लेखक - कृष्ण कुमार शर्मा
पिछले एक साल यानि मार्च 2020 से मई 2021 के बीच के लॉक डाउन पीरियड में कोई 12 से 15 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए हैं । इनमे लाखों की संख्या में मीडियाकर्मी भी शामिल है। राष्ट्रीय , प्रादेशिक और जिला स्तर पर निकलने वाले अखबार के हजारों कर्मचारियों को रोज निकालेे जाने की खबरें आ रही हैं। नवभारत टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया लखनऊ एक बार फिर 90 के दशक का इतिहास दोहराने जा रहा है।लॉक डाउन के बाद पिछले साल कर्मचारियों कि छटाई की शुरुवात इंडिया टुडे जैसे बड़े ग्रुप ने की थी । पहले प्रिंट मीडिया में छटाई की फिर अपने टीवी चैनलों में । फिर जब टाइम्स ऑफ इण्डिया, नवभारत टाइम्स दिल्ली में भी बड़े पैमाने पर लोग निकाले गए तो उसकी देखा देखी हिन्दुस्तान टाइम्स, जागरण, अमर उजाला ने भी छटाई शुरू कर दी । पिछले साल टेलीग्राफ तक ने रांची के अपने सभी 30 कर्मचारियों को 6 महीने की तनख्वाह ( वो भी सिर्फ बेसिक सैलरी ) देकर हाथ में नोटिस थमा दिया कि अब कल से आने की जरूरत नहीं। सोचिए जो लोग कोराना के इस ख़तरनाक माहौल में रात दिन रिपोर्टिंग कर रहे थे , उस निष्ठा का पुरस्कार अचानक इस तरह दिया जाए तो उनके दिल पर क्या गुजरी होगी।
लॉक डाउन होते ही जब नवभारत टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया दिल्ली जैसे बड़े अखबार विज्ञापनों कि कमी के कारण 12-12 पेज के घर पर आए थे, तो पिछले साल इन्हीं दिनों
फेसबुक पर मैंने एक बड़ा लेख लिखा था कि कोराना कि सबसे ज्यादा मार देश के प्रिंट मीडिया यानि अखबारों पर पड़ने वाली है । आने वाले दिन अखबारों और उनमें काम करने वाले कर्मचारियों के लिए बड़े संकट के होंगे। संभव है कई अखबार बंद भी ही सकते हैं । वहीं अपशकुनी आशंका बाद में वास्तविकता में तब्दील हुई और उसका क्रम अब भी जारी है ।
यह हैरान करने वाली बात है कि जिन अखबारों पर देश और दुनिया में हो रहे शोषण और बुराइयों को उजागर करने की जिम्मेदारी है , वे खुद अपने कर्मचारियों के शोषण में बुरी तरह निमग्न हो गए हैं। वो भी तब जब कि बड़े समाचार पत्र समूहों का मुनाफा लगातार बढ़ रहा था। मेरे सामने 90 के दशक में भी नवभारत टाइम्स लखनऊ में 92 लोगों की एक ही दिन में नौकरी चली गई थी और एक अच्छा खासा चलता हुआ अखबार मालिकों ने अपनी ऐंठ के चलते अचानक बंद कर दिया। इस तरह के असंवेदनशील फैसले से कितने परिवार मुश्किल में पड़ जाएंगे ये अमीरी के नशे में डूबे मालिकान जरा भी नहीं सोचते।
मेरा ऐसा मानना है कि इन दिनों सरकारी नौकरी को छोड़कर प्राइवेट सेक्टर में अब किसी की भी आजीविका सुरक्षित नहीं। सभी को मानसिक रूप से अपने आपको तैयार कर लेना चाहिए कि उनका मालिक किसी भी दिन उनकी नौकरी छीन सकता है।इसलिए सभी को भले ही कोई छोटा मोटा ही सही अपने निजी व्यवसाय की तरफ अपने आपको केन्द्रित कर लेना चाहिए।
अखबार की दुनिया में आगे क्या होगा ? ____________________________________
अगर आगामी संभावनाओं पर गंभीरता से सोचे तो प्रिंट मीडिया में अपने लंबे अनुभव के आधार पर मै कह सकता हूं कि अखबार के मालिकान और इसके व्यावसायिक पक्ष यानि सर्कुलेशन और एडवरटाइजमेंट से जुड़े मैनेजमेंट के प्रमुख अब अखबारों को जिंदा रखने के लिए उसे लगभग रद्दी के भाव या मुफ्त देना भी शुरू कर सकते हैं। इससे भी बात अगर नहीं बनती है तो पाठक को अखबार पढ़ने के लिए पैसा भी दे सकते हैं । लोगों को आज मेरी यह बात चौंकाने वाली लग सकती है लेकिन लिख कर रख लीजिए आगे यही होगा।
