Thursday, October 29, 2020

हरे कृष्णा धाम लाया है कानपुर के लिए दिवाली धमाका

सजेगी महफिल होगा जश्न , दीपावली के अवसर पर होगी ढ़ेर सारी खरीददारी , बच्चों का मनोरंजन तथा युवाओं और महिलाओं की मस्ती , देश में लंबे लॉकडाउन के बाद अब त्यौहारों का समय सभी के लिए खास है , एक ऐसा समय जिसमें रिश्तों का एहसास हो, मिठास हो, हर्ष-उल्लास हो |


ठीक इसी समय कानपुर वासियों के लिए कानपुर के आज़ाद नगर इलाके में बनी हरे कृष्णा सोसाइटी लाई है दिवाली धमाल , जहाँ एक तरफ सभी सुखसुविधाओं से पूर्ण , प्रदूषण मुक्त - शुद्ध वातावरण के लिए जाने जाने वाली इस सोसाइटी में दो बड़े पार्कों के साथ ही क्लब हाउस का निर्माण होना है तो वहीं योगा कोर्ट , जिम और पार्टी हाल आदि मुख्य आकर्षण का केंद्र होंगे |


कार्निवल में क्या है खास 


सोसाइटी प्रांगण में कार्यक्रम को आयोजित कर रहे अग्रवाल परिवार ने विशेष बात चीत में हमें बताया कि आने वाली 31 अक्टूबर और 1 नवम्बर को निशुल्क प्रवेश के साथ दिवाली कार्निवल आयोजित किया जा रहा है जिसमें 25 से अधिक विभिन्न व्यापारिक क्षेत्रों की दुकानों का स्टाल लगाया रहा है |



जिसमें बच्चों के लिए विशेषकर खिलौनों की दुकान , फोटो बूथ और प्लेईंग गेम्स के साथ ही साथ महिलाओं के लिए कटलरी , क्रॉकरी आदि के साथ ही होम डेकोर की दुकाने एक ही जगह पर उपलब्ध रहेंगी | तो वहीं फुटवेयर और गिफ्टिंग आइटम की दुकानों के साथ पेट पुजा का भी विशेष इंतेजाम किया गया है जिसमें ड्रिंक्स से लेकर ब्रेकरी उत्पाद और तमाम लज़ीज़ व्यंजनो से लुभाने के लिए कानपुर शहर के तमाम प्रतिष्ठित रेस्टोरेन्ट अपनी सेवा देने के लिए पहुँच रहे हैं |


क्या सोशल डिस्टेन्सिंग का है ख्याल ?


कोविड प्रोटोकॉल के तहत सोशल डिस्टेन्सिंग को ध्यान में रखते हुए सभी दुकानों का साइज़ बड़ा किया गया है ताकि जनता को भीड़ का सामना न करना पड़े , इसी के साथ ही प्रवेश द्वार पर थर्मल फीवर टेस्टिंग और सेनीटाइजेशन की उपयुक्त व्यवस्था का विशेष ध्यान रक्खा जाएगा | 


अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें /



Tuesday, October 27, 2020

महिलाएं हर कार्य करने में सक्षम है: डॉ कामायनी शर्मा

मुसुकुराये कानपुर आज सामाजिक रूप से विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सशक्त भागीदारी सुनिश्चित कर रहा।
कोरोना से लेकर योग तक और अब उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नवरात्रि के पावन अवसर पर उद्घाटित मिशन शक्ति योजना के प्रचार प्रसार में महती भूमिका अदा कर रहा है। इसी क्रम आज मुस्कयराये कानपुर ने
साहू जी महाराज वि0वि0 के राष्ट्रीय सेवा योजना प्रभारी एवं मुसकराये कानपुर के सिटी एम्बेसडर डॉ सिधांशू राय के निर्देशन में मिशन शक्ति विषय पर वेबिनार का आयोजन किया गया।



प्रमुख वक्ता डॉ कामायनी शर्मा ने वेबिनार को प्रारंभ करते हुए मिशन शक्ति योजना की सम्पूर्ण जानकारी देते हुये कहा कि महिला चाहे तो सब कुछ कर सकती है, बस उसे एक दूसरे का साथ देना है, वही डॉ मंजू जैन ने महिलाओं को सशक्त करने के लिए पारिवारिक सहयोग की अपील की। सुरभि द्विवेदी ने शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य रूप से पाठ्यक्रम में शामिल करने पर जोर दिया। डॉ परमजीत कौर ने महिला के उन्मुखीकरण पर बल दिया। डॉ अनुराग पाण्डेय ने कहा कि महिला स्वयं शक्तिपूर्ण है आज समाज को चाहिए इनकी शक्ति को और सशक्त करें।
वेबिनार का समापन करते हुए डॉ सिधांशू राय ने समाज और राष्ट्र में महिला की भूमिका का वर्णन किया।
इस दौरान डॉ अपूर्वा वशिष्ठ, डॉ रचना पांडेय ,डॉ आशु जैन,श्रीमती पूजा गुप्ता,श्रीमती कविता चतुर्वेदी, स्वाती श्रीवास्तव और श्रीमती मीना पांडेय आदि ने सहभागिता की।


Sunday, October 25, 2020

गणेश शंकर विद्यार्थी: जीवन, कर्म और लेखन

लेखक परिचय : डॉ राकेश शुक्ल (1967) विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म महाविद्यालय , कानपुर के हिन्दी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं | प्रो. शुक्ल के 100 से अधिक शोध पत्र और समीक्षा आलेख राष्ट्रीय शोध पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं तो वहीं 24 शोध पत्र पुस्तकों का हिस्सा हैं तथा उन्होंने 16 विद्यार्थियों का शोध निर्देशन तथा 21 विद्यार्थियों के लघु शोध का निर्देशन भी किया है | उन्होंने दर्जनों विषयों पर आकाशवाणी लखनऊ से अपने विचार रखने के साथ ही निरंतर तमाम पत्र-पत्रिकाओं के साथ न सिर्फ लेखन बल्कि सम्पादन का कार्य भी किया तथा तमाम पुस्तकों की समीक्षा और भूमिकाएँ लिखीं |


राष्ट्रीय संगोष्ठियों में प्रखर व्याख्यान के लिए जाने जाने वाले  प्रो. राकेश ने "जलता रहे दिया" (कविता संग्रह), "उनकी सृष्टि अपनी दृष्टि" जैसी तमाम पुस्तकें लिखीं जो कि पाठकों के बीच खूब लोकप्रिय हुईं | शिक्षण कार्य में सक्रिय प्रो. राकेश शुक्ल विभिन्न विश्वविद्यालयों में पी-एच०डी० के परीक्षक तथा विषय विशेषज्ञ एवं चयन समिति का हिस्सा हैं | डॉ शुक्ल को अब तक 'इनोवेशन लीडरशिप एवार्ड' (पं० बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी द्वारा) , 'साहित्य सेवा सम्मान' (भारत के राष्ट्रपति, तत्कालीन राज्यपाल बिहार- श्री रामनाथ कोविन्द द्वारा) तथा जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय युवा केंद्र के "साहित्य श्री सम्मान" (गुजरात के राज्यपाल श्री ओपी कोहली द्वारा) जैसे तमाम सम्मानों द्वारा नवाज़ा जा चुका है | 


 



महान स्वातंत्र्य सेनानी, जुझारू पत्रकार, निर्भीक लेखक और समाजसेवी गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन, कर्म और लेखन अपने समय में राजनीतिक, सामाजिक जीवन को दिशा देने के लिए जितना उपयोगी था, उतना ही आज भी है। वे अपने समय के न सिर्फ स्वातंत्र्य वीर थे; वरन् पत्रकारिता में जिस ईमानदारी, त्याग, धैर्य और बलिदान की जरूरत थी, उसकी मिसाल बन गए थे। स्वातंत्र्य आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के अतिरिक्त अंग्रेज अधिकारियों एवं देशी नरेशों की निरंकुशता, उनके शोषण एवं दमनकारी नीतियों के विरुद्ध विद्यार्थी जी की लेखनी ने बड़े जन-जागरण का कार्य किया था। समाज के निर्धनों, किसानों, मजदूरों की समस्याओं को उजागर करने तथा सामाजिक जड़ताओं, अंधपरम्पराओं एवं कुरीतियों के विरुद्ध सामाजिक जागृति भी उनकी पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य रहा है।


