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देवेंद्र कुमार मिश्रा स्वतंत्र लेखक |
जिस समय उनकी प्रतिमा पर फूल माला चढ़ाई जा रही थी, उसी समय वे सभा में चाय बाँट रहे थे | मंत्री जी ने मंच पर महान लेखक के विषय में कहा "हमारा सौभाग्य है कि हमें शम्भूनाथ जी जैसे महान रचनाकार को उनके जीते जी उनकी मूर्ति पर फूलमाला चढ़ाने का सौभाग्य मिल रहा है |" ठीक उसी समय शम्भूनाथ जी के काँपते हाथों से हिंदी भवन में बैठे श्रोताओं, लेखकों, पाठकों की भीड़ में जो करतल ध्वनि से मंत्री जी की बात का स्वागत कर रहे थे, किसी अतिथि पर चाय गिर गई | अतिथि ने गुस्से में भद्दी गाली देते हुए शम्भूनाथ को धक्का दिया और शम्भूनाथ जी गिर पड़े | उनके सर से खून बहने लगा | चाय की दुकान का मालिक शम्भुनाथ को अच्छी तरह पहचानता था | वह उन्हें फौरन होटल में लाया और अपने दूसरे कर्मचारी से चाय वितरण करने को कहा और स्वयं ऑटो में उन्हें अस्पताल ले गया |
ग्रामवासी शम्भुनाथ को पता ही नहीं चला कि वे कैसे लिखने लगे ? और इतना अच्छा लिखने लगे कि उनकी कविताएं बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी | दसवीं के बाद गरीबी के कारण उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी | गाँव में ही मजदूरी करने लगे थे | गाँव में एक पुस्तकालय था, फुरसत निकालकर वे जाते और एक एक किताब पढ़ लेते | उन्ही किताबों में दिए पते पर वे डाक से अपनी कविताएं भेजते रहते | शहर कभी किसी काम से जाते तो वहाँ के पुस्तकालय का पता करते और पढ़ते रहते पुस्तकें | उन्हें पता ही नहीं चला कि कैसे उनकी कविताएं राजधानी में धूम मचा रही थी | एक दो प्रकाशक जरूर उनके गाँव आए | उनसे कहा "आप लिखिए, हम छापेंगे, आपकी रचनाओं को पुस्तक के रूप में और रुपया भी देंगे |" उन्होंने पुस्तक की पांडूलिपि तैयार करके प्रकाशक को भेजी | प्रकाशक ने उनके नाम पाँच हज़ार का चेक भेजा | वे इसमें ही बहुत खुश थे | उन्होंने अपनी पत्नी से कहा - "देखो अब तो नाराज नहीं होंगी लिखने से, अब तो रुपए भी मिल रहे हैं | मैं इन रुपयों में से आधे तुम्हे दूँगा और आधे से कागज, कलम, लिफ़ाफ़े, डाक टिकट और पढ़ने के लिए कुछ किताबें खरीदूँगा |"
पत्नी ने कहा - "ठीक है लिखों | लेकिन काम करना मत छोड़ना | इतने पैसों में जीवन नहीं कटेगा |"
वे खेतों में मजदूरी भी करते और लिखते भी जाते | इस बीच उन्हें कई बार पाँच हज़ार रुपए दिए गए और बदले में उनसे पांडुलिपि ले ली जाती |
लिखते लिखते उनकी उम्र 55 वर्ष हो गई | एक बेटा था जो कालकवलित हो गया था | पत्नी थी और विवाह के काफी समय बाद एक बिटिया हुई थी | जो अब विवाह के योग्य हो गई थी | इस साल गाँव में सूखा पड़ा | खेती बर्बाद हो गई | उनके करने के लिए मजदूरी भी न थी गाँव में ||
वे बैठे सोच रहे थे कि क्या करें ? तभी गाँव का एक लड़का जो शहर में नौकरी करता था, उसनें शम्भूनाथ के पैर पड़े | बचपन में उनका बेटा और यह लड़का मदन साथ में ही खेलते थे | मदन को आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा - "खुश रहो बेटा"
मदन ने कहा - "चाचा आपको पता नहीं आप क्या चीज हैं ? शहर के स्कूलों के पाठ्यक्रम में आपकी कविताएं पढ़ाई जाती हैं | आपको याद है आप दो-तीन बार प्रदेश और देश की राजधानी गए थे सम्मान के लिए |"
"हाँ, बेटा याद तो है लेकिन उसका क्या ?"