इस दावे के पीछे अखबार व्यवसाय से जुड़ा इसका विशिष्ठ अर्थशास्त्र है,जिसे मैं सामान्य पाठकों कोयहां संक्षेप में समझाने का प्रयास करूंगा । अखबार के सर्कुलेशन यानि बेचने में तो अभी से नहीं युगों से नुकसान उठा रहे हैं अखबार के प्रकाशक। जितनी लागत में एक अखबार छपता है उसकी एक चौथाई कीमत भी अखबार को बेंचकर नहीं निकलती। टाइम्स ऑफ इंडिया नई दिल्ली का एक अखबार का छपाई मूल्य यानि कागज और छपाई में ही 12 रुपए का पड़ता है । इसके वितरण पर आने वाला खर्च और एजेंट कमीशन (33% ) भी जोड़ ले तो प्रकाशक को 2 रुपए भी एक अखबार बैंचकर नहीं मिलता। यह दूसरे उत्पाद जैसे साबुन या टूथपेस्ट की तरह नहीं है कि जितनी ज्यादा मात्रा में उत्पादन करोगे उसकी प्रोडक्शन कॉस्ट कम हो जाएगी। अखबार का अर्थशास्त्र ठीक इसके उल्टा है ।जितना छापोगे प्रति कॉपी उतना घाटा बढ़ेगा । इनकी आमदनी का सबसे प्रमुख और बड़ा जरिया विज्ञापन ही है । ज्यादा से ज्यादा विज्ञापनों के लिए बड़ा घाटा उठाकर भी अधिकाधिक सर्कुलेशन बढ़ाना सभी अखबार मालिकों की सार्वकालिक मज़बूरी रही है । हां यह जरूर है कि आने वाले दिनों में ये चुनौती पहले कहीं ज्यादा बढ़ जाएगी। वे अब "एबीसी" (ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन से प्रमाणित प्रसार संख्या) यानि आधिकारिक प्रतियों की सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहेंगे । कहने का मतलब कि वो " एबीसी" के अनुसार अपनी कमर्शियल और सरकारी विज्ञापन दर बढाकर अपनी आमदनी को लगातार बढ़ाने की कोशिश करेगे और इसकी खातिर सर्कुलेशन के मद में थोड़ा और घाटा बढ़ाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। तो दोस्तो तैयार रहिए आने वाले दिनों में अखबार फ्री पढ़ने के लिए। इसके ऑनलाइन डिजिटल संस्करण के माध्यम से भी कुछ कमाई करने के प्रयास में सभी प्रकाशन समूह बड़ी गंभीरता से जुट गए हैं क्योंकि इसमें अखबार को फायदा ही फायदा है। इस माध्यम में ना अखबार को छापने का झंझट है और ना उसे बेचने का। यानि जिस मद में प्रकाशन समूह को सबसे ज्यादा घाटा उठाना पड़ता है उसका इस ऑनलाइन डिजिटल संस्करण में कोई वास्ता ही नहीं।
आज भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मुकाबले भारत में प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता और लोकप्रियता पूरी तरह बरकरार है । विस्तार से समाचार विश्लेषण जो एक अखबार कर सकता है वो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बूते के बाहर है और आगे भी रहेगा। लोग अखबार में छपी उपयोगी सामग्री का संकलन भी कर सकते हैं और करते भी है। बस आज जरूरत है अच्छी और पठनीय सामग्री परोसने की जिसमे कुछ अरसे से पराभव साफ दिखाई दे रहा है ।
सबसे ज्यादा दिक्कत आने वाली है सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर रहने वाले छोटे और मध्यम दर्जे की पत्र पत्रिकाओं को ।क्योंकि आने वालों दिनों में सरकारी विज्ञापनों की आमद में बहुत बड़ी कमी आने वाली है ।राज्य सरकारों के जन संपर्क निदेशालयों की बात छोड़िए सूचना प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध "डीएवीपी " तक ने दो साल से अखबारों को सरकारी विज्ञापनों का भुगतान नहीं किया है । अस्तु सबसे ज्यादा जद्दोजहद छोटे पत्र पत्रिकाओं को ही करनी पड़ेगी अपने आपको जिंदा रखने के लिए। पिछले दिनों जबलपुर से निकलने वाली संग्रहणीय पत्रिका "पहल" के बंद होने को मैं हिंदी पत्रकारिता का दुर्भाग्य मानता हूं ।
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