बाल विद्यार्थी के रुझान का रुख और प्रथम गुरु 


 26 अक्टूबर 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले (ननिहाल) में जन्में विद्यार्थी जी के पूर्वज जौनपुर के मूल निवासी थे। 1857 के प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन के बाद उनके प्रपितामह बाबू देवी प्रसाद हथगाँव (फतेहपुर) आ गए थे। इनके पितामह बाबू वंश गोपाल आबकारी इंस्पेक्टर थे और पिता बाबू जयनारायण जी उर्दू, फारसी तथा दर्शन के विद्वान थे। धार्मिक विचारों से युक्त उनकी माँ श्रीमती गोमती देवी श्रीरामचरित मानस का नियमित पाठ करती थीं। उनके पास बोध कथाओं का अपरिमित भण्डार था जिन्हें वे बालक गणेश को रोज सुनाया करती थीं। जब विद्यार्थी जी मात्र पाँच वर्ष के थे; उनके पिता ग्वालियर रियासत में शिक्षक नियुक्त हुए, अतः उनकी प्रारम्भिक शिक्षा विदिशा एवं साँची के सांस्कृतिक वातावरण में हुई। सन् 1905 ई0 में उन्होंने अंग्रेजी मिडिल परीक्षा पास की। आगे की पढ़ाई के लिए उनके पिता ने अपने बड़े पुत्र शिवव्रत नारायण के पास कानपुर भेज दिया। शिवव्रत नारायण आर्य समाज से जुड़े हुए थे, जिनकी प्रेरणा से विद्यार्थी जी अपने समय की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं के पाठक बन चुके थे। कुछ दिन बड़े भाई तथा कुछ दिन पिता के पास रहते हुए उन्होंने व्यक्तिगत परीक्षा देकर एण्ट्रेन्स किया, तथा आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें कायस्थ पाठशाला इलाहाबाद भेज दिया गया। इलाहाबाद प्रवास उनके जीवन का ऐसा मोड़ था, जो उनके व्यक्तित्व की निर्मिति का आधार बना। यहाँ उनकी एफ0ए0 की औपचारिक पढ़ाई तो पीछे रह गई; जबकि राजनीतिक, सामाजिक और पत्रकारिता की गतिविधियों में उनका मन अधिक लगने लगा। लेखन के बीज तो पहले ही अंकुरित हो चुके थे, जब मिडिल की पढ़ाई के दौरान उन्होंने ‘हमारी आत्मोत्सर्गता’ नामक सुदीर्घ आलेख लिखा था। इलाहाबाद में वे ‘कर्मयोगी’ पत्र से इतना प्रभावित हुए कि वह पत्र उनकी किताबों के बैग में रहता था, जिसे स्कूल या घर, जहाँ भी समय मिलता तो पढ़ते। इसी दौरान वे इस पत्र के सम्पादक पं0 सुन्दरलाल के सम्पर्क में आये,और उनके आग्रह पर सम्पादन में सहयोग भी करने लगे। इस प्रकार पं0 सुन्दरलाल पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके प्रारम्भिक गुरु बने। उनके संपादन में प्रकाशित उर्दू के एक पत्र ‘स्वराज्य’ में भी विद्यार्थी जी की टिप्पणियाँ प्रकाशित होती थीं। यह पत्र राष्ट्रीय चेतना के उग्र आलेख प्रकाशित करने वाला एक ऐसा पत्र था, जो मात्र एक वर्ष ही चल पाया और अंग्रेज सरकार का कोपभाजन बनते हुए एक के बाद एक इसके आठ सम्पादकों को जेल जाना पड़ा था।



                                             विद्यार्थी जी का इलाहाबाद प्रवास ज्यादा दिन नहीं रहा। उन्हें स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के कारण कानपुर आना पड़ा। अतः शिक्षा और पत्रकारिता में व्यवधान पड़ा। कानपुर आकर छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं, ट्यूशन पढ़ाए और पी0पी0एन0 हाईस्कूल में शिक्षण कार्य किया, पर कहीं भी उनका मन नहीं लगा। इन्हीं दिनो हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के शिखर पुरुष आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को ‘सरस्वती’ के लिए एक युवा, उत्साही सहयोगी की आवश्यकता थी, अतः मित्र काशीनाथ द्विवेदी के आग्रह पर 02 नवम्बर 1911 को वे ‘सरस्वती’ के सहायक सम्पादक नियुक्त हुए और शीघ्र ही आचार्य द्विवेदी के स्नेहभाजक बन गए। उनका पहला लेख ‘आत्मोसर्ग’ ‘सरस्वती’ में ही प्रकाशित हुआ था। यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी, जबकि विद्यार्थी जी पत्रकारिता के माध्यम से 'स्वातंत्र्य समर' में भी अपना योगदान देना चाहते थे, अतः दिसम्बर 1912 में वे पं0 मदन मोहन मालवीय के अखबार ‘अभ्युदय’ में चले गए। यह पत्र घाटे में चल रहा था, पर विद्यार्थी जी मेहनत ओर उनकी विचारोत्तेजक टिप्पणियों की बदौलत उसकी पाठक संख्या बढ़ती चली गईऔर अखबार लोकप्रिय हो गया। यहाँ भी उन्होंने लगभग एक वर्ष योगदान दिया और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के कारण पुनः कानपुर आना पड़ा। 


'प्रताप' की स्थापना


विद्यार्थी जी का सपना तो कुछ और ही था। उनका सपना एक ऐसे पत्र के प्रकाशन का था, जिसके माध्यम से जन-जन में स्वाधीनता की अलख जगाई जा सके और मानवता का कल्याण भी किया जा सके। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 9 नवम्बर 1913 को कानपुर से हिन्दी साप्ताहिक पत्र ’प्रताप’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। पीली कोठी नामक किराये के भवन में चार महानुभावों ने मिलकर ‘प्रताप’ की नींव रखी। सभी ने एक सौ रूपये का सहयोग किया। इस प्रकार कुल चार सौ रूपये की पूँजी से अखबार शुरु हुआ। सम्पादक गणेशशंकर विद्यार्थी, मैनेजर नारायण प्रसाद अरोड़ा, मुद्रक-प्रकाशक शिवनारायण मिश्र वैद्य और कोरोनेशन प्रेस के मालिक यशोदानन्दन।



 आजादी के प्रतीक महापुरुष महाराणा प्रताप के नाम पर प्रकाशित इस पत्र का उद्देश्य भी स्पष्ट था- पूर्ण स्वराज्य। मुख पृष्ठ की उद्देश्यपरक काव्य पंक्तियाँ (मोटो-लाइने) थीं, ‘‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है/वह नर नहीं, नर-पशु निरा है, और मृतक समान है।’’ ये पंक्तियाँ विद्यार्थी जी के अनुरोध पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखी थीं। प्रवेशांक में ही विद्यार्थी जी ने ‘प्रताप की नीति’ शीर्षक से सम्पादकीय-अग्रलेख लिखा था, जिसमें इस पत्र के उद्देश्य पर तो प्रकाश पड़ता ही है, पत्रकारिता के आदर्शों और मूल्यों पर भी उनके मूल्यवान विचारों से हम अवगत होते हैं। ‘‘आज अपने हृदय में नयी-नयी आशाओं को धारण करके और अपने उद्देश्य पर पूर्ण विश्वास रखकर ‘प्रताप’ कर्म क्षेत्र में आता है। समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है, और इस उद्देश्य की प्राप्ति का एक बहुत बड़ा और जरूरी साधन हम भारत वर्ष की उन्नति को समझते हैं। उन्नति से हमारा अभिप्राय देश की कृषि, व्यापार, विद्या, कला, वैभव, मान-बल, सदाचार और सच्चरित्रता की वृद्धि से है। भारत को इस उन्नतावस्था तक पहुँचाने के लिए असंख्य उद्योगों, कार्यों और क्रियाओं की आवश्यकता है। इसमें मुख्यतः राष्ट्रीय एकता, सुव्यवस्थित, सार्वजनिक और सर्वांगीण शिक्षा का प्रचार, प्रजा का हित, भला करने वाली सुप्रबन्ध और सुशासन की शुद्ध नीति का राज-कार्यों में प्रयोग, सामाजिक कुरीतियों और अत्याचारों का निवारण और अत्मावलम्बन और आत्मशासन में दृढ़ निष्ठा है। हम इन्हीं सिद्धान्तों और साधनों को अपनी लेखनी का लक्ष्य बनाएँगे।’’ विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता के जिन मापदण्डों की उस समय स्थापना की थी, वे एक ज्योति-स्तम्भ के रूप में आज भी हमारा पथ प्रदर्शन करते हैं। उन्होंने लिखा था कि, ‘‘किसी की प्रशंसा या अप्रशंसा किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता, किसी की घुड़की या धमकी हमें अपने मार्ग से विचलित न कर सकेगी। साम्प्रदायिक या व्यक्तिगत झगड़ों में ‘प्रताप’ सदा अलग रहने की कोशिश करेगा। उसका जन्म किसी सभा, संस्था, व्यक्ति या मत के पालन-पोषण, रक्षा तथा विरोध के लिए नहीं हुआ है, किन्तु उसका मत स्वातंत्र्य विचार और उसका धर्म सत्य होगा। हम जानते हैं कि इससे हमें बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, और इसके लिए बड़े भारी साहस और आलम्बन की आवश्यकता है।"
 और यही हुआ। ‘प्रताप’ को आने वाले समय में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। प्रारम्भिक कठिनाई तो यही हुई कि सोलह अंकों तक पत्र निरन्तर घाटे में चला। छपाई का भुगतान न होने के कारण यशोदानन्दन जी प्रेस से अलग हो गए। नारायण प्रसाद अरोड़ा अपना अलग अखबार निकालने लगे। बावजूद इसके बिना विचलित हुए शिवनारायण जी और विद्यार्थी जी अखबार निकालते रहे। काशीनाथ द्विवेदी , कमलापत सिंहानियाँ तथा सेठ राम गोपाल की मदद से न सिर्फ कर्ज चुकाया गया, वरन् खुद के प्रेस की व्यवस्था भी कर ली गई। यह पत्र अब कानपुर के फीलखाना से प्रकाशित होने लगा था। 


