देश के मौजूदा परिवेश में सत्य लिखना और प्रकाशित करना गुनाह हो गया है! क्या सत्य लिखने वाले शख्स को रौंदने के लिए नौकरशाही अपने निम्नतर स्तर पर आ गयी है और वह भी उस सरकार के कार्यकाल में जो सत्य का प्रशंसक मानी जाती है ! प्रश्न यह भी उठता है कि क्या सत्य का साथ देने वाला भी कोई नहीं!
कहना गलत नहीं होगा कि यदि इसी तरह से सत्य का दमन किया जाता रहा और लोग मूकदर्शक बने रहे तो निश्चित तौर पर देश में वे बचे-खुचे पत्रकार भी समाप्त हो जायेंगे जिनके कंधों ने अभी तक यह भार उठा रखा है।
हम बात कर रहे हैं हिन्दी मासिक समाचार पत्रिका ‘दृष्टान्त’ की। ‘दृष्टान्त’ पिछले डेढ़ दशकों से सत्य की जंग लड़ता चला आ रहा है। ‘दृष्टान्त’ पत्रिका ने कभी अपने मिशन से समझौता नहीं किया है। दस्तावेजों के आधार पर ‘दृष्टान्त’ ने ऐसे-ऐसे बहरुपियों के चेहरों से नकाब हटायी है जो सत्ता-शासन की गोद में बैठकर आम जनता के टैक्स को लूटते चले आ रहे हैं।
इस दुस्साहस के एवज में ‘दृष्टान्त’ को मिटाने के जो प्रयास किए जाते रहे हैं उसकी जितनी भत्र्सना की जाए वह कम होगी। चाहें ‘दृष्टान्त’ के सम्पादक को घर से बेघर किए जाने का प्रयास रहा हो या फिर जहर देकर और दुर्घटना कराकर हत्या किए जाने का प्रयास। हर बार असत्य पर सत्य की ही जीत हुई है। यही वजह है कि ‘दृष्टान्त’ कल भी सीना तानकर खड़ा था और आज भी सीना तानकर भ्रष्ट, लुटेरों, चोर, डकैतों को चुनौती देता चला आ रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के 5 साल और अखिलेश यादव के अंतिम 3 वर्षों में ताकतवर नौकरशाह रह चुके और अक्टूबर में योगी सरकार में अपर मुख्य सचिव के पद पर विराजमान हुए नवनीत सहगल ने एक पत्र जारी किया है जिसमें उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका दृष्टांत को उत्तर प्रदेश के सभी विभागों से सरकारी विज्ञापन ना देने का निर्देश दिया है। पत्र के कोने में सर्वोच्च प्राथमिकता लिखा है।
28 जनवरी को जारी किए गए पत्र में नवनीत सहगल के हवाले से लिखा गया है कि दृष्टांत पत्रिका के संपादक अनूप गुप्ता के द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री सतीश महाना के खिलाफ बिना तथ्य के खबरें चलाई गई। वास्तव में सच्चाई यह है कि नवनीत सहगल के द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का खुलासा भी दृष्टांत ने फरवरी के अंक में किया है। शायद यही कारण है कि नवनीत सहगल अनूप गुप्ता के ऊपर व्यक्तिगत भड़ास निकालने के लिए इस तरह का कृत्य कर रहे हैं, और यह पत्र भी उसी का एक हिस्सा है।
पत्र पूरे प्रदेश के सचिव, विभागाध्यक्षों सहित विभाग के अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के पास भेजा गया है। इस पत्र में नवनीत सहगल की तरफ से आदेशित किया गया है कि ‘दृष्टान्त’ को विज्ञापन न दिए जाएं। जाहिर है एक भ्रष्ट अधिकारी जब अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सका है तो उसने इस तरह का गैरकानूनी और गैरजिम्मेदाराना तरीका अख्तियार किया है ताकि ‘दृष्टान्त’ आर्थिक रूप से टूटकर बिखर जाए और सत्य को उजागर करने वाला कोई शेष न बचे।बता दूं कि किसी भी अधिकारी को किसी भी मीडिया घराने के खिलाफ इस तरह का पत्र जारी करने का अधिकार नहीं है , शासन प्रशासन के किसी भी वर्ग को किसी भी मीडिया के किसी भी प्रकाशित अंक अथवा डीज़टल कंटेन्ट से यदि आपत्ति है तो वे उस संस्थान को प्रामाणिक रूप से दोषी सिद्ध करते हुए कानूनी कार्यवाही करके उसका लाइसेन्स रद्द कर सकते हैं या मानहानि का दावा कर न्यायालय का रास्ता भी अपना सकते हैं लेकिन स्वतंत्र रूप से आर्थिक चोट पहुंचाने का यह निंदनीय कार्य सरकारी शोभा का गला घोटते हुए , संविधान के अनुच्छेद 19 से प्राप्त अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार की भी हत्या कर देता है |
सिर्फ दबाव बनाने के लिए पूर्व की समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारों की तरह से पत्रकारों के दमन का यह कार्य किया जा रहा है। अनूप गुप्ता ने एक संपादक की हैसियत से कुछ गलत किया है तो उनके ऊपर कार्यवाही की जानी चाहिए। उसके बाद ही इस तरह की प्रक्रियाएं अपनाई जानी चाहिए।
‘दृष्टान्त’ कल भी अपने शुभचिंतकों के सहारे भ्रष्टों का खुलासा करता रहा है और आगे भी इसी तरह से करता रहेगा। तो वहीं पत्रिका के संपादक अनूप गुप्ता का कहना यह है कि एक बार फिर नवनीत सहगल के द्वारा मेरे बच्चों को फुटपाथ पर लाने के तैयारी की जा रही है। मेरी मैगज़ीन को पूरे प्रदेश में सरकारी विज्ञापन ना मिल पाए, इसके लिए नवनीत सहगल के द्वारा आदेश जारी किए गए हैं। मुझे नवनीत सहगल की चुनौती स्वीकार है। मैं डंके की चोट पर दस्तावेजों के आधार पर भ्रष्टाचार में लिप्त नेता, मंत्री और अफसरों के खुलासे करता रहूंगा।
इसके लिए मुझे आम जनता और अपने शुभचिंतकों से आर्थिक सहयोग की अपील है ताकि उत्तर प्रदेश की धरती पर पनप रहे भ्रष्टों का डंके की चोट पर खुलासा किया जाता रहे।
दृष्टान्त को जानने, समझने, परखने, पढ़ने और जुड़ने के लिए http://drishtant.co.in पर क्लिक करें |
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