह इस साल भी योग दिवस को एक थीम दी गई है | लेकिन इस साल कोरोनावायरस के चलते लोगों को ऐसी थीम दी गई है , जो सेहत और स्वास्थ्य को बढ़ावा देगी | अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2020 थीम है घर में रहते हुए अपने परिवार के साथ योग करना |


योग चिकित्सा एक विज्ञान है , एक अनुशासित जीवनशैली है , जीवन जीने की कला है | नियमित ध्यान , योग और प्राणायाम दिमाग को शांत करता है जिससे व्यक्ति प्रसन्नचित रहता है | तथा इसका शरीर के सभी अंगो , ग्रंथियों और इंद्रियों पर प्रभाव पड़ता है | इनमे अपनी साँसो , मन और प्राण शक्ति पर नियंत्रण सीखा जा सकता है | और मन में यह विचारो की उत्पत्ति होती है | तथा हमारा जीवन तनावरहित हो जाता है , इससे हम चुस्त - दुरुस्त और स्वस्थ रहेंगे|


ध्यान रखने योग्य बातें -


1 योगाभ्यास करने का सबसे अच्छा समय सुबह का माना जाता है | हालांकि योगाभ्यास के लिए दिन में कई टाइम रखे गए हैं - प्रात: काल , सांयकाल , रात में खाने से पहले आदि | सूर्योदय या ब्रह्म मुहूर्त का समय सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि इस दौरान पेट खाली होता है तथा मन शांत होता है |


2 योगाभ्यास के दौरान शरीर में ऊष्मा का स्तर बढ़ जाता है | इसलिए एक घंटे बाद स्नान करना चाहिए |


3 योगाभ्यास जमीन पर सीधा न करके बल्कि मैट , चटाई या दरी पर ही करें |


योग के फायदे - 


1)  मानसिक तनाव से छुटकारा सुबह के समय योग करने का सबसे ज्यादा असर व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर होता है | प्रात: काल योग करने से दिन भर के मानसिक तनाव से छुटकारा मिल जाता है तथा सभी कार्य आसानी एवं सरलता से हो जाते है |


2)  मधुमेह के रोगियों के लिए जरूरी कहा जाता है कि डाईबीटीज़ एक ऐसी बीमारी है जो कभी ठीक नहीं होती लेकिन ऐसा नहीं है , योग और प्राणायाम से इस बीमारी का इलाज भी संभव है |


3) मन प्रसन्न - प्रतिदिन सुबह के समय योग करने से मन दिन भर प्रसन्न रहता है , साथ ही मानसिक शांति भी मिलती है |


4) आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी - योगा से मस्तिष्क सक्रिय होता है और शारीरिक ऊर्जा में भी बढ़ोत्तरी होती है , जिससे व्यक्ति का मन किसी भी कार्य में अच्छी प्रकार से लगा रहता है तथा काम करने मे मन लगता है , और आत्मविश्वास बढ़ता है |


5) वजन कम करता है - योग वजन घटाने में अत्यधिक सहायक है |


6) हृदय रोग में भी फायदा - प्राणायाम व योग से हृदय संबन्धित समस्याओं से निजाद मिलती है | यह भारत के लिए बड़े गर्व की बात है कि योग के प्रति लोगों कि रुचि बढ़ती जा रही है , योग अब विदेशों में भी अपनाया जा चुका है जो यह दर्शाता है कि योग अब अंतराष्ट्रीय स्तर पर विकसित हो चुका है | 


  


  


 


Wednesday, June 17, 2020

प्रसन्नता , सृजनात्मकता पर चर्चा परिचर्चा एवं परिकल्पनाएं

प्रसन्नता , सृजनात्मकता पर चर्चा परिचर्चा एवं परिकल्पनाएं



एक्प्रेशन्स इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फॉउंडेशन, लखनऊ द्वारा  दिनांक १५ जून,2020 को हैप्पीनेस एंड क्रिएटिविटी : पान्डेमिक ! लॉक डाउन एंड डाइमेंशन्स विषय पर एक राष्ट्रीय इ सेमिनार का आयोजन किया गया।  कार्यक्रम में डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय लखनऊ की शिक्षिका डॉ अलका सिंह ने विषय परवर्तन करते हुए बीज  व्याख्यान दिया ,और दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज के मनोविज्ञान  विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ सबीन रिज़वी तथा नेशनल डिफेन्स अकादमी खडगवासला में  अंग्रेजी अंग्रेजी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ प्रज्ञा वाजपेयी ने प्लेनरी व्याख्यान दिए।  कश्मीर विश्वविद्यालय कश्मीर की अंग्रेजी विभागाध्यक्ष , और डीन , स्कूल ऑफ़ आर्ट्स लैंग्वेज एंड लिटरेचर प्रोफेसर लिली वांट,टाइम्स ऑफ़ इंडिया लखनऊ की असिस्टेंट न्यूज़ एडिटर सुश्री राशि लाल , तथा दुर्गा महाविद्यालय रायपुर की अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ प्रोतिभा मुख़र्जी साहूकार ने विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने विचार रखे।
अपने व्याख्यान में अलका सिंह ने बताया कि, “खुश रहना और उसके फलस्वरूप किसी रचना को आकार देना , ईश्वर या यूँ कहें की प्रकृति के रचनाकार की शक्ति और उसके आसपास होने का अहसास है। आज जहाँ सारा विश्व कोरोना महामारी का दंश झेल रहा है वहीँ इसके भयावह संक्रमण को नियंत्रित करने हेतु जो चरणबद्ध लॉक डाउन किये गए उससे मानवजीवन की स्थिति ,परिवेश और इक्कीसवीं शताब्दी में बंधे विभिन्न प्रवाहों को नए दर्शन की अनुभूति हुईहै। योग, दर्शन , भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संचार, प्रसार इत्यादि भारतीय संस्कृति एवं प्राचीन सभ्यताओं में निहित मानवीय गुणों , पर्यावरण चिंताओं एवं सस्टेनेबल डेवलपमेंट के अर्थ ने जीवन  को नये सिरे से परिभाषित करने का अवसर प्रदान किया है। कोरोना काल में घर की चारदीवारी में सिमट कर रह रहा  व्यक्ति  , महामारी की लपटों से बचाव हेतु जीवन जीने के नये आयाम तलाश रहा है।  कोरोना विवशता ने हमारे परिवारों , समाज और देश को संपूर्ण मानव जीवन के संरक्षण हेतु  नये प्रयोगों की रचना करना भी सिखाया है। इसने हमारे राजनीतिक , सामाजिक एवं आर्थिक प्रयोगों को नयी दिशा प्रदान किया है।  स्वयं परिवार, समाज एवं देश की सुरक्षा किस प्रकार एक दूसरे से सम्बद्ध हैं ,और अन्योन्याश्रयी इकाइयों की तरह किस तरह एक दुसरे को प्रभावित करती हैं , आज इस महामारी के दौरान भलीभांति परिलक्षित होती है।


 डॉ सबीन रिज़वी, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में मनोविज्ञान की सहायक प्रोफेसर और सलाहकार मनोवैज्ञानिक हैं, ने " खुशी एक पहेली है” पर बात की। उन्होंने हार्वर्ड, येल और यूसीएलए जैसे विश्वविद्यालयों में चल रहे अनुसंधानों  के बारे में बात की और इन से हमारी समझ को अधिक उपयोगितावादी तरीके से आकार दिया है। अनुसंधान साक्ष्य से पता चला है कि पैसा एक निश्चित स्तर के बाद खुशी की गारंटी नहीं दे सकता है। करीबी और सार्थक रिश्ते, जीवन में उद्देश्य की भावना, अच्छी नींद, शारीरिक गतिविधि, माइंडफुलनेस, दयालुता के परोपकारी कार्य, स्वस्थ भोजन विकल्प कुछ ऐसे चर हैं जो यह तय करते हैं कि कोई व्यक्ति कितना खुश रह सकता है। डॉ.रिजवी ने डोपामाइन, सेरोटोनिन, एंडोर्फिन और ऑक्सीटोसिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर की भूमिका पर विस्तार से बताया और कैसे इनसे खुशहाल स्थिति पैदा होती है।  उन्होंने माइंडफुलनेस की प्रासंगिक भूमिका को दोहराया और इस तरह के चुनौतीपूर्ण समय के दौरान भी हम में से प्रत्येक पहेली के टुकड़ों को एक साथ रख सकते हैं, और खुश रह सकते हैं। इस बात को दर्शकों ने बहुत सराहा और वे कई पेचीदा सवालों के साथ सामने आए।


डॉ प्रज्ञा बाजपेयी का  "महामारी के दौरान अभिव्यक्ति: कला एवं कृति" विषयक व्याख्यान उनके ज्ञान, अनुभव, एवं शिक्षण पर और  विशेष रूप से महामारी के परिप्रेक्ष्य में ध्यानाकर्षण करता है। उनका व्याख्यान  यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार से महामारी ने लोगों के चिन्तन/दर्शन को गहराई से प्रभावित किया, उन्हें चुनौती दी, एवं इस प्रक्रिया में उन्हें एक नई दिशा की खोज की ओर प्रेरित किया। उनका यह व्याख्यान आप लोगों को सामान्य रचना एवं रचनात्मक लेखन में भिन्नता का भी बोध कराएगा। जिस प्रकार रचनात्मकता किसी नूतन विचार को साक्षात रूप में अवतरित करके फिर उसको विभिन्न स्वरूपों में लाने का कार्य है, उसी प्रकार रचनात्मक लेखन एक  बौद्घिक विधा है जो लोगों के विचारों को शब्दों में बुनकर एक स्पष्ट स्वरूप देने के लिए प्रेरित करता है। वर्तमान महामारी ने लोगों को अपनी क्षमता को समझने और उसे रचनात्मक आयाम देने के कई अवसर प्रदान किए हैं जिसे लोगों ने अपने अपने सामर्थ्य के हिसाब से विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया है। लॉकडॉउन के विभिन्न चरणों में मिले कुछ फुरसत के पलों में लोगों ने उसका कारगर लाभ लेते हुए विभिन्न प्रकार से प्रयोगों द्वारा रचनात्मक कार्यों में उपयोग किया है । इसी क्रम में कुछ लोगों ने अपने विचारों एवं अनुभवों को शाब्दिक रूप देते हुए रचनात्मक लेखन के माध्यम से नई ऊंँचाइयों तक पहुंँचाया है। उसी के दृष्टिगत यह व्याख्यान आपको रचनात्मक लेखन को गहराई से समझने एवं उस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हुए लाभान्वित करेगा।
फाउंडेशन के सचिव श्री कुलवंत सिंह ने फॉउंडेशन की ओर से  उपस्थित विद्वानों एवं डेलीगेट्स के  स्वागत  किया।   डॉ मुहम्मद तारिक़ इ सेमिनार के संयोजक रहे।  सह संयोजक तथा एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फाउंडेशन के  टेक्निकल डायरेक्टर श्री वैदूर्य जैन ने बताया की कार्यक्रम में देश विदेश से लगभग 1500 लोगों ने रजिस्ट्रेशन  किया है , और यह कार्यक्रम विभिन्न सोशल मीडिया चैनलों तथा ज़ूम पर निर्बाध गति से चला। संचार अधिशाषी  सुमेधा द्विवेदी , संचार अधिशाषी  अनुकृति राज ,तथा रपोर्टियर श्री निलॉय मुख़र्जी तथा सुश्री भाव्या अरोरा ने  वक्ताओं एवं डेलीगेट्स को तकनीकी माध्यमों से संयोजित  किया। कार्यक्रम में अमेरिका , इंग्लैंड ,दक्षिण  अफ्रीका , इंडोनेशिया , मलेशिया  ,थाईलैंड , श्रीलंका इत्यादि  देशों तथा भारत के विभिन्न राज्यों से लोगों ने ऑनलाइन प्रतिभाग किया।
एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फाउंडेशन के सेक्रेटरी  श्री कुलवंत सिंह ने ऐसे आयोजनों कि प्रासंगिकता पर बताया कि "आज के इस संकटपूर्ण समय मे मानव जाति विभिन्न प्रकार की समस्याओ का सामना कर रही है। ऐसे में हम लोगो का एक छोटा सा प्रयास ऐसे लोगो को काफी हद तक मानसिक राहत पहुँचा सकता है। यह प्रयास है अपने संसाधनों को अपनी यथाशक्ति अनुसार तन मन एवं धन से पीड़ित लोगों के साथ बाटना। यह एक ऐसा उपाय है जो केवल दुसरो को ही नही अपितु खुद भी सुख और संतुष्टि का एहसास कराता है। इस संकट के समय में हमारे ऐसे कुछ प्रयास हमारे साथी मनुष्यों एवं समाज मे सकारात्मकता एवं प्रसन्ता का माहौल बनाने में कारगर सिद्ध हो सकते हैं। आइये हम सब इस दिशा में कुछ कदम उठाएं।"