"चाचा वे बहुत बड़े सम्मान थे | आप देश का गौरव हैं | आपके नाम से राजधानी में अकादमी खुली है | बहुत बड़ी साहित्यिक संस्था |"
"हमें पता नहीं बेटा खुली होगी |" शम्भुनाथ ने कहा |
" अरे चाचा, आप नहीं समझेंगे, आप क्या चीज हैं ? " आश्चर्य और ख़ुशी से झूमता हुआ मदन चला गया |
" सुनिए " पत्नी ने कहा |
" जब आपके नाम से सरकार ने इतना कुछ बनाया है तो उसमें आपको नौकरी मिल जाएगी | यहाँ भूखे मरने से अच्छा है कि आप राजधानी जाइए और कहिए सरकार से हमारे नाम से संस्था बनाए हो, हमें नौकरी पर रखो कैसे मना कर देंगे? "
जाने का मन तो नहीं था शम्भुनाथ का, लेकिन कोई और चारा भी नहीं था | वे चल पड़े राजधानी की ओर | रिक्शे वाले से उन्होंने कहा - "भैया शम्भूनाथ अकादमी का पता मालूम है | रिक्शे वाले ने कहा - "जी मालूम है | चलना है क्या ?"
•कितने पैसे लोगे ?
•• पचास रुपए
• ये तो बहुत ज्यादा हैं
•• तो फिर सिटी बस से चले जाइए वो देखिए सामने खड़ी है |
वे सिटी बस में चढ़ गए | सिटी बस के कंडक्टर ने पाँच रुपए लेकर उन्हें अकादमी के बाहर छोड़ दिया | बाहर उनकी संगमरमर की प्रतिमा लगी थी | वे आश्चर्य से भर गए | बाहर चपरासी ने उनसे
"पूछा किससे मिलना है ?"
"साहब से"
"कौन से साहब से ?"
"जो सबसे बड़ा हो |"
"इस तरह नहीं मिल सकते, अपॉइंटमेंट ली |"
"नहीं ली"
चपरासी ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा | बड़ी दाढ़ी, बिखरे बाल, मैली सी धोती और एक-दो जगह से फटा हुआ कुर्ता ||
" जाओ पहले बाबू से मिलो |"
शम्भूनाथ जी बाबू के पास पहुँचे | उन्होंने बाबू से कहा - "मैं शम्भूनाथ हूँ"
"तो मैं क्या करूँ"
"साहब से मिलना है|"
"क्यों ?"
"क्यों का क्या मतलब ? ये अकादमी मेरे नाम से खुली है जिसमें तुम नौकरी कर रहे हो |"
"नौकरी मैं सरकार की कर रहा हूँ | किसके नाम से क्या खुला है उससे मुझे क्या लेना-देना?"
