Tuesday, June 9, 2020

विश्व व्यापी कोरोनॉ त्रासदी-भारत की भूमिका


अदृश्य घातक विषाणु कोरोनॉ जो कि नवम्बर 2019 को चीन की परीक्षण शाला में पैदा हुआ किन्तु चीन की छद्मकारी प्रवृति के चलते इसे अपने यहाँ ही पोषित कर दबे पांव ही धीरे धीरे पूरे विश्व में फैल जाने दिया।क्या उद्देश्य या मनोवृति रही होगी चीन की जो अपनी बनाई विषाणु जनित व्याधि से स्वयं को तो उबार लिया किन्तु पूरे  विश्व को बर्बादी की कगार पर पंहुचा कर विकास को वर्षों पीछे धकेल दिया।
भारत में जब फरवरी-मार्च 2020 में इसने दस्तक दी,तो इसकी विकरालता का भान न तो सरकारी तंत्र को था न ही जनतंत्र को।मार्च आते आते जब इस विषाणु ने भारत में अपने पैर तेजी से पसारे तब सरकार की एडवाइजरी आनी शुरू हुई।दक्षिण से पश्चिम,उत्तर,पूरब सभी दिशाओं में विषाणु ने कोरोनॉ व्याधि के रूप से कहर मचाना प्रारम्भ कर दिया।इस विचित्र बीमारी का कोई इलाज चिकित्सा तंत्र के पास नहीं था कि इसे नियंत्रित किया जा पाता।अंततः सरकार ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू घोषित कर इस बीमारी से जूझने की अधिकृत घोषणा कर दी।फिर 24 मार्च से ही सभी विमान सेवाओं को स्थगित करते हुए 25 मार्च से पूरे देश में ताला बन्दी घोषित कर दी गई।पूरी तरह लॉक डाउन,अर्थात सभी कुछ बन्द-यतायात के साधन,आवागमन,विद्यालय,कोचिंग,सरकारी व निजी  कार्यालय,प्रतिष्ठान,पूजास्थल,बाजार,उद्योग,ट्रांसपोर्ट,डाक सेवा,निर्माण कार्य,होटल,गेस्ट हाउस आदि आदि।जो जहां था वहीं ठहर गया।सामाजिक दूरी,शारीरिक दूरी,अति स्वच्छता के सहारे ही इस महामारी से बचने का उपाय ढूंढते रहे।कोरोनॉ व्याधि नामक शत्रु से डरकर बचने हेतु घरों में दुबककर कैद हो गए।खुले रहे तो बस सरकारी अस्पताल,पेट्रोल पंप व बैंक (निर्धारित सीमित समय के लिए ही)।फुटकर सब्जी,फल व आवश्यक खाद्य सामग्री बिक्री/वितरण का कार्य सावधानी पूर्वक कुछ सीमित समय के लिए जारी रहा।स्वच्छता अभियान जारी रहा।सामाजिक संगठन अवश्य कमर कसकर मैदान में आगये और सावधानी पूर्वक भोजन व आवश्यक सामग्री वितरित कर सरकार व समाज के साथ खड़े रहे।सरकारी अस्पतालों में बस कोरोनॉ और कोरोनॉ ही चलता रहा।बाकी मरीज भगवान भरोसे चलते रहे।अधिकतर निजी अस्पताल,क्लीनिक व चिकित्सक दहशत व दबाव के चलते चिकित्सा कार्य से बचते रहे।



बीच बीच में अनावश्यक अवांछित गतिरोध भी उत्पन्न होते रहे।दिल्ली के मरकज में तब्लीकि जमातियों ने जो कोढ़ में खाज का काम किया वह नितान्त अक्षम्य है।इसके लिए दिल्ली सरकार भी जवाबदेह है।जमातियों को वहां से निकाल कर पूरे देश में फैला दिया गया जबकि उनको वही का वहीं क्वारन्टीन कर दिया जाना चाहिए था।सरकार जो जनता के सहयोग से आत्म संयम के बल पर इस महामारी पर काफी कुछ नियंत्रण पा रही थी इन जमातियों ने सब गुड़ गोबर कर दिया।पूरे देश में घूम घूम कर,थूक थूक कर,सामाजिक दूरी की धज्जियां उड़ा उड़ा कर कोरोनॉ का संक्रमण खुलेआम फैलाने पर आमादा रहे और राजनैतिक विपक्ष सियासत पर उतर आया,अपनी रोटियां सेंकने लगा।सरकारी तंत्र सावधानीपूर्वक इन जमातियों को अस्पतालों में क्वारन्टीन करता गया,यह जमाती उपद्रव मचाते रहे,अभद्रता करते रहे।शाहीन बाग का प्रदर्शन तक नहीं छोड़ा।अंततः सरकार की सख्ती से इन्हें काबू किया जा सका।