एस. एस. कॉलेज, शाहजहांपुर के अंग्रेजी के सहायक प्रोफेसर डॉ अरुण कुमार यादव ने इ सेमिनार के विषय में अपने अनुभव साझा करते हुए कहा  कि "रचनात्मकता आत्म-निरीक्षण का एक उत्कृष्ट माध्यम है, और खुशी के लिए सबसे अच्छा उपाय है। हमारे अनुभवों  को लिखने से हमें यादों के खजाने को बनाए रखने में मदद मिलती है, कि हम  आने वाले समय में इसे किस प्रकार संजोते हैं, रचनात्मक इच्छा मानव आत्मा की सबसे गहरी  खुशियों में से एक है।"वहीँ एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फाउंडेशन के कार्यकारिणी से जुड़े , लखनऊ स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में अंग्रेजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अर्पित कटियार ने विषय पर विचार साझा करते हुए कहा कि "जैसा कि हम सभी एक प्रसिद्ध कहावत से परिचित हैं कि "इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है"। जीवन कभी भी फिर से एक जैसा नहीं होगा, और इस विचार में विश्वास करते हुए महामारी को संभालने के लिए प्रयोग चल रहे हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है इसलिए इस दुनिया में हर कोई बदलते समय के साथ निर्माण, नवाचार और अद्यतन करने की पूरी कोशिश कर रहा है। हमारी फाउंडेशन एक्सप्रेशन इन लैंग्वेजेजस  एंड आर्ट्स फाउंडेशन  ने भी एक ऐसा मंच प्रदान किया है, जहाँ आप इस अवधि के दौरान आप अपने काम को बढ़ा सकते हैं, जैसे कि  नए कौशल और ज्ञान को सीखना। यह हम सबके लिए एक चरम, चुनौती से कम कुछ  कभी नहीं। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने आप को मानसिक तौर पर शांत रखे ताकि भविष्य के लक्ष्य नकारात्मक विचारों और भावनाओं को ध्वस्त न कर सके। "इसी श्रृंखला में कानपुर विश्वविद्यालय से जुड़े एक महाविद्यालय से डॉ भास्कराचार्य ने प्रसन्नता एवं सृजन पर अपनी विस्तृत परिकल्पना साझा किया।
पावर पॉइंट प्रसेनटेशन के निर्माण  द्वारा सुश्री भव्य अरोरा ने कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा एवं उद्देश्यों को स्पष्ट किया।  कोलकाता    से , एक्सप्रेशंस इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फॉउण्डेशन्स  की कार्यकारिणी से जुड़े  असिस्टेंट प्रोफेसर श्री   निलॉय मुख़र्जी ने सभी आये हुए अतिथियों एवं प्रतिभागियों को संस्था की ओर से धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने इस दौर में वेबिनार और इ सेमिनार कि प्रासंगिकता एवं इस से जोड़े विभिन्न आयामों को भी इंगित किया।


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Monday, June 15, 2020

संकल्प सेवा समिति ने दिया विश्व रकदान दिवस को नया रूप


14 जून दिन रविवार को विश्व रक्तदाता दिवस के उपलक्ष्य में संकल्प सेवा समिति न 31वां रक्तदान शिविर लायन्स क्लब कानपुर गेंजेज के सहयोग से मधुलोक हॉस्पिटल ब्लड बैंक में आयोजित किया गया, इस समय कोरोना वायरस की वजह से रक्तदान शिविर न हो पाने की वजह से ब्लड बैंक में रक्क्त की कमी हो गयी है, जिससे  गम्भीर मरीजो को रक्क्त मिलने में परेसानी हो रही है, इसकी कमी को देखते हुए संकल्प सेवा समिति के द्वारा लगातार रक्तदान शिविर आयोजित किये जा रहे है, इसी कड़ी में आज भी रक्तदान शिविर आयोजित किया गया, जिसमे 33 रक्तदाताओ ने रक्तदान किया, शिविर में मुख्य अतिथि मधुलोक हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ लोकेंद्र सिंह उपस्थित रहे, उन्होंने रक्तदाताओ का हौसला बढ़ाया, कोरोना से बचाव के लिए संकल्प सेवा समिति की और लायन्स क्लब की टीम के द्वारा रक्तदाताओ को एन95 मास्क, सेनेटाइजर, दिया गया और उनका उत्साह बढ़ाने के लिए कॉफी मग और प्रशस्ति पत्र दिया गया, आज आरती, प्रीती, यजुवेंद्र, ब्रजेश आदि लोगो ने रक्तदान किया, आज शिविर में संतोष सिंह चौहान, विजय मिश्रा, पुनीत द्विवेदी, अमन, राजकुमार मिश्रा, अनूप सचान, सुबोध कटियार, रजनेश, कमलेश शर्मा, श्री गोपाल तुलसियान, ज्ञान प्रकाश, मोनिका अग्रवाल, अमित अग्रवाल आदि उपस्थित रहे |


