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संजय शर्मा "सिफ़र" |
संभल कर सांस लेना इस हवा में कुछ घुला सा है
परिंदे भी नहीं दिखते फ़िज़ा फिजाँ में क्यों धुआँ सा है |
सड़क खामोश सी क्यों हैं कोई आहट नहीं होती
गली के मोड़ पर ठहरा हुआ ये क्या कुहासा है |
कहीं से कहकहे का शोर कहीं हैं सिसकियाँ घुटती
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ी एक बद दुआ सा है |
नहीं अब बोले है कोई सभी दिखते हैं जल्दी में
निगाहों में लिखा है कि हुआ कुछ हादसा सा है |
उन्हें शोहरत की बस अपनी ही फ़िक्रे खाये जाती हैं
ज़मीं को रौदने वाले तुझे कुछ भ्रम हुआ सा है |
संभालो अब ये घर अपना के तूफान आ के रहना है
हवा का रुख सिफ़र अबकी दिखे कुछ अलहदा सा है |
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