अमिताभ ठाकुर-
थाना चंदवक, जौनपुर की कथित वसूली लिस्ट व कतिपय अन्य सूचनाएं!
कुल कथित वसूली रु० 3.72 लाख/माह
कृपया निष्पक्ष सत्यापन कराते हुए तदनुसार कार्यवाही करें.
@dgpup
UP Police
Jaunpur Police
@IgRangeVaranasi
ADG Zone Varanasi
अमिताभ ठाकुर-
थाना चंदवक, जौनपुर की कथित वसूली लिस्ट व कतिपय अन्य सूचनाएं!
कुल कथित वसूली रु० 3.72 लाख/माह
कृपया निष्पक्ष सत्यापन कराते हुए तदनुसार कार्यवाही करें.
@dgpup
UP Police
Jaunpur Police
@IgRangeVaranasi
ADG Zone Varanasi
हिंदी साहित्य भारती, दिल्ली के द्वारा ‘हिंदी साहित्य तथा मीडिया का नव विमर्श‘ विषय पर राष्ट्रीय तरंग गोष्ठी आयोजित की गई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 भगवती प्रकाश शर्मा, अध्यक्ष रूप में पूर्व शिक्षा मंत्री डाॅ0 रवींद्र शुक्ल, मुख्य वक्ता रूप में डाॅ0 राकेश कुमार दुबे, डाॅ0 आलोक रंजन पाण्डे, श्री लक्ष्मी नारायण भाला, संगोष्ठी की मुख्य समन्वयक एवं संयोजिका प्रो0 माला मिश्रा, हिंदी साहित्य भारती के प्रदेश अध्यक्ष डाॅ0 रमा, महामंत्री डाॅ0 राम जी दुबे, संगठन मंत्री श्री वीरेंद्र शर्मा आदि शामिल हुए।
संगोष्ठी की शुरुआत मनोज कुमार मिश्रा के वंदना गीत‘ उस भरत भू की वंदना, हे भर भू पद वंदना‘ से हुई। इसके बाद मुख्य वक्ता के रूप में आईआईएमटी के जर्नलिज्म के शिक्षक डाॅ0 राकेश कुमार दुबे ने कहा कि साहित्य जगत में प्रारंभिक दौर से ही विमर्श रहा है। चाहे स्वतंत्रता का दौर रहा हो या चाहे स्वतंत्रता के उपरंात का दौर रहा हो, इन दौरों में तत्कालीन साहित्यकारों ने विमर्श आरंभ किया था। बड़ी बेवाकी से वह सामाजिक मुद्दों पर विमर्श प्रकाशित करते थे। उस समय के साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी, राम चंद्र शुक्ल आदि ने अपनी साहित्यिक लेखनी के माध्यम से विमर्श को दिशा दी। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में हिंदी मीडिया ने अनुशासन के साथ अपने को स्थापित किया है। औद्योगिक क्रांति के बाद सूचना एवं प्रौद्योगिकी ने विमर्श को नए स्वरूप में प्रस्तुत किया है। सूचना क्रांति के उपरांत व्यापक तौर पर विमर्श हुआ है। इंटरनेट के आगमन से चेतना विकसित हुई है। लोगों को आपस में जुड़ने का और चिंतन करने का मौका मिला है। सूचना क्रांति ने व्यापार, वाणिज्य, शिक्षा, चिकित्सा, मनोरंजन के क्षेत्र को बहुत प्रभावित किया है। उन्होंनेे कहा कि हिंदी साहित्य के प्रारंभिक दौर में विभिन्न मुद्दों को लेकर विमर्श हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी की उपस्थिति ने यह संदेश दिया है कि हम सोये नहीं हैं। समाज को अंधकार से प्रकाश की ओर, हिंदी साहित्य ले गया है। उन्होंने साहित्य के स्वर्णिम दौर की बात कर कहा कि भारतीय समाज जिस सशक्तता के साथ खड़ा रहा है, उसका विमर्श कमजोर हो ही नहीं सकता। हमारे हिंदी साहित्यकारों ने विमर्श को सामने रखा था। प्रारंभिक दौर के हिंदी साहित्यकारों ने साहित्य के माध्यम से विमर्श को लेकर लेखनी दौड़ाई। उन्होंने समाज को जोड़ा है। उन्होंने समाज के यथार्थ पर चिंतन किया है, विमर्श किया है। साहित्य ने राष्ट्रीयता को स्वर दिये हैं। साहित्य ने हमेशा विमर्श किया है। महिला, आदिवासी, पर्यावरण आदि मुद्दे प्रारंभिक दौर के साहित्य में आज भी दिखाई पड़ते हैं। वह प्रारंभिक दौर से ही सजग रहा है। अब भी भारतीयता, भारतीयता की चेतना, नवजागरण की चेतना, राष्ट्र सर्वोपरि, राष्ट्रीयता को बोध जैसी बातें मीडिया में जोर-शोर से उठ रही हैं, जो सराहनीय है। वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी ने विमर्श को धार दी है। आज की मीडिया जल, जंगल, जमीन से जुड़ी है। वह जिम्मेदारी से काम कर रही है। आज पत्रकार ग्राउंड जीरो में जाकर कृषि आदि की खबरों को रिपोर्ट कर रहा है। हालांकि मीडिया और मीडियाकर्मी इसे केवल इसे फैशन न बनाएं। साहित्य और मीडिया, दोनों ही समाज के प्रति जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इंटरनेट, सूचना एवं प्रौद्योगिकी, सोशल मीड़िया ने समाज को सकारात्मक चिंतन दिया है। उसने विमर्श दिया है।
ब्रिटिश हुकूमतों ने भारतीयों की रोटी छीनी है