हंसराज कॉलेज द्वारा मीडिया साक्षरता पर वेब संगोष्ठी का हुआ आयोजन


हंसराज कॉलेज द्वारा ‘बदलता परिदृश्य और मीडिया साक्षरता’ विषय पर राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस संगोष्ठी में देश भर से दो सौ से भी अधिक लोगों ने सहभागिता की. संगोष्ठी के प्रारंभ में विषय को प्रस्तावित करते हुए संयोजक डॉ. विजय कुमार मिश्र ने कहा कि मीडिया साक्षरता का सम्बन्ध विभिन्न रूपों में मीडिया तक पहुंचने, उसका विश्लेषण करने, उसका मूल्यांकन और एक तार्किक और बेहतर आलोचना दृष्टि के विकास से सम्बद्ध है. मोटे तौर पर देखें तो मीडिया साक्षरता मीडिया के प्रभाव के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना है। संरचनात्मक सुविधाओं, सत्ता, फंडिंग आदि कैसे ख़बरों के कोण को बदलने का प्रमुख कारण बन जाता है यह जानने की दृष्टि से भी मीडिया साक्षरता बेहद महत्त्वपूर्ण है. आज के बदलते दौर में मीडिया लिट्रेसी लोगों को विचारवान, तार्किक, प्रभावशाली कम्यूनिकेटर और एक सक्रिय नागरिक के रूप में स्थापित करता है. मीडिया लिट्रेसी खबरों में हेरफेर, गलत सूचना, फेक न्यूज़, प्राइवेसी, सायबर बुल्लिंग आदि पक्षों के प्रति भी जागरूक करता है. यह हमें मीडिया उपभोग की अपनी आदतों और उसके उपयोग के पैटर्न में सुधार या बदलाव के माध्यम से बेहतर विकल्प को प्रस्तुत करने में भी हमारी सहायता करती है. इसके माध्यम से लोकप्रिय मीडिया में निहित शक्ति संरचनाओं को समझने और समाज पर उसके प्रभाव को परखने का कौशल भी सहज ही विकसित होता चला जाता है यह मीडिया संस्थाओं के पूर्वाग्रह के अपरिहार्य जोखिमों को समझने में भी सक्षम बनाता है।
इसके बाद संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए द आरोहरण मीडिया स्कूल की डीन अपर्णा द्विवेदी ने कहा कि हम ऐसे दौर में रह रहे हैं, जहां सूचनाओं का अंबार है और रोज़मर्रा की बातचीत में ‘पोस्ट-ट्रूथ’ जैसे शब्द शामिल हो गए हैं. जब खबरों में तथ्य से ज्यादा विचारों पर जोर दिया जाए और उन विचारों को साबित करने के लिए खबरों को तोड़ मरोड़ दिया जाए तो ये तय है कि वो खबर कम और एजेंडा ज्यादा है. ऐसा नहीं है कि ये पहले नहीं होता था. लोग और जब मैं लोग कह रही हूं तो वो सारे लोग जिनका हित ऐसी खबरों को फैलाने में जुड़ा होता है वो अपने अपने मतलब के लिए बातों को गढ़ना और उनका प्रचार करने में लग जाते हैं. पहले इसके लिए उनके पास पारंपरिक मीडिया ही होता था जिस पर आम तौर पर पत्रकार जांच परख लेता है लेकिन अब डिजिटल वर्ल्ड में जिस तरह से राजनीतिक, विचारधारा, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर झूठी खबरें आ रही हैं, वह चिंता की बात है. ऐसे दौर में ‘सूचनाओं’ को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ानी और समझ पैदा करनी होगी और इसीलिए जरूरी है कि मीडिया लिटरेसी यानी मीडिया के प्रति साक्षरता बढ़ाने की जरुरत है. 
सोशल मीडिया और अनगिनत मेसेजिंग नेटवर्क की वजह से बड़े पैमाने पर सूचनाओं का प्रसार एलीट वर्ग या मीडिया तक सीमित नहीं रह गया है. इन नेटवर्क के चलते सूचनाओं के प्रवाह को रोकना नामुमकिन हो गया है. ऐसे माहौल में जरूरी है कि लोगों के पास जानकारी होनी चाहए ताकि वो ऐसी खबरो का विश्लेषण कर सके और ये तय करें कि ये सही है या नहींय इसके लिए हमें बहुत कम उम्र से ही जागरूकता बढ़ानी होगी क्योंकि सूचनाओं की बमबारी लड़कपन की उम्र से ही शुरू हो गई है. 
स्मार्टफोन और टैबलेट की संख्या बढ़ने से आज की पीढ़ी के छात्रों की पहले की तुलना में सूचनाओं तक पहुंच काफी आसान हो गई है. 2016 में एक अमेरिकी रिसर्च से पता चला कि अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का धड़ल्ले से इस्तेमाल करने वाले छात्रों में से 80 फीसदी विज्ञापन और ख़बरों के बीच फर्क़ नहीं कर पाए. इसका मतलब यह है कि छात्रों को जिस बड़े पैमाने पर सूचनाओं से जूझना पड़ रहा है, उसमें वे सच या झूठ का फर्क़ नहीं करने में ख़ुद को असहाय पा रहे हैं. हालांकि, कुछ देशों ने इस पर काम करना शुरु किया है .
2014 के बाद से फिनलैंड ने झूठी ख़बरों के खिलाफ़ एक अभियान शुरू किया गया, जिसका मक़सद छात्रों में विश्लेषण की क्षमता और सूझबूझ बढ़ाना है. फैक्ट चेकिंग यानी सच्ची और झूठी खबरों का फर्क़ बताने वाले संस्थानों या जानकारों के साथ मिलकर फिनलैंड छात्रों को ये सिखा रहा है कि झूठी खबरों की पहचान कैसे करे
इसी तरह,2018 में अमेरिका के सरकारी स्कूलों में मीडिया साक्षरता बढ़ाने के लिए एक विधेयक लाया गया, जिसे कैलिफोर्निया के गवर्नर जेरी ब्राउन ने मंजूरी दी. 
भारत में भी कौन सी सूचना सच है और कौन सी झूठ, इसका पता लगाना मुश्किल होता जा रहा है. हमने यहा पर स्कूली स्तर पर मीडिया साक्षरता बढ़ाने पर बातचीत शुरू भी नहीं की है. भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक सिलेबस पूरा करने तक सीमित है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या वो नई तकनीक में ये जानकारी दे पाएंगे कि छात्र सही सूचना के तथ्यों की जांच कर सके.
इसके लिए छात्रों को अवगत कराने के साथ साथ माता पिता और समाज को अवगत कराना होगा. 
आखिर में, सूचनाओं को लेकर सवाल करने की आदत को बढ़ावा देना चाहिए, लेकिन ऐसा भी न हो कि छात्रों के अंदर इससे निराशावाद पनपे. भले ही सूचनाओं की बाढ़ के कई ख़तरे हैं, लेकिन अलग-अलग तरह के मीडिया के आने से अधिक लोगों तक ख़बरें पहुंच रही हैं और उनमें विविधता भी बढ़ी है. इसलिए ठगे जाने का डर, सीखने या सूचना हासिल करने पर हावी नहीं होना चाहिए. आखिर, खबरों का विश्लेषण करने से पहले छात्रों की उनमें दिलचस्पी जगानी होगी.
इसके बाद मीडिया विशेषज्ञ विनीत कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मीडिया साक्षरता का मूल उद्देश्य हैं नागरिकत बोध और नागरिकों के कॉमन सेंस को बचाए रखने की समझ. ये दोनों बातें जरूरी नहीं कि स्कूल-कॉलेज में मीडिया साक्षरता पर कोई पाठ्यक्रम निर्धारित करके की जाय. ये नागरिक समाज के रोजमर्रा जीवन और उसके व्यवहार का हिस्सा होना चाहिए. इस संदर्भ में दूसरी जरूरी बात ये कि मीडिया साक्षरता जब हम कहते हैं तो इसका मतलब होता है कि मीडिया के विविध संदर्भों और उसके कामकाज के तरीके से लेकर समाज पर पड़नेवाले प्रभाव को लेकर संवेदनशील और तार्किक होने की समझ पैदा करना. 
इस संगोष्ठी में डीडी न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि आज हर पत्रकार अपनी जेब में एजेंडा लिए घूमता है ऐसे में मीडिया साक्षरता की बेहद आवश्यकता है ताकि लोग उस एजेंडे को पकड़ सकें. सत्य और अर्द्धसत्य के भेद को समझ सके. पत्रकारिता को मिशन मानने वाले सम्पादक आज के दौर में दुर्लभ हैं. आवश्यकता इस बात की है कि अखबार या टीवी चैनलों से प्रसारित ख़बरों में संतुलन हों. हर तरफ विशेषज्ञों और चेहरों का दुहराव देखा जा सकता है. कुछ गिने चुने लोग ही सभी विषयों पर अपनी राय व्यक्त करते हुए टीवी चैनलों पर देखे जा सकते हैं. पत्रकारिता का मूल्य बदल गया है. व्यावसायिकता हावी है. मुनाफा महत्त्वपूर्ण है. खबरों को विशेष कोण से पूर्वाग्रह के साथ पेश किया जाता है. तथ्यों की जांच परख के बिना वरिष्ठ से बरिष्ठ पत्रकार खबरों को प्रकाशित और प्रसारित करते हैं. यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और इसमें बदलाव के लिए अत्यधिक सचेत और सक्रिय पाठक अथवा दर्शक की आवश्यकता है और इस दिशा में मीडिया साक्षरता या मीडिया लिट्रेसी बेहद महत्त्वपूर्ण है.  
वहीँ हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा की मीडिया आज मिशन से प्रोफेशन तक पहुँचने के बाद अपनी अलग राह बना चुका है. लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की जो भूमिका होनी चाहिए आज की पत्रकारिता उसे निभाती हुई नहीं दिख रही है. आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया की खबरों की जांच-परख हो. उसका विश्लेषण हो और इस दिशा में समाज के बुद्धिजीवियों का महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है. कार्यक्रम का समापन अभिनेता सुशांत सिंह की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट के मौन के साथ हुआ.


सावधान मूवमेंट के डॉक्टर कामायनी शर्मा रुचि त्रिवेदी डॉ अनुराग पांडे सुरभि द्विवेदी और डॉ राजीव मिश्रा ने कराया ऑनलाइन सांस्कृतिक प्रतियोगिता का आगाज


कोविड-19 सावधान मूवमेंट कानपुर ऑनलाइन सांस्कृतिक प्रतियोगिता 'कल्चरल फेस्ट' का आयोजन किया जा रहा है! कल्चरल फेस्ट  के संयोजक एवं सावधान मूवमेंट के प्रमुख  डॉ सुधांशु राय ने बताया कि लॉकडाउन में  इन सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं के माध्यम से समाज को सकारात्मक और हैप्पीनेस का माहौल देने का प्रयास किया जा रहा है जिससे हर व्यक्तियों में विषम परिस्थितियों से लड़ने हेतु आत्मविश्वास बना रहे! साथ ही साथ प्रतिभागियों को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का मौका भी प्राप्त होगा!



 सह संयोजक रुचि त्रिवेदी ने  बताया कल्चरल फेस्ट में गायन और नृत्य में  कुल पांच प्रतियोगिता मे किसी भी शहर एवं समाज के हर वर्ग के व्यक्ति, छात्र-छात्राएं, महिलाएं, छोटे बच्चे इत्यादि  प्रतिभाग कर सकते हैं! विजेताओं को ई सर्टिफिकेट दिया जाएगा!
 सह संयोजक डॉ कामायनी शर्मा ने बताया  प्रतिभागियों को अपने दो से तीन मिनट के वीडियो क्लिप teamsaregama@gmail.com पर दिनांक 25 जून तक भेजने हैं! सह संयोजक डॉ अनुराग पांडे  ने कहा यह प्रतियोगिता निशुल्क है और सह संयोजक सुरभि द्विवेदी ने बताया किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति प्रतिभाग कर सकते हैं!
 डॉ दीप्ति श्रीवास्तव ने कहा कि निर्णायक मंडलों द्वारा हर विधा में प्रथम द्वितीय और तृतीय विजेताओं का निर्णय लिया जाएगा! डॉ राजीव मिश्रा ने कहा इन प्रतियोगिताओं के माध्यम से हम समाज को मोटिवेट करेंगे!
आयोजक गणों में मुख्य रूप से शिवांगी द्विवेदी डॉ रचना पांडे अनुराधा सिंह मीना पांडे शिखा अग्रवाल राजीव सक्सेना मनोज शुक्ला इत्यादि सहित भारत उत्थान न्यास सोशल रिसर्च फाउंडेशन संगम कला ग्रुप पहल सेवा संस्थान विचार संग्रह इत्यादि स्वयंसेवी  संस्थाएं सम्मिलित है


जीवन एक पहेली


सिनेमा की दुनिया हो,या रंग मंच का घर हो,या टेलीविजन जगत के सिरियल्स हो अथवा रचना कार या लेखक का कलपना जगत हो,ये सब ऐसे माध्यम है जिनके द्वारा पाठक,दर्शक अथवा श्रोता प्रस्तुत किये गये  चरित्र और पटकथा की दुनिया में भ्रमण करने लगता है,भले ही यह स्थाई न हो ।
उपरोक्त में कथा बस्तु प्रेम,त्याग,भक्ति आदि आदर्श हो सकतेहैं;धोखा,महत्वाकांक्षा,स्वार्थ,लालच आदि भी होते है;चरित्र द्वारा उत्कृष्ट मार्ग अनुसरण करना दिखाया जाता है जिससे दर्शक को प्रेरणा मिलती है;चरित्र द्वारा कुटिल और निम्न कोटि के रास्ते भी अपनाये जाते हैं जिससे कुछ को दुख पहुंचता है और कुछ को आनंद भी मिलता है;जिसकी जैसी मनोवृत्ति वैसी ही प्रतिक्रिया ।
परन्तु जरा यह भी देखें और सोचें कि चरित्र के स्वयं के जीवन यात्रा में कैसा घटित होता है!क्या उसका कार्य मात्र मनोरंजन देना है?क्या वह मानवीय गुणों अथवा अवगुणो से परे है?निरपेक्ष मनोवृत्ति के चरित्र कुशलता पूर्वक प्रस्तुत कर देने से क्या वह वास्तविक जीवन में भी निरपेक्ष रह पाता है?क्या बुरे से बुरे चरित्र का अभिनय  कर देने से वह जीवन में भी बुरा होता है?
दर्शक की अभिलाषा बहुत होती है;वह अभिनय को यथार्थ समझने  लगता है;जीवन विचित्र है;इसे समझना सरल नही है;कथाबस्तु के चरित्र की भी एक वास्तविक दुनिया होती जिसमें वह भी हमारे जैसे जीवन जीता  है ।उसके जीवन में भी हमारे जैसे सुख-दुःख आते रहते हैं;दुख का अनुपात बहुत होता है,या यो कहें अनेक  गुणा  होता है,फिर भी सुख जो मन की एक अवस्था होती है और जो क्षणिक भी होती है,समस्त दुखों को विस्मृत कर  देती है ।मानव इसी क्षणिक अवस्था को यथार्थ रूप में प्राप्त करते  हुये जीवन भर संघर्ष करता रहता है ।ऐसा नही है कि वह नहीं जानता है कि उसे दुख का सामना नहीं करना पडेगा,केवल सुख ही सुख मिलेगा।