फिर आया दूसरा गतिरोध -- पलायन का।दूसरे राज्यों में फसें विद्यार्थी व श्रमिक।सभी शिक्षण संस्थान बन्द होने से शिक्षार्थी महामारी की भयावहता के चलते अपने घर जाने को आतुर और यातायात के साधन बन्द।सरकार ने बसों की व्यवस्था कर उन्हें उनके गृहप्रदेश भिजवाया।जिससे सामाजिक दूरी का नियम टूटा व संक्रमण का खतरा बढ़ा।निर्माणकार्य बन्दी के चलते श्रमिक वर्ग की स्थिति दयनीय हो गयी।वे स्वयं व उनके परिवार भुखमरी के कगार पर पंहुचने लगे।जो अपना घर,द्वार,गांव छोड़कर दूसरे शहरों में धनार्जन हेतु गए थे वे पूर्णतयः तालाबंदी के कारण बेरोजगार होकर एक एक पैसे को मोहताज होने लगे तब उनका सब्र का बांध टूटा और वे अपने घरों,गांवों को पलायन को विवश हो गए।किन्तु जाएं कैसे, यातायात के साधन बन्द।वे बौखलाहट में पैदल ही निकल पड़े।हज़ारों किलोमीटर की दूरी तय करने को उद्धत।सरकार स्तब्ध।राज्य सरकारों को चाहिए था कि वे अपने राज्य के श्रमिकों को आश्वस्त करती,उन्हें आर्थिक मदद देकर पलायन से रोकती।किन्तु राज्य सरकारें चुप्पी साधे रही और मजदूर अपनी व अपने परिवार की जान जोखिम में डाल कर अपने सुदूर प्रदेश को निकल पड़े।कई दुर्घटनाएं भी हुई।अंततः सरकार ने श्रमिक विशेष बस व रेल सेवा के माध्यम से उन्हें उनके गृह प्रदेश पंहुचाने की व्यवस्था की।किन्तु यह पलायन पुनः कोरोनॉ संक्रमण का बड़ा कारण बना।एक बार फिर सरकार के संक्रमण नियंत्रण अभियान को बड़ा झटका लगा।इन श्रमिकों की वापसी ने गांवों,जो कि अपनी प्राकृतिक समृद्धि के कारण संक्रमण से अछूते थे,में भी यह संक्रमण फैला दिया।
इतने व्यवधानों के उपरांत भी सरकार कोरोनॉ संक्रमण पर नियंत्रण पाने को आशान्वित है।अब हमारा दायित्व बनता है कि हम स्वयं सजग रहें,लोगो को भी जागरूक करें व इस व्याधि से निपटने में सरकार का पूरा सहयोग करें।
लगभग ढाई महीने की पूर्णतयः बन्दी के रहते में देश व  समाज की क्या स्थिति होगी।अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गयी।कितनी जन हानि हुई और कितनी धन हानि,अनुमान लगाना कठिन है और यह क्रम जारी है।1 जून से गतिविधियों को कुछ गति मिली तो कोरोनॉ भी गतिशील हो गया।भारत वर्ष में संक्रमित का आंकड़ा लगभग ढाई लाख के पार पंहुच गया और इससे मृत्यु का आंकड़ा लगभग 7 हजार के पार।यह संख्या बढ़ती ही जा रही है।किन्तु जीवन कब तक ठहरा रहेगा,इसे खोलना भी आवश्यक है।लॉक डाउन तक तो सरकारी और सुरक्षा तंत्र
की मुस्तैदी के रहते हम बेपरवाह रहे किन्तु अब 8 जून से पूर्ण लॉक डाउन खुलने के बाद हमारी अपनी सुरक्षा को लेकर जिम्मेदारियां बढ़ गयी।अब हमें अपनी सुरक्षा घर से ले कर बाहर तक स्वयं बड़ी संजीदगी से करनी है।घर में सुरक्षा को लेकर महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।यू तो सरकारी तंत्र,स्वास्थ्य विभाग ने हमें अपनी जीवन रक्षा के लिए बिंदुवार दिशा निर्देशित किया है।सर्वप्रथम तो हम अपनी सनातनी संस्कृति की ओर लौटे।हमने अपनी सुखसुविधा भोगी व उपभोग वादी पाश्चात्य संस्कृति के अनुसरण करते हुए अपने पर्यावरण व प्रकृति से जो खिलवाड़ किया है उसी का परिणाम है पर्यावरण प्रदूषण,प्रदूषित जलवायु,यह कोरोनॉ जैसी घातक महामारी,समुद्री तूफान,भूचाल,
हिमपात,ओलावृष्टि,असामयिक ऋतु चक्र परिवर्तन,अतिवृष्टि,अनावृष्टि,बढ़ता तापमान,शुष्कता,बाढ़ आदि आदि।