इस अवसर पर मुख्य वक्ता डाॅ0 आलोक रंजन पाण्डे ने कहा कि भारत में सभी हमारी रोटी से खेले हैं। ब्रिटिश हुकूमतों ने भारतीयों की रोटी छीनी है। हर किसी शासक यहां के लोगों की रोटियां छीनने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने राष्ट्र को समझने के लिए भूगोल, संस्कृति और लोग (लोक) को समझना आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि हमारी सांस्कृति, सभ्यता, ज्ञान, सबसे अलग हैें। विश्व में इसकी एक अलग ही पहचान है। यह समाज में प्रबुद्ध लोगों के कारण ही फैला है। उन्होंने कहा कि प्रबुद्ध लोगों का चिंतन, मनन और विचार करते हैं, तो वह विमर्श ही है। मीडिया अब पैसों के लिए कार्य करने लगा है। उसे विमर्श से कोई लेना-देना नहीं है। साहित्य भी अपनी मूल भावना से विमुख हुआ है। इसका एक कारण है कि इन दोनों क्षेत्रों में गलत लोगों का घुस आ गए हैं। मीडिया में धन कमाने की लालसा और साहित्य में लोगों को अपनी तरफ खींचने के लिए लेखन किये जाने से दोनों में ही विमर्श गायब हो गया है। उन्होंने कहा कि सन् 1926 में जब समाचार पत्र निकले, तब विमर्श उन पत्रों में जिंदा था, क्योंकि उन पत्रों में यथार्थ था। समाज का सच था। वहीं प्रारंभिक दौर के मीडिया में सत्य था, जो वर्तमान में नहीं दिखता। अब का मीडिया विमर्श नहीं ला रहा है। उन्होंने कहा कि जब यथार्थ नहीं होगा तो विमर्श कहां से आएगा। अब हाशिए पर लाए गए विषयों को विमर्श बनाया जा रहा है और हाशिए पर जबरदस्ती कौन मुद्दे लेकर आ रहे हैं, यह देखने का विषय है। उन्होंने कहा कि वामपंथी-दक्षिणपंथी विमर्श को तय करने लगे हैं, जबकि विमर्श के मुद्दे ऐसे नहीं होते। उन्होंने साहित्य और मीडिया को जिम्मेदारी से अपने दायित्वों का निर्वह्न करने और विमर्श करने की बात कही।
कुलपति प्रो0 भगवती प्रकाश शर्मा ने अपने वक्तव्य में यह कहा
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 भगवती प्रकाश शर्मा ने अपने वक्तव्य मंे कहा कि समाज जिस चीज को देखकर आकर्षित हो जाएं, वैसा विषय फिल्म, सीरियल, मीडिया में लाकर परोसा जा रहा है। सीरियलों में विवाह विच्छेदन के जितने दृश्य दिखाए जाते हैं समाज में उससे कई गुना ज्यादा विवाह विच्छेदन के उदहारण दिखाई देते हैं। सीरियल में लड़ने, झगड़ने, तलाक, पुनर्विवाह से संबंधित दृश्य, जिस अनुपात में दिखाया जाते हैं, वह युवाओं, बच्चों के मन-मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। छोटे बच्चे भी कम उम्र मेें होकर इन सीरियलों को देखते हुए युवा होने तक यही देखते हैं, जिससे उनका मन-मस्तिष्क प्रभावित होता है। नवीन पीढ़ी में इस तरीके के सीरियल दुष्प्रभाव डालते हैं। यह समाज का विमर्श ही है। यह समाज का सच ही है। अब युवा पीढ़ी भी उसी का अनुसरण कर रहा है। वह भी विवाह विच्छेदन, तलाक और फिर शादी को ही हल समझते हैं। उनके लिए यह सब करना आसान हो गया है। उन्होंने कहा कि साहित्य में ऐसे लेखक घुस गए हैं, जो अतिकल्पनावादी हैं और जो कल्पनाओं में लिख देते हैं। उनका लिखा हुआ हमारा युवा, हमारा पाठक वर्ग भी अनुसरण करता है। वह उन बातों को अपनाने लगते हैं। अतिकल्पना व अति यथार्थवाद हानिकारक है। विकृतियों को महामंडन किया जा रहा है। उनके प्रति युवा व बालक आकर्षित हो जाते हैं। साहित्य व मीडिया, आने वाले समय में समाज-जीवन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। दोनों को ही जिम्मेदारी से काम करने की आवश्यकता है। आज जो बिकता है वो साहित्यकार लिख रहा है और सीरियल में वहीं दिखाया जा रहा है, जो जनता को आकर्षित कर सके। हमें इससे आगे बढ़ना होगा और आत्मसंयम बरतना होगा। उन्होंने कहा कि मीडिया, फिल्म, सीरियल आदि में वह नहीं परोसा जाना चाहिए, जिसको समाज स्वीकार न करे। संचार माध्यमों में आज मानदंड स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। फिल्म, घटना उस अनुपात से अधिक नहीं दिखाए जाने चाहिए। अन्यथा उसके घातक परिणाम देखने को मिलते हैं। संचार माध्यमों के लिए यदि कानून भी बनाने की जरुरत है तो यह मांग हमें करनी चाहिए। आज समाज को आदर्श लेखक, आदर्श पत्रकारों की आवश्यकता है। उन्होंने मीडिया व साहित्य, दोनों को सामाजिक स्वीकारोक्ति विषयों को प्रसारित, प्रकाशित करने की अपील की ।
आज मीडिया जबरदस्ती चतुर्थ स्तम्भ बनने की होड़ में लगा है