Saturday, June 13, 2020

संस्कृति निर्माण में अहम् है मीडिया की भूमिका


“वर्तमान कोरोना संकट काल में  साहित्य एवं संस्कृति के नए समीकरण बनते जा रहे हैं” । पं० दीन दयाल उपाध्याय राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजाजीपुरम, लखनऊ के  अंग्रेज़ी और हिन्दी विभाग  द्वारा संयुक्त रूप  से  आयोजित  वेबिनारके प्लेनरी व्याख्यान में  ११ जून २०२० को लिटरेचर एंड कल्चर : ऑब्जरवेशन इन कोरोना टाइम्स   विषय पर  प्लेनरी वक्ता के रूप में बोलते  हुए  ये तर्क ,लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग  के प्रोफेसर आर पी सिंह ने  दिए ।  उन्हों विभिन्न साहित्यिक पाठों , शैलियों एवं रूपकों का विश्लेषण करते हुए इसे विस्तार प्रदान किया।उन्होंने अंग्रेजी साहित्य के उदय एवं विस्तार की चर्चा करते हुए इसके  सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के मूल  में देश काल एवं परिस्थितियों की विभिन्न रूपों एवं पक्षों की भी चर्चा  की। उन्होंनेबताया की अंग्रेजी भाषा  में ४५० ईस्वी से लेकर आज के कोरोना काल तक कैसे कैसे नए नए प्रयोग होते रहे और इसकी शब्दावली  एवं साहित्य पर कैसे कैसे प्रभाव पड़ते रहे। प्रोफेसर सिंह ने ये भी बताया की मीडिया किस प्रकार संस्कृति का निर्माण करती है। वर्तमान संकट के दौर ने क्रॉस सेक्शनल डायलाग को जन्म दिया है , जिनमे साहित्य पर समुदाय , विचारधारा , अर्थव्यवस्था , व्यक्तिगत अनुभवों ,यथा लाभ या क्षति तथा  तत्सम्बन्धी मनःस्थिति के प्रभाव विभिन्न रूपों में दिखाई दे रहे हैं।  सृजन के मूल केन्द्रक में मनुष्य  चारों ओर फैले सामाजिक दबाव , व्यवहारवादी प्रकरणों धर्म एवं संस्कृति से लेकर मैत्री , प्रेम एवं यौन व्यव्हार एवं तत्सम्बन्धी समीकरणों से भी प्रभावित है। उन्होंने बताया की संस्कृति में इकोलॉजिकल फ़ैलेषी , कन्वर्जेन्स ऑफ़ कल्चर तथा सेल्फ रेफ़्रेन्स क्राइटेरिया दिखाई दे रहे हैं।  ये काल आम आदमी को चिड़चिड़ा बना रहा है हम अपने मूल्यों एवं समीकरणों  से ही  दूसरे के बारे में मत बनाते हैं। आज की साइबर रियलिटी ने जहाँ देश प्रदेश की दूरियों को काम किया है , वहीँ एक दूसरा , यद्यपि कम चर्चित पक्ष ये भी है की इसने कहीं न कहीं एक वंचित वर्ग में असहजता की भी स्थिति भी ला दिया है।इस अवसर पर महाविद्यालयों के प्राध्यापक एवं देश विदेश के समस्त महाविद्यालयों के प्राचार्य, प्राध्यापक, रिसर्च स्कॉलर एवं छात्र, लगभग १२०० प्रतिभागियों ने ज़ूम के द्वारा ऑनलाइन प्रतिभाग किया।


Friday, June 12, 2020

भाषाओं का सम्यक समन्वय : एक्प्रेशन्स इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फॉउंडेशन के काव्य प्रवाह का शुभारंभ


एक्प्रेशन्स इन लैंग्वेजेज एंड आर्ट्स फॉउंडेशन, लखनऊ द्वारा  दिनांक 11जून,2020 को काव्य प्रवाह 1.1 -  काव्य संध्या का आयोजन किया गया ।इस कार्यक्रम में  महराष्ट्र से  प्रो अवधेश  कुमार सिन्हा, बाराबंकी उत्तर प्रदेश से डॉ फिदा हुसैन, लखनऊ से डॉ चंद्र मणि शर्मा तथा समस्तीपुर बिहार से डॉ  शम्भू नाथ झा अतिथि कवि थे। संध्या का प्रारंभ फॉउंडेशन के  अध्यक्ष प्रोफेसर रवीन्द्र प्रताप सिंह ने सभी अतिथियों एवं श्रोतागणों के स्वागत एवं  अपने अंग्रेज़ी एवम् हिन्दी काव्य पाठ  से किया। प्रो अवधेश कुमार सिन्हा ने  अपने अंग्रेज़ी काव्य ययाति एवम्  रश्मिरथी कर्ण  से कुछ अंश तथा कुछ अन्य मुक्तक  श्रोताओ के साथ साझा किए। मशहूर उर्दू शायर डॉ फिदा हुसैन  ने अपने असरार एवम् नज़्मों   से श्रोताओं  का मन मोह लिया। " मेरी ज़िद है की मैं एक नज़्म लिखूं " जैसी काव्य पंकितयों


इसके उपरांत लखनऊ के बी एस ऐन वी कॉलेज में कार्यरत हिंदी के सहायक प्रोफेसर एवं कवि डॉ चंद्र मणि शर्मा ने अपनी कविताएँ भावी पथ औऱ अभिलाषा श्रोताओं के समक्ष पढ़ी। यशस्वी रचनाकार एवम्  प्रसिद्व कवि एवं लेख़क डॉ शम्भु नाथ झा ने अपनी रचनाओं  चिर स्थायी समाधान, अब ना देर लगाओ, चलो नदी के पार इत्यादि कविताओं का पाठ किया। उनकी कविताओं में जहाँ रहस्यवाद एवं भारतीय संस्कृति के शशक्त मूल्य प्रदर्शित हुए । 


आलोचक एवम् कवि डॉ ब्रजेश ने जहां एक ओर जहां अपनी  अंग्रेज़ी कविता पढ़ी वहां हिन्दी के छंद चौपाई में प्रवाहपूर्ण प्रस्तुति दी ।उन्होंने इस आयोजन पर अपने समीक्षा भी प्रेषित किया ।


 इसके उपरांत फाउंडेशन के सचिव श्री कुलवंत सिंह ने फॉउंडेशन की ओर से प्रोफेसर आर पी सिंह तथा आए  हुए अतिथियों एवं श्रोतागणों का आभार व्यक्त किया। उन्होने कार्यक्रम के सफल आयोजन में समिति के टेक्निकल डायरेक्टर श्री वैदूर्य जैन, तथा होस्ट सुश्री सुमेधा द्विवेदी एवं सुश्री अनुकृति राज को उनके योगदान के लिए आभार व्यक्त किया।


कार्यक्रम में आलोचक एवम् समीक्षक  लखनऊ से डॉ  ब्रजेश  , बस्ती से संस्कृत के प्राध्यापक डॉ आशा राम ,संभालपुर से सुश्री मानसी महाराणा ,समस्तीपुर से डॉ पूजा झा ,इंडोनेशिया से अक्षेंद्र मैक्सिमिलिया आदि उपस्थित रहे ।


Thursday, June 11, 2020

यह 5 कंपनियाँ बना रही हैं भारत को आत्मनिर्भर


5G क्या है ?


आज 135 करोड़ की आबादी वाले भारत देश में लगभग 80 करोड़ लोग मोबाइल फोन का व लगभग 50 करोड़ लोग इन्टरनेट का इस्तेमाल करते हैं । हो सकता है, इस लॉकडाउन के समय में यह संख्या और बढ़ गयी हो । लेकिन यह लेख इन्टरनेट पर नहीं, 5G के ऊपर है इसका मतलब, हम डाटा के स्पीड या रफ्तार की बात कर रहे हैं अभी तक के अनुसंधान के अनुसार एक महीने में एक आदमी 12GB डाटा का इस्तेमाल कर लेता है कभी कोई विडियो देखता है, ईमेल करता है, कभी कोई गेम इत्यादि खेलता है या फिर इन्टरनेट का कोई अन्य इस्तेमाल करके लगभग 12GB प्रतिमाह डाटा इस्तेमाल कर लेता है । इन्टरनेट की स्पीड लेटेन्सी पर निर्भर करती है । यह लेटेन्सी क्या है ? यदि हम किसी को देखते हैं तो आपकी आँखें उस फोटो की जानकारी को आपके मस्तिष्क के नर्व सेल को भेजेंगी जहाँ वह फोटो प्रोसेस होगी तब वह फोटो आप के मस्तिष्क में बनेगी और पता चलेगा कि वह एक चिड़िया है । इस प्रोसेस में जितना समय लगेगा |


उस रफ्तार को ही लेटन्सी कहते हैं यह समय जितना कम होगा इन्टरनेट उतना तेज काम करेगा । दुनिया के सभी इन्टरनेट संयन्त्र या डिवाइसेस दो मीडियम के द्वारा आपस में जुड़े हुए हैं वह हैं ऑप्टिकल फाइबर और इलेक्ट्रामेगनेटिक वेव्स (Optical Fiber and Electromagnetic Waves) ऑप्टिकल फाइबर को तो इन्टरनेट की रीढ़ की हड्डी रह सकते हैं |


अगर हम पिछले कुछ वर्षों को देखें तो यह जान सकेंगे कि प्रति 10 वर्षों में मोबाइल की तकनीकी में एक जनरेशन या पीढ़ी की बढ़ोतरी हो रही है जैसे कि शुरुआत में 1G सन् 1980 में, 2G सन् 1990 में, 3G सन् 2000 में, 4G सन् 2010 में और अब 5G की बारी है ।


यहाँ पर स्पीड, केपेसीटी (सामर्थ्य) और लेटेन्सी में बढ़ोतरी के अलावा 5G दूसरे नेटवर्क मैनेजमेन्ट गुण भी प्रदान करती है 5G नेटवर्क और सर्विस को कई स्टेज में तैनात किया जाऐगा । अगले कुछ वर्षों में जो की बढ़ती मोबाइल और इन्टरनेट अनऐबल डिवाइस की जरुरत हो आसानी से पूर्ण कर सकें । कहने का तात्पर्य यह है कि 5G के माध्यम से हम बहुत तरह की नई सुविधाएं प्राप्त कर सकते हैं ।



कितना तेज होने वाला है 5G नेटवर्क -


5G को लेकर सभी उत्साहित हैं और ऐसा माना जा रहा है कि 4G के मुकाबले यह काफी तेज होने वाला है अगर हम 4G की बात करें तो यह आपको 100 मेगाबाइट अर्थात 100 Mbps प्रति सेकेंड की स्पीड देने में सक्षम है वहीं 5G को लेकर कहा जा रहा है कि यह 10 Gigabites प्रति सेकेंड यानी 10Gbps की स्पीड के साथ आने वाला है । इसका मतलब है कि 4G नेटवर्क के मुकाबले 5G नेटवर्क 100 गुना ज्यादा तेज होने वाला है यह अभी तक की सबसे ज्यादा इन्टरनेट स्पीड होने वाली है उदाहरण के लिए एक फीचर को हम कुछ ही सेकेंड में डाउनलोड कर पायेंगे ।


5G नेटवर्क कैसे काम करेगा ?


