
दिल्ली चुनाव के दौरान स्वामी अग्निवेश से उनके आश्रम पर भोजन एवं लम्बी भेंट वार्ता हुई थी |
स्वामी अग्निवेश एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें बात घुमा कर कहना नहीं आता था | जिसके चलते साक्षात्कार के दौरान कई मोड़ो पर वे मुझे बहुत सरल महसूस हुए, मानो इतने सौम्य की तीखे तेवर वाले पत्रकार भी कड़वे प्रश्न रखते हुए आवाज़ ऊँची करने में चार बार सोचें |
पूरे इंटरव्यू में कई बार उनकी विरोधाभासी चीजों को लेकर, जिज्ञासा के साथ ठोस प्रश्न किए |
धार्मिक पाखंडो की खिलाफत वो लम्बे समय से करते आ रहे थे स्वामी जी कहते थे कि असत्य के खिलाफ लड़ो और सत्य को ही ईश्वर मानो, ऐसे में जब मैंने उनसे पूछा कि न ही आपकी कोई जात, न ही धर्म और मज़हब है न आप ईश्वर को मानते तो हिंदुत्व के प्रतीक कहे जाने वाले इन भगवा वस्त्रों को पहनने का मकसद क्या है ?? उन्होंने बिना किसी क्रोध भाव के बताया कि
"वैसे तो चोटी, दाढ़ी, रंग, कपड़े आदि किसी धर्म के प्रतीक नहीं हो सकते लेकिन इस कपड़े का रंग न भगवा न ही नारंगी है ये आग कि लपटों का रंग है Color of flame & fire जो कि अग्निवेश कि आग है | साथी रहे इंद्रवेश ने मुझे इस नाम का सुझाव दिया था जब संन्यास लिया तो नाम के अनुरूप ये कपड़े भी धारण किए |"
बात बढ़ते बढ़ते भजन " रघु पति राघव राजा राम " और गांधी की धार्मिकता और अंधविश्वास की खिलाफत पर पहुँच गई |
बात दिल्ली चुनाव पर होनी थी लेकिन उनकी सरलता से मेरी सहजता अधिक हो गई थी जिसके कारण मेरी जिज्ञासा से तमाम वो प्रश्न निकल रहे थे जो कि मै साथ ले ही नहीं गया था |
स्वामी अग्निवेश भले ही सभी धर्मों के विरोधी हों, लेकिन इंसानियत और मानव अधिकारों के पुजारी जरूर थे | और जैसा कि लोकतान्त्रिक जीवन बिना धरना प्रदर्शन के अधूरा होता है तो ऐसे में स्वामी जी का प्रमुख दफ़्तर दिल्ली के जंतर-मंतर में ही था | कोई भी अपने आंदोलन में बुलाए वे जा कर भाषण दे आते थे, टीवी डिबेट का मंच हो या सड़क पर मजदूर आंदोलन का मंच स्वामी जी की भाषण शैली में कोई फर्क देखने को नहीं मिलता था | कई लोगों का कहना तो ऐसा था कि स्वामी जी का जंतर-मंतर स्थित दफ्तर उनका कम और वहाँ के तमाम आंदोलनकारियों का ज्यादा है |
वैसे तो संत, सत्ता का लोभी नहीं हो सकता और सत्ता का लोभी, संत नहीं हो सकता लेकिन स्वामी जी प्राध्यापक और हरयाणा सरकार में शिक्षा मंत्री भी रहे लेकिन जब फरीदाबाद में 10 मजदूरों को पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ा तो उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया था |
जो कि इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सत्ता की सियासी सानी में वे उस प्रकार शामिल नहीं थे जिस प्रकार आज के नेता होते हैं |
जल, जंगल, जमीन की लड़ाई हो या बंधुआ मजदूरों की लड़ाई स्वामी अग्निवेश अग्रणी थे | बंधुआ मजदूरी मुक्ति मोर्चा के माध्यम से वे अपने अंतिम दिनों में भी कई अभियान चला रहे थे | निजी रूप से उन्होंने मुझे बताया था कि बंधुआ मजदूरों के अधिकारों के हित में दिल्ली में हवा बनाने का काम करेंगे और "विचार मंथन" नाम से चर्चा का कार्यक्रम अपने यूट्यूब पर जल्द शुरू करने की बात भी बताई थी |