इस अवसर पर विद्या भारती के श्री लक्ष्मी नारायण भाला ने कहा कि आज मीडिया जबरदस्ती चतुर्थ स्तम्भ बनने की होड़ में लगा है, तभी मीडिया में रस्खलन देखने को मिल रहा है जबकि उसे स्तम्भ बनने की होड़ से बचना चाहिए। तीनों स्तंभों की विकृतियों को सुधारने की भूमिका उसे निभानी चाहिए। साहित्य को दर्पण और मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ड्रग्स के कारण समाज में विकृति आई है। युवा बर्बाद हो रहे है। युवा इसके प्रभाव में पड़ चुके हैं। यदि मीडिया आदि में इनसे बचने के लिए सही से सूचनाएं नहीं परोशी जाएगी तो समाज में विकार उत्पन्न होंगे। मीडिया में इन सभी को इस तरीके से प्रसारित किया है कि युवा इनके आदि हो जाते हैं। उन्होंने यथार्थ चित्रण करने की सलाह दी और कहा कि मीडिया की भूमिका आज महत्वपूर्ण है। आज मीडिया के गंदे कारनामों को देखकर समूचे मीडिया पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। मीडिया निरपेक्ष्य होकर नजर रखे। तभी उसकी छवि सुधरेगी। स्वाधीनता ही मीडिया का लक्ष्य हो। साहित्य एवं मीडिया, दोनों का नवाचार ही समय की मांग है। उसी के माध्यम सें विमर्श दिखने लगेगा। उन्होंने भारतीय संस्कृति, भाषा, समाज के चरित्र को सही से उद्घाटित करने की बात कही और कहा कि मीडिया एवं साहित्य समाज पर विमर्श करें।
शिक्षा पद्धति अर्थकेंद्रित हो गई हैै
कार्यक्रम में अध्यक्षता करते हुए हिंदी साहित्य भारती के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व शिक्षा मंत्री श्री रवींद्र शुक्ला ने कहा कि जैसा इतिहास हमें पढ़ाया जाता है वह इतिहास नहीं है। उसे तोड़ा-मरोड़ कर हमारे जेहन में डाल दिया गया है। ब्रिटिशों ने अपने हित में बातें लिखी हैं। उन्होंने भ्रम फैलाने वाला इतिहास लिखा है। अंगे्रजों ने कोई सही बात नहीं लिखी हैं और हमारे इतिहासकार उनको इतिहास मानकर हमें पढ़ा रहे हैं, प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय इतिहास, भारतीय संस्कृति को ब्रिटिश ताकतों ने कमजोर किया है। सुनियोजित तरीके से ये सब किया गया है। शिक्षा पद्धति को भी ब्रिटिशों ने पैसा कमाने की नियत ने बनाया था। जिस पर अभी भी कार्य किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा पद्धति अर्थकेंद्रित हो गई हैै, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए था। हमारे देश में जिन्होंने स्वतंत्रता दिलवाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है, उनको हमारे इतिहासकारों ने भुला दिया है। उनका जिक्र हमारे इतिहास की पुस्तकों में नहीं आता है। उन्होंने अच्छाई को सामने लाने के लिए मीडिया एवं साहित्य को पे्ररित किया। साथ ही कहा कि आज पैसा कमाने की प्रवृत्ति जागी है। उन्होंने हिंदी साहित्य भारती के कार्यों पर विस्तार से बात रखी। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य भारती राष्ट्रीयता, भाषा, संस्कृति को लेकर कार्य करती है। उन्होंने सभी से जुड़ने का अनुरोध किया।
इस अवसर पर गोष्ठी की संचालिका प्रो0 माला मिश्रा ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की
इस अवसर पर संयोजिका और गोष्ठी की संचालिका प्रो0 माला मिश्रा ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने मीडिया और साहित्य के संदर्भ में कहा कि दोनों का ही दायित्व है कि वो निःष्पक्ष होकर विमर्श करे। वह सच को उद्घाटित करे। सकारात्मक माहौल बनाए। समाज की नींव साहित्य एवं मीडिया पर ही टिकी है। इन दोनों को ही जिम्मेदारी से समाज को दिशा निर्देश देने के लिए कार्य करना होगा।
संगोष्ठी में प्रो0 रमा ने आभार और श्री राम जी लाल दुबे ने कल्याण मंत्र का उच्चारण कर गोष्ठी का समापन किया।
यह गोष्ठि में इतने लोगों ने की भागीदारी
इस राष्ट्रीय गोष्ठी में प्रतिभा शाह, डाॅ0 संगीता, डाॅ0 राजलक्ष्मी कृष्णन, डाॅ0 ललित चंद्र जोशी, डाॅ0 वसुंधरा उदयसिंह जाघव, कल्पना शाह, प्रभात द्विवेदी, रोहिता रौत, सरिता वर्मा, डाॅ0 मधु वर्मा, डाॅ0 कोयल विश्वास, लक्ष्मी नारायण भाला, सीमा जोधावत, डाॅ0 संगीता, रीतू माथुर, डाॅ0 सुशीला व्यास, सीमा मिश्रा, डाॅ0 रोहिता आदि दर्जनों प्रतिभागियों ने भागीदारी की।
रिपोर्टः
लेखक- डाॅ0 ललित चंद्र जोशी
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग,
सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
देश के सभी पीठासीन अधिकारियों से सदनों की कार्यवाही में बाधा दूर करने वाली गठित समिति को अपने सुझाव भेजने का आग्रह
