Monday, January 31, 2022

शतरंज के खिलाड़ी - "तुलनात्मक एवं समीक्षात्मक विश्लेषण" - By PRAKHAR

 

एक जमाने में कहा जाता था कि जिसको ना दे मौला उसको दे सुराजुद्दौला, सुराजुद्दौला अपने समय के दानवीर राजा थे उनके शासनकाल के बाद... लखनऊ में मौजूद तमाम मीनार और इमारतें उन्हीं के काल में बनी उनका एक शेर भी था " जहां में जहां तक जगह पाइए, इमारतें बनाते चले जाइए "

प्रेमचंद्र की "शतरंज के खिलाड़ी" कहानी वाजिद अली शाह के समयकाल की है | कहानी का मूल भाव दर्शाता है कि किस प्रकार शहर के संरक्षण को नज़रअंदाज करते हुए, सियासी सूरमाओ ने अपनी वर्चस्व की लड़ाई शतरंज के लिए लड़ी, रफ्तार से तबाही की ओर बढ़ते समाज से अधिक तीव्रता के साथ दोनों बादशाहों ने एक दूसरे की जान ले ली | दोनों का आपसी रिश्ता जहाँ मित्रता को रेखांकित करता है तो वहीं मूर्खता को भी प्रकट करता है, तो एक और कहानी अंग्रेज शासक डलहौजी की क्रूरता का भी जिक्र करती है |

किताब में 

इस कहानी में लखनऊ को शाही विलासिता में डूबा हुआ एक नगर दिखाया गया है जहाँ गरीब हो या अमीर सब मस्ती में शिरकत करते हैं | कोई कारीगरी करता तो कोई मजलिस सजाता, फकीरों को पैसे मिलते तो वे रोटियां न लेकर अफीम खाते...

शतरंज का शुमार इस शहर में सर चढ़कर बोलता था और तर्क दिया जाता कि शतरंज, ताश आदि खेलने से विचार शक्ति का विस्तार होता है |

बड़ी जागीर वाले बादशाह मिर्जा सज्जाद अली और बादशाह मीर रोशन अति घनिष्ट दोस्त होने के साथ ही शतरंज के ऐसे शाही खिलाड़ी थे जिन्हें ना तो अपने जीविका की चिंता थी ना ही समाज की..

एक की बेगम इस बात से खफा रहती थी कि उनके पुरुष उन्हें शतरंज के कारण समय क्यों नहीं देते हैं तो दूसरे की बेगम इस बात से खफा कि मेरे पुरुष घर से बाहर क्यों नहीं जाते हमेशा घर पर हुक्का पीते हुए शतरंज की चालें चला करते हैं |

रईसों का यह हाल था तो प्रजा की अल्लाह ही मालिक, प्रजा दिनदहाड़े लूटी जाती, बादशाह शतरंज के खेल को कम सियासी नहीं समझते थे बल्कि ऐसे प्यासे शूरमाओं की तरह लड़ते थे जैसे मानो असल युद्ध चल रहा हो  | 

इसलिए लखनऊ की बादशाहत का शतरंज के हातों तबाह होना निश्चित ही था |

एक बार जब दूसरी फौज ने हमला करने का फरमान भेजा तो दोनों बादशाह बचते हुए गोमती किनारे जा जमे और शतरंज की चालें जारी रखीं, मानो जैसे अक्ल और हिम्मत दोनों शतरंज ने चुरा ली हों |

राजनीतिक डांस के चलते क्षेत्र में संग्राम जैसे हालात थे, और लोग बच्चों को लेकर देहात की ओर भाग रहे थे |

ऐसे में जनाब वाहिद अली शाह पकड़ लिए गए और सेना उन्हें किसी अज्ञात जगह ले जाने लगी |

लखनऊ मानो जैसे ऐश की नींद सो रहा था, स्वाधीन राज्य के राजा की पराजय इतनी शांति से शायद इतिहास में ना हुई होगी कि जब ना ही मार-काट हुई, ना ही एक बूंद खून गिरा...

उधर विलास से भरे दोनों बादशाह मित्र शतरंज की चाल के दांवपेच में हुई नोकझोंक के चलते आपसी विवाद में पड़ गए, जो कि बढ़ते बढ़ते अहम Ego और व्यक्तिगत वीरता की लड़ाई में बदल गया, और तलवार बाजी में एक दूसरे को हराते हराते वो दोनों जीवन से हाथ धो बैठे.