5G नेटवर्क एक बिल्कुल ही नये रेडियो स्पेक्ट्रम बैंड पर काम करता है, आपको बता देते हैं कि 5G मिलीमीटर वेव्स का इस्तेमाल करता है, इसके बाद एक फ्रीक्वेंसी को ब्रोडकास्ट करता है जो 30 से 300 GHz पर काम करती है, इससे पहले यह 6 GHZ पर काम करता था अर्थात 4G के लिए वर्तमान में इस बैंड का इस्तेमाल किया जाता है अभी तक इस तकनीक को सेटेलाइट और राडार सिस्टम के बीच में कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जाता था हालांकि मिलीमीटर वेव्स किसी भी बिल्डिंग के बीच में से आसानी से नहीं गुजर सकती है, इसके कारण ही 5G को स्मॉल सेल्स का भी लाभ मिलता है । इसके लिए लगभग हर 250 मीटर पर एक स्मॉलर (छोटा) मिनिएचर आधारित स्टेशन स्थापित किया गया है इसके कारण ही किसी भी जगर पर आपको बढ़िया कवरेज मिलती है ।


5G के फायदे या गुण जो अभी मौजूदा किसी नेटवर्क में नहीं हैं –


» अपलोडिंग और डाउनलोडिंग काफी तेज गति से होगी ।


» अगर मोबाइल टावर दूर है तो भी इन्टरनेट चलाने में कोई दिक्कत नहीं होगी


» यह कम बैटरी का इस्तेमाल करता है ।


» यह ऊर्जा को बचाने में मदद करता है ।


» इसमें हम लगभग 10-100 संयन्त्रों को जोड़ सकते हैं |


» इसकी लेटेन्सी 4G के मुकाबले बहुत ज्यादा होती है ।


5G के उपयोग – 5G के आने का फायदा तो हम सभी को मिलेगा, क्योंकि हमें इसकी मदद से तेज इन्टरनेट मिलने वाला है |


» 5G के आने से स्वास्थ्य सुरक्षा (हेल्थकेयर) के क्षेत्र में जरुर फायदा मिलेगा, इसके जरिये दूर क्षेत्रों में रह रहे लोगों तक चिकित्सकीय जानकारी को आसानी से पहुंचाया जा सकेगा इसके अलावा रोबोट द्वारा की जाने वाली शल्य चिकित्सा (रोबोटिक सर्जरी) को भी बढ़ावा मिलेगा रोबोटिक सर्जरी में गलती होने की गुंजाइश कम होगी


» 5G के आने के बाद ये भी हो सकता है कि भारत को सेल्फ ड्राइविंग कार को लॉच करने में मदद मिले क्योंकि इस तरह की कार को चलाने के लिए फास्ट स्पीड इन्टरनेट की आवश्यकता होती है ।


» 5G से डाटा की रफ्तार तो मिलेगी पर कहाँ कहाँ मिलेगी इसके बारे में पूर्वानुमान लगाना अभी मुश्किल है कोई भी सोच सकता है कि महानगरों के लोगों की जीवनशैली अधिक तेजी से बदलेगी । इससे कितनी असमानताओं का जन्म होगा इसे भी देखना होगा ।


साहित्य या तो बाजार एवं सत्ता की शक्तियों द्वारा उत्पादित होते हैं या आत्मचेतना द्वारा विकसित


साहित्य या  तो बाजार एवं सत्ता की शक्तियों द्वारा उत्पादित होते हैं या आत्मचेतना द्वारा विकसि।  ये तर्क ,लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग  के प्रोफेसर आर पी सिंह ने    कवियत्री  बहिणाबाई चौधरी उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय जलगांव से सम्बद्ध आर्ट्स साइंस एंड कॉमर्स कॉलेज यावल द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार (10 जून )मॉडर्न ट्रेंड्स इन लिटरेचर (मराठी , हिंदी , अंग्रेजी ) के प्लेनरी व्याख्यान मॉडर्न ट्रेंड्स इन इंग्लिश लिटरेचर विषय पर बोलते हुए दिए । उन्हों विभिन्न साहित्यिक पाठों , शैलियों एवं रूपकों का विश्लेषण करते हुए इसे विस्तार प्रदान किया।
आर पी सिंह ने  बताया की जैसे आधुनिक अंग्रेजी साहित्य में विश्वयुद्धों के परिप्रेक्ष्य में युद्ध का चित्रण मिलता है वैसे ही वर्तमान कोरोना महामारी के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न प्रकार की आतंरिक एवं  वाह्य , व्यक्त एवं अव्यक्त सूक्ष्म प्रवित्तियों  पर आधरित साहित्य लिखा जा रहा है। हालाँकि लॉकडाउन  काल में प्रकाशकों द्वारा पुस्तकों के प्रकाशन में थोड़ा कमी  दिखाई पड़ी है , किन्तु सोशल मीडिया एवं अन्य लघु माध्यमों द्वारा प्रभावशाली साहित्य संचारित किया जा रहा है।


प्रोफेसर सिंह ने बताया की उन्होंने   देश विदेश में महामारी कोविड के  फैलाव के आरम्भिक लक्षण काल ले  लगातार  विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रकाशित  अंग्रेजी साहित्य पर नज़र रख रहे हैं। इनमे भावों के उतर चढ़ाव एवं उनके साहित्यिक निरूपण के विभिन्न चरण दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने वक्तव्य में अंग्रेजी साहित्य के आरम्भिक दौर से लेकर आधुनिक काल तक के साहित्य में  दो  मूल विभेदों का भी विश्लेषण किया।उन्होंने बताया की साहित्य या तो बाजार एवं सत्ता की शक्तियों द्वारा उत्पादित होते हैं या आत्मचेतना द्वारा विकसित।
वर्तमान साहित्य में इन दोनों ही प्रवित्तियों के दर्शन होते हैं।


ऑनलाइन संवाद के प्रत्यक्ष लाभ और दूरगामी परिणाम


आज का युग ICT(Information Communication Technology)   का है;संवाद विषय बस्तु  को सुगमता पूर्वक शीघ्रता के साथ भौगोलिक बाधा के बिना  व्यक्ति से व्यक्ति ,समूह से समूह,देश से देश अथवा कहीं से कहीं को अनलाइन के द्वारा भेजा जा सकता है और वर्तमान इसे संभव कर रहा है ।कुछ मामलों में यह वरदान सिद्ध हुआ है,यथा रेल,हवाई आदि टिकट लेने में,और भी दैनिक अनगिनत कार्यों को पूर्ण करने में;शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश से लेकर परीक्षा परिणाम घोषित करने में अभूतपूर्व योगदान दे रहा है ।
आज कल शिक्षण कार्य भी अनलाइन विधा द्वारा जोरो में है;पाठयक्रम प्रस्तुत करने से पूर्ण करने का कार्य ऑनलाइन चल रहा है ।कितना क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है ।
परन्तु इसके दूरगामी परिणाम के बारे में जरा सोचिए;मैं अपनी बात फेसबुक जो ICT का एक माध्यम है पर देता हूँ,पर कितने लोग इसे देखते पढते रहते हैं?हो सकता है कि बिषय बस्तु अच्छी न हो,पर यदि अच्छी भी हो तो यह निश्चित नही है कि लोग तत्काल देखते पढते होंगे;वे अपनी सुविधा और समय के अनुसार ही यह कार्य करते है। शिक्षा के क्षेत्र में एक सशक्त माध्यम  Webinar आया है जिसे वक्ता ने प्रस्तुत किया और श्रोता ने ग्रहण कर लिया;यह सब तकनीकी के माध्यम से संभव हो सका,परंतु कितना किया,कैसे किया,किया भी कि नहीं और इसका परिणाम कैसा रहा आदि प्रश्न मेरे मन को व्यग्र करते है ।
हो सकता है कि आने वाले दिनों में शिक्षा प्रणाली आन लाइन हो जाय और शिक्षक शिक्षार्थी इसी माध्यम के अभ्यस्त हो जायें;राजनीति की दिशा और दशा भी अनलाइन हो जायेगी जिसकी शुरुआत हो चुकी है;वीडियो के माध्यम से वक्ता द्वारा स्पीच और  श्रोता द्वारा सुनने और देखने कार्य शुरू हो गया है,पर श्रोता कितना इसे गंभीरता पूर्वक लेता है?क्या वक्ता श्रोता से विना प्रत्यक्ष (Face to face   )संवाद किये संतुष्ट रह पायेगा?
क्या प्रत्यक्ष संवाद के विना मूल्य स्थापित एवं संवर्धित हो पायेगा?गौतम बुद्ध ,जीसस और  शंकराचार्य यदि प्रत्यक्ष संवाद नही किये होते क्या वे मूल्य जो वे समाज को देना चाहते थे,कर पाते? आप के विचार आमंत्रित है।


Tuesday, June 9, 2020

विश्व व्यापी कोरोनॉ त्रासदी-भारत की भूमिका


अदृश्य घातक विषाणु कोरोनॉ जो कि नवम्बर 2019 को चीन की परीक्षण शाला में पैदा हुआ किन्तु चीन की छद्मकारी प्रवृति के चलते इसे अपने यहाँ ही पोषित कर दबे पांव ही धीरे धीरे पूरे विश्व में फैल जाने दिया।क्या उद्देश्य या मनोवृति रही होगी चीन की जो अपनी बनाई विषाणु जनित व्याधि से स्वयं को तो उबार लिया किन्तु पूरे  विश्व को बर्बादी की कगार पर पंहुचा कर विकास को वर्षों पीछे धकेल दिया।
भारत में जब फरवरी-मार्च 2020 में इसने दस्तक दी,तो इसकी विकरालता का भान न तो सरकारी तंत्र को था न ही जनतंत्र को।मार्च आते आते जब इस विषाणु ने भारत में अपने पैर तेजी से पसारे तब सरकार की एडवाइजरी आनी शुरू हुई।दक्षिण से पश्चिम,उत्तर,पूरब सभी दिशाओं में विषाणु ने कोरोनॉ व्याधि के रूप से कहर मचाना प्रारम्भ कर दिया।इस विचित्र बीमारी का कोई इलाज चिकित्सा तंत्र के पास नहीं था कि इसे नियंत्रित किया जा पाता।अंततः सरकार ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू घोषित कर इस बीमारी से जूझने की अधिकृत घोषणा कर दी।फिर 24 मार्च से ही सभी विमान सेवाओं को स्थगित करते हुए 25 मार्च से पूरे देश में ताला बन्दी घोषित कर दी गई।पूरी तरह लॉक डाउन,अर्थात सभी कुछ बन्द-यतायात के साधन,आवागमन,विद्यालय,कोचिंग,सरकारी व निजी  कार्यालय,प्रतिष्ठान,पूजास्थल,बाजार,उद्योग,ट्रांसपोर्ट,डाक सेवा,निर्माण कार्य,होटल,गेस्ट हाउस आदि आदि।जो जहां था वहीं ठहर गया।सामाजिक दूरी,शारीरिक दूरी,अति स्वच्छता के सहारे ही इस महामारी से बचने का उपाय ढूंढते रहे।कोरोनॉ व्याधि नामक शत्रु से डरकर बचने हेतु घरों में दुबककर कैद हो गए।खुले रहे तो बस सरकारी अस्पताल,पेट्रोल पंप व बैंक (निर्धारित सीमित समय के लिए ही)।फुटकर सब्जी,फल व आवश्यक खाद्य सामग्री बिक्री/वितरण का कार्य सावधानी पूर्वक कुछ सीमित समय के लिए जारी रहा।स्वच्छता अभियान जारी रहा।सामाजिक संगठन अवश्य कमर कसकर मैदान में आगये और सावधानी पूर्वक भोजन व आवश्यक सामग्री वितरित कर सरकार व समाज के साथ खड़े रहे।सरकारी अस्पतालों में बस कोरोनॉ और कोरोनॉ ही चलता रहा।बाकी मरीज भगवान भरोसे चलते रहे।अधिकतर निजी अस्पताल,क्लीनिक व चिकित्सक दहशत व दबाव के चलते चिकित्सा कार्य से बचते रहे।



