Saturday, June 25, 2022

“जया मनी जैसा भाव तया तैसा अनुभव”

 ईश्वर की अनुकम्पा के बिना जीवन में कुछ भी होना असंभव है। ईश्वर- कृपा से ही  सब संभव है। जीवन चलायमान भी ईश्वर कृपा से ही संभव है।भगवत- भक्ति हेतु पूर्ण समर्पण आवश्यक है। किसी भी स्थिति- परिस्थिति में सच्चे हृदय से ही परमात्मा को स्मरण किया जाए, तो वे हमारे सम्मुख उपस्थित होकर हमारी विपदाओं को क्षण भर में ही  समाप्त कर देते हैं। अपने अनुभवानुसार आज मैं एक  ‘सच्ची घटनाजो मेरे तथा मेरे परिवार के साथ घटी आप सभी के साथ साझा करना चाहती हूँ। कुछ समय पूर्व हम परिवार सहित नौ देवियों के दर्शन  के उपरान्त  दिल्ली लौट रहे थे कि मार्ग में रात करीब दो बजे पहाड़ों के बीच सुनसान सड़क पर हमारी कार रैलिंग पर चढ़कर बंद हो गई। बहुत प्रयास के बाद भी कार चल नहीं रही थी। आस- पास कुछ था केवल चांद की रोशनी ही थी। मैंने सच्चे दिल से साई बाबाजी को पुकारा, तभी चमत्कार-सा हुआ। सामने से एक बूढ़े व्यक्ति अकेले रेडा लेकर आते दिखाई दिए। हमारे पास आकर उन्होंने हमसे वहाँ रुकने का कारण पूछा ,कारण जानकर उन्होंने रेडे पर से रस्सा उठाया तथा गाड़ी को रस्सी से बाँधकर ऐसे खींचा, मानो कोई खिलौना खींच रहे हों। फिर गाड़ी को खींचकर वे कुछ किलोमीटर दूर स्थित एक दुकान (जहाँ गाड़ियाँ ठीक होती थीं) पर ले गए। मैंने शीघ्र ही कार से पानी निकालकर उन्हें पीने के लिए दिया पानी पीकर वे बहुत खुश थे मैने कुछ पैसे देने चाहे, तो उन्होंने अस्वीकर कर दिए।अभी मैं कुछ कदम गाड़ी ठीक करने वाली दुकान से चली ही थी, मेरा अन्तर्मन बार- बार कह रहा था कि हो हो ये मददगार साईं बाबाजी ही हैं, मैंने पीछे मुड़कर देखा, तो वहाँ कोई था, रेड़ा, ही कोई व्यक्ति दूर- दूर तक सुनसान सड़क थी गाड़ी ठीक करवाकर हम दिल्ली लौट आए पूर्णविश्वास है मुझे, तथा मेरे परिवार को, कि वे साईबाबा जी ही थे क्योंकि इतनी शीघ्र वे आँखों से ओझल हो गए थे। सामान्य व्यक्ति होता तो कुछ दूर तो दिखाई देता हमारे जीवन पर साई बाबा जी की इतनी कृपा है कि गिनाना असंभव है।हमारा जीवन ही साईं बाबाजी हैं।यह कहना, अतिश्योक्ति होगी साई राम ‘ ‘सबका भला होयही हमारी कामना है     

          

श्रीमती वीना कपूर         

(अध्यापन कार्यरत)                     

(एक शिक्षिका)

Saturday, June 11, 2022

जनविद्रोह दिवस समारोह: मशाल मार्च से रौशन हुआ महुआ डाबर क्रांति स्थल

बहादुपुर ब्लॉक अंतर्गत ऐतिहासिक क्रांति की धरती महुआ डाबर में जन विद्रोह दिवस पर मशाल मार्च निकालकर आज़ादी की अलख जगाने वाले क्रांतिवीरों को नमन किया गया। अपने लड़ाका पुरखों की याद में आयोजित जन विद्रोह दिवस समारोह में आये लोगों में अलग ही जज़्बा देखने को मिला। भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के महानायकों का स्मरण किया गया। क्रांतियोद्धा रास बिहारी बोस की आत्मकथा का विमोचन हुआ। वहीं, आजादी आंदोलन को समेटे दुर्लभ दस्तावेजों की प्रदर्शनी लगाकर नौजवानों को आजादी के महत्व बताया गया। कबीर संगीत मंडली की सांस्कृतिक प्रस्तुति दिल को छू गई। वक्ताओं ने महुआ डाबर में गौरवशाली स्मारक बनाने की मांग की। समारोह में संविधान के प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया गया।