बाबू ने चिढ़ कर कहा | "जाइए बाहर बैठिए, आपका नाम भेज दिया है | जज साहब बुलाएंगे तो चले जाना |"
शम्भुनाथ ने चारों तरफ नज़र फैलाकर देखा | अकादमी की बड़ी बड़ी दीवारों पर उनकी किताबों के नाम लिखे थे |
काफी देर वो बैठे रहे | तभी उनके नाम का पुकारा हुआ | वे साहब के कमरे में गए | साहब के केबिन में साहब की कुर्सी के पीछे ऊपर दीवार पर उनकी फोटो लगी हुई थी |
"कहिए क्या काम है ?" साहब ने पूछा | "मैं शम्भुनाथ हूँ |"
"आगे बोलिए"
"ये अकादमी मेरे नाम से बनी है |"
शम्भुनाथ की बात सुनकर साहब चौंके | उन्होंने पीछे लगी तस्वीर को देखा | फिर गौर से शम्भुनाथ की तरफ देखा और कहा - " अरे बैठिए लेखक महोदय | आपका स्वागत है | आप यहाँ कैसे ? खबर भिजवा दी होती, गाँव पहुँच जाते सेवा में |" फिर उन्होंने चपरासी को बुलवा कर चाय नाश्ता लाने के लिए कहा |
"बहुत ख़ुशी हुई आपसे मिलकर |" शम्भूनाथ को कहने में संकोच हो रहा था | जहाँ इतना मान सम्मान हो वहाँ काम कैसे मांगे ? लेकिन मज़बूरी थी उनकी गाँव में खाने के लाले पड़े थे |
उन्होंने संकोच में कहा - "साहब, सुना है ये अकादमी मेरे नाम पर बनी है | बाहर मेरी प्रतिमा भी स्थापित है |"
" हाँ, हाँ, बिल्कुल बनी है | मूर्ति भी आपकी है |"
"तो क्या मुझे कोई नौकरी मिल सकती है यहाँ ?"
साहब पहले चौंके फिर उन्होंने कहा - "शम्भुनाथ जी, नौकरी के लिए तो विज्ञापन निकलते हैं फॉर्म भरा जाता है | परीक्षा होती है | फिर जो योग्य होता है उसे लिया जाता है | भर्ती की एक प्रक्रिया होती है | योग्यता, उम्र सब देखी जाती है | आपकी उम्र तो नौकरी के लायक है नहीं |"
"क्या झाडू-पोछा करने की नौकरी भी नहीं मिल सकती |🤔 उसकी भी भर्ती होती है |"
शम्भुनाथ को चुप देखकर अधिकारी ने कहा - "आप बताइए | मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ ? कहो तो संस्कृति मंत्री से बात कर कोई राशि दिलवा दूँ |"
"नहीं, मुझे काम चाहिए |"
" मैं इसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकता |"
अधिकारी ने कहा चाय नाश्ता आ चुका था |
" लीजिए चाय-नाश्ता करिए |"
शम्भुनाथ भूखे थे सुबह से, वो नाश्ता कर चाय पीने लगे | अधिकारी ने कहा - "आठ दिन बाद आपके जन्मदिन पर बड़ा कार्यक्रम रखा गया है | मुझे बहुत काम है | आप जरूर आइए, आपको निमंत्रण पत्र भी भेजा जा चुका है, चलिए आपको बाहर तक छोड़ दूँ |"
अधिकारी ने पूरी विनम्रता से कहा और बाहर तक छोड़ने आए | विभाग के कर्मचारियों को लगा के साहब के गाँव के कोई रिश्तेदार आए होंगे मदद माँगने |
थके हारे शम्भुनाथ जी सामने वाली चाय नाश्ते के होटल पर बैठ गए | होटल का मालिक पढ़ने का शौक़ीन था | शम्भुनाथ उसके प्रिय लेखक थे | शम्भुनाथ को देखते ही पहचान गया, बिठाया, चाय पीलाई और कहा - "हमारे अहोभाग्य जो इस गरीब के होटल पर पधारे |"
शम्भुनाथ ने उदास स्वर में कहा - "मैं खुद गरीब हूँ | जब सुना कि मेरे नाम से संस्था बनाई है सरकार ने तो चला आया काम माँगने | लेकिन काम नहीं मिला |"
"आप मुझसे कहिए, आपको कितने रुपए की जरुरत है ? "
होटल मालिक ने कहा
"भीख नहीं चाहिए | काम चाहिए | दोगे |"
"मेरी क्या औकात आपको काम दे सकूँ ?"
"तो फिर मैं चलता हूँ"
"एक मिनट रुकिए, क्या काम करना चाहेंगे आप ?"
