Monday, June 15, 2020

जीवन एक पहेली


सिनेमा की दुनिया हो,या रंग मंच का घर हो,या टेलीविजन जगत के सिरियल्स हो अथवा रचना कार या लेखक का कलपना जगत हो,ये सब ऐसे माध्यम है जिनके द्वारा पाठक,दर्शक अथवा श्रोता प्रस्तुत किये गये  चरित्र और पटकथा की दुनिया में भ्रमण करने लगता है,भले ही यह स्थाई न हो ।
उपरोक्त में कथा बस्तु प्रेम,त्याग,भक्ति आदि आदर्श हो सकतेहैं;धोखा,महत्वाकांक्षा,स्वार्थ,लालच आदि भी होते है;चरित्र द्वारा उत्कृष्ट मार्ग अनुसरण करना दिखाया जाता है जिससे दर्शक को प्रेरणा मिलती है;चरित्र द्वारा कुटिल और निम्न कोटि के रास्ते भी अपनाये जाते हैं जिससे कुछ को दुख पहुंचता है और कुछ को आनंद भी मिलता है;जिसकी जैसी मनोवृत्ति वैसी ही प्रतिक्रिया ।
परन्तु जरा यह भी देखें और सोचें कि चरित्र के स्वयं के जीवन यात्रा में कैसा घटित होता है!क्या उसका कार्य मात्र मनोरंजन देना है?क्या वह मानवीय गुणों अथवा अवगुणो से परे है?निरपेक्ष मनोवृत्ति के चरित्र कुशलता पूर्वक प्रस्तुत कर देने से क्या वह वास्तविक जीवन में भी निरपेक्ष रह पाता है?क्या बुरे से बुरे चरित्र का अभिनय  कर देने से वह जीवन में भी बुरा होता है?
दर्शक की अभिलाषा बहुत होती है;वह अभिनय को यथार्थ समझने  लगता है;जीवन विचित्र है;इसे समझना सरल नही है;कथाबस्तु के चरित्र की भी एक वास्तविक दुनिया होती जिसमें वह भी हमारे जैसे जीवन जीता  है ।उसके जीवन में भी हमारे जैसे सुख-दुःख आते रहते हैं;दुख का अनुपात बहुत होता है,या यो कहें अनेक  गुणा  होता है,फिर भी सुख जो मन की एक अवस्था होती है और जो क्षणिक भी होती है,समस्त दुखों को विस्मृत कर  देती है ।मानव इसी क्षणिक अवस्था को यथार्थ रूप में प्राप्त करते  हुये जीवन भर संघर्ष करता रहता है ।ऐसा नही है कि वह नहीं जानता है कि उसे दुख का सामना नहीं करना पडेगा,केवल सुख ही सुख मिलेगा।


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