गोमती पार नवाब सिराजुद्दौला की पुरानी वीरान मस्जिद में दोनों बादशाह शतरंज के अपने-अपने वजीर की रक्षा में प्राण गवा चुके थे, अंधेरा हो चला था बाजी बिछी हुई थी, सिंहासन पर बैठे शतरंज के बादशाह मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे |

किताब में जो छिपाया गया

किताब में अंग्रेज अधिकारियों और उनकी चाल बाजियों के बारे में तनिक भी नहीं बताया गया है, इसका कारण शायद प्रेमचंद्र जी का संकेतिक लेखन रहा होगा |

• किताब में दो महत्वपूर्ण बातों का विवरण नहीं था पहला कि वाजिद अली शाह द्वारा अपने पसंदीदा ताज को जब लंदन की एक प्रदर्शनी भेजा गया तो तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने लिखा था " the rich at Lucknow who has sent his crown to the exhibition, would have done his people and us a great service if he sent his head in it ; never missed it, that is the cherry which will drop into his mouth one day " जिसका अर्थ है "लखनऊ के जिस राजा ने अपना मुकुट भेजा है बहुत अच्छा होता कि वह अपना सिर भी भेजता अवध के सरताज का सर चैरी की तरह हड़प लिया जाए |"

• और दूसरा जब नवाब सुजाउदौल ने हिमाकत के चलते अंग्रेजी सेनाओं को चुनौती दे डाली और बदले में हार हासिल हुई, लेकिन अंग्रेजों की दरियादिली यह थी कि उन्होंने रियासत लेने के बजाय 50 लाख रुपए हर्जाने में लिए और दोस्ताना शपथ पत्र में दस्तखत करवाए, जिसमें उल्लेखित था कि जब भी अंग्रेजों को किसी जंग में पैसे की जरूरत पड़ेगी अवध के दरबार खुले रहेंगे |

 फिल्म 

Devki Chitra Presents || Based on story By Prem Chandra

- Amjad Khan as Wajid Ali Shah, - Ricchard Attenborough as general outram, - Sanjeev Kumar , - Saeed Jafreey , - Shabana Azmi , - Fareeda Jalal , - Veena , - Devid Abraham, - Victor Banerjee , - Farooq Shekh , - Tom Alter , - Leela Mishra , - Barry John, - Samarth Narain.

फ़िल्म के इंट्रो में कहानी का जिस्ट समझ आने का एक कारण यह भी हो सकता है कि उसकी रूपरेखा मैंने किताब में पहले पढ़ रखी है, मगर फर्क उतना ही महसूस होता है जितना कि किसी एक खबर को पेश करने में अखबार की भाषा शैली और टेलीविजन कार्यक्रम की स्क्रिप्ट की भाषा शैली में होता है |

किताब पढ़ कर दिमाग ने जो छवियां बनाई, उस छवियों को चार चांद लगा कर के मलाई मक्खन लगा के फिल्म में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया |

फिल्म में कई जगह बात को समझाने के लिए ब्लैक एंड व्हाइट ओल्ड एनिमेशन का भी प्रयोग किया गया है, जोकि हल्के अंदाज में दर्शक की रुचि बनाए रखने में प्रभावी है |

फिल्म के रोमांचक दृश्य जो किताब में न थे |

•} फिल्म में 49वें मिनट पर एक बुजुर्ग वकील की मृत्यु के बाद 5 मिनट लम्बा गाना फिट किया गया है जो कि कुछ इस प्रकार है

" कान्हा मैं तो से हारी छोड़ो हरि, सुनो बिहारी नहीं मैं दूंगी तुम्हें गारी " अमूमन आजकल की फिल्मों में मृत्यु पश्चात कोई गीत कम ही मिलता है जिसमें ईश्वर से सवालिया शिकायत की गई हो |


शायद गाने की गुंजाइश बनाए रखने के लिए ही फिल्म निर्देशक ने इससे ठीक पहले वकील की मृत्यु का सीन डाला और बादशाह मिर्जा सज्जाद अली के शतरंज की गोटियां चूरवा दीं, शतरंज खेलने के लोग के कारण ही दोनों मित्र बादशाह उस बुजुर्ग वकील के घर पहुंचे थे |