लोकसभा के अध्यक्ष श्री ओम बिरला द्वारा अपने विगत 2 वर्षों के कार्यअनुभवों एवं विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं/विधान परिषदों के अध्यक्ष/सभापतियों से भी अपने अनुभवों को साझा करने के लिए आज दिनांक-22 जून, 2021 को वर्चुअल बैठक बुलायी गयी।
उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष, श्री हृदय नारायण दीक्षित ने मा0 लोक सभा अध्यक्ष द्वारा बुलाई गयी बैठक में उत्तर प्रदेश का पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश जनसंख्या की दृष्टि से अन्य कई दृष्टियों में भी देश का सबसे बड़ा राज्य है। कोरोना की महामारी ने पूरे देश को प्रभावित किया है। उत्तर प्रदेश भी इस महामारी से प्रभावित हुआ है। उत्तर प्रदेश राज्य सहित अन्य राज्यों के समक्ष संवैधानिक बाध्यता रही जहां 6 महीने व्यतीत होने वाले थे, वहां पर बैठक बुलाया जाना अपरिहार्य था। उत्तर प्रदेश में भी कोरोना के बीच बैठक बुलाये जाने की संवैधानिक अपरिहार्यता बनी।
श्री दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश पहला ऐसा राज्य था जहां पर दिनांक-20 अगस्त से 22 अगस्त 2020 तक कोरोना महामारी के बीच बैठक बुलाई गयी। हमारे सामने कोई अनुभव नहीं था। कोरोना के बीच विषम परिस्थितियों में बैठक बुलाये जाने हेतु सामान्य परंपरा के अनुसार सदन के प्रारम्भ होने के पहले बुलाये जाने के स्थान पर 15-20 दिन पहले बैठक बुलाई गयी थी। मा0 मुख्यमंत्री, संसदीय कार्यमंत्री, सभी दलीय नेताओं ने भाग लिया। पक्ष एवं प्रतिपक्ष के साथ व्यापक रणनीति बनाई गई। सदस्यों को एक सीट छोड़कर दूसरी सीट पर बैठाने की व्यवस्था बनाई गयी। इसके अतिरिक्त मा0 विधायकों को दर्शक एवं विशिष्ट दीर्घाओं में बैठने की व्यवस्था सुनिश्चित की गयी। पत्रकारों के लिए भी एक कक्ष अलग से निर्धारित किया गया। 65 साल के ऊपर वाले सदस्यों एवं विधान सभा में न आ पाने की स्थिति में रहे विधायकों को वर्चुअल बैठक की व्यवस्था की गई। सदन सुचारू रूप से सुन्दर ढंग से चला। उत्तर प्रदेश द्वारा कोरोना के बीच बैठक के आयोजन का अनुकरण अन्य राज्यों द्वारा भी किया गया। कोरोना महामारी के बीच दुर्भागपूर्ण घटना भी घटी जिसमें 9 साथी विधायकों को खोना पड़ा। जिसमें 3 मंत्रिमण्डल के सदस्य थे। विधान सभा के एक अधिकारी एवं एक कर्मचारी की भी कोरोना के बीच खोया।
उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष ने उत्तर प्रदेश की कार्यवाही के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि विधायी सदन 2019-20 एवं 2020-21 विशेष रूप से स्मरणीय रहा। 2019-20 में साल भर में 6 बैठके आहूत की गयी। प्रथम सत्र के अतिरिक्त मा0 राज्यपाल द्वारा संवेत सदन को 2 बार सम्बोधित किया गया। प्रथम बजट सत्र पर एवं द्वितीय संविधान दिवस पर।
वर्ष 2019-20 में 242 सदस्यों ने चर्चा में भाग लिया। कार्यवाही 143 घण्टे 51 मिनट चली। 2021 में 116 सदस्यों ने भाग लिया। 65 घण्टे 31 मिनट तक सदन की कार्यवाही चली। प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन एवं विशेष रूचि लेने पर 3 बार विशेष सत्र चलाया गया। 02 अक्टूबर को महात्मा गांधी की 150 जयंती के अवसर पर, संयुक्त राष्ट्र संघ के 17 सतत विकास के कार्यक्रमों के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु 36 घण्टे का रातो-दिन निरंतर सदन चला। संयुक्त राष्ट्र संघ के सतत विकास के 17 लक्ष्यों पर चर्चा हुई।
26 नवम्बर को संविधान अंगीकृत करने की तिथि को संविधान की उद्देश्किा एवं मूल कर्तव्यों पर विचार विमर्श करने के लिए विशेष बैठक आहूत हुई। इसी तरह 31 दिसम्बर 2019 को संविधान का 126 संशोधन विधेयक आरक्षण के संसद के द्वारा पास किये गये संविधान संशोधन के अनुसमर्थन में बैठक बुलाई गयी।
उत्तर प्रदेश विधान सभा से 2019-20 में 58 एवं 2021 में मात्र 10 दिनों के उपवेशन में कुल 18 विधेयक पारित हुए।
श्री दीक्षित ने सदनों की कार्यवाही में बाधा दूर करने के लिए गठित समिति के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि अन्य विधान सभाओं की तरह उत्तर प्रदेश में भी राज्यपाल के अभिभाषण पर हो-हल्ला, हाउस के वेल में जाकर कार्यवाही के संचालन में व्यवधान एवं निरंतर प्रश्न काल को बाधित करना आदि की समस्याएं रही है। सदन के भीतर विचार-विमर्श प्रेमपूर्ण एवं प्रीतिपूर्ण हो और मा0 सदस्यगण अपनी-अपनी बात शालीनता और सुन्दर ढंग से रख सके इसके लिए लोकसभा अध्यक्ष ने समिति का गठन किया। उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष को उसका अध्यक्ष एवं 6 राज्यों के अध्यक्षों को सदस्य मनोनीत किया गया है।