'प्रताप' के महाप्रताप की कहानी 


24 अप्रैल 1915 को रात के अँधेरे में प्रताप प्रेस, विद्यार्थी जी एवं शिवनारायण मिश्र के आवास पर पुलिस ने छापेमारी की। उन्हें जब कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली तो ग्राहकों की सूची, सदस्यता संबंधी रजिस्टर तथा कुछ पुस्तकें उठा ले गई। इससे ग्राहकों में भय उत्पन्न हुआ, अनेक लोगों ने पत्र लेना बंद कर दिया, जिससे प्रताप प्रेस को घाटा उठाना पड़ा, पर विद्यार्थी जी विचलित नहीं हुए और दृढ़तापूर्वक पत्र निकालते रहे। उन्हीं दिनों 1916 ई0 में लक्ष्मण सिंह चौहान (सुभद्रा कुमारी चौहान के पति) का नाटक ‘कुलीप्रथा’ प्रताप प्रेस से प्रकाशित हुआ था, अंग्रेज सरकार ने इसे तुरन्त जब्त कर लिया, और एक हजार रूपये की जमानत माँगी। बचाव के सारे प्रयास विफल होने पर अन्ततः उक्त धनराशि जमा की गई।



 28 से 31 दिसम्बर 1916 को लखनऊ में अखिल भारतीय काँग्रेस का खुला अधिवेशन आयोजित हुआ था, जिसमें महात्मा गाँधी की उपस्थिति रही। उसी दौरान 29 दिसम्बर 1916 को विद्यार्थी जी के संयोजन में आयोजित ‘अखिल भारतीय भाषा एवं लिपि सम्मेलन’ की अध्यक्षता भी गाँधी जी ने की तथा अपना महत्वपूर्ण उद्बोधन दिया। विद्यार्थी जी के आग्रह पर वे अधिवेशन के बाद कानपुर भी आये थे, जहाँ बालगंगाधर तिलक तथा मि0 पोलक के साथ वे प्रताप प्रेस में ही ठहरे थे। अनेक विद्वानों का मानना है कि चम्पारण में नील की खेती करने को विवश पीड़ित, प्रताड़ित किसानों के प्रतिनिधि राजकुमार शुक्ल की भेंट गाँधी जी से कानपुर में विद्यार्थी जी ने ही कराई थी, फलस्वरूप चम्पारण आन्दोलन हुआ, जिसके माध्यम से भारत में सर्वप्रथम गाँधी जी के नायकत्व ने उभार पाया। इतना ही नहीं विद्यार्थी जी ने नील की खेती प्रकरण पर अंग्रेज जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ ‘प्रताप’ में निरन्तर तेज-तर्रार खबरें प्रकाशित कीं। उन्होंने वहाँ अपने संवाददाता भेजकर विस्तृत रपटें तैयार कराईं, जिससे अंग्रेज सरकार नाराज हो गई और अनेकशः ‘प्रताप’ प्रेस को नोटिस भेजकर कड़ी चेतावनी दी गई पर विद्यार्थी जी भला झुकने वाले कहाँ थे। वे निर्धन किसानों एवं कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की समस्याओं एवं उनकी दुरवस्था को न सिर्फ ‘प्रताप’ में प्रकाशित करते रहे; वरन् उन्हें संगठित करने के प्रयास भी किये। सन् 1916 से 1919 ई0 के दौरान कानपुर में पच्चीस हजार से अधिक मजदूरों के संगठन ‘मजदूर सभा’ का नेतृत्व किया तथा उनके पत्र ‘मजदूर’ के प्रकाशन में भी सहयोग किया। उनके द्वारा मजदूरों का नेतृत्व किये जाने से कानपुर का अंग्रेज मजिस्ट्रेट इतना नाराज था कि उसने प्रताप प्रेस के ट्रस्ट को मान्यता देने के लिए निर्धारित जमानत राशि एक हजार को मनमाने ढंग से बढ़ाकर दो हजार कर दिया था। उसकी दलील थी कि इस ट्रस्ट के एक सदस्य गणेश शंकर विद्यार्थी हैं, जिन्होंने मजदूरों को सरकार के खिलाफ भड़काने का कार्य किया है।


22 अप्रैल 1918 को ‘प्रताप’ में नानक सिंह ‘हमदम’ की क्रान्तिकारी कविता ‘सौदा-ए-वतन’ प्रकाशित करने पर ‘प्रताप’ पर राजद्रोह की कार्यवाही की गई और एक हजार रूपये की जमानत राशि जब्त कर ली गई। आर्थिक संकट के कारण उक्त राशि की व्यवस्था न हो सकी अतः लगभग एक महीने तक पत्र का प्रकाशन स्थगित रहा। 8 जुलाई 1915 के अंक में जब सरकार द्वारा ‘प्रताप’ के उत्पीड़न की खबरें प्रकाशित हुईं तो उसके पाठकों एवं व्यवसायियों ने आठ हजार रूपये का सहयोग भेजा। इससे विद्यार्थी जी में नई आशा एवं उत्साह का संचार हुआ। वे एक नैतिक आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति थे। अतः एक ट्रस्ट का गठन कर उक्त धनराशि को उसके खाते में जमा कर दिया। इस ट्रस्ट में विद्यार्थी जी ने स्वयं और शिवनारायण मिश्र के अतिरिक्त मैथिलीशरण गुप्त, डाॅ0 जवाहर लाल रोहतगी तथा लाला फूलचंद को भी शामिल किया।


मुकदमों का दौर


23 नवम्बर 1920 को यह पत्र दैनिक हो गया था। जैसा कि प्रारम्भ से ही ‘प्रताप’ का उद्देश्य था कि वह न सिर्फ अंग्रेजों की निरंकुशता और उनकी लूट को उजागर कर रहा था वरन् देशी नरेशों, सामंतो, जमींदारों और भ्रष्ट अधिकारियों के द्वारा आम आदमी के उत्पीड़न, रिश्वत और भ्रष्टाचार को भी बेनकाब कर रहा था। इसी कड़ी में रायबरेली के जमींदार वीरपाल सिंह के अत्याचारों को भी इस पत्र ने प्रमुखता से छापा। जिसने गरीब किसानों पर गोली चलवाई थी। कारण, कुछ किसानों ने उसके द्वारा किये जा रहे अपने शोषण का विरोध किया था। इससे नाराज होकर उसने ‘प्रताप’ पर मानहानि का दावा ठोंक दिया। जैसा कि हम जानते हैं, उन दिनों अंग्रेज अधिकारी, न्यायाधिकारी और सामंतों, जमींदारों में एक प्रकार का गठजोड़ हुआ करता था।



न्यायपालिका अंग्रेज सरकार के इशारों पर नाचती थी, फलस्वरूप विद्यार्थी जी और शिवनारायण मिश्र पर दस-दस हजार रूपये की जमानत तथा पाँच-पाँच हजार रूपये का मुचलका, कुल पन्द्रह-पन्द्रह हजार रूपये जमा करने तथा छह-छह महीने की कैद की सजा सुनाई गई, जबकि इस केस में पं0 मोतीलाल नेहरु, जवाहर लाल नेहरु सहित लगभग पचास से अधिक राजनेताओं और अधिवक्ताओं ने पैरवी की थी। उस दौरान मुकदमों की पैरवी करने तथा जेल जाने के कारण ‘प्रताप’ का सम्पादन क्रमशः कृष्णदत्त पालीवाल, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ तथा माखन लाल चतुर्वेदी ने बखूबी निभाया। इस मामले में विद्यार्थी जी को कानपुर और लखनऊ की जेलों में लगभग आठ महीने व्यतीत करने पड़े।


रायबरेली केस से ‘प्रताप’ अभी उबर नहीं पाया था कि 1926 ई0 में मैनपुरी मानहानि केस का सामना करना पड़ा। शिकोहाबाद के एक भ्रष्ट थानेदार की घूसखोरी की खबर छापने पर उसने भी मानहानि का मुकदमा कर दिया था। सम्पादक गणेशशंकर विद्यार्थी तथा उन दिनों के मुद्रक-प्रकाशक सुरेन्द्र शर्मा को यह मुकदमा लड़ना पड़ा और दोनों को चार-चार सौ रुपये का जुर्माना अथवा छह-छह महीने की सजा हुई। विद्यार्थी जी ने जुर्माना न देकर जेल जाने का सहर्ष निर्णय लिया लेकिन मैनपुरी-आगरा क्षेत्र के ‘प्रताप’ के पाठकों ने चैबीस घण्टे में ही उक्त धनराशि अदा करके उन्हें जेल से मुक्त करा लिया। बाद में हाईकोर्ट से वे बाइज्जत बरी हुए। कोर्ट ने जमानत राशि वापस करने का निर्णय सुनाया और दरोगा के खिलाफ जाँच की कार्यवाही का निर्णय भी।


‘प्रताप’ पर एक और मुकदमा सन् 1928 में नरसिंहपुर मानहानि केस भी चला। वहाँ के ढोंगी महन्त और उसके शिष्यों के पाखण्ड और भ्रष्ट कारनामों का भण्डाफोड़ ‘प्रताप’ ने किया था। बाद में उन पाखण्डियों ने और अधिक फँसने के डर से केस वापस ले लिया। पत्रकारिता और स्वातंत्र्य-आंदोलन के कारण विद्यार्थी जी को पाँच बार जेल की यात्रा करनी पड़ी थी।
 ‘प्रताप’ की लोकप्रियता अपने समय में चरम पर थी। यह एक ऐसा पत्र था जिसमें समाज के हर वर्ग के दुःख और उनकी तकलीफों को वाणी मिलती थी। उनसे संघर्ष करने की ताकत और अन्यायी, अत्याचारी का सशक्त प्रतिकार करने की सामर्थ्य भी। ‘प्रताप’ ने मजदूरों के हक में आवाज उठाने के साथ-साथ किसानों को संगठित करने के लिए भी समय-समय पर अभियान चलाया। सन् 1921 में प्रकाशित अवध के किसान आन्दोलन की खबरों की आँच इंग्लैण्ड की सरकार तक पहुँच गई थी, उसने लंदन स्थित भारतीय सचिवालय के माध्यम से भारत के तत्कालीन वायसराय से रिपोर्ट माँगी, जिससे संयुक्त प्रान्त का तत्कालीन गवर्नर हरकोर्ट बटलर चिंतित हो गया था।


