Monday, June 15, 2020

हंसराज कॉलेज द्वारा मीडिया साक्षरता पर वेब संगोष्ठी का हुआ आयोजन


हंसराज कॉलेज द्वारा ‘बदलता परिदृश्य और मीडिया साक्षरता’ विषय पर राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस संगोष्ठी में देश भर से दो सौ से भी अधिक लोगों ने सहभागिता की. संगोष्ठी के प्रारंभ में विषय को प्रस्तावित करते हुए संयोजक डॉ. विजय कुमार मिश्र ने कहा कि मीडिया साक्षरता का सम्बन्ध विभिन्न रूपों में मीडिया तक पहुंचने, उसका विश्लेषण करने, उसका मूल्यांकन और एक तार्किक और बेहतर आलोचना दृष्टि के विकास से सम्बद्ध है. मोटे तौर पर देखें तो मीडिया साक्षरता मीडिया के प्रभाव के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना है। संरचनात्मक सुविधाओं, सत्ता, फंडिंग आदि कैसे ख़बरों के कोण को बदलने का प्रमुख कारण बन जाता है यह जानने की दृष्टि से भी मीडिया साक्षरता बेहद महत्त्वपूर्ण है. आज के बदलते दौर में मीडिया लिट्रेसी लोगों को विचारवान, तार्किक, प्रभावशाली कम्यूनिकेटर और एक सक्रिय नागरिक के रूप में स्थापित करता है. मीडिया लिट्रेसी खबरों में हेरफेर, गलत सूचना, फेक न्यूज़, प्राइवेसी, सायबर बुल्लिंग आदि पक्षों के प्रति भी जागरूक करता है. यह हमें मीडिया उपभोग की अपनी आदतों और उसके उपयोग के पैटर्न में सुधार या बदलाव के माध्यम से बेहतर विकल्प को प्रस्तुत करने में भी हमारी सहायता करती है. इसके माध्यम से लोकप्रिय मीडिया में निहित शक्ति संरचनाओं को समझने और समाज पर उसके प्रभाव को परखने का कौशल भी सहज ही विकसित होता चला जाता है यह मीडिया संस्थाओं के पूर्वाग्रह के अपरिहार्य जोखिमों को समझने में भी सक्षम बनाता है।
इसके बाद संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए द आरोहरण मीडिया स्कूल की डीन अपर्णा द्विवेदी ने कहा कि हम ऐसे दौर में रह रहे हैं, जहां सूचनाओं का अंबार है और रोज़मर्रा की बातचीत में ‘पोस्ट-ट्रूथ’ जैसे शब्द शामिल हो गए हैं. जब खबरों में तथ्य से ज्यादा विचारों पर जोर दिया जाए और उन विचारों को साबित करने के लिए खबरों को तोड़ मरोड़ दिया जाए तो ये तय है कि वो खबर कम और एजेंडा ज्यादा है. ऐसा नहीं है कि ये पहले नहीं होता था. लोग और जब मैं लोग कह रही हूं तो वो सारे लोग जिनका हित ऐसी खबरों को फैलाने में जुड़ा होता है वो अपने अपने मतलब के लिए बातों को गढ़ना और उनका प्रचार करने में लग जाते हैं. पहले इसके लिए उनके पास पारंपरिक मीडिया ही होता था जिस पर आम तौर पर पत्रकार जांच परख लेता है लेकिन अब डिजिटल वर्ल्ड में जिस तरह से राजनीतिक, विचारधारा, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर झूठी खबरें आ रही हैं, वह चिंता की बात है. ऐसे दौर में ‘सूचनाओं’ को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ानी और समझ पैदा करनी होगी और इसीलिए जरूरी है कि मीडिया लिटरेसी यानी मीडिया के प्रति साक्षरता बढ़ाने की जरुरत है. 
सोशल मीडिया और अनगिनत मेसेजिंग नेटवर्क की वजह से बड़े पैमाने पर सूचनाओं का प्रसार एलीट वर्ग या मीडिया तक सीमित नहीं रह गया है. इन नेटवर्क के चलते सूचनाओं के प्रवाह को रोकना नामुमकिन हो गया है. ऐसे माहौल में जरूरी है कि लोगों के पास जानकारी होनी चाहए ताकि वो ऐसी खबरो का विश्लेषण कर सके और ये तय करें कि ये सही है या नहींय इसके लिए हमें बहुत कम उम्र से ही जागरूकता बढ़ानी होगी क्योंकि सूचनाओं की बमबारी लड़कपन की उम्र से ही शुरू हो गई है. 
स्मार्टफोन और टैबलेट की संख्या बढ़ने से आज की पीढ़ी के छात्रों की पहले की तुलना में सूचनाओं तक पहुंच काफी आसान हो गई है. 2016 में एक अमेरिकी रिसर्च से पता चला कि अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का धड़ल्ले से इस्तेमाल करने वाले छात्रों में से 80 फीसदी विज्ञापन और ख़बरों के बीच फर्क़ नहीं कर पाए. इसका मतलब यह है कि छात्रों को जिस बड़े पैमाने पर सूचनाओं से जूझना पड़ रहा है, उसमें वे सच या झूठ का फर्क़ नहीं करने में ख़ुद को असहाय पा रहे हैं. हालांकि, कुछ देशों ने इस पर काम करना शुरु किया है .
