Saturday, June 6, 2020

कोरोना की रोकथाम में महिलाओं की भूमिका 


घर हो या समाज , नगर हो या गाँव , देश हो या विदेश यदि महिलाओं की स्थिति और भूमिका पर गौर किया जाए तो उसमें बहुत कोई विशेष अंतर नहीं है , वहीं घर , परिवार , समाज के नियम देखभाल , व्यवसाय या नौकरी करना | वो कैसे न कैसे अपने आप को हर परिस्थिति के अनुसार ढाल कर सब कुछ सँजो लेती है , समाज के बदलते रुप - स्वरूप में स्वयं को उस खाँचें में फिट करती आई है | घर और बाहर किस प्रकार सामंजस्य बैठाना है , वो बखूबी जानती हैं , एक शिक्षित अनुभवी नारी को यदि निर्णय लेने की स्वतन्त्रता हो तो वो आसानी से अपने बुद्धि कौशल द्वारा हर परेशानी का समाधान खोज ही लेती है |


महिलाओं के हिस्से में तो यूं ही अनेक भूमिकाएँ होती हैं , जिसे वो कुशलता से निभा भी लेती हैं , लेकिन इस समय जो पूरे विश्व पटल पर आफत आई है उसमें एक स्त्री की भूमिका और भी अधिक आयामों की अपेक्षा कर रही है , इस समय महिला को अपने परिवार में पारंपरिक कार्य जैसे खाना बनाना , सफाई करना , कपड़े धोना , बर्तन साफ करना , सब्जी काटना और अलग अलग रेसपी भी बनाना | तो दूसरी ओर यदि बच्चे छोटे हैं तो उनकी देखभाल करना , उनका एक एक कार्य स्वयं करना , थोड़े बड़े हो तो पढ़ाई का कार्य , उनकी ऑन लाइन क्लास लेने में सहायता करना , जैसे डॉ दीप्ति रॉय से बात-चीत में पता लगा कि उनकी पाँच वर्षीय बेटी जब ऑन लाइन क्लास लेने बैठती है , तो उन्हे भी पूरे वक्त साथ बैठना पड़ता है और वो स्वयं भी शिक्षिका है , तो उन्हे भी अपनी क्लास लेनी होती है , दस वर्षीय बेटे को गृहकार्य में मदद करनी , घर के सारे कार्य करने मेड आती थी , वो आ नहीं सकती , वास्तव में स्थिति बड़ी विकट है , यह लगभग सभी जगह है लेकिन समाधान हर बात का है तो दीप्ति की तरह महिलाएं इस मोर्चे पर भी जीत हांसिल करने में लगी हैं | सबके पास अपने अपने उपाए हैं अभी अमेरिका में रहने वाली श्रीमती आकांक्षा से बात हुई , तो उन्होने कहा कि कोई विशेष अंतर नहीं है यहाँ और वहाँ की महिलाओं की भूमिका में , बस ये है कि भारत में काम करने वाली मेड मिल जाती है , और यहाँ नहीं , लेकिन यहाँ कोई ऑफिस खाना लेकर नहीं जाता है क्योंकि नाश्ता और दोपहर का भोजन वहीं प्रोपर मिलता था | 'वर्क फ़्रोम होम' के चलते सभी कुछ घर से मैनेज करना है , जुड़वा बच्चे हैं पहले पार्क में ले जाते थे तो रिलैक्स व्यतीत हो जाता था , अब मुझे पूरे समय देखना होता है | कहाँ रविवार , कहाँ वीकेंड मुझे कुछ समय नहीं मिल पाता हर वक्त बस काम ही काम , हसबैंड भी घर ही रहते है और ऑफिस कार्य करते हैं और चलिए हमारा घर बड़ा है लेकिन जहाँ घर छोटे हैं वहाँ कितनी दिक्कत हो रही है , बच्चे चीखते चिल्लाते हैं और ऑफिस कार्य शांति से संपादित होते है , लेकिन आकांक्षा बताती हैं कि मैंने समाधान खोज लिया है जब मै बच्चों को पढ़ाती हूँ , तो हसबैंड उसी समय खाना बना लेते हैं , फिर बच्चे सो जाते हैं तब हम ऑफिस का कार्य देखते हैं |


अब बात करते हैं फ्रांस की जहाँ उन्मुक्त जीवन शैली है विवाह संस्था का अभाव है , वहाँ स्वास्थ्य शिक्षा आदि व्यवस्था सरकार द्वारा प्रदत्त है , वहाँ घरेलू हिंसा महिलाओं और पुरुष दोनों के द्वारा चल रही है , लेकिन स्त्री अधिक शिकार है , सरकार द्वारा हेल्पलाइन नंबर दिया गया है , जिससे पीड़ित महिला को बुलाकर उसके रहने का प्रबंध होटल में किया जाता है |


वापिस रुख भारत की ओर करते है और पुणे की कृति से बातचीत के दौरान जानने की कोशिश की तो ऐसा लगा कि उन्हे कोई ऐसी दिक्कत नहीं है , वो आई.बी.एम में सीनियर टेक्निकल सर्विसेस स्पेशिलिस्ट हैं , उनका यह कहना है कि व्यक्ति को सब कुछ आना चाहिए |


अलग अलग स्थान की महिलाओं को देखकर समझ कर ये कहा जा सकता है कि इस महामारी के संकट काल में , डॉ. , नर्स , सफाई कर्मचारी की तरह महिलाओं की भूमिका भी कम असरदार नहीं है , वो इस समय अपने परिवार के लिए कुक ,बड़े बुजुर्गों की देखभाल करना | यह सारे कार्य करके अपने बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचय तो दे ही रही है | और अनेक खर्चों में कटौती करके , स्वयं कार्य करके आर्थिक रूप से भी सफलता पाने में प्रयासरत है | 


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