साक्षात्कार से पूर्व मैंने जब उनको स्वयं द्वारा सम्पादित कुछ पात्रिकाएं दिखाई थी तो तमाम शुभाशीष भरे शब्दों के साथ उनकी जिज्ञासा से भरी नज़रें भूले बिसरे क्रन्तिकारियों को समर्पित अगस्त 2018 के अंक के एक पेज पर जा कर ठहर सी गई | उस पेज पर नेता जी शुभाष चंद्र बोस की सेना की महिला विभाग की अध्यक्ष और झाँसी की रानी रजनीमेन्ट की लेफ्टिनेंट श्रीमति मानवती आर्या का ऐतिहासिक exclusive इंटरव्यू प्रकाशित था जो कि भगत सिंह के सहयोगी रहे अमर क्रांतिकारी डॉ गया प्रसाद कटियार के पुत्र श्री क्रांति कटियार जी द्वारा लिया गया था |
स्वामी जी ने कहा "आप सक्रियता से काम करते हैं ये इस बात का प्रमाण है कि मै इतनी बार कानपुर गया और मानवती आर्या जी के बारे में जान नहीं पाया, हाँ कानपुर में रहनी वाली शुभाषनी अली कि माता जी के बारे में जरूर सुना था और मेरे ही आर्य समाज की इस क्रांतिकारी महिला के बारे में आपसे जानकारी मिल पाई |"
एक समय देश में विधवा महिलाओं को अपने पति की अर्थी पर लिटा कर सतीप्रथा के नाम पर जिन्दा जला दिया जाता था, इस प्रथा को लेकर 1987 में स्वामी अग्निवेश ने आंदोलन छेड़ा और सारे देश में बहस छिड़ गई और सरकार को क़ानून लाना पड़ा था |
दिल्ली सरकार वर्तमान में आम आदमी पार्टी की है | इस पार्टी का जन्म जिस आंदोलन में हुए था उस आंदोलन का एक अहम हिस्सा स्वामी अग्निवेश भी थे | स्वामी अग्निवेश ने इंटरव्यू में कहा " अरविंद केजरीवाल जी ने मुझे बहुत नुकसान पहुंचाया, मै भी अन्ना, तू भी अन्ना सारा देश है अन्ना जैसे नारों ने एक जन आंदोलन को व्यक्तिवादी आंदोलन बना दिया जो कि उचित नहीं था" ,
दिल्ली चुनाव में शाहीन बाग़ एक अहम मुद्दा रहा और राजनीतिक टक्कर भाजपा Vs कांग्रेस के बीच दिख रही थी | लेकिन ऐसे में सवाल जब किसकी सरकार बनती दिख रही है पूछा तो मुस्कान के साथ उनका साफ उत्तर था कि सरकार वो बन रही है जो देश की पहली सरकार है जो काम के आधार पर वोट मांग रही है और मै मनीष जी अरविंद जी को साधुवाद देता हुँ कि वो इस काम को आगे बढ़ाएं |
उनके मन में एक दुख भी देखने को मिला जो कि ऑफ़ रिकॉर्ड उन्होंने बताया और काफ़ी हद तक उसको ऑन कैमरा मैंने लाने कि कोशिश की, उन्होंने कहा ~ "उप मुख्य मंत्री मनीष सिसोदिया हों या पोलिटिकल एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव ये लोग कोई भी मेरा फ़ोन नहीं उठाते हैं | अब योगेंद्र यादव के तो केवल पी•ए• से बात हो पाती आदि आदि |"
जो लोग अंत वर्ष में स्वामी जी से दूरी बना चुके थे, उन लोगों के बड़े-बड़े लेख जब स्वामी अग्निवेश की तारीफ में पढ़ता रहा हुँ तो स्वयं को अचंभित महसूस कर रहा हुँ | और देख पा रहा हुँ कि सामने से दिखने वाले कई बड़े व्यक्तित्व असल में उतने ही संकीर्ण और छोटे भी होते हैं |