बीच बीच में अनावश्यक अवांछित गतिरोध भी उत्पन्न होते रहे।दिल्ली के मरकज में तब्लीकि जमातियों ने जो कोढ़ में खाज का काम किया वह नितान्त अक्षम्य है।इसके लिए दिल्ली सरकार भी जवाबदेह है।जमातियों को वहां से निकाल कर पूरे देश में फैला दिया गया जबकि उनको वही का वहीं क्वारन्टीन कर दिया जाना चाहिए था।सरकार जो जनता के सहयोग से आत्म संयम के बल पर इस महामारी पर काफी कुछ नियंत्रण पा रही थी इन जमातियों ने सब गुड़ गोबर कर दिया।पूरे देश में घूम घूम कर,थूक थूक कर,सामाजिक दूरी की धज्जियां उड़ा उड़ा कर कोरोनॉ का संक्रमण खुलेआम फैलाने पर आमादा रहे और राजनैतिक विपक्ष सियासत पर उतर आया,अपनी रोटियां सेंकने लगा।सरकारी तंत्र सावधानीपूर्वक इन जमातियों को अस्पतालों में क्वारन्टीन करता गया,यह जमाती उपद्रव मचाते रहे,अभद्रता करते रहे।शाहीन बाग का प्रदर्शन तक नहीं छोड़ा।अंततः सरकार की सख्ती से इन्हें काबू किया जा सका।
फिर आया दूसरा गतिरोध -- पलायन का।दूसरे राज्यों में फसें विद्यार्थी व श्रमिक।सभी शिक्षण संस्थान बन्द होने से शिक्षार्थी महामारी की भयावहता के चलते अपने घर जाने को आतुर और यातायात के साधन बन्द।सरकार ने बसों की व्यवस्था कर उन्हें उनके गृहप्रदेश भिजवाया।जिससे सामाजिक दूरी का नियम टूटा व संक्रमण का खतरा बढ़ा।निर्माणकार्य बन्दी के चलते श्रमिक वर्ग की स्थिति दयनीय हो गयी।वे स्वयं व उनके परिवार भुखमरी के कगार पर पंहुचने लगे।जो अपना घर,द्वार,गांव छोड़कर दूसरे शहरों में धनार्जन हेतु गए थे वे पूर्णतयः तालाबंदी के कारण बेरोजगार होकर एक एक पैसे को मोहताज होने लगे तब उनका सब्र का बांध टूटा और वे अपने घरों,गांवों को पलायन को विवश हो गए।किन्तु जाएं कैसे, यातायात के साधन बन्द।वे बौखलाहट में पैदल ही निकल पड़े।हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय करने को उद्धत।सरकार स्तब्ध।राज्य सरकारों को चाहिए था कि वे अपने राज्य के श्रमिकों को आश्वस्त करती,उन्हें आर्थिक मदद देकर पलायन से रोकती।किन्तु राज्य सरकारें चुप्पी साधे रही और मजदूर अपनी व अपने परिवार की जान जोखिम में डाल कर अपने सुदूर प्रदेश को निकल पड़े।कई दुर्घटनाएं भी हुई।अंततः सरकार ने श्रमिक विशेष बस व रेल सेवा के माध्यम से उन्हें उनके गृह प्रदेश पंहुचाने की व्यवस्था की।किन्तु यह पलायन पुनः कोरोनॉ संक्रमण का बड़ा कारण बना।एक बार फिर सरकार के संक्रमण नियंत्रण अभियान को बड़ा झटका लगा।इन श्रमिकों की वापसी ने गांवों,जो कि अपनी प्राकृतिक समृद्धि के कारण संक्रमण से अछूते थे,में भी यह संक्रमण फैला दिया।
इतने व्यवधानों के उपरांत भी सरकार कोरोनॉ संक्रमण पर नियंत्रण पाने को आशान्वित है।अब हमारा दायित्व बनता है कि हम स्वयं सजग रहें,लोगो को भी जागरूक करें व इस व्याधि से निपटने में सरकार का पूरा सहयोग करें।
लगभग ढाई महीने की पूर्णतयः बन्दी के रहते में देश व  समाज की क्या स्थिति होगी।अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गयी।कितनी जन हानि हुई और कितनी धन हानि,अनुमान लगाना कठिन है और यह क्रम जारी है।1 जून से गतिविधियों को कुछ गति मिली तो कोरोनॉ भी गतिशील हो गया।भारत वर्ष में संक्रमित का आंकड़ा लगभग ढाई लाख के पार पंहुच गया और इससे मृत्यु का आंकड़ा लगभग 7 हजार के पार।यह संख्या बढ़ती ही जा रही है।किन्तु जीवन कब तक ठहरा रहेगा,इसे खोलना भी आवश्यक है।लॉक डाउन तक तो सरकारी और सुरक्षा तंत्र
की मुस्तैदी के रहते हम बेपरवाह रहे किन्तु अब 8 जून से पूर्ण लॉक डाउन खुलने के बाद हमारी अपनी सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारियां बढ़ गयी।अब हमें अपनी सुरक्षा घर से ले कर बाहर तक स्वयं बड़ी संजीदगी से करनी है।घर में सुरक्षा को लेकर महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।यू तो सरकारी तंत्र,स्वास्थ्य विभाग ने हमें अपनी जीवन रक्षा के लिए बिंदुवार दिशा निर्देशित किया है।सर्वप्रथम तो हम अपनी सनातनी संस्कृति की ओर लौटे।हमने अपनी सुखसुविधा भोगी व उपभोग वादी पाश्चात्य संस्कृति के अनुसरण करते हुए अपने पर्यावरण व प्रकृति से जो खिलवाड़ किया है उसी का परिणाम है पर्यावरण प्रदूषण,प्रदूषित जलवायु,यह कोरोनॉ जैसी घातक महामारी,समुद्री तूफान,भूचाल,
हिमपात,ओलावृष्टि,असामयिक ऋतु चक्र परिवर्तन,अतिवृष्टि,अनावृष्टि,बढ़ता तापमान,शुष्कता,बाढ़ आदि आदि।
अब समय आ गया है हम स्वदेशी संस्कृति की ओर बढ़े।-
स्वास्थ्य की दृष्टि से अपनी पुरातन योगसंस्कृति,आयुर्वेद सबसे अधिक कारगर हैं।पहले हम रात में सपरिवार खुले आसमान में सोते थे,शुद्ध हवा लेते थे,कूलर,ए सी की हमें न तो आवश्यकता होती थी न हम चलते थे,घर में पंखा ही ठंडक देता था,कोई उमस-गर्मी की अति नहीं होती थी।बिजली के जाने पर हम हाथ का पंखा झलते थे। किसी प्रदूषण कारक इन्वर्टर या जनरेटर की आवश्यकता नहीं होती थी।सर्दी में हम रजाई या कम्बल प्रयोग करते थे।कोई रूम हीटर या ब्लोअर की आवश्यकता हमें नहीं होती थी।दिन में बाहर बैठकर सूर्य की गर्मी व धूप में बैठकर विटामिन डी लेते थे न कि घर मे घुसकर हीटर की अप्राकृतिक गर्मी।
बीमार पड़ने पर हम घर मे ही दादी नानी के प्राकृतिक नुस्खों,योग व्यायाम आदि करके,काढ़ा आदि पीकर ठीक हो जाते थे,अंग्रेज़ी दवाएं लेने की आवश्यकता ही नहीं होती थी।शुद्ध खानपान था।तब होटल,ढाबों व रेस्टोरेंट की संस्कृति नहीं थी।हम घर का बना शुद्ध ताजा भोजन करते थे।हम ताजी व प्राकृतिक मौसमी पौष्टिक स्वास्थ्यवर्धक  सब्जियां फल खाते थे न कि कोल्ड स्टोरेज में संरक्षित बेमौसम अपौष्टिक खाद्य पदार्थ।स्वस्थ रहने को हम जिम नहीं जाते थे,स्विममिंग पूल के गंदले पानी में नहीं तैरते थे,कार-बाइक पर जाकर नहीं टहलते थे बल्कि घर में भी शारीरिक श्रम करते थे,नदियों नहरों के शुद्ध पानी में स्नान करते थे,कुएं,नल,घड़े,सुराही का ही शुद्ध पानी पीते थे।घर में वाटर कूलर,जल प्रतिशोधक प्योरिफायर आर ओ,गीज़र, हीटर आदि प्रयोग में नहीं थे।हम शुद्ध सात्विक जीवन जीते थे,मानसिक शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते थे।तनाव द्वंद नहीं थे।धर्म कर्म,दया करुणा,चिन्तन मनन,भावना संवेदना,ध्यान दान,विश्वास-आत्मविश्वास,सहायता-सहयोग भाव आदि स्वस्थ गुणों का हम पालन करते थे।सकारात्मक सोच व नियम संयम हमे स्वस्थ रखते हुए हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी निरन्तर वृद्धि करते थे।आज हम इन गुणों का अभाव देखते हैं।जिसका दुष्परिणाम हमारे समक्ष है।
हम स्वच्छता अभियान का हिस्सा बने।दिखावे का जीवन छोड़कर स्वाभाविक जीवनयापन करें।अपनी स्वदेशी संस्कृति का पालन करें।शिक्षा को अपने जीवन में भी ढाले।ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कुछ संदेश,संस्कृति सौंप कर जाएं जैसे हमारे बुजुर्गों ने हमें सौंपी है भले ही हम उससे भटक रहे हैं किन्तु आने वाली पीढ़ी न भटके।उसे वह दिन न देखना पड़े जो हम देख रहे हैं।इसमें महिलाओं की अहम भूमिका हो सकती है।हम अपने बच्चों को पाश्चात्य इतिहास नहीं बल्कि अपना गौरवशाली इतिहास पढ़ाएं,स्वाभिमान का भाव जगाएं,स्वदेशी अपनाएं,स्वस्थ रहें,दूसरों को स्वस्थ रखें।महामारियों को अपनी शारीरिक मानसिक शक्ति से मात देते रहे।हम स्वस्थ होंगे,सशक्त होंगे,हमारा देश स्वस्थ होगा,सशक्त होगा,समृद्ध होगा।हमारा भारत इसमें अग्रणी भूमिका निभा सकता है।फिर से विश्वगुरु बनने की क्षमता रखता है।इस विश्वव्यापी कोरोनॉ संकट ने यह सिद्ध भी कर दिया है,विश्व की महाशक्तियां भी भारत का लोहा मान रही हैं।यह हमारे लिए गर्व व गौरव की बात है।     