‘प्रताप’ में समय-समय पर अनेक रियासतों के निरंकुश और अत्याचारी राजाओं, सामंतों के विरुद्ध भी विस्तृत खबरें, रपटें और आलेख प्रकाशित होते रहे, जिससे वे विद्यार्थी जी को अपना शत्रु समझने लगे थे। इन रियासतों में राजस्थान की बिजौलिया और भरतपुर तथा मध्यप्रदेश की ग्वालियर रियासतें प्रमुख थीं। नागपुर के झंडा सत्याग्रह की खबरें भी ‘प्रताप’ में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थीं।


नया रुख , नया मोड़, क्रांतिकारियों का जोश और विद्यार्थी की शहादत 


प्रवेशांक के सोलह पृष्ठों से प्रारम्भ होने वाला यह पत्र सन् 1930 ई0 तक चालीस पृष्ठों का हो गया था। वार्षिक सदस्यता राशि स्थानीय पाठकों के लिए मात्र 3 रूपये तथा बाहरी पाठकों के लिए 3.50/- हुआ करती थी। ‘प्रताप’ के अनेक अविस्मरणीय विशेषांक भी प्रकाशित हुए। प्रकाशन के एक वर्ष पूरे होने पर सन् 1914 में उसका विशेषांक ‘राष्ट्रीय अंक’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। तीसरी वर्षगाँठ पर एक और ‘राष्ट्रीय अंक’ प्रकाशित हुआ। पाँचवी वर्षगाँठ 1918 में ‘स्वराज्य’ शीर्षक से एक और महत्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित हुआ था, जिसमें अपने समय के शीर्षस्थ विचारकों, साहित्यकारों की राष्ट्रीय चेतना की रचनाएँ प्रकाशित हुई थीं।


 प्रताप कार्यालय राष्ट्रवादियों और क्रान्तिकारियों के साथ साहित्यकारों का भी केन्द्र था। रामप्रसाद ‘विस्मिल’, अश्फाक उल्ला खाँ, ठा0 रोशन सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, शिववर्मा तथा छैल बिहारी दीक्षित ‘कण्टक’ आदि का उन्होंने समय-समय पर सहयोग और मार्गदर्शन किया था। सरदार भगत सिंह तो अपनी फरारी के दिनों में वेश बदलकर प्रताप कार्यालय में रहे थे। उन्होंने बलवंत सिंह, छद्मनाम से ‘प्रताप’ में लेख भी लिखे। विद्यार्थी जी ने श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ से झण्डागीत की रचना कराई थी, जो उन दिनों आजादी का तराना बन गया था।



 हम जानते हैं कि विद्यार्थी जी की पत्रकारिता और लेखन का मूल उद्देश्य पूर्ण स्वराज्य और सुराज था, जिसकी वजह से उन्होंने ‘सरस्वती’ जैसी शीर्षस्थ साहित्यिक पत्रिका के सह सम्पादक के दायित्व को छोड़ दिया था, पर साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीयता की अलख जगाना वे अच्छी तरह जानते थे। इसका श्रेय उन्हें ‘प्रभा’ पत्रिका के माध्यम से मिला। ‘प्रभा’ का प्रकाशन, सम्पादन 1913 ई0 में खण्डवा से विख्यात कवि, साहित्यकार, माखनलाल चतुर्वेदी ने प्रारम्भ किया था किन्तु अपरिहार्य कारणों से सन् 1916 ई0 में इसका प्रकाशन स्थगित हो गया तब विद्यार्थी जी ने आग्रह करके इसे प्रताप प्रेस से छापना प्रारम्भ किया। सन् 1920 से 1925 ई0 तक यह प्रताप प्रेस से प्रकाशित होती रही। यह मूलतः राजनीतिक, सामाजिक पत्रिका थी पर उसमें साहित्य की विविध विधाओं में विविध विषयों पर अपने समय के शीर्षस्थ साहित्यकारों की उच्चतम कोटि की रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। उसमें प्रकाशित राष्ट्रीय चेतना की अनेक कविताएँ स्वातंत्र्य सेनानियों, क्रान्तिकारियों के कण्ठ का हार बनीं। माखनलाल चतुर्वेदी का प्रसिद्ध गीत ‘पुष्प की अभिलाषा’ सर्वप्रथम ‘प्रभा’ में ही प्रकाशित हुआ था। मुंशी प्रेमचंद, पं0 विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, निराला जी, सनेही जी, सम्पूर्णानन्द, चन्द्रशेखर शास्त्री, भगवतीप्रसाद वाजपेयी, इलाचंद्र जोशी, चतुरसेन शास्त्री, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, रायकृष्णदास तथा चण्डी प्रसाद जैसे अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार ‘प्रभा’ के नियमित लेखक थे। विद्यार्थी जी भी ‘एक बैठा-ठाला ग्रेजुएट’ छद्म नाम से ‘प्रभा’ में सामाजिक व्यंग लिखा करते थे। वे अन्य पत्रों में भी लगभग आधा दर्जन छद्म नामों से लिखा करते थे। 


 विद्यार्थी जी के सान्निध्य और मार्गदर्शन में अनेक महानुभावों ने पत्रकारिता और सम्पादन की कला सीखी तथा कालान्तर में यश और कीर्ति पाई। इनमें बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, कृष्यादत्र पालीवाल, दशरथ प्रसाद द्विवेदी, श्रीराम शर्मा, देवव्रत शास्त्री, रमाशंकर अवस्थी, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य, राम दुलारे त्रिवेदी, सुरेन्द्र शर्मा, श्रीनिवास बालाजी हार्डीकर, विष्णुदत्त शुक्ल तथा प्रकाश नारायण शिरोमणि के नाम प्रमुख हैं।


 मात्र चालीस वर्ष की आयु पाने वाले विद्यार्थी जी जीते-जी किंवदन्ती बन गए थे। जिस आयु में आज के युवा अपने जीवन की दिशा नहीं तय कर पाते हैं, उन्होंने पूरे समाज और राष्ट्र की दिशा को तय करने का कार्य किया था। अहर्निश राष्ट्र सेवा को समर्पित एक ऐसा व्यक्ति जो पत्रकारिता, स्वातंत्र्य समर, समाज सेवा, सामाजिक, राजनीतिक संगठन और लेखन-सम्पादन में एक साथ सक्रिय रहा हो। इन सबके साथ जिसने कोर्ट-कचहरी और जेल जीवन का भी सहर्ष वरण किया हो, उसकी विलक्षण प्रतिभा, अदम्य साहस और अटूट लगन को दर्शाता है। सक्रिय राजनीति में रहते हुए वे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे थे, पर राजनीति के दाँव-पेंच और स्वार्थी राजनीतिज्ञों के मुखर आलोचक थे।



 सामाजिक सद्भाव और साम्प्रदायिक एकता के लिए वे निरन्तर प्रयत्नशील रहे। इस हेतु उनकी लेखनी भी सक्रिय रही। यहाँ तक कि उनका बलिदान भी समाज को संदेश देकर गया। 23 मार्च 1931 को सरदार भगत सिंह तथा उनके साथियों को लाहौर षड़यंत्र के केस में फाँसी की सजा दी गई थी। 24 मार्च को कानपुर में अंग्रेजों द्वारा सुनियोजित दंगे भड़काए गए। उन्हीं दंगों में कानपुर के चौबेगोला स्थान पर विद्यार्थी जी ने अपनी आहुति दी। एक-दूसरे के खून के प्यासे हिन्दू-मुसलमान दंगाइयों को जैसे ही विद्यार्थी जी की शहादत के बारे में पता चला, वैसे ही दंगे रुक गए। दोनों ओर के दंगाइयों ने घोर प्रायश्चित किया। वस्तुतः वे दोनो वर्गों के मसीहा थे।



गणेशशंकर विद्यार्थी मूलतः पत्रकार थे पर पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके अग्रलेख (सम्पादकीय लेख) अथवा लेख गम्भीर मनन-चिन्तन और भाषा-शैली के वैशिष्ट्य में साहित्यिक कोटि के हैं। वैसे तो ये हिन्दी में वैचारिक निबन्धों की कोटि में माने जाएँगे पर इनमें उनका व्यक्तित्व भी प्रतिबिम्बित है। उनका कोई भी लेखन निरुद्देश्य नहीं है। सभी किसी न किसी रूप में समाज में राष्ट्रीय या सामाजिक जागरण का मंत्र फूँकते हैं।


