Saturday, June 5, 2021

ब्रह्माकुमारी का बेमिसाल अनुभव

“ब्रह्माकुमारी संस्थान और मैं ”

ब्रह्माकुमारी संस्थान से मेरा परिचय तीन वर्ष पूर्व मई २०१८ में हुआ। ज्ञान सरोवर, माउंट आबू स्थित मुख्यालय के कला एवम् संस्कृति प्रभाग द्वारा उनके वार्षिक सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेने हेतु आमंत्रण प्राप्त हुआ, जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया।और एक जिज्ञासु के रूप में माऊँट आबू पहुँचा।

ज्ञानसरोवर के अपने पाँच दिवसीय प्रवास में मुझे इस संस्थान और उसके उद्देश्यों को निकट  से जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ।”राजयोग”से मेरा परिचय हुआ। सम्मेलन में अपने अनुभवों पर मैंने कई वक्तव्य भी दिये, वहाँ उपस्थित लोगों ने बहुत ही स्नेह एवं मनोयोग से सुना। 

परन्तु मैं जिन्हें मिलना, सुनना और दर्शन करना चाहता था, वो थीं राजयोगिनी दादी जानकी जी। ये अभिलाषा जब मैंने सम्मेलन के व्यस्थापक श्री दयाल भाई और श्री सुभाष भाई के समक्ष प्रकट की तो उन्होंने मुझे सूचना दी कि दादीजी तो लन्दन में है, वो यहाँ होतीं तो आपसे अवश्य मिलतीं, आपको टोली (प्रसाद) और उपहार भी देतीं। क्योंकि दादीजी अपने अतिथियों को बिना उपहार दिये विदा नहीं करतीं हैं।

दयाल भाई और सुभाष भाई ने अपनी सेवा काल के प्रारम्भ से ही दादी जानकी को निकट से देखा और जाना है, मुझे उनके माध्यम से जो जानकारीयाँ मिलीं वो साँझा कर रहा हूँ...

राजयोगिनी दादी जानकी जी ने १२ वर्ष के बाल्यकाल में ही स्वयं को ओम् मंडली को पूर्ण समर्पित कर दिया था। मात्र चौथी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त होने के बाद भी, अपने आध्यात्मिक ज्ञान, कर्तव्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता, संकल्पशक्ति, परिश्रम एवम् समर्पित सेवा भावना के कारण, मुख्य प्रशासिका के सर्वोच्च पद तक पहुँची और आजीवन सुशोभित किया।

वसुधैवकुटुम्बकम की भावना से विश्व कल्याण हेतु आदरणीय प्रकाशमणी दादीजी के कार्यकाल के समापन सन २००७ के पश्चात संस्थान के अन्य सदस्यों के सहयोग से १४० देशों में केन्द्रों की स्थापना की तथा दक्षता के साथ संचालन भी किया।

दादी जानकी अपने प्रवचन की कक्षाओं में आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ मनुष्य के व्यक्तिगत गुणों के विकास पर अत्याधिक बल  देती थीं।

सादा जीवन उच्च विचार को मानने वाली दादी जब प्रथम बार लन्दन गईं, तो मात्र दो साड़ी लेकर गईं।आत्मविश्वास इतना था कि वो कहतीं... श्वेत वस्त्र और ख़ाली जेब, फिर भी विश्व भ्रमण करतीं थीं।

समय के महत्व को वो भलीभाँति जानती थीं,  और बहुत ही व्यवस्थित रहती थीं तथा समय का सदुपयोग करती थीं।

एयरपोर्ट पर विमान की प्रतीक्षा करते हुवे यदि समय मिल जाता तो उनकी कक्षा वहीं प्रारम्भ हो जाती, जिसका लाभ वहाँ उपस्थित अन्य यात्रीगण भी उठाते थे।कई तो इतने प्रभावित और उत्साहित हो जाते थे कि संस्थान में सम्मिलित भी हो जाते थे।

संस्थान या किसी की कोई व्यक्तिगत समस्या, विवाद होता तो सम्बन्धित व्यक्ति को अपने वाहन में यात्रा करते हुवे बिठा लेती थीं, और यात्रा की समाप्ति तक निदान भी कर देतीं।

समय नष्ट ना हो अतः यात्रा अवधि में ही भोजन भी कर लेती थीं।

कोई कितनी भी बड़ी भूल कर दे, उन्हें क्रोध नहीं आता था, वो अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से ही उस व्यक्ति को उसकी भूल का आभास करा देतीं, और वह व्यक्ति स्वयं प्रायश्चित कर भूल सुधार कर लेता था।