"जो तुम्हारे पास हो |"
"आप हमारी गद्दी संभालिए मालिक बनकर बैठिए |"
"जीवन भर मजदूरी की है बेटा | काम कोई छोटा बड़ा नहीं होता | मेरे लायक काम हो तो बताओ |"
" मैं क्या बताऊँ ? आप जो करना चाहें | खुद ही चुन लीजिए | वेतन जो चाहे खुद ही तय कर लीजिए | "
" नहीं बेटा जो सबको देते हो, वैसे ही मुझे देना | लेखक मैं किताबों में हूँ अभी तो काम की तलाश में निकला हुआ मजदूर हूँ | "
और होटल मालिक से कहकर शम्भुनाथ ने वेटर की नौकरी स्वीकार कर ली | होटल में ही रात में उनके सोने की व्यवस्था कर दी गई |
आज अकादमी में शम्भुनाथ का जन्मदिवस मनाया जा रहा था | होटल मालिक को आने वाले अतिथियों के चाय नाश्ते का ठेका मिला था | होटल मालिक मन ही मन सोचकर दुखी हो रहा था कि जिसके नाम सरकार लाखों रुपए खर्च कर रही है, उसे ही अनदेखा कर रही है | जिसकी मूर्ति पर माला पहनाई जा रही है | जिसके सम्मान में बड़ी बड़ी बाते होने वाली हैं | वही वेटर का काम करेगा अपने समारोह में |होटल मालिक ने कहा - "आप अकादमी के कार्यक्रम में वेटर बनकर मत जाइए |" शम्भुनाथ नहीं माने उन्होंने कहा "मैं काम कर रहा हूँ कोई भीख नहीं मांग रहा हूँ, कोई चोरी नहीं कर रहा हूँ, फिर शर्म कैसी ? सरकार मेरे नाम से इतना बड़ा कार्यक्रम कर रही है ये ही बहुत है मेरे लिए |
और शम्भुनाथ ने चाय नाश्ता बांटना शुरू कर दिया | जब मुख्य अतिथि शम्भुनाथ जी के जीवन पर प्रकाश डाल रहे थे, तभी शम्भुनाथ जी चाय और समोसे कि प्लेट लिए हुए अकादमी के हिंदी भवन में दाखिल हुए | जब उनकी रचनाओं पर अध्यक्ष महोदय बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे | तब शम्भुनाथ ने नाश्ता बांटना शुरू किया | और जब शम्भुनाथ के नाम के आगे जी लगाकर उनकी मूर्ति पर पुष्पामाला चढ़ाई गई | उस समय शम्भुनाथ के हाथ काँपें | जब शम्भुनाथ की प्रशंसा से दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों ने तालियां बजाई उसी समय उनके काँपते हाथों से किसी अतिथि पर चाय गिर गई और उन्हें भद्दी गाली देते हुए धक्का दे दिया गया | शम्भुनाथ जी गिर पड़े |
शम्भुनाथ जी नहीं गिरे थे | गिरा था सरकारी तंत्र, प्रशासनिक महकमा, और वे तमाम सम्मानित लोग जो अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, सम्मानित अतिथि बनकर आए थे | मंत्री जी ने पूछा - "क्या शम्भुनाथ जी नहीं आए ? क्या उनकी तबियत ख़राब है ? होटल मालिक ने चीखकर कहना चाहा कि आये थे लेकिन धक्का दे दिया गया उन्हें | वेटर का काम कर रहे हैं यहाँ लेकिन होटल मालिक कह न सका | शम्भुनाथ को लेकर उसे अस्पताल जाना था | उनके सर से खून बह रहा था |
कार्यक्रम जारी था, मंत्री जी ने कहा - "शम्भुनाथ जी पहले साहित्यकार होंगे जिनके जीवित में ही उनकी फोटो पर मालयार्पण किया जा रहा है | ये नियम के विरुद्ध है, लेकिन यह व्यक्ति की नहीं व्यक्तित्व की पूजा है | उम्मीद करता हूँ कि अगली बार वो स्वयं पधारकर हमें सेवा सत्कार का मौका देंगे, मैं उनके सम्मान में संचार मंत्री को डाक टिकट जारी करने का प्रस्ताव भेजता हूँ |
और दर्शक दीर्घा में फिर एक बार तालियों की गूंज सुनाई दी |