Sunday, June 7, 2020

साहित्य सृजन के उत्साह -उमंग चरण से चलकर अन्तर्दर्शन तक व्याप्त है कोविड काल में साहित्य


कोविड काल में साहित्य सृजन उत्साह और उमंग राग  (फेज ऑफ़ एंथुज़ियस्म) के चरण  से चलकर विरोधाभास(फेज ऑफ़ पैराडॉक्स ) , परक्रामण/समीक्षात्मक संवेदना (फेज ऑफ नेगोशिएशन ) होते हुए वर्तमान में अन्तर्दर्शन (फेज ऑफ़ इंट्रोस्पेक्शन ) के चरण में चल रहा है । अंग्रेजी  साहित्य के विभिन्न पाठों कि समीक्षा करते हुए  ये बातें मुंबई विश्वविद्यालय से सम्बद्ध भवन हजारीमल सोमानी  कॉलेज चौपाटी मुंबई कॉलेज द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार "रेफ्लेक्शंस ऑन द पोस्ट  कोविड लिटरेरी सेनारिओ " में लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ के अंगेज़ी विषय के  प्रोफेसर रवीन्द्र प्रताप सिंह ने अपने   प्लेनरी व्याख्यान में कहीं।


प्रोफेसर सिंह ने बताया की भारत में महामारी कोविड के आरम्भिक लक्षण काल ले लगातार वह विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रकाशित  अंग्रेजी साहित्य पर नज़र रख रहे हैं। मात्र जर्नल और पत्र पत्रिकाओं  या पुस्तकों में ही प्रकशित साहित्य  में ही  नहीं नहीं , सोशल मीडिया पर प्रकाशित रचनाओं में भी गहरी संवेदनशीलता दृष्टिगत  है। उन्होंने बताया कि अभी यह कहना कि उत्तर कोविड साहित्य कैसा होगा , थोड़ा जल्दबाज़ी होगी।  हम इस महामारी पर विजय प्राप्त कर रहे हैं , किन्तु इस विजय के मूल्य क्या होंगे , इन पर भी साहित्य की विमाओं का निरूपण एवं निर्माण होगा।  उन्होंने कोविड महामारी पर राष्ट्र  विजय कि चर्चा करते हुए सम्राट अशोक की कलिंग विजय ,एवं समुद्रगुप्त की विजयों एवं प्रशस्तियों कि भी चर्चा किया।  उन्होंने सम्भावना व्यक्त की की आने वाले दिनों में विश्वविद्यालयों में कोविड साहित्य पर शोध होंगे , और बड़ी तीव्र गति से कोविड सम्बन्धी साहित्य विभिन्न विधाओं एवं विषयों में लिखा जायेगा।  जहाँ तक अंग्रेजी और हिंदी साहित्य का प्रश्न है ,उत्तर कोविड कल में ये ये इनोवेटिव , इंटरडिसिप्लिनरी और पॉलिटिकली इंगेज़्ड रहेगा।  पॉपुलर कल्चर और पॉपुलर सहित्य की अधिकता , और नेओ रोमांटिसिज्म के उदय को भी नाकारा नहीं जा सकता।  वर्तमान कोविड काल ने मानव को जीवन की क्षणभंगुरता एवं
आशंकाओं आदि से भली भांति परिचित करा दिया है।  प्रोफेसर सिंह ने ये भी बताया की इस दौर में दो तरह के साहित्य लिखे जा रहे हैं , उत्पादित एवं विकसित। उत्पादित साहित्य बाजार की गतियों के अधीन है और विकसित साहित्य आत्म चिंतन एवं संवेदना के।


आर्थिक पहलुओं पर सावधान करता 'सावधान मूवमेंट' का वेबीनार


सावधान मूवमेंट ग्रुप जो समाज  की विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं को सम्मिलित कर बनाया गया है जो कोरोना  संकट  के  शुरुआत से ही  अपने  काउंसलर्स के द्वारा  समाज के  हर वर्ग की  प्रभावी काउंसलिंग लगातार कर रहा है  आज इसी क्रम में "कोरोना के बाद की भारतीय अर्थव्यवस्था" विषय पर सावधान मूवमेंट के तत्वाधान में वेबीनार का आयोजन किया गया  वेबीनार में मुख्य वक्ता के रूप में दिल्ली वित्त आयोग के सदस्य, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान दिल्ली के प्रोफ़ेसर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो0 वी0एन0 अलोक ने कोरोना काल में भारतीय अर्थव्यवस्था के वर्तमान और भविष्य के परिदृश्य पर  बताया कि यदि केंद्र से लेकर पंचायतों तक कोरोना से निपटने की कार्य योजना को विकेन्द्रित कर दिया जाय तो कोरोना से विजय पाई जा सकती है इसी परिपेक्ष्य में उन्होंने केरल माडल का जिक्र भी किया इसके अतिरिक्त लोकल ब्रांड्स के उन्मुखीकरण पर जोर देने की बात कही ।
 वेबिनार की अध्यक्षता करते हुए छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय के चीफ, एंप्लॉयमेंट ब्यूरो एवं राष्ट्रीय सेवा योजना के नोडल अधिकारी डा0 सुधांशु राय ने प्रवासी मजदूरों के रोजगार पुनर्वास एवं युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की रणनीतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना पर कानपुर को आत्मनिर्भर बनाने की शुरुआत की गई है! बेबिनार की संयोजिका डा0 कामायनी शर्मा ने औद्योगिक क्षेत्र में मंदी के उन्मूलन तो वहीं संचालक डा0 अनुराग पांडेय ने उदारीकरण के पूर्व की अर्थव्यवस्था की पुनः वापसी की बात करते हुए स्वदेशी की और लौटने की बात कही।
दिल्ली की प्रो0 अपूर्वा वशिष्ठ ने पूर्व की महामारियों से सीख लेकर आगे बढ़ने का मन्त्र दिया  और अपने आत्मविश्वास और धैर्य को बनाए रखने को कहा ! व्यापार मंडल के नेता श्री मनोज शुक्ल ने लघु उद्योगों की समस्या को उठाया डॉ भावना श्रीवास्तव ने आयात कैसे कम कर सकते है इस पर अपनी जिज्ञासा रखी  संकल्प मेहता ने आर्थिक पैकेज में मध्यमवर्ग को क्या फायदा होगा इस पर अपना प्रश्न रखा।
प्रो0 वी0एन0 आलोक जी ने  उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं की तारीफ करते हुए सभी की जिज्ञासाओं को शांत करते हुए मूल मंत्र दिया कि आत्मनिर्भर होने के लिए आत्मविश्वास की महती आवश्यकता होती है!
  गुरुचरण अरोड़ा, शिखा अग्रवाल, मीना पांडेय , गौरी शंकर कोष्ठा  गोपाल गुप्ता  ने भी अपने अपने विचार रखें । वेबिनार की सह संयोजिका डा0  रचना पांडेय एवं श्री मती रूचि त्रिवेदी ने  धन्यवाद ज्ञापन किया


संकल्प सेवा समिति के रक्तदान योद्धाओं ने किया थैलीसीमिया के मरीजों का सहयोग


कानपुर शहर में अस्पतालों में रक्त की कमी होने से थैलीसीमिया के मरीजो का इलाज करने में कई समस्या सामने आ रही है जिसके बाद संकल्प सेवा समिति ने लोगो की समस्याओं को देखते हुए जनता नगर चौकी के सामने बने एस एस के कॉन्टिनेंटल में 30 वा रक्त दान शिविर का आयोजन किया जहाँ पर मुख्य अतिथि जनता नगर चौकी प्रभारी राजेश कुमार ने भी रक्त दान कर लोगो से अपील की और बताया कि आपके रक्तदान करने से जरूरमंद लोगो की जान बचाई जा सकती है और इस कोरोना जैसी महामारी से सब मिल कर लड़ेंगे और कोरोना मुक्त भारत बनायेगे, रक्तदाताओं में ए बी सी चैनल के वरिष्ट पत्रकार सोनू शर्मा और पार्षद जे पी पाल ने भी रक्त दान कर लोगो से अपील की है ज़्यादा से ज्यादा लोग आगे बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले और रक्त दान कर लोगो की जान बचा सके, संकल्प सेवा समिति का इस लाकडाउन् पीरियड में 5 वा रक्तदान शिविर था, आज शिविर में 32 लोगो ने आगे आकर रक्त दान किया, संश्था के द्वारा सभी रक्तदाताओं को प्रशस्ति पत्र देकर उनका हौसला बढ़ाया गया, एवं सभी रक्तदाताओं का आभार व्यक्त किया गया, संकल्प सेवा समिति के अध्यक्ष सन्तोष सिंह चौहान ने बताया कि समय समय पर संस्था के द्वारा रक्तदान शिविर आयोजित होते रहेंगे, जिससे थैलीसीमिया के मरीजो और जरूरतमंद मरीजो को रक्क्त उपलब्ध हो सके, आज के रक्तदान शिविर में संकल्प सेवा समिति के अध्य्क्ष संतोष सिंह चौहान, रत्नेश शुक्ला, पुनीत द्विवेदी,विजय मिश्रा,रघुनाथ सिंह, अशोक मिश्रा, अनूप सचान, नीरज चौहान, राज कुमार मिश्रा, शिवम, रजनेश चौहान, विक्रांत चौहान, के एन पाल, विमल सेंगर,पवन मिश्रा, आदि लोगो मौके पर मौजूद रहे |


एटलस साइकिल कंपनी। उत्तर प्रदेश सरकार दखल दे- एटक


विश्व साइकिल दिवस के दिन 3 जून एटलस साइकिल का कारखाना बंद हो गया।
एटलस साइकिल में उत्पादन हरियाणा में 1951 में प्रारंभ हुआ था और इसकी 3 इकाइयां थी
2014 के दिसंबर में एटलस कंपनी के मालिकों ने मध्यप्रदेश में मालनपुर स्थित इकाई को बंद कर दिया और उसके पश्चात अपनी सोनीपत की इकाई को भी 2018 में बंद कर दिया।
उक्त दो यूनिटों के बंद होने के पश्चात उसका अंतिम कारखाना उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद में था जिसको भी कंपनी के मालिकों ने 1 जून को अनलॉक 1 प्रारंभ होने के पश्चात 3 जून से बंद कर दिया और वहां कार्यरत लगभग 1000 लोगों का स्टाफ सड़क पर आ गया।


मालिकों ने तर्क दिया है कि उनके पास वित्त की तंगी है इसलिए हम कारखाने को बंद कर रहे हैं और कारखाने के समस्त मजदूरों का ले ऑफ किया जाता है।


मालिकों ने यह सब कार्यवाही एक तरह से समस्त श्रम कानूनों को धता बताकर की है क्योंकि किसी भी ले ऑफ की कार्यवाही को करने से पूर्व उसको श्रम विभाग की अनुमति लेनी पड़ती है और ऐसा नहीं प्रतीत होता कि श्रम विभाग से वह अनुमति ली गई थी।
 