परंतु ऐसा कोई भी किस्सा किताब में नहीं मिलता 

•} फिल्म में 10 मिनट 26 सेकंड पर अंग्रेज रेसिडेंट जनरल उटरम जब अपने खबरिया से राजा के बारे में कंफर्म करते हुए पूछते हैं कि Why he Prays 5 time a day ? & What is Mushayra ? उनका खबरिया उन्हें बताता है कि A Mushayra is a gathering of poet., & concept of five times prayer is known as Namaz तभी मस्जिद से नमाज की आयतों का उपचार सुनाई देता है और जनरल उटरम कहते हैं कि तुम तो यही के हो, यहां की भाषा जानते हो तो यह जो आवाज सुनाई दे रहे हैं इसका अनुवाद बताओ... जवाब मैं खबरिया सुनाई पड़ रही कुछ आयतों का अर्थ हिंदी उच्चारण में बताता है जो कि फिल्म का बेहद खूबसूरत दृश्य है | जिसके बाद राजा की तमाम आदतों और नगर के हालात तो बर्बाद होने लगती है |

•} फिल्म में 19वें मिनट में एक दफा शतरंज के चलते खेल के बीच जब एक बुजुर्ग मुंशी का महल में आना हुआ, तो उन्होंने बताया कि यह इरानी खेल नहीं है बल्कि भारत से विलायत तक पहुंचा, किसको खेलने के दो तरीके हैं एक हिंदुस्तानी और एक अंग्रेजी, अंग्रेजी तरीके में फर्क सिर्फ इतना है कि पैदल दो घर चलता है तो वही वजीर को रानी का जाता है जो की आमने सामने खड़ी होती हैं |

 •} 7 फरवरी 1856 को जब जनाब वाजिद अली शाह सत्ता छोड़ी और अवध पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हुआ तब वाजिद अली शाह को फिल्म में यह गाते दर्शाया है कि  "जब छोड़ चले लखनऊ नगरी, कहे हाल के हम पर क्या गुज़री" 


किताबी हिस्सा जो फिल्म में छिपाया गया

•} किताब में ऐसा दर्शाया गया है कि जब बेगम इस बात से खफा होती हैं कि उनके पुरुष उन्हें शतरंज के कारण समय नही देते तो हरिया को भेजकर कई दफा उनको बुलाने का प्रयास करती, कई प्रयासों के बाद जब वह आ जाते हैं तो उनसे नाराजगी व्यक्त करती और किताब अनुसार क्रोध में जा कर शतरंज की गोटियां बाहर फेंकते हुए गेट बंद कर देते हैं और उनके साथी खिलाड़ी बाहर खड़े रह जाते और गुस्से की आहट सुनकर चुपचाप रवाना हो जाते....

जबकि फिल्म में महारानी को क्रोध में तो दिखाया है पर इतना नहीं कि उन्होंने साथी खिलाड़ी के मुंह पर गेट बंद कर दिया हो और गोटियां बाहर फेंक दी हों, बल्कि ऐसा दिखाया गया है कि महारानी गुस्से में तो है पर वह अपने क्रोध को बड़े ही मासूमियत से व्यक्त कर रही हैं, उसमें उनकी रोमांस करने की चाहत की झलक भी प्रस्तुत की गई है पर अंत में वह रात भर जाग कर अपने क्रोध की अभिव्यक्ति करती हैं |

•) "उल्फत ने तेरी हमको ना रखा कहीं का दरिया का ना जंगल का, हवा का ना ज़मीं का" यह शेर मीर साहब ने फिल्म के अंत भाग में आपसी लड़ाई से पहले कहा था, जब की किताब में शेर का कोई जिक्र ना था | हो सकता है बड़े पर्दे मांग पर ये शेर डाला गया हो लेकिन किताब के पेज नंबर 18 पर लिखा था कि " दोनों जख्म खाकर गिरे और दोनों ने वहीं तड़प-तड़प कर अपनी जान दे दी | अपने बादशाह के लिए जिनकी आंखों से एक बूंद पानी न निकला उन्हीं दोनों प्राणियों ने शतरंज के वजीर की रक्षा में प्राण दे दिए | अंधेरा हो चला था | बाजी बिछी हुई थी | दोनों बादशाह अपने अपने सिंहासन पर बैठे मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे | "


 जबकि फिल्म में दोनों के बीच तीखी नोकझोंक होती है और बंदूक भी चलती है मगर फिर मामला सुलझ जाता है किसी की मृत्यु नहीं होती है और फिल्म का अंत अच्छी सिनेमैटोग्राफी के साथ वजीर की गोटी पर फोकस करते हुए 'मल्लिका विक्टोरिया तशरीफ ला रही हैं ' की गूंज के साथ हुआ |







मेरी बात और निष्कर्ष

•> सीरियस फिल्म को भी हमेशा मस्ती के मिजाज से देखा है भले ही उस से बहुत कुछ सीखने को मिला हो या फिर हंसी आई हो, कुछ मौकों पर समीक्षा के नजर से भी देखा पर इस असाइनमेंट के द्वारा एक तुलनात्मक विश्लेषण का अनुभव प्राप्त हुआ जहां न सिर्फ फिल्म का सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष गौर करना था ना सिर्फ किताब जिस पर फिल्म आधारित है उसका सकारात्मक नकारात्मक पक्ष बल्कि साथ ही में दोनों की तुलना भी करनी थी जो कि मेरे लिए निजी रूप से नया अनुभव था |

सच कई बार या शायद हमेशा ही फिल्टर हो कर आता है अनुवादक हो या लेखक, लिखते वही हैं जो दिखाना चाहते हैं ना कि वो जो सच होता है या शायद सच इतना सादा होता है कि बिना बात घूमाए फिराए उसे बेचा नहीं जा सकता |
 एक पत्रकार के तौर पर मेरा सुझाव यह हो सकता है कि जब मुगल साम्राज्य और लखनऊ की नजाकत को फिल्म में जोर दे कर दिखाया गया था, तो उस समय का वह हिस्सा भी शामिल करना चाहिए था जो कि भावी भविष्य में एक उदाहरण बन सकता था, और फिल्म के माध्यम से होता तो शायद और भी जोरदार तरह से...
 वह यह कि उस समय काल में ही वाजिद अली शाह के लखनऊ से बेदखल होने पर अफवाह उड़ी कि अंग्रेज उन्हें लंदन ले जा रहे हैं | तब लखनऊ की औरतों ने कैसर बाग़ में जमा होकर गाया ' हजरत जाते हैं लंदन, कृपा करो रघुनंदन '
यह भाग भी यदि फिल्म में पूरी मौलिकता के साथ दिखाया जाता तो तमाम उम्र तक जीवित रहता...
एक सवालिया शिकायत समाज और सरकार से भी हुई की क्रूर शासक डलहौजी जिसके अत्याचारों से भारतवासी पीड़ित रहे, आजादी के इतने साल बाद भी उसके नाम से इतनी जगह क्यों बनी हुई है ? क्या भला कोई देश गुलामी के प्रतीकों को इस तरह संजो कर रखता है ?
बात जहाँ तक रही शतरंज की तो जावेद साहब की कुछ पंक्तियों के साथ आपसे विदा लेता हूँ |

ये खेल क्या है 

मेरे मुखालिफ़ ने चाल चल दी है  और अब मेरी  चाल के इंतेज़ार में है
मगर मैं कब से सफ़ेद खानों सियाह खानों में रक्खे काले-सफ़ेद मोहरों को देखता हूँ

मैं सोचता हूँ ये मोहरे क्या हैं

अगर मैं समझूँ कि ये जो मोहरे हैं सिर्फ लकड़ी के हैं खिलौने
तो जीतना क्या है हारना क्या

