लेखक - गौरव बाजपेई
आज जहां घर है,
कल वहां पेड़ था!
आज जहां सड़क है,
कल वहां पेंड़ था!
आज जहां खेत है,
कल वहां पेंड़ था!
आज जहां प्लॉट है,
कल वहां पेंड़ था !
आज यहां जो कुछ भी,
उसके पीछे जंगल था!
आज यहां जीवन भी,
उसके पीछे पेड़ था!
पेंड़ नही बाधा है,
पेंड़ से तो प्राण है!
पेंड़ से ही आशा है,
उसके बिन सब निष्प्राण हैं।
पेंड़ एक सैनिक
जो लड़ता प्रदूषण से
पेंड़ एक डॉक्टर,
जो रोगी न बनने दे
पेंड़ एक कृषक,
जो भोजन दे सबको ही,
पेंड़ एक माली,
जो वंदन को पुष्प दे
पेंड़ तो है माता सा,
आँचल से छांव दे,
पेंड़ तो है पिता सा,
जीवन को मुकाम दे!
पेंड़ तो है मित्र सा,
जो देता और देता रहे,
पेंड़ तो है ईश्वर,
जो जीवन का आधार दे!
पेंड़ सा पवित्र कौन?
कभी जो अपराधी नही!
पेंड़ सा तपस्वी कौन?
जीवन भर तपता रहे!
पेंड़ नीलकंठ सा,
जो हलाहल पीता रहे,
पेंड़ तो है अमृत कलश,
अमृत मानव को देता रहे!
पेंड़ एक संसार,
वहां प्राणी पंक्षी पलें,
पेंड़ से ही है बहार,
बसन्त में फूल खिले!
पेड़ जो कर सकता
कोई नहीं कर सकता
पेड़ जितना दे सकता
कोई नहीं दे सकता!
अनमोल है पेंड़ देव
बस लकड़ी का मोल लगे
साँस सबकी साधे रहे,
फिर भी सबको बाधा लगे!
पेंडो से प्रारम्भ है,
पेड़ों से साँस शुरू,
पेंडो सा है यार कौन?
अंत मे जो साथ जले!
पेड़ों सा है यार कौन
अंत मे जो साथ जले!
#पेंड़भीसड़क_भी
#बरगदबाबा
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