साहित्य या तो बाजार एवं सत्ता की शक्तियों द्वारा उत्पादित होते हैं या आत्मचेतना द्वारा विकसि। ये तर्क ,लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर आर पी सिंह ने कवियत्री बहिणाबाई चौधरी उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय जलगांव से सम्बद्ध आर्ट्स साइंस एंड कॉमर्स कॉलेज यावल द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार (10 जून )मॉडर्न ट्रेंड्स इन लिटरेचर (मराठी , हिंदी , अंग्रेजी ) के प्लेनरी व्याख्यान मॉडर्न ट्रेंड्स इन इंग्लिश लिटरेचर विषय पर बोलते हुए दिए । उन्हों विभिन्न साहित्यिक पाठों , शैलियों एवं रूपकों का विश्लेषण करते हुए इसे विस्तार प्रदान किया।
आर पी सिंह ने बताया की जैसे आधुनिक अंग्रेजी साहित्य में विश्वयुद्धों के परिप्रेक्ष्य में युद्ध का चित्रण मिलता है वैसे ही वर्तमान कोरोना महामारी के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न प्रकार की आतंरिक एवं वाह्य , व्यक्त एवं अव्यक्त सूक्ष्म प्रवित्तियों पर आधरित साहित्य लिखा जा रहा है। हालाँकि लॉकडाउन काल में प्रकाशकों द्वारा पुस्तकों के प्रकाशन में थोड़ा कमी दिखाई पड़ी है , किन्तु सोशल मीडिया एवं अन्य लघु माध्यमों द्वारा प्रभावशाली साहित्य संचारित किया जा रहा है।
प्रोफेसर सिंह ने बताया की उन्होंने देश विदेश में महामारी कोविड के फैलाव के आरम्भिक लक्षण काल ले लगातार विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी साहित्य पर नज़र रख रहे हैं। इनमे भावों के उतर चढ़ाव एवं उनके साहित्यिक निरूपण के विभिन्न चरण दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने वक्तव्य में अंग्रेजी साहित्य के आरम्भिक दौर से लेकर आधुनिक काल तक के साहित्य में दो मूल विभेदों का भी विश्लेषण किया।उन्होंने बताया की साहित्य या तो बाजार एवं सत्ता की शक्तियों द्वारा उत्पादित होते हैं या आत्मचेतना द्वारा विकसित।
वर्तमान साहित्य में इन दोनों ही प्रवित्तियों के दर्शन होते हैं।
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