आज सच्चाई का ईनाम कहाँ मिलता है
जो है हक़दार उसे नाम कहाँ मिलता है
कुछ न कुछ सर पे मुसल्लत है मुसीबत बन कर
ज़िंदगी मे कभी आराम कहाँ मिलता है
जिनसे क़ायम थी रवादारियां तहज़ीबों की
अब मोहब्बत का वो पैगाम कहाँ मिलता है
तेरी महफ़िल में क्या साक़ी कोई तफरीक़ नही
प्यास है जिनको उन्हें जाम कहाँ मिलता है
इतना पढ़ लिख के हैं बेकार हमारे बच्चे
डिग्रियां हाथ में हैं काम कहाँ मिलता हैं
जिनका आगाज़ कभी हो न सका हो ए सिया
ऐसे अफसानों को अंज़ाम कहाँ मिलता हैं
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