लोकसभा के अध्यक्ष की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके द्वारा विगत दो साल के कार्यकाल में कार्यवाही सुचारू रूप से चले इसके लिए कई अभिनव प्रयोग किये है और अनेकों बार अनेक स्तरों पर विचार-विमर्श किया है।
श्री दीक्षित ने कहा कि सदनों की कार्यवाही में बाधा दूर करने के लिए प्रकारांतर में बैठके हो चुकी है। सुझाव भी आए है। कोरोना महामारी के कारण बैठकों के आयोजन में कठिनाई के कारण कुछ विलम्ब अवश्य हुआ। समिति यथाशीघ्र अपने निर्णय को अंतिम रूप देते हुए मा0 लोक सभा अध्यक्ष को अपनी संस्तुति भेजेंगे।
श्री अध्यक्ष ने कहा कि इस बीच कई विधान सभाओं में चुनाव हुए जिसमें कई नए मा0 अध्यक्ष निर्वाचित हुए है। उन्होंने देश के सभी विधान सभा एवं विधान परिषद के सदस्यों से आग्रह किया की सदनों में कार्यवाही में बाधा दूर करने के लिए गठित समिति के पास अपने-अपने सुझाव लिखकर भिजवाने की कृपा करें, जिससे व्यापक रूप से विचार कर निर्णय लेने का अवसर प्राप्त हो सके।
इस वर्चुअल बैठक में असम, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओडिशा, राजस्थान आदि विधान सभाओं के अध्यक्षों/विधान परिषद के सभापतियों एवं अन्य विधान सभाओं सहित 31 पीठासीन अधिकारियों ने भाग लिया।
![]() |
लेखिका-श्रीमती लीना पाणी |
![]() |
काव्यान्तरण : प्रो .माला मिश्र |
तुम निराश होकर रो रही थीं द्रौपदी,
और पांडव हँस रहे थे तुमको पाकर ,
तुम पांच हिस्सों में बंट गईं थीं ,
और सम्पूर्ण संसार तुम्हारे विभक्त अस्तित्व का उपहास कर रहा था ,
उस दिन तुम स्तब्ध खड़ी थीं टुकड़े टुकड़े होकर।
तुम जब पूर्णतः असहाय होकर रो रही थीं,
और तुम्हारे सखा कृष्ण अपनी गरिमा के साथ मुस्कुरा रहे थे ,
उस दिन कौरवों की आयताकार भरी सभा के बीच घिरी खड़ी थीं तुम ,
कृष्णा सदृश सखा के होते हुए भी इतनी निरुपाय हो गईं थीं तुम ।
तुम समूचे नारी समाज की प्रतिनिधि थीं ,
हे द्रौपदी ! तुम विषाद में निमग्न हो विलाप कर रही थीं ,
और यह संवेदनशून्य समाज तुम्हारी विषण्ण उदासी पर निर्लज्जता से हंस रहा था ,
उस दिन तुम क्यों अबला बन गईं द्रौपदी !
क्यों अन्याय के विरुद्ध अस्त्र उठाने में तुम अक्षम रह गईं ,
तुम तो इस पावन धरा की साहसी वीरांगना थीं ,
इस सच्चाई को आखिर तुमने क्यों भुला दिया।
तुम आज भी रो रही हो द्रौपदी !
तुम्हारा यह रुदन युगों युगों के लिए है ,
तुम्हें अपनी उस भूल से मुक्ति मिल जाती ,
जो अपनी मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ का स्वागत करने की बजाय ,
अपने हाथ में स्वयं खड़ग उठा लिया होता ,
तो आज उन दुराचारियों को
कठोर दंड अवश्य मिल गया होता।।
Association of National Exchanges Members of India (ANMI) is an
association comprising around 900. Stock Brokers from across the country who
are members of National Stock Exchange of India Limited, The Bombay Stock
Exchange, Multi Commodity Exchange and other exchanges having national
presence. The basic objective of ANMI is to work for the growth of the capital
markets thus contributing to the economic development of the country and the
overall interest of investors and its members at large by becoming a medium
between regulator, exchanges and participants. ANMI is also a member of the
International Council of Securities Association (ICSA).
Mr. KK Maheshwari has assumed the role of new president of Association of National Exchanges Members of India (ANMI), India’s largest stock exchange member’s body, with a 5-pronged priority agenda for the next couple of months in view of the ‘New Normal’ for the industry forced upon by the Coronavirus pandemic. He takes over from the outgoing president Mr. Anup Khandelwal, who led ANMI with distinguishing excellence during a period marked by widespread disruptions, destructions of lives and livelihoods and unparalleled challenges dealt by the pandemic.
