उत्तर - यह बात सच है कि सूचनाओं के दबाव के चलते कई बार मानव मन भ्रमित हो जाता है अक्सर युवाओं में देखा गया है कि वह बिना परिणाम की चिंता किए बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं |
सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव का एक बड़ा सामाजिक उदाहरण यह है कि मौलिक रिश्तो का मूल्य घट रहा है और स्वार्थी रिश्ते बढ़ रहे हैं |
प्रश्न - ऐसी परिस्थिति में जब संयुक्त परिवारों की संख्या कम हो रही हो और लोग व्यक्तिगत कुंठा और अवसाद से घिरे हों तो उपाय कि क्या रास्ते संभव हैं ?
उत्तर - जैसा कि कहा जाता है कि "परोपकार अपने घर से ही प्रारंभ होता है" इसलिए उपाय का रास्ता घर से ही संभव है - माता पिता को अपने बच्चों को समय देना होगा, वे उन्हें आया आदि के भरोसे छोड़कर जाएंगे तो कभी भी अपने मूल्य उनमें नहीं देख पाएंगे इसलिए समय देना ही सबसे बड़ा सहयोग हो सकता है इस समस्या से निपटने के लिए जिससे बच्चों में बड़ों के प्रति सम्मान व प्रेम कि भावना जागृत होगी, जिससे समझ, सहयोग, सद्भभावना जैसे तत्व समाज में पुनः पनपने लगेंगे |
प्रश्न - डिजिटल गेमिंग की दुनिया कई बच्चों को लती बना देती है जिससे अवसाद के साथ ही बच्चों की शैली जिद्दी चिड़चिड़ी हो जाती है, ऐसे मरीजों के लिए दवाओं के अलावा क्या कुछ और भी इलाज संभव हैं ?
उत्तर - कई बार पाया गया है कि जो बच्चे अकेले रहते हैं हॉस्टल आदि में रहते हैं, वे गेम के प्रति निर्भरता पैदा कर लेते हैं जो कि उनके लिए एक नशे की तरह होता है, जब उन्हें गेम खेलने को नहीं मिलता तो उन्हें बेचैनी और घबराहट होती है |
ऐसे मरीजों को दवा तब तक नहीं देते जब तक कि काउंसलिंग के माध्यम से उन्हें ठीक करने की कोई भी गुंजाइश बची हो, आज विभिन्न प्रकार की साइकोलॉजिकल तकनीक मौजूद हैं जिन के माध्यम से उन्हें ठीक किया जा सकता है |
हम उन्हें उनकी लत के पैमाने के आधार पर कई प्रकार के व्यायाम (राजयोगा) आदि और आध्यात्म भी बताते हैं |
युवा को भ्रम से निकालने के लिए उसकी दिव्य चेतना पर काम करना आवश्यक होता है |
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