कुछ लोगों की नज़र में स्वामी जी ज्ञानी, क्रांतिकारी व्यक्ति थे जिनकी राजनीतिक हत्या हो चुकी थी तो कुछ लोगों की नज़र में स्वामी जी एक कांग्रेस प्रेमी हिंदुत्व विरोधी व्यक्ति थे |
उनका बिग बॉस में जाना और संसद से अच्छी जगह बिगबॉस को बताना,
सैयद अली शाह गिलानी से मुलाक़ात हो या यासीन मालिक के साथ आंदोलन की वायरल फोटो या फिर अन्ना आंदोलन के समय कपिल सिब्बल से फोन कर कहना कि "यह अन्ना तो पागल हो रहा है"
अगला साक्षात्कार होता तो इन सब मुद्दों पर भी विस्तार से बात करता
लेकिन ये सब एक जीवन के तमाम पक्ष हैं और व्यक्ति माने न माने गलतियां करना तो इंसानी स्वभाव का हिस्सा ही है लेकिन जीवन में कोई भगवान नहीं और किसी व्यक्ति को भगवान की तरह बना देने की खिलाफत स्वामी जी स्वयं समय-समय पर किया करते थे |
सभी धर्मों को पाखंड कहने वाले स्वामी जी जब सिर्फ हिंदुत्व का मज़ाक़ बनाते तो कई स्तर पर निजी असहमति भी उनसे थी, कश्मीरी पंडितो को लेकर उन्होंने जो कहा मै उससे सहमत नहीं था | सुप्रीम कोर्ट ने भी उनको एक बार चेताया था कि आप जो भी कहें पर ध्यान रखें कि लोगों कि भावना न आहत हों |
लेकिन लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है और स्वयं स्वामी जी भी विचार मंथन के पक्षधर रहे थे |
मेरे विवेक और निजी मुलाक़ात के आधार पर स्वामी अग्निवेश में जो भी गुण या अवगुण हों लेकिन असल मायने में इंसानियत का धर्म यदि कोई होगा तो स्वामी अग्निवेश का जीवन एक अहम स्तम्भ के रुप में याद किया जाएगा |
स्वर्गीय गोपाल दास नीरज की रचना याद आती है कि "कोई तो ऐसा मज़हब भी बनाया जाए जिसमें इंसान को इंसान" बनाया जाए |
सत्ता द्वारा सशक्त इंसानी ताकतों ने 78 वर्षीय स्वामी अग्निवेश को झारखंड के पाकुर गांव में बुरी तरह मारा, उनकी पगड़ी उछाली फिर उसके एक माह भीतर ही दिल्ली में कुछ लोगों ने देशद्रोही के नारों के साथ स्वामी अग्निवेश पर जूते बरसाए |
इसी झारखंड के हमले में उन्हें इंटरनल चोट आई जिसमें उनका लिवर डैमेज हुआ और दो साल तक लिवर की बिमारी से जूझने के बाद अंतत: उनका निधन हो गया |
लेकिन उनकी मौत से कुछ माह पहले ही झारखंड के मुख्यमंत्री 'हेमंत सोरेन' को लिखे पत्र में स्वामी जी कहते हैं कि "पाकुर के हमले में चोटे आई थीं,मै 2 साल से इलाज करा रहे हुँ यदि सरकार दर्ज एफ•आई•आर• पर कार्यवाही नहीं करेगी तो यह सरकार के लिए ऐतिहासिक कलंक होगा"
कौन कितना बड़ा कलंक हुआ या होगा, पता नहीं | उनकी मृत्यु के अंतिम तीन दिन उनके निकट के मित्रों और सहयोगियों से बात होती रही ~ निधन की सूचना से 3 घण्टे पहले उन्हें जीवित बता कर Visinoner's International Network द्वारा Hero of Humanity Award दिया जाना भी मुझे निजी तौर पर सम्मान जनक नहीं लगा |
लेकिन उनके न रहने पर कुछ लोगों द्वारा उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग, न सिर्फ मेरे-आपके लिए लेकिन हिंदुत्व और हिंदुस्तान के लिए बेहद अफ़सोसजनक है |