Mr. Maheshwari will lead ANMI in 2021, a year which is both unique and challenging for the organisation. ANMI will enter the important milestone of 25 years of its establishment in August 2021. However, this special achievement comes at an unprecedented time for the stock broking industry which is still acclimatising to the changes in the regulatory and policy framework and the ‘Neo Normal’ of functioning, which is a departure from physical and interpersonal networking to completely digital mode of operations.
Speaking
about his appointment, Mr. Maheshwari said: “I am greatly honoured to be
bestowed with this responsibility and
thank all members for reposing faith in me to lead this organisation in its Silver
Jubilee year. As part of my immediate priorities, I would want to ensure
greater contribution of our industry towards capital market development, work
towards ease of doing business and ensure more effective adherence to
compliances for our members in view of the current changes and challenges.”
The
5 focus points for the year ahead will be:
1.Rationalization of compliances: The focus will be to work with the relevant authorities to streamline and rationalize duplicate and redundant compliances in view of the increase in compliance burden on members during the past year.
2.Mitigating the impact of Peak Margin. The phased implementation of Peak Margin norms, implemented by SEBI with effect from December 1st, 2020, has eroded the exchange volumes and has hit the small brokers the hardest, who even face the risk of becoming defunct. As per the schedule, peak margin obligation of client was 25% from December 1st, 2020, and 50% from March 1st, 2021. It is slated to increase further to 75% from June 1st, 2021 and 100% from September 1st, 2021. With further increase in peak margins, the markets are likely to witness a significant drop in volumes and participation. The focus will be to take up this issue with the relevant authorities on priority to mitigate the impact of this regulation.
3.Making investor education a way of life: There will be great many changes in the business methods and philosophy in the neo-normal of this industry. Educating the investor for seamless and smooth market participation will be the top priority for all members, who will need to assume greater responsibilities to facilitate investor participation.
4.Establishing better connectivity with members – In this world of fast moving information, connectivity between various stakeholders and members will be the key to successful operations. The priority will to understand and resolve the problems and glitches faced by the members in their day-to-day operations.
5.Working for the betterment of ANMI: Improving the workings of ANMI to ensure a better, stronger and a strongly united organization will be the priority to tide over the current challenges and overcome the hurdles for the smooth functioning of the industry.
The ANMI president can be contacted directly by all its members on the
aforesaid 5 areas of focus or for resolution of any other challenges or
concerns faced by them during the year,
उत्तर प्रदेश के कानपुर के चुन्नी गंज स्थित अमर शहीद गंगू बाबा स्थल पर अमर शहीद गंगू बाबा स्मारक एवं संचालन समिति के तत्वाधान में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर संचालक देव कबीर ने कहा कि- आज से 163 साल पहले 5 जून 1858 को इसी स्थल पर लगे नीम के पेड़ पर गंगू बाबा जी को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था । वह अत्यंत पिछड़े स्वच्छ कार समुदाय से थे। उन्होंने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण निछावर कर दिए थे। वह बिठूर के नाना साहेब पेशवा की फौज में थे । लगभग सौ सालों से इस स्थान पर उनके नाम का दिया जलाया जा रहा था। उनकी एक मूर्ति भी यहां पर स्थापित थी। सन 2016 में इस स्थल का सुंदरीकरण एवं विस्तारीकरण का काम किया गया । अब यह एक दर्शनीय स्थल बन गया है। हजारों लोगों की आस्था इस स्थल से जुड़ी हुई है । गंगू बाबा को लोग न केवल एक शहीद के रूप में पूजते हैं बल्कि एक महान संत के रूप में भी नमन करते हैं। बहुत दूर-दूर से लोग आकर मन्नते मांगते हैं और पूरी हो जाने पर मिठाई, वस्त्र, घंटे आदि चढ़ाकर जाते हैं। आज उनकी शहादत दिवस के अवसर पर विभिन्न संगठनों द्वारा सुबह से लेकर शाम तक कार्यक्रम चलते रहे।अमर शहीद गंगू बाबा के तत्वाधान में भी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर संचालक देव कबीर के अलावा कुंवर जीत, चमन बिरिहा ,संजय टेकला,अरूण हजारिया,प्रियांशु चौधरी, विकास गौतम, रुद्रांश जीत,शिवा तथा रुद्राक्ष मौजूद रहे।
अनुकृति की उड़ान
आपको बताते चलें अनुकृति को उनके अंतराष्ट्रीय योगदान के लिए महात्मा गांधी सम्मान तथा अपने पेशे में उत्कृष्ट योगदान के लिए उत्तराखंड फिल्म अकादमी अवार्ड से भी नवाज़ा जा चुका है
वर्तमान में महिला उत्थान एवं बाल कल्याण संस्थान पूरे उत्तराखंड में इस महामारी के दौरान लोगों तक हर संभव मदद पहुंचा रहा है। अनुकृति गुसाईं द्वारा बताया गया कि 3 जून की शाम को उनके निवास स्थान डिफेंस कॉलोनी देहरादून से राहत सामग्री पहाड़ों की ओर रवाना की गई। इसमें 10,000 से ज्यादा राशन किट, सैनिटाइजर, मास्क, सेनेटरी पैड, एवं मेडिकल किट पूरे उत्तराखंड मे वितरण किए जाएंगे|
Nestlé’s, which makes Maggi noodles, KitKats and Nescafe, in an internal document admitted that more than 70% of its food and drinks portfolio do not meet the “recognised definition of health”. The world’s biggest food company also admitted that some of its food products will ‘never be healthy’ no matter “how much we renovate”.
