शिक्षा मानव सभ्यता की सर्वागीण विकास की एक अहम् कड़ी है | प्राचीन काल से वर्तमान काल तक के समय अंतराल में शिक्षा का स्वरुप उद्देश्य एवं प्रफुलिकता में अहम परिवर्तन देखने को मिला, ठीक ऐसे ही शिक्षण संस्थानों के वातावरण में भी समय एवं वैश्विक जरूरत के हिसाब से समय-समय पर परिवर्तन आवश्यक होता गया |
आज की शिक्षा व्यवस्था छात्र छात्राओं में क्रिएटिव, क्वालिटेटिव एवं क्वांटिटेटिव धारणा में मौलिक परिवर्तन लाई है |
छात्र छात्रा हमारे ऐसेट भी हैं और लाइबिल्टी भी, दूरदर्शी शिक्षक, छात्र छात्राओं के जीवन के शिल्पकार होते हैं | जो अपनी साधना, संघर्ष एवं सहिषुणत: के साथ छात्रों के बौद्धिक विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं तथा छात्रों के जीवन में मानव कल्याण के मूल्य बोध की बुनियाद का निर्माण करते हैं |
विगत कुछ वर्षों से शिक्षा व्यवस्था के अंदर एक निराशा जनक स्तिथि पैदा हुई है, छात्र छात्राओं में शिक्षा के प्रति रूचि और उत्साह कम हुआ है तो वहीं बढ़ती उदासीनता समग्र शिक्षा व्यवस्था पर एक प्रश्न चिन्ह लगाती है|
हमारा युवा वर्ग अपना कौशल, दक्षता एवं कर्तव्य निष्ठा से इस देश की नई तक़दीर लिखना और देश की तस्वीर बदलना चाहता है|
लेकिन मै बड़े दुख के साथ कहना चाहता हुँ कि हमारी शिक्षा व्यवस्था उद्देश्य साधने में अनुपयोगी रही है |
हमें हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को सफल, सक्रिय, आधुनिक एवं युगउपयोगी बनाना होगा जिसके लिए शिक्षण संस्था को एक विशेष भूमिका अदा करनी होगा |
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए शिक्षण संस्था को हर प्रकार की संकीर्ण नीति से ऊपर उठ कर देश समाज और युवा शक्ति के निर्माण में अपना समस्त सकारात्मक ऊर्जा का इस्तेमाल करना होगा | जिससे छात्र छात्राओं का बौद्धिक प्रगति के साथ साथ जीविका उपार्जन भी बन सके |
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