Wednesday, June 16, 2021

आज भी रो रही है द्रौपदी

लेखिका-श्रीमती लीना पाणी







काव्यान्तरण  : प्रो .माला मिश्र







तुम निराश होकर रो रही थीं द्रौपदी,

और पांडव हँस रहे थे तुमको पाकर ,

तुम पांच हिस्सों में बंट गईं थीं ,

और सम्पूर्ण संसार तुम्हारे विभक्त अस्तित्व का उपहास कर रहा था ,

उस दिन तुम स्तब्ध खड़ी थीं टुकड़े टुकड़े होकर।


तुम जब पूर्णतः असहाय होकर रो रही थीं,

और तुम्हारे सखा कृष्ण अपनी गरिमा के साथ मुस्कुरा रहे थे ,

उस दिन कौरवों की आयताकार भरी सभा के बीच घिरी खड़ी थीं तुम ,

कृष्णा सदृश सखा के होते हुए भी इतनी निरुपाय हो गईं थीं तुम ।


तुम समूचे नारी समाज की प्रतिनिधि थीं ,

हे द्रौपदी ! तुम विषाद में निमग्न हो विलाप कर रही थीं ,

और यह संवेदनशून्य समाज तुम्हारी विषण्ण उदासी पर निर्लज्जता से हंस रहा था ,

उस दिन तुम क्यों अबला बन गईं द्रौपदी ! 

क्यों अन्याय के विरुद्ध अस्त्र उठाने में तुम अक्षम रह गईं ,

तुम तो इस पावन धरा की साहसी वीरांगना थीं ,

इस सच्चाई को आखिर तुमने क्यों भुला दिया।


तुम आज भी रो रही हो द्रौपदी ! 

तुम्हारा यह रुदन युगों युगों के लिए है ,

तुम्हें अपनी उस भूल से मुक्ति मिल जाती ,

जो अपनी मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ का स्वागत करने की बजाय ,

अपने हाथ में स्वयं खड़ग उठा लिया होता ,

तो आज उन दुराचारियों को 

कठोर दंड अवश्य मिल गया होता।।

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