According to UK business daily Financial Times, a presentation circulated among top executives in early 2021 said that only 37% of Nestle’s products, excluding pet food and specialised medical nutrition, achieved a rating of 3.5 or higher under Australia’s health star rating system. The company considered 3.5-star rating as the “recognised definition of health”. The system rates foods on a scale of 5 stars and is used by international groups as the benchmark.
According to the presentation seen by FT, out of the company’s overall food and drinks portfolio, 70% of products failed to make the cut, along with 90% of beverages excluding pure coffee.
Water and dairy products, however, fared better with 82% of waters and 60% of dairy above the threshold.
The data does not take into account baby formula, pet food, coffee, and the health science division which the company makes for people with specific medical conditions. This meant that the data did take into account about half of Nestle’s Eu 84.35 billion total revenues.
After the damaging FT report, the Swiss company in a statement said it was working on a "company-wide project" to update its nutrition and health strategy and was looking at its entire portfolio to make sure its products helped meet people's nutritional needs.
Meanwhile, in a statement on Tuesday, a Nestlé India spokesperson said: “Nestlé India believes that nutrition is a fundamental need and the food industry has a vital role to play in enabling healthier lives. Driven by our purpose, we are constantly striving to increase the nutrient profile of our products, as well as innovate with new and nutritious offerings.”
https://www.timesnownews.com/amp/business-economy/companies/article/maggi-maker-nestl-s-internal-document-says-majority-of-its-food-products-unhealthy-report/764348?utm_campaign=fullarticle&utm_medium=referral&utm_source=inshorts
“ब्रह्माकुमारी संस्थान और मैं ”
ब्रह्माकुमारी संस्थान से मेरा परिचय तीन वर्ष पूर्व मई २०१८ में हुआ। ज्ञान सरोवर, माउंट आबू स्थित मुख्यालय के कला एवम् संस्कृति प्रभाग द्वारा उनके वार्षिक सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेने हेतु आमंत्रण प्राप्त हुआ, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया।और एक जिज्ञासु के रूप में माऊँट आबू पहुँचा।
ज्ञानसरोवर के अपने पाँच दिवसीय प्रवास में मुझे इस संस्थान और उसके उद्देश्यों को निकट से जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ।”राजयोग”से मेरा परिचय हुआ। सम्मेलन में अपने अनुभवों पर मैंने कई वक्तव्य भी दिये, वहाँ उपस्थित लोगों ने बहुत ही स्नेह एवं मनोयोग से सुना।
परन्तु मैं जिन्हें मिलना, सुनना और दर्शन करना चाहता था, वो थीं राजयोगिनी दादी जानकी जी। ये अभिलाषा जब मैंने सम्मेलन के व्यस्थापक श्री दयाल भाई और श्री सुभाष भाई के समक्ष प्रकट की तो उन्होंने मुझे सूचना दी कि दादीजी तो लन्दन में है, वो यहाँ होतीं तो आपसे अवश्य मिलतीं, आपको टोली (प्रसाद) और उपहार भी देतीं। क्योंकि दादीजी अपने अतिथियों को बिना उपहार दिये विदा नहीं करतीं हैं।
दयाल भाई और सुभाष भाई ने अपनी सेवा काल के प्रारम्भ से ही दादी जानकी को निकट से देखा और जाना है, मुझे उनके माध्यम से जो जानकारीयाँ मिलीं वो साँझा कर रहा हूँ...
राजयोगिनी दादी जानकी जी ने १२ वर्ष के बाल्यकाल में ही स्वयं को ओम् मंडली को पूर्ण समर्पित कर दिया था। मात्र चौथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त होने के बाद भी, अपने आध्यात्मिक ज्ञान, कर्तव्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता, संकल्पशक्ति, परिश्रम एवम् समर्पित सेवा भावना के कारण, मुख्य प्रशासिका के सर्वोच्च पद तक पहुँची और आजीवन सुशोभित किया।
वसुधैवकुटुम्बकम की भावना से विश्व कल्याण हेतु आदरणीय प्रकाशमणी दादीजी के कार्यकाल के समापन सन २००७ के पश्चात संस्थान के अन्य सदस्यों के सहयोग से १४० देशों में केन्द्रों की स्थापना की तथा दक्षता के साथ संचालन भी किया।
दादी जानकी अपने प्रवचन की कक्षाओं में आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ मनुष्य के व्यक्तिगत गुणों के विकास पर अत्याधिक बल देती थीं।
