Sunday, September 13, 2020

मुझको मेरी भाषा प्यारी


कोमल कोमल,झीना झीना
महका महका, आंचल तेरा
माता सी दुलरा देती है
पिता सी समझा देती है


सखा सहेली बन जाती है
जाने क्या क्या बतलाती है
कहाँ कहाँ की सैर कराती
जाने किस किस से मिलवाती


ज्ञान बखारे  कैसा कैसा
कभी सरल तो कभी विकट है
कभी तो ऊपर से बह जाये
कभी हाथ पकड़ समझाये


कुनबा इसका बहुत विशाल
नानी की नानी भी संग हैं
दादी की दादी हैं पीछे
मौसी बुआ सभी महान
बहनों की भी अपनी शान


जैसा बोलो वैसा लिख दो
न कोई साइलेंट न ही मुखर है
नहीं कहीं है कोई छुपाव
नहीं कहीं कोई भेदभाव


जैसा भाव बनाते जाओ
वैसे शब्द उठाते जाओ
कोश कभी न खाली होता
चाहें जितने लो शब्दार्थ


नया पुराना जो भी आये
सभी समाहित होते जाये
इसीलिए ये हमको भाती
मुझको मेरी भाषा प्यारी


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