न ये ज़रूरी , न वो अहम है

अगर खुशी है न जीतने की
न हारने का ही कोई ग़म है

तो खेल क्या है

मैं सोचता  हूँ , जो खेलना है
तो अपने दिल में यक़ीन कर लूँ

ये मोहरे सचमुच के बादशाहो-वज़ीर

सचमुच के हैं प्यादे और इनके आगे है
दुश्मनों की वो फ़ौज

रखती है जो कि मुझको तबाह करने के 
सारे मनसूबे सब इरादे

मगर मैं ऐसा जो मान भी लूँ तो सोचता हूँ
ये खेल कब है , 

ये जंग है जिसको जीतना है
ये जंग है जिसमें सब है जायज़

कोई ये कहता है जैसे मुझसे
ये जंग भी है, ये खेल भी है

ये जंग है पर खिलाड़ियों की
ये खेल है जंग की तरह का

मैं सोचता हूँ जो खेल है
इसमें इस तरह का उसूल क्यों है

कि कोई मोहरा रहे कि जाए
मगर जो है बादशाह उसपर कभी कोई आँच भी न आए

वज़ीर ही को है बस इजाज़त कि जिस तरफ़ भी वो चाहे जाए

मैं सोचता हूँ जो खेल है ,इसमें इस तरह का उसूल क्यों है

प्यादा जो अपने घर से निकले पलट के वापस न जाने पाए

मैं सोचता हूँ अगर यही है उसूल तो फिर उसूल क्या है

अगर यही है ये खेल, तो फिर ये खेल क्या है

मैं इन सवालों से जाने कब से उलझ रहा हूँ

मिरे मुखालिफ़ ने चाल चल दी है
और अब मेरी चाल के इंतेज़ार में है।

https://youtube.com/playlist?list=PLD787A9F467130846

Sunday, January 30, 2022

गांधी की समकालीन अनिवार्यता

अध्ययन एवं अनुसंधान पीठ भारत और  क्वाजुलु विश्वविद्यालय ,दक्षिण अफ्रीका के संयुक्त तत्वावधान में गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी पुण्य स्मृति में एक अंतरराष्ट्रीय तरंग  संगोष्ठी का आयोजन किया गया।जिसका विषय था -' गांधी की समकालीनअनिवार्यता।'इस संगोष्ठी के मुख्य समन्वयक थे आचार्य चन्द्र।इस कार्यक्रम में डॉ .लोकेश महाराज, दक्षिण अफ्रीका ने अध्यक्षता की।मोतिहारी के महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष प्रो .राजीव कुमार इसमें मुख्य अतिथि थे। प्रमुख आमंत्रित वक्ताओं में दिल्ली विश्वविद्यालय की वरिष्ठ प्रोफेसर माला मिश्र , प्रख्यात आलोचक डॉ. संदीप अवस्थी तथा  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के  अध्येता प्रोफेसर अवधेश कुमार शुक्ल उपस्थित थे।


प्रोफेसर माला मिश्र ने कहा गांधी तृणमूल स्तर के भारत की मिट्टी से जुड़े सामाजिक उन्मूलन कर्ता थे जिनकी आवश्यकता हर युग को रहेगी।प्रो .राजीव कुमार ने कहा गांधी के विचार हमेशा जन जन में जीवंत रहेंगे। डॉ .संदीप अवस्थी ने माना कि गांधी भारतीय संस्कृति के उन्नायक हैं।डॉ .राकेश कुमार दुबे ने कहा गांधी को कथनी से नहीं करनी से ही साक्षात किया जा सकता है।यही समकालीन अनिवार्यता है।अध्यक्ष डॉ.लोकेश महाराज ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में भी गांधी का योगदान अप्रतिम है।सत्याग्रह का मूल मंत्र गांधी ने यहां से ही दिया था ।मुख्य समन्वयक आचार्य चंद्र ने कहा - गांधी समूची मानवीयता के रक्षक एवं अंतिम जन के समर्थक  थे और उनकी वैचारिकी ही उनका संदेश है।

इस प्रकार गंभीर मंथन के साथ इस विचारोत्तेजक तरंग संगोष्ठी का प्रभावी समापन हुआ।

Wednesday, January 26, 2022

“अमृत महोत्सव”

शैलेंद्र श्रीवास्तव

 