‘महुआ डाबर विद्रोह की दास्तान’ खुला सत्र को संबोधित करते हुए कमांडर-इन-चीफ गेंदालाल दीक्षित के पौत्र डॉ. मधुसूदन दीक्षित ने कहा कि महुआ डाबर में क्रांतिवीर पिरई खां की अगुवाई में उनके इंकलाबी साथियों ने अंग्रेजी सेना के लेफ्टिनेंट लिंडसे, लेफ्टिनेंट थॉमस, लेफ्टिनेंट इंग्लिश, लेफ्टिनेंट रिची, सार्जेन्ट एडवर्ड, लेफ्टिनेंट कॉकल जैस कुख्यात अफसरों की घेराबंदी करके मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेजी सेना के छह अफसरों के मौत के बाद सार्जेन्ट बुशर घायल अवस्था में किसी तरह से अपनी जान बचाकर भाग निकला और अंग्रेजी हुकूमत के उच्च अधिकारियों को घटना की जानकारी दी। अपने छह सैन्‍य अफसरों की मौत से बौखलाई अंग्रेजी सेना ने 20 जून,1857 को बस्ती के तत्कालीन मजिस्ट्रेट पेपे विलियम्स ने घुड़सवार फौजियों की मदद से पांच हजार की आबादी वाले महुआ डाबर गांव को घेरकर जलाकर राख कर दिया। पूरे कस्बे को तहस नहस करने के बाद 'गैरचिरागी' घोषित कर दिया गया। महुआ डाबर गांव के अस्तित्व को मिटाने के लिए पेपे विलियम्स को ब्रिटिश सरकार ने सम्मानित भी किया था। 

वरिष्ठ दस्तावेजी छायाकार सुनील दत्ता ने अफसोस जताते हुए कहा कि आजादी के इतने बरस बीत जाने के बाद भी साजिश के तहत महुआ डाबर क्रांति स्मारक नहीं बन सका। जबकि महुआ डाबर से वर्डपुर तक यहां के आजादी मतवालों के संघर्ष की शानदार विरासत है। 

क्रांतिकारी चिंतक अविनाश गुप्ता ने जोर देते हुए कहा कि अब बिना देर किये यहां गौरवशाली स्मारक बनाकर आजादी महानायकों को उचित सम्मान दिया जाना चाहिए।

समारोह की अध्यक्षता कर रहे महामंडलेश्वर महा शक्ति  पीठाधीश्वर डॉ. फूलचंद्र ब्रह्मचारी ने कहा कि महुआ डाबर का गौरवशाली विरासत को संजोने की बहुत जरूरत है। आजादी की लड़ाई का साझा संघर्ष हमारी धरोहर है।

समारोह के आयोजक शाह आलम राना ने कहा कि आज़ादी के भूले बिसरे नायकों को याद करना हमारा फ़र्ज़ है। यही एक तरीका है जिससे हम समझ सकते हैं आज़ादी के लिये कितने लोगों ने कुर्बानियां दीं, बल्कि इससे आज़ादी की कीमत भी पता चलती है।


समारोह को गौरवशाली सैनिक संतराम मौर्य, प्रोफेसर रामदेव दीक्षित, क्रांतिकारी विचारक धीरेंद्र प्रताप, पूर्व ब्लाक प्रमुख राणा दिनेश प्रताप सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता विजेंद्र अग्रहरि, गौहर अली, नूर मोहम्मद प्रधान आदि ने संबोधित ककिया। समारोह का संचालन शिक्षक वागीश मिश्रा ने किया. महुआ डाबर स्मृति समारोह के संयोजक आदिल खान ने आए हुए अतिथियों का आभार प्रकट किया। आयोजन समिति द्वारा स्मृति चिन्ह व शॉल देकर आए हुए सभी अतिथियों का स्वागत किया गया। इस अवसर पर अखंड मित्रा, मोहम्मद रमजान, सुरेन्द्र कुमार, फकीर मोहम्मद खान, अब्दुल वहीद, विशाल पांडेय, डॉ. जहांगीर आलम, शमीम खान, सुशील कुमार, फरहान आदि मौजूद रहे।

Friday, June 3, 2022

सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव पर मनोवैज्ञानिक चिकित्सक डॉक्टर अंजली गुप्ता से विशेष बातचीत



प्रश्न - युवा वर्ग पर सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों का जीवंत उदाहरण वर्तमान समय में आपके मरीजों में किस प्रकार का देखने को मिल रहा है ?

उत्तर - यह बात सच है कि सूचनाओं के दबाव के चलते कई बार मानव मन भ्रमित हो जाता है अक्सर युवाओं में देखा गया है कि वह बिना परिणाम की चिंता किए बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं |

सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव का एक बड़ा सामाजिक उदाहरण यह है कि मौलिक रिश्तो का मूल्य घट रहा है और स्वार्थी रिश्ते बढ़ रहे हैं | 

प्रश्न - ऐसी परिस्थिति में जब संयुक्त परिवारों की संख्या कम हो रही हो और लोग व्यक्तिगत कुंठा और अवसाद से घिरे हों तो उपाय कि क्या रास्ते संभव हैं ?