अब समय आ गया है हम स्वदेशी संस्कृति की ओर बढ़े।-
स्वास्थ्य की दृष्टि से अपनी पुरातन योगसंस्कृति,आयुर्वेद सबसे अधिक कारगर हैं।पहले हम रात में सपरिवार खुले आसमान में सोते थे,शुद्ध हवा लेते थे,कूलर,ए सी की हमें न तो आवश्यकता होती थी न हम चलते थे,घर में पंखा ही ठंडक देता था,कोई उमस-गर्मी की अति नहीं होती थी।बिजली के जाने पर हम हाथ का पंखा झलते थे। किसी प्रदूषण कारक इन्वर्टर या जनरेटर की आवश्यकता नहीं होती थी।सर्दी में हम रजाई या कम्बल प्रयोग करते थे।कोई रूम हीटर या ब्लोअर की आवश्यकता हमें नहीं होती थी।दिन में बाहर बैठकर सूर्य की गर्मी व धूप में बैठकर विटामिन डी लेते थे न कि घर मे घुसकर हीटर की अप्राकृतिक गर्मी।
बीमार पड़ने पर हम घर मे ही दादी नानी के प्राकृतिक नुस्खों,योग व्यायाम आदि करके,काढ़ा आदि पीकर ठीक हो जाते थे,अंग्रेज़ी दवाएं लेने की आवश्यकता ही नहीं होती थी।शुद्ध खानपान था।तब होटल,ढाबों व रेस्टोरेंट की संस्कृति नहीं थी।हम घर का बना शुद्ध ताजा भोजन करते थे।हम ताजी व प्राकृतिक मौसमी पौष्टिक स्वास्थ्यवर्धक  सब्जियां फल खाते थे न कि कोल्ड स्टोरेज में संरक्षित बेमौसम अपौष्टिक खाद्य पदार्थ।स्वस्थ रहने को हम जिम नहीं जाते थे,स्विममिंग पूल के गंदले पानी में नहीं तैरते थे,कार-बाइक पर जाकर नहीं टहलते थे बल्कि घर में भी शारीरिक श्रम करते थे,नदियों नहरों के शुद्ध पानी में स्नान करते थे,कुएं,नल,घड़े,सुराही का ही शुद्ध पानी पीते थे।घर में वाटर कूलर,जल प्रतिशोधक प्योरिफायर आर ओ,गीज़र, हीटर आदि प्रयोग में नहीं थे।हम शुद्ध सात्विक जीवन जीते थे,मानसिक शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते थे।तनाव द्वंद नहीं थे।धर्म कर्म,दया करुणा,चिन्तन मनन,भावना संवेदना,ध्यान दान,विश्वास-आत्मविश्वास,सहायता-सहयोग भाव आदि स्वस्थ गुणों का हम पालन करते थे।सकारात्मक सोच व नियम संयम हमे स्वस्थ रखते हुए हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी निरन्तर वृद्धि करते थे।आज हम इन गुणों का अभाव देखते हैं।जिसका दुष्परिणाम हमारे समक्ष है।
हम स्वच्छता अभियान का हिस्सा बने।दिखावे का जीवन छोड़कर स्वाभाविक जीवनयापन करें।अपनी स्वदेशी संस्कृति का पालन करें।शिक्षा को अपने जीवन में भी ढाले।ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कुछ संदेश,संस्कृति सौंप कर जाएं जैसे हमारे बुजुर्गों ने हमें सौंपी है भले ही हम उससे भटक रहे हैं किन्तु आने वाली पीढ़ी न भटके।उसे वह दिन न देखना पड़े जो हम देख रहे हैं।इसमें महिलाओं की अहम भूमिका हो सकती है।हम अपने बच्चों को पाश्चात्य इतिहास नहीं बल्कि अपना गौरवशाली इतिहास पढ़ाएं,स्वाभिमान का भाव जगाएं,स्वदेशी अपनाएं,स्वस्थ रहें,दूसरों को स्वस्थ रखें।महामारियों को अपनी शारीरिक मानसिक शक्ति से मात देते रहे।हम स्वस्थ होंगे,सशक्त होंगे,हमारा देश स्वस्थ होगा,सशक्त होगा,समृद्ध होगा।हमारा भारत इसमें अग्रणी भूमिका निभा सकता है।फिर से विश्वगुरु बनने की क्षमता रखता है।इस विश्वव्यापी कोरोनॉ संकट ने यह सिद्ध भी कर दिया है,विश्व की महाशक्तियां भी भारत का लोहा मान रही हैं।यह हमारे लिए गर्व व गौरव की बात है।     


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