Friday, August 6, 2021

'नृत्य ,संगीत और कला'व्यक्तित्व के उन्नायक :डॉ .राकेश कुमार दुबे

रबींद्र भारती विश्वविद्यालय ,कोलकाता तथा अध्ययन एवं अनुसंधान पीठ,दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में 'नृत्य ,संगीत और कला 'विषय पर बहुत  सुंदर  दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।इसके मुख्य समन्वयक आचार्य चंद्र थे।इस संगोष्ठी की मुख्यअतिथि कोलकाता के शिक्षण एवं प्रशिक्षण विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो .सोमा बंदोपाध्याय थीं।उन्होंने कहा कि ललित कलाओं एवं प्रदर्शनमूलक कलाओं पर यह संगोष्ठी एक अनूठी पहल है।इसमें विभिन्न कलाकारों के विचारों की प्रस्तुति के लिए सकारात्मक मंच प्रदान करना कला जगत के लिए बहुत श्रेयस्कर सिद्ध होगा।

इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ता थीं कथक की नवोदित अंतरराष्ट्रीय स्तर की ख्याति प्राप्त नृत्यांगना प्रयाग संगीत समिति की छात्रा शुभांगी ,भरतनाट्यम की उभरती प्रतिभा अश्नेशा ,सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवम कवयित्री रेणु हुसैन ,रबींद्र भारती विश्वविद्यालय की संगीत एवम कला विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो .महुआ मुखर्जी ,सुप्रसिद्ध चिंतक एवं आलोचक डॉ संदीप अवस्थी। 



शुभांगी ने कहा वर्तमान करोनाकाल में संगीत और नृत्य एक उपचारक की भांति कार्य कर रहा है।जीवन की रिक्तता को सकारात्मक रूप से भरकर उसे नई दिशाएँ दे रहा है।कथक भारत की प्रसिद्ध एवं प्राचीन प्रभावी नृत्य शैली है जिसे पुनः चिन्हित एवं विकसित कर देश की संस्कृति को नई पहचान दी जा सकती है।उन्होंने कथक की बहुत सुंदर एवं अभिराम नृत्य मुद्राओं एवं भाव भंगिमाओं का अद्भुत आकर्षक प्रदर्शन कर समस्त दर्शकों का मन मोह लिया।युवा नृत्यांगना

अश्नेशा ने व्यवहारिक उदाहरणों द्वारा नृत्य और संगीत को विज्ञान से संबंधित किया ,सुंदर गायन किया तथा उसके स्वास्थ्यवर्धक पहलुओं पर चर्चा की।

प्रो.महुआ मुख़र्जी ने गौड़ीय नृत्य शैली के विभिन्न पक्षों को रेखांकित किया और ललित कलाओं के दूरगामी प्रभावों 

की विस्तृत चर्चा की।

डॉ संदीप अवस्थी ने विविध कलाओं की सार्वभौमिक उपयोगिता पर गंभीर विमर्श किया।युवा प्रोफेसर तथा समीक्षक डॉ .राकेश कुमार दुबे ने कहा कि जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवन और समाज संगीत से जुड़ा हुआ है।विशेष रूप से ग्रामीण जीवन।सोलहों संस्कारों के लिए समाज में अलग अलग गीत प्रचलित हैं।गीत संगीत मनुष्य की आत्मा हैं।उसके अकेलेपन के सबसे बड़े संबल हैं।व्यक्तित्व की उदारता एवं सुकोमलता के उन्नायक हैं।

आचार्य चंद्र ने संगोष्ठी के उद्देश्यों एवं कार्यशैली पर गंभीरतापूर्वक विमर्श किया।साथ ही नवोदित कलाकारों और प्रतिभाओं को ही देश का भावी कर्णधार बताया।उन्होंने कहा कि युवा ऊर्जा और प्रतिभा के उन्नयन से ही भारतवर्ष को समृद्ध किया जा सकता है।

ललित कलाओं के प्रदर्शनधर्मी चरित्र एवं प्रभावों पर व्यावहारिक  चर्चा के साथ यह संगोष्ठी सम्पूर्ण हुई।

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