सादा जीवन उच्च विचार को मानने वाली दादी जब प्रथम बार लन्दन गईं, तो मात्र दो साड़ी लेकर गईं।आत्मविश्वास इतना था कि वो कहतीं... श्वेत वस्त्र और ख़ाली जेब, फिर भी विश्व भ्रमण करतीं थीं।
समय के महत्व को वो भलीभाँति जानती थीं, और बहुत ही व्यवस्थित रहती थीं तथा समय का सदुपयोग करती थीं।
एयरपोर्ट पर विमान की प्रतीक्षा करते हुवे यदि समय मिल जाता तो उनकी कक्षा वहीं प्रारम्भ हो जाती, जिसका लाभ वहाँ उपस्थित अन्य यात्रीगण भी उठाते थे।कई तो इतने प्रभावित और उत्साहित हो जाते थे कि संस्थान में सम्मिलित भी हो जाते थे।
संस्थान या किसी की कोई व्यक्तिगत समस्या, विवाद होता तो सम्बन्धित व्यक्ति को अपने वाहन में यात्रा करते हुवे बिठा लेती थीं, और यात्रा की समाप्ति तक निदान भी कर देतीं।
समय नष्ट ना हो अतः यात्रा अवधि में ही भोजन भी कर लेती थीं।
कोई कितनी भी बड़ी भूल कर दे, उन्हें क्रोध नहीं आता था, वो अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से ही उस व्यक्ति को उसकी भूल का आभास करा देतीं, और वह व्यक्ति स्वयं प्रायश्चित कर भूल सुधार कर लेता था।
यज्ञ ( संस्थान ) हेतु सर्वस्व समर्पण और सेवा उनका मूल मंत्र था। बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्होंने यज्ञ में अपना सर्वस्व दान कर दिया था, दादीजी को उनके सुरक्षित भविष्य की भी चिंता थी। अतः लन्दन के महेश भाई से अनुरोध कर माउंट आबू में “ शिवमणी” वृद्धाश्रम का निर्माण करवाया।
आत्मनिर्भरता उनमें कूट कूट कर भरी हुई थी, अपने सारे कार्य स्वयं करतीं थीं। वृद्धावस्था में जब साड़ी स्वयं पहनने में असमर्थता हुई तो किसी की सहायता ना लेकर, लम्बा कुर्ता पहनने लगीं जिससे किसी पर निर्भरता ना हो।
संस्थान के किसी कार्य हेतु यदि धन की कमी होती या कोई अन्य समस्या आती, तो वो सबको ढाँढस बँधाती, और अपने आत्मबल तथा संकल्प सिद्धी बल से भविष्य में उस कार्य को सफलता पूर्वक पूर्ण भी करातीं थीं।
उनका दृढ़ विश्वास था कि पवित्र विचारों और पवित्र मनोभावों से परमार्थ हेतु किए हुवे संकल्पों को बाबा अवश्य पूर्ण कराते हैं।
ऐसे अतिविलक्षण गुणों से परिपूर्ण थीं हमारी राजयोगिनी दादी जानकी जी।
*”क्रिया सिद्धि: सत्वे भवति महताम नोपकरणे” अर्थात् महान और तेजस्वी व्यक्तियों का कार्य उनके पराक्रम, उनके तेज से पूर्ण हो जाता है, उपकरण या साधन जुटाने से नहीं। और यह बात शत-प्रतिशत प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका परम आदरणीय, राजयोगिनी स्वर्गीय दादी जानकी जी पर पूर्णरूपेण चरितार्थ होती है।गत वर्ष २७ मार्च २०२० को १०४ वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया। किन्तु उनके महान कार्य, मानवता की सेवा की सुखद स्वर्णिम स्मृतियाँ ये संसार सदैव स्मरण रखेगा। वो हमारी स्मृतियों में हमारे हृदय में अनन्त काल तक बसी रहेंगी।
सम्मेलन की समाप्ति के पश्चात वापसी की यात्रा में मुझे ज्ञानसरोवर से शाँतिवन लाया गया जहाँ सुभाष भाई मुझे अपने साथ लेकर विशेष अतिथियों के भोजनालय पहुँचे और मुझे स्वादिष्ट भोजन कराया।
तदुपरान्त मृत्युंजय भाई ने सम्मान चिन्ह एवं शाल भेंट कर मुझे सम्मानित करते हुए विदा किया।
राजयोग आज प्रतिदिन अमृतबेला में मुझे मानसिक शाँति और आत्मशक्ति से परिपूर्ण, परमात्मा के प्रेम और शक्तियों से परिपूर्ण कर किसी भी परिस्थिति का सामना करने का साहस देता है।
मैं स्वयं को भाग्यशाली मानता हूँ। आभारी हूँ अपनी मित्र मोनिका पटेल जी का जिन्होंने मुझे इस दिव्य ईश्वरीय संस्थान एवं इसके सहृदय एवं विराट हृदय के अतिविनम्र सदस्यों से मेरा परिचय कराया।जिनमें सुभाष भाई, दयाल भाई, राम कृष्ण भाई, मीनेश भाई एवं सूरज भाई प्रमुख हैं। कुछ अन्य बहनों से भी परिचय हुआ था। ज्ञानसरोवर माऊँट आबू से आदरणीय सुभाष भाई एवं दयाल भाई निरन्तर मुझ जैसे अकिंचन व्यक्ति का मार्ग दर्शन करते रहते हैं, प्रेरणा देते रहते हैं।
वर्तमान महामारी के कठिन समय में भी वेबिनार द्वारा प्रखर वक्ता शिवानी जी और अन्य प्रबुद्ध वक्ताओं के साथ मुझे जोड़ते हैं तथा मुझे अपने अनुभव एवं विचारों को प्रस्तुत करने का सुअवसर प्रदान करते रहते हैं। मैं नतमस्तक हूँ और हृदय तल से आभारी हूँ।
- शैलेंद्र श्रीवास्तव
सुमित कुमार श्रीवास्तव ( वैज्ञानिक अधिकारी) भारत वर्ष में उपच्छायी चंद्र ग्रहण दिनांक 5 मई 2023 को रात्रि में 8.45 से 1.02 बजे तक दिखाई दे...