प्रसिद्ध अभिनेता व लेखक, मुंबई









अमृत महोत्सव वर्ष ,

         नव संकल्प होना चाहिए।

विश्व में सबसे प्रबल,

            भारत ही होना चाहिए॥

निस्वार्थ सेवाभाव से,

                 नेतृत्व होना चाहिए।

 हो वंश-वाद से मुक्त,

         वो गणतंत्र होना चाहिए॥

तुष्टिकरण का राष्ट्र से,

            अब अन्त होना चाहिए।

जैसी हो जिसकी योग्यता,

           पद प्राप्त होना चाहिए॥

स्वार्थ लालच पाप का,

            अब अन्त होना चाहिए।

हो समर्पित राष्ट्र को,

           जीवन वो होना चाहिए॥

स्वदेश निर्मित वस्तु पर,

               हमें गर्व होना चाहिए।

कुटीर ग्राम उद्योग का,

             विस्तार होना चाहिए॥

स्वच्छ हो गंगा का जल,

            अमृत सा होना चाहिए।

हो आत्मनिर्भर राष्ट्र,

         पूर्ण समृद्ध होना चाहिए॥

प्राचीन धर्म स्थलों का,

            पुनरोद्धार होना चाहिए।

भारत पुनः हो विश्वगुरु,

           ये प्रयास होना चाहिए॥

प्रगति की सम्भावना,

                अनन्त होना चाहिए।

संस्कृति सनातन धर्म पर,

           अभिमान होना चाहिए॥

पाठ्यक्रम शिक्षा में भी, 

              बदलाव होना चाहिए।

आधुनिक शिक्षा मिले,

        गुरुकुल भी होना चाहिए॥

निज देश भाषा ज्ञान का,

                बखान होना चाहिए।

जो देश की रक्षा करे,

              विज्ञान होना चाहिए॥

वीर- वीरांगनाओं का,

              गुणगान होना चाहिए।

बेटियाँ अभिमान हैं,

              ये सोच होना चाहिए॥

स्वर्णिम सत्य इतिहास का,

            पुनर्लेखन होना चाहिए।

राष्ट्र जिनका है ऋणी,

              सम्मान होना चाहिए॥

खेल कूदों में भी नित, 

               उत्थान होना चाहिए।

शीर्ष पर पहुँचे ये भारत,

          कीर्तिमान होना चाहिए॥

योग राजयोग जीवन सँवारे,

   चित्त की ये वृत्ति होना चाहिए।

वीर जो करें सीमा सुरक्षित,

    देश में सम्मान होना चाहिए॥

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक सभी का,

         पूज्य स्थान होना चाहिए।

शस्त्र से हो सेना सुसज्जित,

   देख शत्रु काँप जाना चाहिए॥

ड्रैगन यदि दुस्साहस करे तो,

 गलवान सा शौर्य होना चाहिए। पराक्रम जब सेना दिखाए,

     प्रश्न कोई ना होना चाहिए॥

छुपें हों आतंकी जहाँ भी,

        तत्काल वध होना चाहिए।

राष्ट्रवाद राष्ट्र परम्परा हो,

      नव्य संस्कार होना चाहिए॥

Monday, January 24, 2022

Kaizzen partners with TERI for World Sustainable Development Summit 2022

Kaizzen, an integrated communication agency, has partnered with The Energy and Resources Institute (TERI), the not-for-profit, policy research organization, as an Outreach Partner for World Sustainable Development Summit (WSDS) 2022. WSDS is TERI’s annual flagship event, which will be virtually held from 16-18 February 2022. The umbrella theme of the year is ‘Towards a Resilient Planet: Ensuring a Sustainable and Equitable Future.’

"By driving multi-stakeholder conversations, the World Sustainable Development Summit series seeks to play a constructivist role to reinforce commitment towards a more sustainable and equitable world," said Dr. Shailly Kedia, Senior Fellow, and Associate Director, TERI. "The role of media and communications is extremely crucial to strengthen the momentum on sustainable development. Partnering with organizations such as Kaizzen is a step towards effectively amplifying the message," she added. 

 

As an outreach partner, Kaizzen will work along with the TERI communications team to strengthen media and social media outreach for WSDS 2022.

Speaking on the partnership Vineet Handa, CEO, Kaizzen, said, “Kaizzen is proud to partner with TERI’s prestigious World Sustainable Development Summit 2022. The age-old, celebrated event brings several countries together to find sustainable solutions towards a healthier planet. I believe that ESG will be a great focus area of the industry and the corporates this year. As communications consultants, we have been an advocate of sustainability and therefore we fully resonate with this year’s WSDS theme which is futuristic, progressive, and highly ambitious. Lastly, I would like to thank TERI for this opportunity and commit my support as their outreach partner.”

