प्रेमचंद की 141 वीं जयंती के अवसर पर हिंदी साहित्य भारती की दिल्ली प्रदेश इकाई ने एक राष्ट्रीयतरंग संगोष्ठी का आयोजन किया जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर पी सी टंडन , विक्रम विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो .शैलेन्द्र कुमार शर्मा ,रांची विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो . जे. बी .पांडेय ,नार्वे के प्रतिष्ठित साहित्यकार सुरेश चंद शुक्ल जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे।इस कार्यक्रम के संयोजक डॉ .राकेश कुमार दुबे थे और मुख्य समन्वयक प्रो .माला मिश्र थीं।कार्यक्रम का कुशल ,भावप्रवण और सुंदर संचालन प्रो .माला मिश्र तथा डॉ . राकेश कुमार दुबे ने किया।
प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा प्रेमचन्द को स्मृतियों में याद करना बहुत यादगार है।उनका व्यक्तित्व बहुत जीवंत है भारत के ग्रामीण जीवन का प्रतिनिधि है।
प्रो.पी .सी .टंडन ने कहा प्रेमचंद का जीवन सादा जीवन उच्च विचार का दृष्टांत है।ग्रामीण सरोकारों की धरोहर है।
प्रो .जे .बी.पांडेय ने प्रेमचंद की कहानियों के पात्रों के संस्कारों और मूल्यों पर विस्तृत चर्चा की।नार्वे के विद्वान सुरेश चंद शुक्ल ने प्रवासी भारतीयों के मध्य प्रेमचंद के साहित्य के प्रति अटूट विश्वास के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये तथा प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कई सम्मान समारोहों के आयोजन के माध्यम से प्रेमचंद की रचनाओं की प्रासंगिकता चर्चा परिचर्चा का उल्लेख किया।
प्रो .माला मिश्र ने कहा प्रेमचंद भारत की मिट्टी के लेखक हैं।भारत के गांव में उनकी आत्मा बसती है।वह जीवन शिल्पी कथाकार हैं। डॉ .राकेश ने प्रेमचंद के कथासाहित्य में विद्यमान ग्रामीण तत्वों का उल्लेख करते हुए उन्हें हिंदी का सबसे बड़ा लेखक बताया।साथ ही उनको दी गई कलम का सिपाही और उपन्यास सम्राट की संज्ञा को सार्थक बताते हुए तरंग संगोष्ठी को बौद्धिक परिपूर्णता प्रदान की।
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