प्रताप प्रेस की जर्जर स्थिति एवं सामाजिक कोशिशें 


दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि प्रताप प्रेस के जिस  भवन ने सारे देश में वैचारिक , राजनीतिक क्रांति की अलख जगाई , वह आज अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहा है । कानपुर के फीलखाना क्षेत्र में स्थित इस जर्जर इमारत को एक स्मारक के रूप में संरक्षित करने के लिये किसी भी सरकार ने पहल नहीं की, और न ही अभी तक इस हेतु कानपुर की सामाजिक संस्थाओं या राजनीतिक व्यक्तियों ने कोई गम्भीर पहल की ।
               इस भवन तक बहुत मुश्किल से पहुँचा जा सकता है । अत्यंत जीर्ण-शीर्ण भवन में किराएदारों का कब्जा है , केवल एक कमरे में कुछ पुरानी मशीनें रखी हैं , जिस पर ताला लगा हुआ है और चावी का अता-पता नहीं ।


  2012 में कानपुर के अनेक साहित्य-सेवियों और पत्रकारों ने 'प्रताप शताब्दी समारोह समिति' के माध्यम से पूरे एक वर्ष तक विद्यार्थी जी और 'प्रताप' की स्मृति में अनेक कार्यक्रम , संगोष्ठियाँ आदि आयोजित की थी । उस दौरान केंद्र और प्रदेश सरकार से अनेक माँगे भी की गई थीं । यथा – कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना , उनके जन्मदिन या 'प्रताप' की स्थापना दिवस को राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस घोषित करना तथा प्रताप प्रेस एवं विद्यार्थी जी के शहादत स्थल चौबेगोला को स्मारक के रूप में संरक्षित करना आदि , पर सरकार की ओर से उस पर कोई भी सुनवाई नहीं हुई। इधर युवा लेखक मृदुल पाण्डेय ने 'प्रताप प्रेस पुनरुत्थान समिति' के माध्यम से उक्त भवन को स्मारक के रूप में विकसित करने का अभियान चलाया है।


            एक सुखद उपलब्धि यह हुई कि इन पंक्तियों के लेखक के प्रयासों से छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के एम०ए० (उत्तरार्द्ध) हिन्दी के तृतीय प्रश्नपत्र के पाठ्यक्रम में विद्यार्थी जी की पुस्तक 'जेल - जीवन की झलक' शामिल की गई है।


चित्रावली


श्री लाल बहादुर शास्त्री श्रद्धांजली अर्पित करते हुए 


श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी इंटर कॉलेज , पांडु नगर, कानपुर में विद्यार्थी प्रतिमा का अनावरण 


पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा चित्र पर माल्यार्पण 


पिताश्री मुंशी जयनारायण को अंतिम विदाई सिरहाने बैठे अग्रज शिवव्रत नारायण और गणेश जी 


गणेश दंपती 


विद्यार्थी परिवार 


गणेश शंकर विद्यार्थी के विचार (130वीं जयंती पर विशेष)

लेखक परिचय : डॉ राकेश शुक्ल (1967) विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म महाविद्यालय , कानपुर के हिन्दी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं | प्रो. शुक्ल के 100 से अधिक शोध पत्र और समीक्षा आलेख राष्ट्रीय शोध पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं तो वहीं 24 शोध पत्र पुस्तकों का हिस्सा हैं तथा उन्होंने 16 विद्यार्थियों का शोध निर्देशन तथा 21 विद्यार्थियों के लघु शोध का निर्देशन भी किया है | उन्होंने दर्जनों विषयों पर आकाशवाणी लखनऊ से अपने विचार रखने के साथ ही निरंतर तमाम पत्र-पत्रिकाओं के साथ न सिर्फ लेखन बल्कि सम्पादन का कार्य भी किया तथा तमाम पुस्तकों की समीक्षा और भूमिकाएँ लिखीं |


राष्ट्रीय संगोष्ठियों में प्रखर व्याख्यान के लिए जाने जाने वाले  प्रो. राकेश ने "जलता रहे दिया" (कविता संग्रह), "उनकी सृष्टि अपनी दृष्टि" जैसी तमाम पुस्तकें लिखीं जो कि पाठकों के बीच खूब लोकप्रिय हुईं | शिक्षण कार्य में सक्रिय प्रो. राकेश शुक्ल विभिन्न विश्वविद्यालयों में पी-एच०डी० के परीक्षक तथा विषय विशेषज्ञ एवं चयन समिति का हिस्सा हैं | डॉ शुक्ल को अब तक 'इनोवेशन लीडरशिप एवार्ड' (पं० बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी द्वारा) , 'साहित्य सेवा सम्मान' (भारत के राष्ट्रपति, तत्कालीन राज्यपाल बिहार- श्री रामनाथ कोविन्द द्वारा) तथा जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय युवा केंद्र के "साहित्य श्री सम्मान" (गुजरात के राज्यपाल श्री ओपी कोहली द्वारा) जैसे तमाम सम्मानों द्वारा नवाज़ा जा चुका है | 


विद्यार्थी जी के विचार 


विद्यार्थी जी के कुछ निबन्धों के आधार पर हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि उनकी दृष्टि कितनी व्यापक थी, उनका उद्देश्य कितना महान था। देश की स्वाधीनता और राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए उनका लेखकीय योगदान कितना महत्वपूर्ण है, जिसकी चर्चा सामान्यतः कम ही हुई है।



 विद्यार्थी जी का लम्बा आलेख ‘जेल-जीवन की झलक’ आज के प्रत्येक विद्यार्थी को अवश्य पढ़ना चाहिए। यह सिर्फ एक आलेख न होकर देश की आजादी के लिए संघर्षरत वीर, स्वातंत्र्य सेनानियों के कष्टों एवं संघर्षों की ऐसी महागाथा है, जिसे पढ़ते हुए हम उन पर गर्व करते हैं, तो दुःख के सागर में डूबते उतराते भी हैं। एक अंश के विचार और भाषा द्रष्टव्य है, ‘‘जहाँ जंजीरें खनक रही हों, काल कोठरी का अँधेरा हो, जहाँ बात-बात पर तिरस्कार और मारामार हो, जहाँ पग-पग पर फटकार और प्रहार पर प्रहार हो, जहाँ मनुष्यता को रौंद डालने का विचार काम करता हो, जहाँ मनुष्यों को निकृष्ट प्राणी की भाँति रहना वांछनीय हो, जहाँ खाने के लिए मिट्टी मिला आटा और कंकड़ मिली दाल हो, पहनने के लिए जूं भरे फटे कम्बल और लज्जा का भी निवारण न कर सकने योग्य वस्त्र हों, जहाँ हमारे पथ के पथिक, हमारे साथी, हमारे सखा, हमारे दोस्त, हमारे प्यारे भाई, हमारे अपने, एक नहीं, दो नहीं, दस नहीं, सौ नहीं, हजारों की तादात में..............।’’



 डायरी और संस्मरण की समन्वित शैली से युक्त यह निबन्ध आजादी के उन दीवानों का रोजनामचा भी है, जो कैदी जीवन बिता रहे थे। महात्मा गाँधी के आह्वान पर जिन दिनों असहयोग आन्दोलन अपने चरम पर था, उन दिनों आजादी के दीवानों की कमी न थी, फिर भी समाज के अनेक लोग ऐसे थे जो उन्हें उपेक्षा और तिरस्कार से देखते थे। उनका मानना था कि ये लोग किसी दूसरी दुनिया के हैं जो उन अंग्रेजों से आजादी माँग रहे हैं, जिनके साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता। ऐसे लोगों के विषय में वे बड़े आहत भाव से लिखते हैं, ‘‘कानपुर जाने वाली गाड़ी की ओर बढ़़ रहे थे कि इतने में ‘वंदे मातरम्’, ‘महात्मा गाँधी की जय’ की ध्वनि कानों में पड़ी। नजर घुमाकर देखने पर, स्टेशन को पार करने वाले पुल के जीने पर पुलिस के गार्ड के बीच अनेक युवक चलते हुए दिखाई पड़े, जिनके पैरों में बेड़ियाँ थीं। एक प्रकार से उनके हाथ-पैर बँधे हुए थे। परन्तु तो भी जुबान और जुबानों से बढ़कर हृदय खुले हुए थे। उन्होंने जय बोली। माता की वंदना की। .... परन्तु युवकों के कण्ठ से निकली आवाज स्टेशन की दीवारों से टकराकर रह गई।... लोग चुपचाप उन्हे देखते रहे। मानों वे एक तमाशा देखते थे। मानों वे एक जुलूस देखते थे।’’


 इस आलेख के माध्यम से विद्यार्थी जी ने न सिर्फ उन स्वातंत्र्य सेनानियों के कष्टों एवं संघर्षों का वर्णन किया है; वरन् तत्कालीन शासन-प्रशासन तंत्र, विशेषकर जेल, थाना आदि के अधिकारियों एवं पुलिस के कारनामों का भी बारीक विश्लेषण किया है। उन्होंने अंग्रेज सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी का भी निर्भीकता से वर्णन किया है। वे लिखते हैं, ‘‘जेल के कर्मचारी पुलिस वालों से भी अधिक रिश्वतखोर और अत्याचारी हैं। मनो माल जेल से साफ उड़ा लेते हैं। खूब रुपया खाते हैं। कैदियों से खाते और कैदियों का पेट काट-काट कर खाते, और सरकारी खाते। जेल के कर्मचारियों के घरों की तलाशी हो, तो मनो माल जेल का उनके घरों से निकले।’’