2014 के बाद से फिनलैंड ने झूठी ख़बरों के खिलाफ़ एक अभियान शुरू किया गया, जिसका मक़सद छात्रों में विश्लेषण की क्षमता और सूझबूझ बढ़ाना है. फैक्ट चेकिंग यानी सच्ची और झूठी खबरों का फर्क़ बताने वाले संस्थानों या जानकारों के साथ मिलकर फिनलैंड छात्रों को ये सिखा रहा है कि झूठी खबरों की पहचान कैसे करे
इसी तरह,2018 में अमेरिका के सरकारी स्कूलों में मीडिया साक्षरता बढ़ाने के लिए एक विधेयक लाया गया, जिसे कैलिफोर्निया के गवर्नर जेरी ब्राउन ने मंजूरी दी. 
भारत में भी कौन सी सूचना सच है और कौन सी झूठ, इसका पता लगाना मुश्किल होता जा रहा है. हमने यहा पर स्कूली स्तर पर मीडिया साक्षरता बढ़ाने पर बातचीत शुरू भी नहीं की है. भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक सिलेबस पूरा करने तक सीमित है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या वो नई तकनीक में ये जानकारी दे पाएंगे कि छात्र सही सूचना के तथ्यों की जांच कर सके.
इसके लिए छात्रों को अवगत कराने के साथ साथ माता पिता और समाज को अवगत कराना होगा. 
आखिर में, सूचनाओं को लेकर सवाल करने की आदत को बढ़ावा देना चाहिए, लेकिन ऐसा भी न हो कि छात्रों के अंदर इससे निराशावाद पनपे. भले ही सूचनाओं की बाढ़ के कई ख़तरे हैं, लेकिन अलग-अलग तरह के मीडिया के आने से अधिक लोगों तक ख़बरें पहुंच रही हैं और उनमें विविधता भी बढ़ी है. इसलिए ठगे जाने का डर, सीखने या सूचना हासिल करने पर हावी नहीं होना चाहिए. आखिर, खबरों का विश्लेषण करने से पहले छात्रों की उनमें दिलचस्पी जगानी होगी.
इसके बाद मीडिया विशेषज्ञ विनीत कुमार ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मीडिया साक्षरता का मूल उद्देश्य हैं नागरिकत बोध और नागरिकों के कॉमन सेंस को बचाए रखने की समझ. ये दोनों बातें जरूरी नहीं कि स्कूल-कॉलेज में मीडिया साक्षरता पर कोई पाठ्यक्रम निर्धारित करके की जाय. ये नागरिक समाज के रोजमर्रा जीवन और उसके व्यवहार का हिस्सा होना चाहिए. इस संदर्भ में दूसरी जरूरी बात ये कि मीडिया साक्षरता जब हम कहते हैं तो इसका मतलब होता है कि मीडिया के विविध संदर्भों और उसके कामकाज के तरीके से लेकर समाज पर पड़नेवाले प्रभाव को लेकर संवेदनशील और तार्किक होने की समझ पैदा करना. 
इस संगोष्ठी में डीडी न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने कहा कि आज हर पत्रकार अपनी जेब में एजेंडा लिए घूमता है ऐसे में मीडिया साक्षरता की बेहद आवश्यकता है ताकि लोग उस एजेंडे को पकड़ सकें. सत्य और अर्द्धसत्य के भेद को समझ सके. पत्रकारिता को मिशन मानने वाले सम्पादक आज के दौर में दुर्लभ हैं. आवश्यकता इस बात की है कि अखबार या टीवी चैनलों से प्रसारित ख़बरों में संतुलन हों. हर तरफ विशेषज्ञों और चेहरों का दुहराव देखा जा सकता है. कुछ गिने चुने लोग ही सभी विषयों पर अपनी राय व्यक्त करते हुए टीवी चैनलों पर देखे जा सकते हैं. पत्रकारिता का मूल्य बदल गया है. व्यावसायिकता हावी है. मुनाफा महत्त्वपूर्ण है. खबरों को विशेष कोण से पूर्वाग्रह के साथ पेश किया जाता है. तथ्यों की जांच परख के बिना वरिष्ठ से बरिष्ठ पत्रकार खबरों को प्रकाशित और प्रसारित करते हैं. यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और इसमें बदलाव के लिए अत्यधिक सचेत और सक्रिय पाठक अथवा दर्शक की आवश्यकता है और इस दिशा में मीडिया साक्षरता या मीडिया लिट्रेसी बेहद महत्त्वपूर्ण है.  
वहीँ हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा की मीडिया आज मिशन से प्रोफेशन तक पहुँचने के बाद अपनी अलग राह बना चुका है. लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की जो भूमिका होनी चाहिए आज की पत्रकारिता उसे निभाती हुई नहीं दिख रही है. आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया की खबरों की जांच-परख हो. उसका विश्लेषण हो और इस दिशा में समाज के बुद्धिजीवियों का महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है. कार्यक्रम का समापन अभिनेता सुशांत सिंह की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट के मौन के साथ हुआ.


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