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लेखिका-श्रीमती लीना पाणी |
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काव्यान्तरण : प्रो .माला मिश्र |
तुम निराश होकर रो रही थीं द्रौपदी,
और पांडव हँस रहे थे तुमको पाकर ,
तुम पांच हिस्सों में बंट गईं थीं ,
और सम्पूर्ण संसार तुम्हारे विभक्त अस्तित्व का उपहास कर रहा था ,
उस दिन तुम स्तब्ध खड़ी थीं टुकड़े टुकड़े होकर।
तुम जब पूर्णतः असहाय होकर रो रही थीं,
और तुम्हारे सखा कृष्ण अपनी गरिमा के साथ मुस्कुरा रहे थे ,
उस दिन कौरवों की आयताकार भरी सभा के बीच घिरी खड़ी थीं तुम ,
कृष्णा सदृश सखा के होते हुए भी इतनी निरुपाय हो गईं थीं तुम ।
तुम समूचे नारी समाज की प्रतिनिधि थीं ,
हे द्रौपदी ! तुम विषाद में निमग्न हो विलाप कर रही थीं ,
और यह संवेदनशून्य समाज तुम्हारी विषण्ण उदासी पर निर्लज्जता से हंस रहा था ,
उस दिन तुम क्यों अबला बन गईं द्रौपदी !
क्यों अन्याय के विरुद्ध अस्त्र उठाने में तुम अक्षम रह गईं ,
तुम तो इस पावन धरा की साहसी वीरांगना थीं ,
इस सच्चाई को आखिर तुमने क्यों भुला दिया।
तुम आज भी रो रही हो द्रौपदी !
तुम्हारा यह रुदन युगों युगों के लिए है ,
तुम्हें अपनी उस भूल से मुक्ति मिल जाती ,
जो अपनी मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ का स्वागत करने की बजाय ,
अपने हाथ में स्वयं खड़ग उठा लिया होता ,
तो आज उन दुराचारियों को
कठोर दंड अवश्य मिल गया होता।।
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