 स्वराज्य के मतवालों का चित्रण करते हुए उन्होंने आजादी के उन नायकों के चरित्र पर किंचित प्रकाश डाला है जो समय-समय पर जेल-जीवन में उनके सहयात्री बने। इनमें पं0 मोतीलाल नेहरु, पं0 जवाहर लाल नेहरु, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, डाॅ0 जवाहर लाल रोहतगी, बाबू रणेन्द्रनाथ बसु, मौलाना कमाल उद्दीन जाफरी तथा रामनाथ गुर्टू आदि प्रमुख हैं। उनमें से अनेक ऐसे मतवाले भी हैं, जो अल्पज्ञात अथवा अज्ञात रह गए। ऐसे न जाने कितने पराक्रमी क्रान्तिकारी थे। इन्ही में से एक थे सीताराम जी शुक्ल जिन्होंने जेल में राजनीतिक कैदियों वाला अच्छा भोजन लेने से मना कर दिया था। उन्होंने साधारण कैदियों वाले भोजन, वस्त्र और कड़ी मशक्कत के लिए जेल में सत्याग्रह शुरु कर दिया था। हाथों-पैरों में हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ डालकर उन्हें लगभग एक दर्जन से अधिक जेलों में रखा गया था। विद्यार्थी जी के शब्दों में, ‘‘उन्होंने कह दिया, एक तौक की जगह दो तौक पहना दो, और एक बेड़ी की जगह दो बेड़ी, इससे ज्यादा तुम कर ही क्या सकते हो।.......... वे अच्छे जमींदार हैं। चाहते तो आनन्द से घर रहते। परन्तु देशभक्ति का नशा उनके सिर पर ऐसा सवार है कि वे भय को भय नहीं मानते और न आराम को आराम।’’



 इस प्रकार इस आलेख में अनेक ऐसे विवरण हैं, जिन्हे पढ़ते हुए आज के युवा यह जान सकते हैं कि आजादी कितनी त्याग, तपस्या और बलिदान का प्रतिफल है।
राष्ट्रचिन्तन में लीन रहने वाले इस महापुरुष के अनेक आलेख न सिर्फ उन दिनों युवाओं के पथ-प्रदर्शक थे; वरन् आज भी हर तरह से हमारे मार्गदर्शक हैं। विद्यार्थी जी आजादी की प्राप्ति और उसके बाद जिस तरह के राष्ट्रनिर्माण का स्वप्न देख रहे थे, उनका वह सपना आज भी पूरा नहीं हो सका है। सन् 1915 ई0 में लिखा गया निबंध ‘राष्ट्र का निर्माण’ आज भी कितना प्रासंगिक है। कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं, ‘‘ऊसर भूमि पुष्पों की जननी नहीं होती, और न उल्टे-सीधे डाल दिए जाने वाले बीज ही कभी पुष्पोद्यान का हाथ दिखा सकते हैं। पराजित देश किसी सभ्यता के मंदिर नहीं बनते, सरस्वती उन पर कृपा नहीं करती, लक्ष्मी उन पर दृष्टि नहीं डालती।’’ देशोद्धार या जनजीवन के अभ्युत्थान के लिए युवाओं की शक्ति को वे कितना महत्व देते थे, उनके इस उद्धरण से स्पष्ट है, ‘‘देश की सच्ची सम्पत्ति हैं उसके वे युवक ओर युवतियाँ, जिनके शरीर की आभा में प्रकृति का सबसे अधिक स्पष्ट दर्शन होता है। और जिनके हृदय में उदारता और कर्मण्यता, सहिष्णुता और अदम्य साहस के स्रोत का प्रवाह पूरे जोरों पर है।’’ विद्यार्थी जी किसी देश की सर्वतोमुखी प्रगति का सबसे बड़ा आधार वहाँ के कर्मशील और प्रतिभाशाली युवाओं को मानते थे। यहाँ ध्यातव्य है कि विगत एक सौ वर्षों में हम ज्ञान-विज्ञान की दृष्टि से कहाँ से कहाँ पहुँच गए बावजूद इसके दहेज प्रथा, बाल विवाह, स्त्री-पुरुष असमानता आदि की समस्याओं को हम अभी तक जड़ से मिटा नहीं पाये हैं बल्कि कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराइयाँ और पैदा हो गई हैं। विद्यार्थी जी ने ‘युवक’ के साथ ‘युवती’ शब्द का प्रयोग कर लगभग एक सौ वर्ष पूर्व ही स्त्री समानाधिकार को कितना महत्व दिया था। यहाँ कहना थोड़ा असंगत हो सकता है पर युवाओं को प्रबोधित करने, उनमें जागरण का मंत्र फूंकने में विद्यार्थी जी की भूमिका स्वामी विवेकानन्द जैसी ही थी।



‘राष्ट्र की आशा’ निबन्ध में देश की युवा शक्ति को झकझोरते हुए विद्यार्थी जी ने जहाँ अतीत के गौरव से प्रेरणा लेने को सीख दी है, वहीं वर्तमान की कमजोरियों, हमारे अधःपतन और हमारी अशिक्षा पर प्रहार करते हुए सोये हुए जनमानस को एक लम्बी और गहरी नींद से जगाने का कार्य किया है। वे कहते हैं कि जिन दिनों पाश्चात्य देशों में सभ्यता और संस्कृति का सूर्योदय नहीं हुआ था, उन दिनों ज्ञान-विज्ञान, व्यवसाय, धन-सम्पदा, धर्म, दर्शन, कला अर्थात् सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि में भारत विश्व का सिरमौर था। क्या कारण है कि आज हमारा देश पद्दलित, शोषित और अधोगति को प्राप्त है। वे युवकों को ललकारते हुए कहते हैं कि, ‘‘तुममें से कितने हैं, जिन्हें इस बात का बोध हो कि अर्वाचीन उन्नति के समय में, जबकि इंग्लैण्ड, अमेरिका, जर्मनी तथा जापान जैसे देशों में 99 फीसदी पुरुष तथा स्त्रियाँ शिक्षित हैं, इस देश में 94 फीसदी पुरुष तथा स्त्रियाँ ऐसे हैं जो शिक्षा रूपी सूर्य के उजियाले से कोसों दूर हैं। तुम में से कितने हैं जिन्होंने इस भयंकर दारिद्रय तथा अज्ञानांधकार को यथाशक्ति दूर करने का बीड़ा उठाया हो?’’ इसी तरह ‘माँ के अंचल में’ निबन्ध में वे देशवासियों को लोकतांत्रिक चेतना के प्रति जागरुक करते हैं और विस्तार उसकी अच्छाइयों का उल्लेख करते हैं। वे कहते हैं कि प्रजातंत्र की यह आँधी जब सारे विश्व में आई। तब भारत ही इससे अप्रभावित क्यों रहे? ‘‘यह आँधी सब जगह आई हुई है। रूस, जर्मनी, आस्ट्रिया, हंगरी, टर्की, चीन सब देशों के वन-उपवन उसके झोकों से कंपित हो उठे। प्रजातंत्र की यह आँधी कई देशों में आई और उसने जनता की छाती पर शताब्दियों से रुके हुए सिंहासनों को उखाड़कर फेंक दिया। जो राष्ट्र सुषुप्तावस्था में पड़े हुए थे, वे उन्निद्रत होकर अपनेपन को प्राप्त करने दौड़ पड़े।’’
 विद्यार्थी जी इस मायने में अपने समय के विलक्षण विचारक थे कि वे अहिंसावादियों और क्रान्तिकारियों को समान रूप से प्रिय थे। जब गाँधी जी सहित वरिष्ठ पीढ़ी के उनके अधिकांश अनुयायी युवा क्रान्तिकारियों को भटका हुआ, कुमार्गी या देशद्रोही कहकर अपमानित कर रहे थे तब उन्होंने ‘वे दीवाने’ अग्रलेख लिखकर ऐसे लोगों को करारा जवाब दिया था। काकोरी काण्ड के फैसले के बाद लिखे इस अग्रलेख में वे लिखते हैं, ‘‘हम सशस्त्र क्रान्ति के उपासक नहीं हैं। हम भी उन पढ़े-लिखे मूर्खों में गिने जाते हैं, जो व्यावहारिकता को छोड़ना नहीं चाहते। लेकिन हमारे हृदय में आदर और भक्ति है, उन आदर्श पुजारियों के प्रति जो देश-काल के बंधनों को काटकर फेंक देते हैं। उनका काम क्या रंग लाएगा, इसकी उन्हें चिन्ता नहीं। वे विद्रोह के पुतले हैं। वे भारतवर्ष की अन्तर-अग्नि की चिनगारियाँ हैं।.... उनका काम है देश को उन्नत और विशाल करना।’’ इसी प्रकार ‘हमारे वे मतवाले निर्वासित वीर’ आलेख में उन्होने लाला हरदयाल जैसे उन निस्पृह, सत्यनिष्ठ, त्यागी महापुरुषों को याद किया है जो दूसरे देशों में निर्वासित जीवन जीते हुए तथा अनेक प्रकार के कष्टों और आर्थिक संकट का सामना करते हुए देश की स्वाधीनता के लिए प्रयत्नशील थे। वे लिखते हैं कि, ‘‘हम लोग तो अंधे हैं। हम दूसरों की आँखों से देखते हैं। विदेशों के वीरों की चरितावली हम बड़े चाव से पढ़ते हैं, पर हमारे देशवासियों ने स्वतंत्रता के युद्ध में जिन कठिनाइयों का सामना किया और जो यंत्रणाएँ सहीं, उनका हमें पता तक नहीं।’’ चौरी चौरा काण्ड से आहत होकर महात्मा गाँधी जब अचानक अपने उफान पर चल रहे असहयोग आन्दोलन को स्थगित कर देते हैं, और उपवास पर बैठ जाते हैं, तब विद्यार्थी जी उनके इस निर्णय से सहमत नहीं हो पाते। ‘जेल जीवन की झलक’ आलेख में वे लिखते हैं कि सैकड़ों सत्याग्रही जो रोज जेल में महात्मा गाँधी की जय के नारे लगाते थे, उनके इस निर्णय से ऐसे कुम्हला गये जैसे तुषार से बतिया कुम्हला जाती है। ‘‘एक महाशय बोले, चौरी चौरा काण्ड पर उपवास ही क्यों? माघ मेले में जिस प्रकार कीलदार पीढ़े पर साधू लोग बैठकर अपनी तपस्या की प्रदर्शनी किया करते हैं, वैसा ही एक पीढ़ा गाँधी जी पास भेज देना चाहिए, और वे उस पर बैठक तपस्या भी करें।’’



