25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू किया गया था। यह तारीख इतिहास में काले अक्षर के माफिक दर्ज है। आपातकाल में चंबल घाटी से जुड़े उत्तर प्रदेश के इटावा से गिरफतार हुए समाजवादी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया पर चर्चा करना आज भी लोग बड़े ही गर्व की बात मानते हैं। आपातकाल में गिरफ्तार हुए कंमाडर को 1977 में यहां की जनता ने सांसद बनाकर आपातकाल की यातना का ईनाम दिया था। अर्जुन सिंह भदौरिया की एक खासियत थी कि चाहे अग्रेजी हुकूमत रही हो या फिर भारतीय कमांडर कभी झुके नहीं। लोकतांत्रिक भारत में भी वह तीन बार सांसद बने ओर उनकी पत्नी भी राज्यसभा का चुनाव जीतीं। यह बात अलग है कि 2004 में जब उन्होंने आंखें बंद की तब तक समाजवाद और समाजवादियो ने नई रंगत हासिल कर ली थी।
खड़ा किया समाजवादी आंदोलन
समाजवादियों के गढ़ इटावा में कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया का नाम एक वक्त में बड़े जोरशोर से सुनाई दिया करता था। असल में कमांडर नाम का यह शख्स ही समाजवादी आंदोलन का पहला और बड़ा अनुयायी बना। चंबल के बीहड़ों में समाजवादी आंदोलन इसी शख्स की बदौलत फला फूला रहा। आजादी से पहले समाजवादियों ने यहां पर लाल सेना बनाई थी। जिसका काम जबरन सरकारी कामकाज बाधित करना था। कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया नौजवानों के इस दल के नेता के रूप में उभरे। लोहिया,जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी जैसे दिग्गजों ने उनके कर्तव्य को देख कर के उन्हें कमांडर कहना शुरू कर दिया। यह विश्लेषण उनके नाम से ताजिंदगी चिपका रहा। 10 मई 1910 को बसरेहर के लोहिया गांव में जन्मे अर्जुन सिंह भदौेरिया ने 1942 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। 1942 में उन्होंने सशस्त्र लाल सेना का गठन किया और बिना किसी खून खराबे के अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिये। इसी के बाद उन्हें कमांडर कहा जाने लगा।
1957, 1962 और 1977 में इटावा से लोकसभा के लिए चुने गए कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया का संसद में भी उनके बोलने का अंदाज बिल्कुल अलग ही रहा। 1959 में रक्षा बजट पर सरकार के खिलाफ बोलने पर उन्हें संसद से बाहर उठाकर फेंक दिया गया। लोहिया ने उस वक्त उनका समर्थन किया। पूरे जीवनकाल में लोगों की आवाज उठाने के कारण वह 52 बार जेल भेजे गए। इसमें आपातकाल का दौर भी शामिल था। आपातकाल में उनकी पत्नी तत्कालीन राज्यसभा सदस्य श्रीमती सरला भदौरिया और उनके पुत्र सुधींद्र भदौरिया अलग-अलग जेलो में रहे। उन्होंने पुलिस के खिलाफ इटावा के बकेवर कस्बे में 1970 के दशक में आंदोलन चलाया था। लोग उसे आज बकेवर कांड के नाम से जानते हैं। इटावा में शैक्षिक पिछड़ेपन की समस्या आवागमन के लिए पुलों का आभाव जैसी समस्याओं को कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया प्रमुखता से उठाते रहे।
हमेशा उठाये जनहित से जुड़े मुद्दे
जनहित के बडे और अहम मुददे उठाने में कमांडर का कोई सानी नहीं रहा। 27 फरवरी 2016 को अर्से से उपेक्षित चंबल घाटी में यात्री रेलगाड़ी की शुरूआत होते ही उस सपने को पर लग गये जो साल 1958 में इटावा के सांसद कंमाडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने देखा था। 1957 में पहली बार सांसद बनने के बाद कमांडर ने सदियों से उपेक्षा की शिकार चंबल घाटी में विकास का पहिया चलाने का खाका खींचा और रेल संचालन का खाका खींचते हुए 1958 में तत्कालीन रेल मंत्री बाबू जगजीवन राम और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने एक लंबा चौड़ा मांग पत्र इलाकाई रखा था। जिस पर उनको रेल संचालन का भरोसा भी दिया गया था। कंमाडर 1957 के बाद 1962 और 1977 में भी इटावा के सांसद निर्वाचित हुए, लेकिन चंबल घाटी में उनकी रेल संचालन की योजना किसी भी स्तर पर शुरू नहीं हो सकी, लेकिन कंमाडर के चंबल रेल संचालन की योजना को 1986 सिंधिया परिवार के चश्मोचिराग माधव राव सिंधिया ने पूरा करने का बीड़ी उठाया और देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ मिलकर तत्कालिक तौर पर अमल शुरू कराया।
लाल सेना का किया गठन
आजादी के आंदोलन के दौरान कंमाडर के नाम से लोकप्रिय रहे अर्जुन सिंह भदौरिया ने 1942 की क्रांति के नायक की छवि स्थापित कर लाल सेना गठित की थी। कमांडर के बेटे सुधींद्र भदौरिया का कहना है कि उनके पिता ने चंबल में आजादी के आंदोलन के दौरान जो तकलीफें देखी थीं, उनको दूर करने की दिशा में सांसद बनने के बाद कई अहम निर्णय लेते हुए उनको दूर करने की दिशा में काम किया। उन्होंने बताया कि जब उनके पिता इटावा के सासंद हुआ करते थे, तब इटावा का दायरा फिरोजाबाद से लेकर बिल्हौर तक हुआ करता था। उनको आज भी याद है कि चंबल नदी पर पुल का निर्माण नहीं था तब सभी को पीपे के पुल से ही जाना पड़ता था। इस समस्या को भी उन्होंने हमेशा प्रमुखता से ही उठाया था।
साभार :- पत्रिका
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