उत्तर - जैसा कि कहा जाता है कि "परोपकार अपने घर से ही प्रारंभ होता है" इसलिए उपाय का रास्ता घर से ही संभव है - माता पिता को अपने बच्चों को समय देना होगा, वे उन्हें आया आदि के भरोसे छोड़कर जाएंगे तो कभी भी अपने मूल्य उनमें नहीं देख पाएंगे इसलिए समय देना ही सबसे बड़ा सहयोग हो सकता है इस समस्या से निपटने के लिए जिससे बच्चों में बड़ों के प्रति सम्मान व प्रेम कि भावना जागृत होगी, जिससे समझ, सहयोग, सद्भभावना जैसे तत्व समाज में पुनः पनपने लगेंगे |

प्रश्न - डिजिटल गेमिंग की दुनिया कई बच्चों को लती बना देती है जिससे अवसाद के साथ ही बच्चों की शैली जिद्दी चिड़चिड़ी हो जाती है, ऐसे मरीजों के लिए दवाओं के अलावा क्या कुछ और भी इलाज संभव हैं ?

उत्तर - कई बार पाया गया है कि जो बच्चे अकेले रहते हैं हॉस्टल आदि में रहते हैं, वे गेम के प्रति निर्भरता पैदा कर लेते हैं जो कि उनके लिए एक नशे की तरह होता है, जब उन्हें गेम खेलने को नहीं मिलता तो उन्हें बेचैनी और घबराहट होती है |

ऐसे मरीजों को दवा तब तक नहीं देते जब तक कि काउंसलिंग के माध्यम से उन्हें ठीक करने की कोई भी गुंजाइश बची हो, आज विभिन्न प्रकार की साइकोलॉजिकल तकनीक मौजूद हैं जिन के माध्यम से उन्हें ठीक किया जा सकता है |

हम उन्हें उनकी लत के पैमाने के आधार पर कई प्रकार के व्यायाम (राजयोगा) आदि और आध्यात्म भी बताते हैं |

युवा को भ्रम से निकालने के लिए उसकी दिव्य चेतना पर काम करना आवश्यक होता है |

इस साक्षात्कार को वीडियो माध्यम से देखने के लिए क्लिक करें



Thursday, June 2, 2022

रहे मेरी माँग सिंदूरी

महिलायें ही एक संस्कृति की परंपरा की वाहक होती हैं, उन्हें यदि ये सब विवशता वश, करना छोड़ना पड़े तो परंपराये भी छूटने लगेगी, ये कहना था कानपुर से डॉ कामायनी शर्मा का जिन्होने अखिल भारतीय उत्तराखंड युवा प्रतिनिधि मंच एवं राष्ट्रीय सर्वभाषी ब्राह्मण संगठन के संयुक्त तत्वाधान में एक वेबीनार में प्रतिभाग किया शीर्षक था "रहे मेरी माँग सिंदूरी"


विदूषी महिलाएँ और उनकी वार्ताएं बहुत सब मनभावन था, देहरादून से पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल जी का संवाद और गायन उत्कृष्ट रहा, नेपाल से जुड़ी श्रीमती बिमुन्स पौडेल जी का संवाद अनोखा था।

प्रस्तुत है एक रिपोर्ट संस्था की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तनु खुल्बे जी द्वारा बनाई गई।

मांग मेरी रहे सिन्दूरी, अटल सौभाग्य देने वाला सुहागिनों का व्रत है वट सावित्री अमावस्या

      पतिव्रता नारी की शक्ति, अटल विश्वास, दृढ़ संकल्प व संस्कार से युक्त ज्येष्ठ मास की अमावस्या को पड़ने वाले वट सावित्री व्रत पर अखिल भारतीय उत्तराखंड युवा प्रतिनिधि मंच एवं राष्ट्रीय सर्वभाषी ब्राह्मण संगठन द्वारा मांग मेरी रहे सिंदूरी वेबीनार का कुशल आयोजन किया गया। जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आई सुहागिनों ने वट अमावस्या व्रत की महत्ता, पौराणिक कथा व पूजा विधि तथा पर्यावरण संरक्षण से परीचित कराया।

         कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पद्मश्री डा. माधुरी बड़थ्वाल जी, देहरादून से रही और वट सावित्री व्रत पर अपने विचार व्यक्त किए तथा उत्तराखंड का बहुत ही सारगर्भित गीत अपने सुरीले कंठ से सुना कर सबके मन को भाव विभोर कर दिया। अध्यक्ष हरीश उपाध्याय जी ने शंख ध्वनि से व उपाध्यक्षा तनु खुल्बे जी ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का सुंदर आगाज़ किया, जहां एक ओर शिवानी अवस्थी जी ने नागपुर से अपनी सुमधुर वाणी में गणेश वंदना गा कर वेबीनार का शुभारंभ किया तो वहीं श्रीमती धारणा अवस्थी जी ने बड़ी ही कुशलता व सधे हुए शब्दों के साथ कार्यक्रम का सुंदर संचालन किया।कार्यक्रम के अंत में संस्था की राष्ट्रीय उपाध्यक्षा तनु खुल्बे जी ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी सम्मानीय जनों का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए यह विश्वास दिलाया कि गत वर्षो की भांति आगे भी इसी तरह पर्यावरण संरक्षण, संस्कृति, परंपराओं को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम संस्था द्वारा आयोजित करते रहेंगे।

                 कार्यक्रम के खूबसूरत शुभारंभ के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्कर्ष चैनल के संस्थापक, संपादक हरीश उपाध्याय जी ने संस्था की ओर से कार्यक्रम में सम्मिलित होने पर सबको धन्यवाद देते हुए सबका स्वागत करते हुए कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। 

               नमिता सुयाल ने हल्द्वानी ,उत्तराखंड से वट सावित्री व्रत के पौराणिक व ज्योतिषीय पहलू को उजागर किया।

          भावना बर्थवाल, दिल्ली ने उत्तराखंड में वट सावित्री व्रत पूजा विधान, खान- पान बताते हुए वहा की सुहागन महिलाओं द्वारा हर शुभ कार्य में ओढ़ा जानें वाला पिछोड़ा परिधान की महत्ता की जानकारी दे सबका ध्यानाकर्षित किया। 

         डा.आभा सिंह भैसोड़ा, हल्द्वानी ने स्वरचित पंक्तियों ' विष्णु संग लक्ष्मी की पूजा, संग पूजे बरगद को दूजा.. द्वारा बताया कि वट वृक्ष औषधीय गुणों से भरपूर हैं, जीवनदायिनी, पर्यावरण की रक्षा करने वाला वृक्ष है इसमें त्रिदेव का वास होता है इन्हीं कारणों से यह ऋषियों द्वारा पूजा जाता है। 

             पूनम मिश्रा'पूर्णिमा' नागपुर ने सत्यवान सावित्री की अति रोमांचकपूर्ण ढंग से कथा सुना सबका मन मोह लिया। 

       श्रीमती राधा बिष्ट, लखनऊ ने वट सावित्री व्रत को अटल सौभाग्य देने वाला व अडिग विश्वास का प्रतीक बताया, साथ ही युवा पीढ़ी को आधुनिकता की दौड़ में संस्कार विहीन ना होने का संदेश दिया। 

         डा. कामायनी शर्मा, कानपुर ने अति सौंदर्यपूर्ण भाषा शैली के साथ विवाह के बाद अपने पहले वट सावित्री व्रत की पूजा का संस्मरण बता सबको रोमांचित किया। 

     डा. कविता परिहार, नागपुर ने संस्था के पदाधिकारियों को धन्यवाद दिया व वट वृक्ष को ऑक्सीजन का भंडार बताते हुए जड़ से लेकर फल तक के स्वास्थ्य की दृष्टि से होने वाले फायदे बताए। विद्या चौहान, हरियाणा ने 'तेरा पूजन करें सुहागन हे वट वृक्ष महान, तेरी शरण में जो भी आए दो उनको वरदान, हे वट वृक्ष महान' स्वरचित कविता गीत गाकर सबका मन मोह लिया तो नागपुर से आयी रेखा तिवारी ने भी 'आई कर सोलह श्रृंगार, मैं तो बड़ को पूजू आज मंगल घड़ियों में' स्वरचित गीत गाकर कार्यक्रम में समा बांध दिया। 

      नेपाल से श्रीमती बिमुन्स पौडेल जी ने भी वट सावित्री पर अपनी कविता 'ज्येष्ठ कृष्ण की चतुर्दशी यह बहुत ही पावन होती, एक सुहागन दर्द मिटाने वृक्ष छाऊ तल रोती' सुना सबके हृदय को छू लिया एवं वट सावित्री की उपासना व्रत नेपाल में कैसे मनाया जाता है इस पर भी प्रकाश डाला।

      कार्यक्रम के अंत में संस्था की राष्ट्रीय उपाध्यक्षा तनु खुल्बे जी ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी सम्मानीय जनों का हार्दिक आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में उर्मिला जी , भगवती पंत, लक्ष्मी जोशी, प्रेमा पांडे, मधु पंत, पैंजी जी, कुसुम जोशी जी, अरुणा उपाध्याय, अशीष उपाध्याय जी आदि भी उपस्थित रहें।

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