हिमांशु श्रीवास्तव |
अब शायद ही तू कभी हमारे नज़र में आए
कि अब शायद ही कोई फल शज़र में आए
दोस्ती निभ ना सकी और रहेगा ये मलाल भी
भूल हुई कि भूल से हम तेरी रहगुज़र में आए
पूरी उम्र गुज़ार दी और इक यार भी ना बना सके
सोचते हैं किस काम के हैं हम क्यों इस दहर में आए
मेरे अपने ही करते हैं रोज़ दुआएँ मेरे मरने की
उन्हें ये खुशी दे मौला उनकी दुआएँ असर में आए
जिधर देखो चेहरों की भीड़ से सजी हुई है दुनिया
प' मैं जब भी आँखें मूँदूँ एक ही चेहरा नज़र में आए
क्या सितम है कि उसे इक पल भी ख़याल नहीं मेरा
जिसका ख़याल मुझको शाम-ओ-सहर में आए
ख़ैर यही तो ख़ूबी है राह-ए-इश्क़ की मेरे यारों
उतना हीं मज़ा है जितनी मुश्किलें इस सफ़र में आए