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- प्रो• गौतम हाल |
(राजनैतिक अस्थिरता, कमजोर विपक्ष क्या भाजपा ही विकल्प)
पश्चिम बंगाल की चुनावी हलचल के बीच राजनैतिक वातावरण काफी गरम है। आये दिन नित नए राजनैतिक घटनाक्रम ने इस माहौल को तरोताजा तथा रोचक बना दिया है। बी0जे0पी0 के एजेण्डे में बंगाल की फतेह कई वर्ष से चल रही है। 2010 के पश्चात् बी0जे0पी0 तथा आर0एस0एस0 बंगाल में कमल खिलाने में जोड़-तोड़ कोशिश कर रही है। तो वहीं ममता बनर्जी ने जब कांग्रेस छोड़ तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी तब केन्द्र में अटल बिहारी बाजपेयी जी की सरकार थी । ममता दीदी ने बी0जे0पी0 को बंगाल में दस्तक देकर चुनावी गंठबंधन तथा केन्द्रीय सरकार में सक्रिय भागीदारी निभाई थी। मगर बाद में संबंध एकता के मुद्दे पर मुस्लिम वोट बैंक तृणमूल से अलग न हो जाये इसलिए बी0जे0पी0 से अलग-थलग कर लिया था। क्योंकि बंगाल में करीब 28% मुस्लिम मतदाता है। ममता बनर्जी ने 34 साल की कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ फेंकने में केन्द्र में बी0जे0पी0 सरकार की मदद ली थी। मगर बी0जे0पी0 के लिए बंगाल में सन् 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले तक उर्वरा भूमि नहीं थी।
अमित शाह के भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद बी0जे0पी0 को राष्ट्रव्यापी पार्टी बनाने का लक्ष्य रखा गया। बंगाल तथा पूर्वी एवं दक्षिण भारत में पार्टी का विस्तार तथा जनाधार बनाने की रणनीति बनायी गयी, जिसका परिणाम 2019 लोकसभा चुनाव में बंगाल में देखने को मिला। बंगाल से 18 लोकसभा सदस्य भारी मत से चुनकर आए जो बंगाल के विधानसभा चुनाव के पहले बी0जे0पी0 के लिए संजीवनी थे। इस परिणाम से मोदी - अमितशाह - नड्डा की तिगड़ी ने बारीकी से बंगाल के भौगोलिक, राजनैतिक अर्थनीतिक एवं सामाजिक गणित को ध्यान में रखते हुए बंगाल फतेह की रणनीति बनाई जिसका क्रियान्वयन धीरे-धीरे होता दिख रहा है। इसी कड़ी में बी0जे0पी0 के शीर्ष नेतृत्व का बंगाल में प्रवास जनसभा, रोड शो का हिस्सा है। बंगाल राजनीति में वाम दल के कैडर वेस राजनीति में सूनापन एवं नेतृत्वविहीन कांग्रेस की दिशाहीनता बंगाल में बी0जे0पी0 के एक मजबूत विपक्ष तथा विकल्प के तौर पर बंगाली जनता ने बी0जे0पी0 को अपनाया। फिलहाल मनोवैज्ञानिक युद्ध में भाजपा काफी आगे बढ़ गयी है।
सत्ता विरोधी रुझान और बी0जे0पी0 की बंगाल में मजबूत दस्तक बहुत कुछ संकेत दे रही है |
ममता दी एक अच्छी स्ट्रीट फाइटर है। उनके अदम्य एवं कड़क मेहनत ने बंगाल से वाम दल से 34 वर्ष के वाम शासन के अन्त हुआ था। मगर उनकी सरकार तथा सरकार में शामिल सदस्यों के प्रति गम्भीर वित्तीय अनियमितता, काटमानी, भाई-भतीजावाद जैसे गम्भीर आरोप लग रहे हैं। इसके अलावा बंगाल युवा काफी पीड़ित है। सरकारी नियुक्ति की व्यवस्था अव्यवस्था की शिकार है। किसान से लेकर आम जनता तक सरकार की योजनाओं के लाभ नहीं ले पा रही है। तुष्टी एवं पुष्टीकरण सरकारी महकमों के लिए एक आम बात है, जिससे स्वस्थ दिमाग वाले तथा निष्पक्ष मतदाता कानून व्यवस्था तथा कुशासन को लेकर काफी असंतुष्ट है। इस सब समस्या को ध्यान में रखते हुए मोदी जी एक पर एक संवाद कायम कर रहे हैं। उनका 2019 के बाद में विवेकानन्द के कर्मभूमि बेल्लूर मठ में दौरा, 2019 के अन्त में अमित शाह जी का बैल्लूर मठ, वीर भूमि, शान्ति निकेतन एवं िवद्यासागर व खुदीराम बोस के जन्म स्थली मेदनीपुर में जनसभा यह कोई संयोग नहीं है वरन बंगाल फतेह की रणनीति का अहम हिस्सा है।
कहा जाता है कि बी0जे0पी0 की चुनावी रणनीति काफी धारदार होती है। और पार्टी चुनाव से पहले ही काफी मसक्कत कर लेती है जिससे चुनाव में उसका फायदा मिल जाता है।
मोदी जी के लक्ष्य, उद्देश्य, संवाद एवं संबोधन भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी की जनप्रियता एवं सरकार के कई साहसिक कदम बंगाल में बी0जे0पी0 की एक मजबूत जमीन बनाने में सफल सिद्ध होंगे | हर-एक मौके का प्रधानमंत्री जी बखूबी इस्तेमाल कर रहे है। चाहे वह मन की बात के कार्यक्रम हों, विश्वभारती के शताब्दी समारोह में संबोधन हो या नये किसी कानून को लेकर चल रहे किसान आन्दोलन के उद्देश्य में देश के विभिन्न प्रान्त में किसान भाइयों से सीधा एकतरफा संवाद हो, इन सभी में बंगाल उनके लक्ष्य में रहा। किसान संवाद कार्यक्रम में मोदी जी ने ममता सरकार पर तीखा हमला किया है। उन्होंने बताया बंगाल के करीब 70 लाख से ज्यादा किसान भाई किसान सम्मान निधि 6000/- प्रति वर्ष से वंचित है, क्योंकि ममता सरकार किसान को यह फायदा नहीं देना चाहती है। उन्होंने वाम शासन में किसानों की आर्थिक बदहाली का भी जिक्र किया है। इन दोनों सरकारों ने किसान के हित में कुछ नहीं किया सिर्फ और सिर्फ किसान सम्प्रदाय को मतदाता के रूप में इस्तेमाल किया। इस संवाद में मोदी जी की सहानुभूति के स्वर किसान सम्प्रदाय को लुभाने में काफी मददगार रहे।
चुनाव जितना नजदीक आता जा रहा है। बंगाल में राजनैतिक परिदृश्य उतना ही रोचक तथा दिलचस्प होता जा रहा है। तृणमूल सांसद, विधायक एवं काफी संख्या में कार्यकर्ताओं का दल-बदल, विपरीत विचारधारा वाले वाम तथा कांग्रेस के चुनावी गठबंधन ओ0बी0सी0 के बंगाल में पदार्पण एवं बंगाली मुसलमान को संगठित करने का प्रयास ममता सरकार के पुनरावृत्ति की राह को काफी मुश्किल कर दिया है।
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