विद्यार्थी जी का मानना था कि नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में वैमत्य की बजाय एक-दूसरे के प्रति आदर और स्नेह का भाव होना चाहिए। वे कहते थे कि नई पीढ़ी की विद्युत शक्ति को सहेजने और उसके उचित संचालन का कार्य पुरानी पीढ़ी द्वारा किया जाना चाहिए। उनका लेख ‘युवकों का विद्रोह’ आजादी की लड़ाई में युवा क्रान्तिकारियों के योगदान को व्याख्यायित करने वाला एक महत्वपूर्ण लेख है। वे कहते हैं कि, ‘‘युवक, युवक ही क्या, यदि उसमें उत्साह और ओज न हो। युवकत्व का सबसे बड़ा प्रमाण ही यह है कि भावनाओं का वह पुंज हो और अखिल उत्साह का स्रोत।’’ इसी आलेख में हिंसा और अहिंसा के द्वन्द्व पर उनके विचार अत्यंत सार्थक और मूल्यवान हैं। वे लिखते हैं, ‘‘हिंसा और अहिंसा की विवेचना छोड़ दीजिए, विज्ञान ने वर्तमान रण शैली को बेहद भयंकर बना दिया है, उसमें वीरता नहीं रही, उसमें पशुता और हत्या का राज है, और उसके मुकाबले हमारे ऐसे शताब्दियों से निशस्त्र लोगों का खड़ा रह सकना असम्भव है। हमारे लिए तो अहिंसा ही परम अस्त्र है, उसी से हम दुनिया में किसी का मुकाबला कर सकते हैं।" इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विद्यार्थी जी क्रान्तिचेता युवकों का सम्मान करते थे, उनका उत्साहवर्धन भी, पर यह भी मानते थे कि अहिंसा का कोई विकल्प नहीं है।


विद्यार्थी जी के निबन्धों में ऋजुता, सहजता, बोधगम्यता के साथ तथ्यानुशीलन सर्वत्र विद्यमान है। उनके निबन्ध जहाँ उद्बोधन शैली में हैं और विचारात्मक हैं, वहाँ व्यास शैली का प्रयोग हुआ है। जहाँ वे दर्शन मनोविज्ञान या सैद्धान्तिक विषयों पर लिखते हैं, वहाँ समास शैली का प्रयोग हुआ है। वैसे इस तरह की प्रवृत्ति सर्वत्र नहीं दिखाई देती। दरअसल ये निबन्ध ‘प्रताप' या अन्यत्र अग्रलेखों या आलेखों के रूप में लिखे गए, जिनमें स्थान और कलेवर की एक सीमा थी। अनेक विचारात्मक निबंध भी समास शैली में हैं, जिनके एक-एक वाक्य में गम्भीर चिन्तन समाहित है। ‘लोकसेवा’, ‘सार्वजनिक सदाचार’, ‘कर्मक्षेत्र’, ‘राष्ट्रीयता’, ‘सुगमता की माया’, ’धर्म की आड़' , ‘दरिद्रता का सामना’, ‘आगामी महाभारत’ आदि अनेक इसी प्रकार के महत्वपूर्ण निबन्ध हैं। ’धर्म की आड़' तथा ‘जिहाद की जरूरत’ निबंधों में उन्होंने हिन्दू- मुसलमानों की धार्मिक रूढ़ियों, जड़ताओं, जहालत तथा अंधविश्वासों पर करारे प्रहार किए हैं।


‘स्वराज्य किसके लिए?’ एक छोटा किन्तु इतना महत्वपूर्ण लेख है, जो मुंशी प्रेमचंद सहित अनेक कथाकारों के लिए प्रेरणादायी बना। प्रेमचंद की कहानी ‘आहुति’ की नायिका का यह कहना कि, ‘‘जाॅन की जगह अगर गोविन्द गद्दी पर बैठ जाये।’’ या ‘गबन’ उपन्यास के एक पात्र देवीदीन खटिक का यह कहना कि, ‘‘साहब! सच-सच बताओ जब तुम सुराज का नाम लेते हो, तब उसका कौन सा रूप तुम्हारी आँखों में होता है?..... इस सुराज से क्या होगा? तुम दिन में पाँच बार खाना खाना चाहते हो, वह भी बढ़िया माल। गरीब किसान को एक बार भी सूखा चबेना नहीं मिलता..........।’’ आदि कथन क्या विद्यार्थी जी के इस निबंध से प्रभावित नहीं है? विद्यार्थी जी अपने इस निबंध में पहले ही स्पष्ट कर चुके थे कि, ‘‘देश में जो स्वराज्य होगा, वह होगा किसी छोटे-मोटे समुदाय का नहीं, धनवानों और शिक्षितों का नहीं, वह होगा, साधारण से साधारण आदमी तक का। संसार भर की शासन पद्धति इस समय उलट-पलट रही हैं। व्यक्ति को समान अधिकार कागजों पर दिये गये हैं परन्तु कुलीनों, धनवानों और शिक्षितों के गुट करोड़ों आदमियों को दाबे बैठे हैं।’’ इन विचारों के आधार पर हम कह सकते हैं कि विद्यार्थी जी के सपनों का स्वराज्य हमें आज तक नहीं मिल सका है।


गणेशशंकर विद्यार्थी ने कुछ कहानियाँ भी लिखी थीं, पर उनकी सिर्फ एक कहानी ही मिलती है, ‘हाथी की फाँसी’। वे मूलतः कहानीकार नहीं थे पर वस्तु और शिल्प के स्तर पर यह कहानी बहुत उत्कृष्ट है। कथ्य, भाषा, शिल्प, संवाद, किस्सागाई और रूपक तत्व में यह कहानी आज के दौर की श्रेष्ठ कहानियों की तुलना में किसी भी मायने में कमतर नहीं है। विद्यार्थी जी के हरदोई जेल में कैद रहने के दौरान सन् 1920 ईस्वी के आसपास यह कहानी लिखी गई थी। उस समय देश की आजादी के लिए मरने-मिटने वाले दीवानों की कमी नहीं थी, तो दूसरी ओर झूठी शान वाले, सुविधाभोगी, अय्याश शोषकों, सामन्तों, नवाबों की भी कमी नहीं थी। विद्यार्थी जी ने व्यंग्य शैली में इन्हीं में से एक चित्र उठाया है। कहानी एक स्नैपशाट लगने के बावजूद सोचनीय वास्तविकता का उद्घाटन करती है। बहुत सम्भव है कि कहानी पढ़कर कोई भी सामान्य पाठक इसे विशुद्ध हास्य-व्यंग की मनोरंजन प्रधान कहानी समझे, पर ऐसा नहीं है। सीधे-सादे कथानक में सशक्त संवाद योजना के द्वारा विद्यार्थी जी ने इस कहानी में बहुस्तरीय अर्थवत्ता पैदा की है। शीर्षक की अंतरध्वनि भी बहुस्तरीय है। व्यंजना यह है कि अंग्रेजों ने अपनी बुद्धि, तर्क, ज्ञान-विज्ञान और समय की पाबन्दी से देश भर के शासकों (हाथियों) को फाँसी दे दी है। यहाँ हाथी शान-शौकत वाले सामंतों, नवाबों के प्रतीक हो सकते हैं तो मद, अहंकार और घमण्ड के प्रतीक भी। कहानी अपनी अभिव्यंजना शक्ति में भी बेजोड़ है।