Looking at the current planetary crisis which calls global action, TERI has been holding a series of events for 2 decades to encourage and promote sustainable development and climate action around the globe, with a special emphasis on developing nations like India. The last edition of the event was inaugurated by India’s Hon’ble Prime Minister, Mr. Narendra Modi and witnessed the participation of over 100 countries.

 

The summit will focus on planetary health along with socioeconomic crises that the entire world is grappling with, primarily due to the pandemic. Together with the other countries, the event is aimed at drawing global measures towards sustainable development, environmental stewardship, poverty eradication measures, and health and education, which are crucial in achieving sustainability goals.

Kaizzen enjoys a diverse portfolio with brands such as Vedanta, Jindal, hunting PLC, Electrosteel Limited, Adidas, Perrier, Embassy of Sweden, Embassy of Norway, Yale University, Enterprise Ireland, and UNICEF, amongst others. In recent times, it has been ranked as the fastest-growing PR agency in India, the fourth fastest-growing PR agency globally, and second fastest in Asia-Pacific in the Provoke Global PR Agency Rankings 2021. It has also been awarded the ‘Agency of the Year (Mid-Sized)’ at ET Brand Equity – Kaleido Awards’21.

Saturday, January 15, 2022

संकल्प सेवा समिति के द्वारा कम्बल वितरण

आज मकर संक्रांति के पवन पर्व पर संकल्प सेवा समिति की टीम ने कृष्णा फाउंडेशन एकेडमी विद्यालय में पहुंचकर वँहा के सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को तथा दैनिक मजदूरों को कम्बल वितरित किये, आज संश्था के संरक्षक राजनारायण द्विवेदी ने अपने हाथों से सभी कर्मचारियों एवं दैनिक मजदूरों को कम्बल वितरित किये, संश्था के अध्यक्ष सन्तोष सिंह चौहान ने बताया कि पिछले 6 वर्षों से प्रत्येक सर्दियों में संश्था के द्वारा सभी के सहयोग से कम्बल वितरण किया जाता है, ये कम्बल वितरण इसी प्रकार चलता रहेगा, आज कम्बल वितरण कार्यक्रम में संश्था के अध्यक्ष सन्तोष सिंह चौहान, राजनारायण द्विवेदी, माया द्विवेदी, राजकुमार मिश्रा, पुनीत, रजनेश, विमल आदि लोग उपस्थित रहे|

Tuesday, January 11, 2022

हिंदी भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान : विकास दवे , निदेशक ,साहित्य अकादमी,मध्य प्रदेश

 विश्व हिंदी दिवस (10जनवरी) के अवसर पर अध्ययन एवं अनुसंधान पीठ द्वारा आज़ादी का अमृतमहोत्सव को समर्पित अंतरराष्ट्रीय तरंग गोष्ठी  "हिंदी का वैश्विक विस्तार और मूलभूत चुनौतियाँ"  का आयोजन वरिष्ठ प्रोफेसर माला मिश्र, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयोजन में आयोजित किया गया। संगोष्ठी में प्रमुख वक्ता थे- सीनियर रेडियो ब्रॉडकास्टर, भाषा एवं संस्कृति सेवी व लेखक पार्थसारथि थपलियाल, डॉ. राकेश दुबे, अध्यक्ष जनसंचार विभाग चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, डॉ. शैलेन्द्र कुमार संयुक्त सचिव वित्त मंत्रालय, डॉ.विकास दवे , अध्यक्ष-साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश, अध्यक्षता कर रहे थे श्री यन्तुदेव बुधु, अध्यक्ष-हिंदी प्रचारिणी सभा, मॉरीशस।

संयोजिका प्रोफेसर माला मिश्र ने विश्व हिंदी दिवस की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 10 जनवरी 1975 को पहली बार विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हिंदी प्रचारिणी सभा वर्धा की पहल पर नागपुर में आयोजित किया गया था। सन 2006 में 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय भारत सरकार ने लिया। तब से यह दिवस विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।  हिंदी प्रेमी प्रवासी विशेष रूप से जहां कहीं भी हैं वे इस दिवस को मनाते हैं।विश्व हिंदी दिवस मनाने के पीछे उद्देश्य है हिंदी को प्रचार प्रसार और अन्य गतिविधियों के माध्यम से हिंदी को वैश्विक बनाने के प्रयास करना।