वास्तविकता तो यह है कि उत्तर प्रदेश में भले ही  सरकार यह प्रतिदिन कहे कि उत्तर प्रदेश में एमएसएमई की 90 लाख कारखाने हैं और उन कारखानों में उत्तर प्रदेश की सरकार जो वापस लौट कर आए मजदूर हैं उनको समाजोजित करेगी ।यदि एक एक भी लिया गया तो सब समायोजित हो जाएंगे।


अब यह बात सुनने में तो अत्यंत कर्णप्रिय है।


राष्ट्रीय सहारा के कानपुर संस्करण में विगत दिवस छपा है कि पनकी व दादा नगर औद्योगिक क्षेत्रों में लगभग 5000 कारखाने हैं और ऐसी संभावना व्यक्त की गई है की कारखानों के प्रारंभ होने के पश्चात उन कारखानों में 40 फ़ीसदी मजदूरों की छटनी संभावित है।
हवा का रुख तो ये है।
जुमले रोटी रोज़ी नहीं देते।


छोटी पूंजी के कारखाने दारों की अपनी परेशानियां और दिक्कतें हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।


परंतु यह भी सत्य है कि सुप्रीम कोर्ट के भी अनेकों ऐसे फैसले हैं जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कारखाने दार मजदूरों को न्यूनतम वेतन भी सुनिश्चित नहीं कर सकते तो उन कारखानों को बनें रहने का कोई अधिकार ही नहीं है ।
इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों की रक्षा करने के लिए अनेकों निर्णय अलग-अलग समयों  में दिए हैं जो कानूनों की किताबों में कोई भी जा कर देख सकता है।


उत्तर प्रदेश में स्थिति और भी भयानक हो जाती है जब  पूरा  समाज यह देख रहा है कि उत्तर प्रदेश की सरकार समाज के सबसे कमजोर वर्ग, मजदूर वर्ग के सुरक्षा के लिए जो श्रम कानून बनाए गए हैं उनको भी निरस्त कर रही है ।
अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश की सरकार ने 8 घंटे के काम को 12 घंटे का घोषित कर दिया । जब रिट उच्च न्यायालय में लग गई तो उत्तर प्रदेश की सरकार ने उच्च न्यायालय को यह चिट्ठी भेज दी कि इस प्रकार की मंशा अब उत्तर प्रदेश सरकार की नहीं है ।


उत्तर प्रदेश के  मजदूरों को इस बात को अच्छी तरह से मालूम है कि उत्तर प्रदेश में लागू जितने भी श्रम कानून है उन को सस्पेंड करने के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार ने एक अध्यादेश का प्रारूप केंद्रीय सरकार को भेजा हुआ है।


तो क्या उम्मीद कोई लगा सकता है।
इन कठिन परिस्थितियों में उम्मीदों का लगाना भी अपने आप को धोखे में ही डालना होगा।


उत्तर प्रदेश में अगर 2 कानूनों से मदद हो पा रही है तो वह है मनरेगा का कानून और दूसरा है बिल्डिंग एंड कंस्ट्रक्शन वर्कर का कानून ।उनसे ही अधिकतर मदद उत्तर प्रदेश की सरकार कर सकी है।


यह दोनों ही कानून किसी भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार के द्वारा बनाए हुए नहीं हैं।


मजदूरों में यह उम्मीद थी कि सरकार अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए एटलस के कारखाने दार पर दबाव डालेगी कि  इस मौके पर कारखाने को ना बंद किया जाए परंतु ऐसा कोई लक्षण दिखाई नहीं देता । 
ट्रेड यूनियनों के नाते हम तो यह मांग करते हैं कि सरकार कारखाने का टेकओवर कर कम से कम 1000 संगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की रोजी रोटी बचाये।


एक यह परिदृश्य भी है कि 4 जून को सुप्रीम कोर्ट में बहस हुई और बहस का मुद्दा यह था कि केंद्रीय सरकार ने 29 मार्च के अपने निर्देशों में यह कहा था की लॉक डाउन पीरियड का पैसा मजदूरों को कारखाने दार देंगे । कारखाने दार सरकार के इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट चले गए और जब कल सुप्रीम कोर्ट में यह बहस हुई तो केंद्रीय सरकार  के वकील ने वहां कह दिया कि हम उक्त आदेश को वापस लेते हैं ।
यानि केंद्रीय सरकार ने सबसे कमजोर तबकों, मजदूरों का साथ छोड़ दिया।
बडा विचित्र समय है। लॉक डाउन है ,नेशनल डिजास्टर का कानून है ,मजदूर में करोना का भय है, धारा 144 लगी हुई है ,प्रदर्शन हो नहीं सकते। देह दूरी का पालन करना है ,अदालत भी आज कल अक्सर  ही मौन हैं । सरकारों को तो जैसे मजदूरों की कोई फिक्र ही नहीं है ।वह तो उनके संरक्षण के सारे कानूनों को समाप्त ही कर देने पर तुली हुई है।


खैर वह सुबह कभी तो आएगी....


एटक मांग करती है उत्तर प्रदेश की सरकार एटलस कारखाने की बंदी में दखल दे, मजदूरों के हितों की रक्षा करे ,और कारखाने को पुनः चलवानें के अपने सारे प्रयास करे।
अगर मालिक राजी नहीं होते तो कारखाने का सरकारी टेकओवर कर लिया जाए।


Saturday, June 6, 2020

कोरोना की रोकथाम में महिलाओं की भूमिका 


घर हो या समाज , नगर हो या गाँव , देश हो या विदेश यदि महिलाओं की स्थिति और भूमिका पर गौर किया जाए तो उसमें बहुत कोई विशेष अंतर नहीं है , वहीं घर , परिवार , समाज के नियम देखभाल , व्यवसाय या नौकरी करना | वो कैसे न कैसे अपने आप को हर परिस्थिति के अनुसार ढाल कर सब कुछ सँजो लेती है , समाज के बदलते रुप - स्वरूप में स्वयं को उस खाँचें में फिट करती आई है | घर और बाहर किस प्रकार सामंजस्य बैठाना है , वो बखूबी जानती हैं , एक शिक्षित अनुभवी नारी को यदि निर्णय लेने की स्वतन्त्रता हो तो वो आसानी से अपने बुद्धि कौशल द्वारा हर परेशानी का समाधान खोज ही लेती है |


महिलाओं के हिस्से में तो यूं ही अनेक भूमिकाएँ होती हैं , जिसे वो कुशलता से निभा भी लेती हैं , लेकिन इस समय जो पूरे विश्व पटल पर आफत आई है उसमें एक स्त्री की भूमिका और भी अधिक आयामों की अपेक्षा कर रही है , इस समय महिला को अपने परिवार में पारंपरिक कार्य जैसे खाना बनाना , सफाई करना , कपड़े धोना , बर्तन साफ करना , सब्जी काटना और अलग अलग रेसपी भी बनाना | तो दूसरी ओर यदि बच्चे छोटे हैं तो उनकी देखभाल करना , उनका एक एक कार्य स्वयं करना , थोड़े बड़े हो तो पढ़ाई का कार्य , उनकी ऑन लाइन क्लास लेने में सहायता करना , जैसे डॉ दीप्ति रॉय से बात-चीत में पता लगा कि उनकी पाँच वर्षीय बेटी जब ऑन लाइन क्लास लेने बैठती है , तो उन्हे भी पूरे वक्त साथ बैठना पड़ता है और वो स्वयं भी शिक्षिका है , तो उन्हे भी अपनी क्लास लेनी होती है , दस वर्षीय बेटे को गृहकार्य में मदद करनी , घर के सारे कार्य करने मेड आती थी , वो आ नहीं सकती , वास्तव में स्थिति बड़ी विकट है , यह लगभग सभी जगह है लेकिन समाधान हर बात का है तो दीप्ति की तरह महिलाएं इस मोर्चे पर भी जीत हांसिल करने में लगी हैं | सबके पास अपने अपने उपाए हैं अभी अमेरिका में रहने वाली श्रीमती आकांक्षा से बात हुई , तो उन्होने कहा कि कोई विशेष अंतर नहीं है यहाँ और वहाँ की महिलाओं की भूमिका में , बस ये है कि भारत में काम करने वाली मेड मिल जाती है , और यहाँ नहीं , लेकिन यहाँ कोई ऑफिस खाना लेकर नहीं जाता है क्योंकि नाश्ता और दोपहर का भोजन वहीं प्रोपर मिलता था | 'वर्क फ़्रोम होम' के चलते सभी कुछ घर से मैनेज करना है , जुड़वा बच्चे हैं पहले पार्क में ले जाते थे तो रिलैक्स व्यतीत हो जाता था , अब मुझे पूरे समय देखना होता है | कहाँ रविवार , कहाँ वीकेंड मुझे कुछ समय नहीं मिल पाता हर वक्त बस काम ही काम , हसबैंड भी घर ही रहते है और ऑफिस कार्य करते हैं और चलिए हमारा घर बड़ा है लेकिन जहाँ घर छोटे हैं वहाँ कितनी दिक्कत हो रही है , बच्चे चीखते चिल्लाते हैं और ऑफिस कार्य शांति से संपादित होते है , लेकिन आकांक्षा बताती हैं कि मैंने समाधान खोज लिया है जब मै बच्चों को पढ़ाती हूँ , तो हसबैंड उसी समय खाना बना लेते हैं , फिर बच्चे सो जाते हैं तब हम ऑफिस का कार्य देखते हैं |


अब बात करते हैं फ्रांस की जहाँ उन्मुक्त जीवन शैली है विवाह संस्था का अभाव है , वहाँ स्वास्थ्य शिक्षा आदि व्यवस्था सरकार द्वारा प्रदत्त है , वहाँ घरेलू हिंसा महिलाओं और पुरुष दोनों के द्वारा चल रही है , लेकिन स्त्री अधिक शिकार है , सरकार द्वारा हेल्पलाइन नंबर दिया गया है , जिससे पीड़ित महिला को बुलाकर उसके रहने का प्रबंध होटल में किया जाता है |


वापिस रुख भारत की ओर करते है और पुणे की कृति से बातचीत के दौरान जानने की कोशिश की तो ऐसा लगा कि उन्हे कोई ऐसी दिक्कत नहीं है , वो आई.बी.एम में सीनियर टेक्निकल सर्विसेस स्पेशिलिस्ट हैं , उनका यह कहना है कि व्यक्ति को सब कुछ आना चाहिए |


अलग अलग स्थान की महिलाओं को देखकर समझ कर ये कहा जा सकता है कि इस महामारी के संकट काल में , डॉ. , नर्स , सफाई कर्मचारी की तरह महिलाओं की भूमिका भी कम असरदार नहीं है , वो इस समय अपने परिवार के लिए कुक ,बड़े बुजुर्गों की देखभाल करना | यह सारे कार्य करके अपने बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचय तो दे ही रही है | और अनेक खर्चों में कटौती करके , स्वयं कार्य करके आर्थिक रूप से भी सफलता पाने में प्रयासरत है | 


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