Sunday, June 7, 2020

एटलस साइकिल कंपनी। उत्तर प्रदेश सरकार दखल दे- एटक


विश्व साइकिल दिवस के दिन 3 जून एटलस साइकिल का कारखाना बंद हो गया।
एटलस साइकिल में उत्पादन हरियाणा में 1951 में प्रारंभ हुआ था और इसकी 3 इकाइयां थी
2014 के दिसंबर में एटलस कंपनी के मालिकों ने मध्यप्रदेश में मालनपुर स्थित इकाई को बंद कर दिया और उसके पश्चात अपनी सोनीपत की इकाई को भी 2018 में बंद कर दिया।
उक्त दो यूनिटों के बंद होने के पश्चात उसका अंतिम कारखाना उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद में था जिसको भी कंपनी के मालिकों ने 1 जून को अनलॉक 1 प्रारंभ होने के पश्चात 3 जून से बंद कर दिया और वहां कार्यरत लगभग 1000 लोगों का स्टाफ सड़क पर आ गया।


मालिकों ने तर्क दिया है कि उनके पास वित्त की तंगी है इसलिए हम कारखाने को बंद कर रहे हैं और कारखाने के समस्त मजदूरों का ले ऑफ किया जाता है।


मालिकों ने यह सब कार्यवाही एक तरह से समस्त श्रम कानूनों को धता बताकर की है क्योंकि किसी भी ले ऑफ की कार्यवाही को करने से पूर्व उसको श्रम विभाग की अनुमति लेनी पड़ती है और ऐसा नहीं प्रतीत होता कि श्रम विभाग से वह अनुमति ली गई थी।
 
वास्तविकता तो यह है कि उत्तर प्रदेश में भले ही  सरकार यह प्रतिदिन कहे कि उत्तर प्रदेश में एमएसएमई की 90 लाख कारखाने हैं और उन कारखानों में उत्तर प्रदेश की सरकार जो वापस लौट कर आए मजदूर हैं उनको समाजोजित करेगी ।यदि एक एक भी लिया गया तो सब समायोजित हो जाएंगे।


अब यह बात सुनने में तो अत्यंत कर्णप्रिय है।


राष्ट्रीय सहारा के कानपुर संस्करण में विगत दिवस छपा है कि पनकी व दादा नगर औद्योगिक क्षेत्रों में लगभग 5000 कारखाने हैं और ऐसी संभावना व्यक्त की गई है की कारखानों के प्रारंभ होने के पश्चात उन कारखानों में 40 फ़ीसदी मजदूरों की छटनी संभावित है।
हवा का रुख तो ये है।
जुमले रोटी रोज़ी नहीं देते।


छोटी पूंजी के कारखाने दारों की अपनी परेशानियां और दिक्कतें हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।


परंतु यह भी सत्य है कि सुप्रीम कोर्ट के भी अनेकों ऐसे फैसले हैं जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कारखाने दार मजदूरों को न्यूनतम वेतन भी सुनिश्चित नहीं कर सकते तो उन कारखानों को बनें रहने का कोई अधिकार ही नहीं है ।
इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों की रक्षा करने के लिए अनेकों निर्णय अलग-अलग समयों  में दिए हैं जो कानूनों की किताबों में कोई भी जा कर देख सकता है।


उत्तर प्रदेश में स्थिति और भी भयानक हो जाती है जब  पूरा  समाज यह देख रहा है कि उत्तर प्रदेश की सरकार समाज के सबसे कमजोर वर्ग, मजदूर वर्ग के सुरक्षा के लिए जो श्रम कानून बनाए गए हैं उनको भी निरस्त कर रही है ।
अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश की सरकार ने 8 घंटे के काम को 12 घंटे का घोषित कर दिया । जब रिट उच्च न्यायालय में लग गई तो उत्तर प्रदेश की सरकार ने उच्च न्यायालय को यह चिट्ठी भेज दी कि इस प्रकार की मंशा अब उत्तर प्रदेश सरकार की नहीं है ।


उत्तर प्रदेश के  मजदूरों को इस बात को अच्छी तरह से मालूम है कि उत्तर प्रदेश में लागू जितने भी श्रम कानून है उन को सस्पेंड करने के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार ने एक अध्यादेश का प्रारूप केंद्रीय सरकार को भेजा हुआ है।


तो क्या उम्मीद कोई लगा सकता है।
इन कठिन परिस्थितियों में उम्मीदों का लगाना भी अपने आप को धोखे में ही डालना होगा।


उत्तर प्रदेश में अगर 2 कानूनों से मदद हो पा रही है तो वह है मनरेगा का कानून और दूसरा है बिल्डिंग एंड कंस्ट्रक्शन वर्कर का कानून ।उनसे ही अधिकतर मदद उत्तर प्रदेश की सरकार कर सकी है।


यह दोनों ही कानून किसी भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार के द्वारा बनाए हुए नहीं हैं।


मजदूरों में यह उम्मीद थी कि सरकार अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए एटलस के कारखाने दार पर दबाव डालेगी कि  इस मौके पर कारखाने को ना बंद किया जाए परंतु ऐसा कोई लक्षण दिखाई नहीं देता । 
ट्रेड यूनियनों के नाते हम तो यह मांग करते हैं कि सरकार कारखाने का टेकओवर कर कम से कम 1000 संगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की रोजी रोटी बचाये।


एक यह परिदृश्य भी है कि 4 जून को सुप्रीम कोर्ट में बहस हुई और बहस का मुद्दा यह था कि केंद्रीय सरकार ने 29 मार्च के अपने निर्देशों में यह कहा था की लॉक डाउन पीरियड का पैसा मजदूरों को कारखाने दार देंगे । कारखाने दार सरकार के इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट चले गए और जब कल सुप्रीम कोर्ट में यह बहस हुई तो केंद्रीय सरकार  के वकील ने वहां कह दिया कि हम उक्त आदेश को वापस लेते हैं ।
यानि केंद्रीय सरकार ने सबसे कमजोर तबकों, मजदूरों का साथ छोड़ दिया।
बडा विचित्र समय है। लॉक डाउन है ,नेशनल डिजास्टर का कानून है ,मजदूर में करोना का भय है, धारा 144 लगी हुई है ,प्रदर्शन हो नहीं सकते। देह दूरी का पालन करना है ,अदालत भी आज कल अक्सर  ही मौन हैं । सरकारों को तो जैसे मजदूरों की कोई फिक्र ही नहीं है ।वह तो उनके संरक्षण के सारे कानूनों को समाप्त ही कर देने पर तुली हुई है।


खैर वह सुबह कभी तो आएगी....


एटक मांग करती है उत्तर प्रदेश की सरकार एटलस कारखाने की बंदी में दखल दे, मजदूरों के हितों की रक्षा करे ,और कारखाने को पुनः चलवानें के अपने सारे प्रयास करे।
अगर मालिक राजी नहीं होते तो कारखाने का सरकारी टेकओवर कर लिया जाए।


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