इस तरंग संगोष्ठी के आरंभ में पार्थसारथि थपलियाल ने हिंदी का उद्भव, विकास, उसका प्रचार प्रसार, पल्लवित करनेवाले वे लोग जो मजदूरों के रूप में विदेश गए और वहां अपनी भाषा और संस्कृति को आज तक जीवित रखे है। इस पर विचार रखे, साथ ही वैश्विक होती हिंदी का एक लेखा जोखा भी उन्होंने प्रस्तुत किया। डॉ. राकेश दुबे ने हिंदी की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और उसकी महत्ता पर सारगर्भित पक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने साहित्य ,संस्कृति और मीडिया के परिप्रेक्ष्य में हिंदी की विकास यात्रा और चुनौतियों की सटीक समीक्षा प्रस्तुत की। कार्यक्रम की संयोजिका डॉ माला मिश्र ने अपने संबोधन में हिंदी के पल्लवन के लिए कोरोना काल में किये गए प्रयासों से अवगत किया। उन्होंने अनेक अंतरराष्ट्रीय वेबिनारों का जिक्र भी किया, साथ ही विश्व हिंदी दिवस की महत्ता को प्रभावी ढंग से उपयोगी बताया। डॉक्टर शैलेन्द्र कुमार ने मातृ भाषा और संस्कृति की अवहेलना के प्रति असंतोष व्यक्त किया। उनका मानना है कि दृढ़ संकल्प और कार्य के प्रति निष्ठा से बड़ी -बड़ी समस्याएँ हल हो जाती हैं। इसकी शुरुआत प्रत्येक भारतीय को अपने से शुरू करनी होगी। उन्होंने आशा व्यक्त की, कि हिंदी का भविष्य उत्तम है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में यन्तुदेव बुधु ने 1926 से मॉरीशस में हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयासों और जनसहयोग के प्रति अपनी खुशी प्रकट की। उन्होंने कहा हिंदी जनमन की भाषा है जो संस्कृति के साथ घुली मिली हुई है। विद्वान वक्ता ने हिंदी के सांस्कृतिक पक्ष को उदाहरण सहित प्रस्तुत किया। उन्होंने अब तक आयोजित विभिन्न हिंदी सम्मेलनों के माध्यम से विस्तार पाती हिंदी का सोशल मीडिया से व्यापक प्रचार को भी सार्थक माना। बुधु ने हिंदी के विकास और प्रसार में गिरमिटिया मजदूरों और रामचरितमानस की विशिष्ट भूमिका को प्रवासी भारतीयों एवं मॉरिशस के संदर्भ में रेखांकित किया।उन्होंने प्रतिभागियों के आभार भी जताया। गोष्ठी के अंत में तरंग गोष्ठी  की कुशल संचालिका डॉ माला मिश्रा ने सभी का आभार व्यक्त किया और काव्यात्मक स्वरों में हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का संकल्प व्यक्त कर संगोष्ठी को  विराम प्रदान किया।

Saturday, January 1, 2022

Morning awakes with a vision new


Dr Alka Singh 
Faculty Member,
Dr Ram Manohar Lohiya National Law University, Lucknow 



Morning awakes with a vision new,

New Year ahead in the brighter hue!

Thoughts are shaping and  visions on soar,

observations , testimonials , ideas  etal -

all come forth , in  cultural tropes ,

The New Year’s sun with the brighter rays!

Time rolls , a wink is there ,

morning rays amid  beautiful hues .

Thoughts on stride ,  new year there,

Be it good, be it grand!

Strong our grip on a selfless move

Nature in sync- with our version engross.

Strong we emerge, in thoughts in plan,

Our self esteem our industrious self.

Immune! Questions again to answer!

No fear! Time to Cheer!

Happy New Year! Happy New Year !


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सुमित कुमार श्रीवास्तव  ( वैज्ञानिक अधिकारी) भारत वर्ष में उपच्छायी चंद्र ग्रहण दिनांक 5 मई 2023 को रात्रि में 8.45 से 1.02 बजे तक दिखाई दे...