यज्ञ ( संस्थान ) हेतु सर्वस्व समर्पण और सेवा उनका मूल मंत्र था। बहुत से लोग ऐसे भी थे जिन्होंने यज्ञ में अपना सर्वस्व दान कर दिया था, दादीजी को उनके सुरक्षित भविष्य की भी चिंता थी। अतः लन्दन के महेश भाई से अनुरोध कर माउंट आबू में “ शिवमणी” वृद्धाश्रम का निर्माण करवाया।

आत्मनिर्भरता उनमें कूट कूट कर भरी हुई थी, अपने सारे कार्य स्वयं करतीं थीं। वृद्धावस्था में जब साड़ी स्वयं पहनने में असमर्थता हुई तो किसी की सहायता ना लेकर, लम्बा कुर्ता पहनने लगीं जिससे किसी पर निर्भरता ना हो।

संस्थान के किसी कार्य हेतु यदि धन की कमी होती या कोई अन्य समस्या आती, तो वो सबको ढाँढस बँधाती, और अपने आत्मबल तथा संकल्प सिद्धी बल से भविष्य में उस कार्य को सफलता पूर्वक पूर्ण भी करातीं थीं। 

उनका दृढ़ विश्वास था कि पवित्र विचारों और पवित्र मनोभावों से परमार्थ हेतु किए हुवे संकल्पों को बाबा अवश्य पूर्ण कराते हैं।

ऐसे अतिविलक्षण गुणों से परिपूर्ण थीं हमारी राजयोगिनी दादी जानकी जी।

*”क्रिया सिद्धि: सत्वे भवति महताम नोपकरणे” अर्थात् महान और तेजस्वी व्यक्तियों का कार्य उनके पराक्रम, उनके तेज से पूर्ण हो जाता है, उपकरण या साधन जुटाने से नहीं। और यह बात शत-प्रतिशत प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की मुख्य प्रशासिका परम आदरणीय, राजयोगिनी स्वर्गीय दादी जानकी जी पर पूर्णरूपेण चरितार्थ होती है।गत वर्ष २७ मार्च २०२० को १०४ वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया। किन्तु उनके महान कार्य, मानवता की सेवा की सुखद स्वर्णिम स्मृतियाँ ये संसार सदैव स्मरण रखेगा। वो हमारी स्मृतियों में हमारे हृदय में अनन्त काल तक बसी रहेंगी।

सम्मेलन की समाप्ति के पश्चात वापसी की यात्रा में मुझे ज्ञानसरोवर से शाँतिवन लाया गया जहाँ सुभाष भाई मुझे अपने साथ लेकर विशेष अतिथियों के भोजनालय पहुँचे और मुझे स्वादिष्ट भोजन कराया। 

तदुपरान्त मृत्युंजय भाई ने सम्मान चिन्ह एवं शाल भेंट कर मुझे सम्मानित करते हुए विदा किया।

राजयोग आज प्रतिदिन अमृतबेला में मुझे मानसिक शाँति और आत्मशक्ति से परिपूर्ण, परमात्मा के प्रेम और शक्तियों से परिपूर्ण कर किसी भी परिस्थिति का सामना करने का साहस देता है।

मैं स्वयं को भाग्यशाली मानता हूँ। आभारी हूँ अपनी मित्र मोनिका पटेल जी का जिन्होंने मुझे इस दिव्य ईश्वरीय संस्थान एवं इसके सहृदय एवं विराट हृदय के अतिविनम्र सदस्यों से मेरा परिचय कराया।जिनमें सुभाष भाई, दयाल भाई, राम कृष्ण भाई, मीनेश भाई एवं सूरज भाई प्रमुख हैं। कुछ अन्य बहनों से भी परिचय हुआ था। ज्ञानसरोवर माऊँट आबू से आदरणीय सुभाष भाई एवं दयाल भाई निरन्तर मुझ जैसे अकिंचन व्यक्ति का मार्ग दर्शन करते रहते हैं, प्रेरणा देते रहते हैं।

वर्तमान महामारी के कठिन समय में भी वेबिनार द्वारा प्रखर वक्ता शिवानी जी और अन्य प्रबुद्ध वक्ताओं के साथ मुझे जोड़ते हैं तथा मुझे अपने अनुभव एवं विचारों को प्रस्तुत करने का सुअवसर प्रदान करते रहते हैं। मैं नतमस्तक हूँ और हृदय तल से आभारी हूँ।                 

                                                             - शैलेंद्र श्रीवास्तव

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