Saturday, January 30, 2021

फौलादी हैं , पंजाब की औलादें


लेखक : प्रताप फौजदार  ( लाफ्टर चैलेंज विजेता एवं राष्ट्रीय कवि )


देश में आज-कल किसान आंदोलन का जोर है ,
        मुझे एक अनुभव याद आता है
ये अस्सी और नब्बे के दशक की बात है, उस समय राजनीति वर्गवाद पर होती थी भाजपा व्यापारी वर्ग की पार्टी मानी जाती थी, लोकदल ' किसानों की पार्टी मानी जाती थी,
कांग्रेस की उपस्थिति कहीं कम कहीं ज्यादा लगभग सभी वर्गों में होती थी।
हाँ , लेकिन किसानों के साथ न्याय कांग्रेस के शासन काल में भी नहीं हुआ और वर्तमान में तो अन्याय पर अन्याय हो रहे हैं |
वर्तमान सरकार द्वारा वाकायदा कानून बना कर किसानों को कारपोरेट के हाथों बेचने की तैयारी है या किसानों की आनेवाली नस्लों को कारपोरेट का गुलाम बनाने की ।
मुझे अच्छी तरह याद है कि जब 
रेडी पर मूंगफली बेचने वाला जो बड़ी मुश्किल से पचास रुपए कमाता था वो बड़े गर्व से कहता  "भाजपा व्यापारियों की पार्टी है और हम उसे सपोर्ट करेंगे"
यानी रेड़ी पर मूंगफली बेचने वाला भी अपने को व्यापारी समझता था |
यही हाल , सब्जी पैदा करने वाले,  फ़ूल पैदा करने वाले, गाजर मूली आदि पैदा करने वाले छोटे- छोटे किसानों का था जो लोकदल या किसी क्षेत्रीय पार्टी को अपनी पार्टी कहते थे और खुद को किसान कहने में गर्व महसूस करते थे।
        लेकिन आज चरित्र दोगला हो गया है |
सब्जी, फूल, गाजर, मूली पैदा करने वाले सामाजिक स्तर पर खुद को किसान कहकर सम्मान तो प्राप्त करते हैं लेकिन वास्तव में वे चालाक सत्ता की गुलामी करते हैं| और सच बात तो यह है कि वे सत्ता की दलाली करते हैं तथा किसानों के हक़ में उठने वाली आवाज को कमजोर करते हैं हालांकि उनकी झोली में थोड़े से अनुदान ( भीख ) के अलावा कुछ नहीं गिरता है लेकिन वे इसे ही मेहरबानी समझते हैं क्योंकि उनकी सोच ही इतनी है ।
   कुछ दिन से मैं फेसबुक पर देख रहा हुँ कुछ ऐसे लोग जिन्हें मैं अच्छी तरह जानता हुँ |
जो दिहाड़ी मजदूर दो-दो ~ चार-चार रुपए प्रति पोस्ट के लिए सत्ता , दल विशेष अथवा सोच विशेष के लिए दिन भर चाटुकारिता भरी पोस्ट डालते हैं । ऐसे गुलाम भी पोस्ट डालने या टिप्पणी करने से पहले लिखते हैं  " मैं भी एक किसान हूं " और फिर किसानों को या किसान आंदोलन को ग़लत ठहराते है या गाली देते हैं । मेरा मानना है ऐसे  नीच, निक्रषट लोगों के पास थोड़ी-बहुत ज़मीन भले ही हो लेकिन गारंटी है इनका 'जमीर' मर चुका है।

वर्तमान में इस किसान आंदोलन से कुछ लोगों की पहचान स्थापित हुयी है |
मेरी नज़र में आज तीन तरह के लोग हैं 
पहला अपने हक के लिए संघर्ष करने वाला " धरती पुत्र " जिसके पास ' ज़मीन भी है और ज़मीर भी जिंदा है '

दूसरे वे किसान आंदोलन को कमजोर करने वाला "निक्रष्ट ,नीच व गुलाम" 
जिसके पास जमीन है लेकिन ज़मीर मर गया है |

तीसरे वे शांति पूर्वक किसान आंदोलन और किसानों की जायज़ मांगों का समर्थन करने वाले "न्याय प्रिय, श्रेष्ठ , देशभक्त"
जिनके पास ' ज़मीन नहीं है लेकिन ज़मीर जिन्दा है '
      और अंत में एक ही बात लिखूंगा 
देश के अंतर्गत जो भी व्यक्ति "कृषि उत्पादों को जिस मुंह से खाता होगा" वह उसी मुंह से किसानों की जायज़ मांगों को ग़लत तो नहीं ठहरायेगा |

वैसे तो हम सुनते और पढ़ते आये हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है 
और ये भी कटुसत्य है कि सरकार चाहे कोई भी रही हो लेकिन किसानों को अपने हितों की रक्षा के लिए हमेशा संघर्ष करना पड़ा है। इसलिए स्वाभाविक है कि देश में किसानों के अनेक संगठन हैं।
और ये भी एक कटुसत्य है कि इन संगठनों में स्वार्थी और लालची तत्व आकर मिलते रहे हैं तथा संगठनों के साथ गद्दारी कर के दलाली का रास्ता अपनाते रहे हैं |
संगठन के निष्ठावान और ईमानदार लोगों ने उन तत्वों को बाहर का रास्ता दिखाया तो इन अवांछनीय तत्वों ने अपने छोटे- छोटे गुट बना लिए और दलाली करने लगे |

ये हम रोजमर्रा की जिंदगी में देखते हैं कि जो डाक्टर जिस क्षेत्र का विषेशज्ञ होता है वह उस मर्ज को तुरंत पहचान लेता है शायद इसलिए ही 
मैं भाजपा और भाजपा सरकार का प्रशंसक हूं कि किस संगठन , किस वर्ग ,किस धर्म , किस जाति ,किस दल में गद्दार कहाँ छिपा है तुरंत पहचान लेती है |
सुना है किसानों के साथ गद्दारी करने वाले गुटों की भी पहचान कर ली गई है|
लेकिन सत्य है कि सत्य के लिए संघर्ष करने वाले में आत्मबल अधिक होता है और सत्य का विरोधी कोई कितना भी ताकतवर हो मुंह की खानी ही पड़ती है|
इस बार "सत्य" किसान आंदोलन के साथ है क्योंकि देश की बहुसंख्यक कर्म निष्ठ और ईमानदार जनता सीधे सरल किसानों के साथ की जा रही धूर्तता को अच्छी तरह समझ रही है|

अतः अब सरकार करोड़ों रुपए खर्च करके किसान आंदोलन के समानांतर प्रचार अभियान चलायेगी और ये समझायेगी कि किसानों का कारपोरेट के हाथों बिकना या किसानों की आनेवाली पीढ़ियों का गुलाम होना दरसअल "किसानों के हित में है" ,,,,,,,
 ------------ और अंत में ----------
ओठों की मुस्कान कुटिल है आंखों में मक्कारी है।
साफ़ गुलामी झलक रही है चेहरे पर गद्दारी है।

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