Tuesday, January 11, 2022

हिंदी भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान : विकास दवे , निदेशक ,साहित्य अकादमी,मध्य प्रदेश

 विश्व हिंदी दिवस (10जनवरी) के अवसर पर अध्ययन एवं अनुसंधान पीठ द्वारा आज़ादी का अमृतमहोत्सव को समर्पित अंतरराष्ट्रीय तरंग गोष्ठी  "हिंदी का वैश्विक विस्तार और मूलभूत चुनौतियाँ"  का आयोजन वरिष्ठ प्रोफेसर माला मिश्र, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयोजन में आयोजित किया गया। संगोष्ठी में प्रमुख वक्ता थे- सीनियर रेडियो ब्रॉडकास्टर, भाषा एवं संस्कृति सेवी व लेखक पार्थसारथि थपलियाल, डॉ. राकेश दुबे, अध्यक्ष जनसंचार विभाग चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, डॉ. शैलेन्द्र कुमार संयुक्त सचिव वित्त मंत्रालय, डॉ.विकास दवे , अध्यक्ष-साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश, अध्यक्षता कर रहे थे श्री यन्तुदेव बुधु, अध्यक्ष-हिंदी प्रचारिणी सभा, मॉरीशस।

संयोजिका प्रोफेसर माला मिश्र ने विश्व हिंदी दिवस की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 10 जनवरी 1975 को पहली बार विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हिंदी प्रचारिणी सभा वर्धा की पहल पर नागपुर में आयोजित किया गया था। सन 2006 में 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय भारत सरकार ने लिया। तब से यह दिवस विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।  हिंदी प्रेमी प्रवासी विशेष रूप से जहां कहीं भी हैं वे इस दिवस को मनाते हैं।विश्व हिंदी दिवस मनाने के पीछे उद्देश्य है हिंदी को प्रचार प्रसार और अन्य गतिविधियों के माध्यम से हिंदी को वैश्विक बनाने के प्रयास करना।

इस तरंग संगोष्ठी के आरंभ में पार्थसारथि थपलियाल ने हिंदी का उद्भव, विकास, उसका प्रचार प्रसार, पल्लवित करनेवाले वे लोग जो मजदूरों के रूप में विदेश गए और वहां अपनी भाषा और संस्कृति को आज तक जीवित रखे है। इस पर विचार रखे, साथ ही वैश्विक होती हिंदी का एक लेखा जोखा भी उन्होंने प्रस्तुत किया। डॉ. राकेश दुबे ने हिंदी की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और उसकी महत्ता पर सारगर्भित पक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने साहित्य ,संस्कृति और मीडिया के परिप्रेक्ष्य में हिंदी की विकास यात्रा और चुनौतियों की सटीक समीक्षा प्रस्तुत की। कार्यक्रम की संयोजिका डॉ माला मिश्र ने अपने संबोधन में हिंदी के पल्लवन के लिए कोरोना काल में किये गए प्रयासों से अवगत किया। उन्होंने अनेक अंतरराष्ट्रीय वेबिनारों का जिक्र भी किया, साथ ही विश्व हिंदी दिवस की महत्ता को प्रभावी ढंग से उपयोगी बताया। डॉक्टर शैलेन्द्र कुमार ने मातृ भाषा और संस्कृति की अवहेलना के प्रति असंतोष व्यक्त किया। उनका मानना है कि दृढ़ संकल्प और कार्य के प्रति निष्ठा से बड़ी -बड़ी समस्याएँ हल हो जाती हैं। इसकी शुरुआत प्रत्येक भारतीय को अपने से शुरू करनी होगी। उन्होंने आशा व्यक्त की, कि हिंदी का भविष्य उत्तम है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में यन्तुदेव बुधु ने 1926 से मॉरीशस में हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयासों और जनसहयोग के प्रति अपनी खुशी प्रकट की। उन्होंने कहा हिंदी जनमन की भाषा है जो संस्कृति के साथ घुली मिली हुई है। विद्वान वक्ता ने हिंदी के सांस्कृतिक पक्ष को उदाहरण सहित प्रस्तुत किया। उन्होंने अब तक आयोजित विभिन्न हिंदी सम्मेलनों के माध्यम से विस्तार पाती हिंदी का सोशल मीडिया से व्यापक प्रचार को भी सार्थक माना। बुधु ने हिंदी के विकास और प्रसार में गिरमिटिया मजदूरों और रामचरितमानस की विशिष्ट भूमिका को प्रवासी भारतीयों एवं मॉरिशस के संदर्भ में रेखांकित किया।उन्होंने प्रतिभागियों के आभार भी जताया। गोष्ठी के अंत में तरंग गोष्ठी  की कुशल संचालिका डॉ माला मिश्रा ने सभी का आभार व्यक्त किया और काव्यात्मक स्वरों में हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का संकल्प व्यक्त कर संगोष्ठी को  विराम प्रदान किया।

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