विद्यार्थी जी का भाषा और साहित्य के प्रति लगाव तथा उनके भाषण


हिन्दी की सेवा और उसे राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन कराने में आजादी के पूर्व जिन विद्वानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही, उनमें एक नाम विद्यार्थी जी का भी है। हिन्दी भाषा के परिष्कार, संस्कार और उसके व्याकरण सम्मत रूप का प्रचार-प्रसार करने में वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सच्चे उत्तराधिकारी थे। मार्च 1930 में, अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन गोरखपुर में दिया गया उनका सुदीर्घ वक्तव्य ‘हिन्दी का गौरव’ अत्यंत मूल्यवान है। हिन्दी, उर्दू के उद्भव और विकास से लेकर उसके संघर्ष, ज्ञान-विज्ञान के अनेक अनुशासनों में उसके प्रयोग, सामर्थ्य  और सीमा, देश-विदेश में उसके उपयोग, लिपि, उसके साहित्यिक योगदान एवं अनेकानेक संस्थाओं द्वारा हिन्दी साहित्य की सेवा आदि पर उस समय का महत्वपूर्ण और विस्तृत लेखा-जोखा इस निबन्ध में है। इस लेख के माध्यम से जहाँ विद्यार्थी जी ने गद्य की अनेक विधाओं (नाटक आदि) में लेखन की आवश्यकता पर बल दिया, वहीं कुरुचिपूर्ण साहित्य की भर्त्सना भी की है। एक अंश द्रष्टव्य है, ‘‘सज्जनो! हिन्दी साहित्य के एक विशेष अंग पर मुझे अपना कुछ मत प्रकट करना आवश्यक जंचता है। इस समय ‘घासलेटी साहित्य’ की चर्चा बहुत जोरों से उठ रही है मुझे इस बात के बतलाने की आवश्यकता नहीं है कि घासलेटी साहित्य किस प्रकार के साहित्य को कहते हैं? जो साहित्य यथार्थ में सार्वजनिक कुरुचि की वृद्धि करने वाला है, वह निःसन्देह त्याज्य और  भर्त्सनीय है।’’



इसी प्रकार ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ शीर्षक से उनके सुदीर्घ आलेख में विश्व के अनेक देशों की शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन हुआ है, और उसके आलोक में भारतीय शिक्षा नीति पर उन्होंने मूल्यवान  विमर्श किया है। एक सौ वर्ष से अधिक पहले लिखा गया यह आलेख आज भी न सिर्फ प्रासंगिक है, वरन् आज की शिक्षा व्यवस्था को आईना भी दिखा रहा है।


 विद्यार्थी जी कितने बड़े और सजग भविष्यद्रष्टा थे, इसे जानने के लिए उनके दो निबंधों का उल्लेख आवश्यक है। पहला ‘पहाड़ों के अंचल में’ तथा दूसरा ‘नगर जीवन’। पहाड़ों के अंचल में निबंध पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों, विशेषकर वहाँ की स्त्रियों के संघर्षपूर्ण जीवन, उनकी परवशता और उन पर होने वाले अत्याचारों के वर्णन हमारी आत्मा को कचोटते हैं। वहाँ की सांस्कृतिक चेतना, प्राकृतिक सुषमा आदि के वर्णनों में रिपोर्ताज और यात्रावृतांत का आनंद एक साथ लिया जा सकता है। विशेष बात यह है कि इस निबन्ध के माध्यम से आज से लगभग एक सौ वर्ष पूर्व वे न सिर्फ प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण की बात करते हैं वरन् मशीनीकरण की अंधी दौड़ में श्रमिकों, कुलियों, टट्टूवालों आदि की छिनती हुई आजीविका पर भी गम्भीर चिन्ता प्रकट करते हैं। इसी प्रकार ‘नगर जीवन’ निबंध में आजीविका के लिए या अन्य कारणों से ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन और नगरीय जीवन के प्रति ललक के कारण नगरों एवं शहरों में बेतरतीब फैलती बस्तियों के नारकीय जीवन पर चिन्ता प्रकट की गई है। इस समस्या का पूर्वानुमान उन्होंने एक शताब्दी पहले ही कर लिया था।


 


Saturday, October 24, 2020

एक नज़्म - प्यार क्या है हमारी नज़रों में


प्रेम बंधन है मन के रिश्तों का 
प्रेम संगम है आत्माओं का,


प्रेम एहसास का मिलन भी है
हसरतों की ये अंजुमन भी है


एक ही राग एक सरगम है
प्यार तो दो सुरों का संगम है


हमनशीनों का हमनवाओं  का
सिलसिला है ये बस वफाओं का


अजनबीयत में अपनेपन का सुरूर
दूर रहकर भी क़ुर्बतों का ग़ुरूर 


इक सफर कर रहें हैं दो राही 
मुश्किलें हैं तमाम अनचाही 


इतना आसान रास्ता भी नही
और मंज़िल का कुछ पता भी नही


प्रेम विश्वास है इबादत है
रूठ जाना भी इसकी आदत है


प्यार है एक रंग लाखों हैं
आईना एक संग लाखों हैं


प्यार का रिश्ता इतना गहरा है
दिल तो क्या रूह तक ये उतरा है 


 


आज सच्चाई का ईनाम कहाँ मिलता है


आज सच्चाई का ईनाम कहाँ मिलता है
जो है हक़दार उसे नाम कहाँ मिलता है


कुछ न कुछ सर पे मुसल्लत है मुसीबत बन कर
ज़िंदगी मे कभी आराम कहाँ मिलता है


जिनसे क़ायम थी रवादारियां तहज़ीबों की
अब मोहब्बत का वो पैगाम कहाँ मिलता है


तेरी महफ़िल में क्या साक़ी कोई तफरीक़ नही  
प्यास है जिनको उन्हें जाम कहाँ मिलता है


इतना पढ़ लिख के हैं बेकार हमारे बच्चे
डिग्रियां हाथ में हैं काम कहाँ मिलता हैं


जिनका आगाज़ कभी हो न सका हो ए सिया
ऐसे अफसानों को अंज़ाम कहाँ मिलता हैं


Tuesday, October 6, 2020

जब जिला विद्यालय निरीक्षक, पहुंचे बिल्हौर इण्टर कॉलेज , बिल्हौर

पिछले मंगलवार को तहसील दिवस में प्रतिभाग करने के साथ ही जिला विद्यालय निरीक्षक श्री सतीश कुमार तिवारी  बिल्हौर इण्टर कॉलेज, बिल्हौर पहुँचे। पुनरावृत्तिक आर्थिक घपलों के दोषी परन्तु डीआईओएस महोदय की अनुकम्पा से प्रधानाचार्य बने हुए श्री प्रेमचन्द्र त्रिपाठी द्वारा वित्तविहीन शिक्षकों के विरूद्ध झूठी शिकायतें की गई जिस पर डीआईओएस एक शिक्षक पर नाराज हुए तथा संस्था प्रबन्धक महोदय से शिक्षक द्वारा ऑनलाइन पढ़ाई न करवाने का आरोप लगाते हुए दूरभाष पर वार्ता की। संस्था प्रबन्धक ने डीआईओएस से अनुरोध किया कि आप पक्षपाती रवैया न रखते हुए पूर्वाग्रहों को छोड़ कर समस्त वित्तविहीन शिक्षको द्वारा किये जा रहे ऑनलाइन शिक्षण का अवलोकन करें तथा तुलनात्मक रूप से (अर्कमण्य, झूठे एवं वित्तीय अनियमितताओं के सिद्धदोष) प्रधानाचार्य द्वारा व्यक्तिगत रूप से ऑनलाइन शिक्षण में क्या किया जा रहा है, वह भी देख लें आपको हकीकत का पता चल जायेगा।


जिला विद्यालय निरीक्षक महोदय द्वारा वित्तविहीन प्रकोष्ठ के शिक्षकों द्वारा अपनाई गई ऑनलाइन शिक्षण प्रणाली का अनुश्रवण एवं वीडियोज शूट करने वाली लैब आदि का अवलोकन कर अत्यन्त प्रसन्नता व्यक्त की गई तथा अत्यअल्प मानदेय पर कार्यरत वित्तविहीन शिक्षकों के ऑनलाइन शिक्षण कार्य की सराहना की गई। वहीं वित्तपोषित व्यवस्था द्वारा कोई ऑनलाइन शिक्षण में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं दिखाया जा सका, स्वयं प्रधानाचार्य श्री प्रेमचन्द्र त्रिपाठी जो कि प्रवक्ता नागरिक शास्त्र हैं और विषय सम्बन्धी अध्यापन का कोई कार्य नहीं कर रहे है, का खुलासा भी हो गया।



जिला विद्यालय निरीक्षक श्री सतीश कमार तिवारी द्वारा वित्तविहीन प्रकोष्ठ द्वारा ऑनलाइन टीचिंग के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए वित्तपोषित व्यवस्था के उपलब्ध शिक्षक श्री सुशील त्रिपाठी एवं श्री अक्षय कुमार को टॉपिक्स दे कर जल्द से जल्द वीडियो बना कर अवलोकित कराने हेतु निर्देश दिये गये हैं।



संस्था प्रबन्धक ने समस्त घटनाक्रम के विषय में हमे बताया है कि "जिला विद्यालय निरीक्षक श्री सतीश कुमार तिवारी द्वारा निष्पक्षता से ऑनलाइन टीचिंग का निरीक्षण करने एवं वित्तविहीन अध्यापको के कार्य की सराहना हेतु उन्हें धन्यवाद देता हूँ औरआशा व्यक्त करता हूँ कि यदि डीआईओएस महोदय सभी प्रकरणो में इसी प्रकार का निष्पक्ष रवैया अख्तियार कर लेगें तो अर्कमण्य, झूठे और आर्थिक घपलों के अभ्यस्त प्रधानाचार्य के पद पर बने रह पाने का मामला स्वतः ही समाप्त हो जायेगा और शासन/प्रशासन स्तर पर शिकायतें करने की जहमत नहीं उठानी पडेगी।"


 


Featured Post

सूर्य या चंद्र की खगोलीय घटना होने की संभावना

सुमित कुमार श्रीवास्तव  ( वैज्ञानिक अधिकारी) भारत वर्ष में उपच्छायी चंद्र ग्रहण दिनांक 5 मई 2023 को रात्रि में 8.45 से 1.02 बजे तक दिखाई दे...